49-DISCIPLINE /अनुशासन..; Y.S.पचहरा

【पूर्व में मेरा ये लेख अपने विद्यालय ‘के.एल.जैन इंटर कॉलेज,सासनी,’ की वार्षिक-पत्रिका,”आशा” के अंक-2010 में भी प्रकाशित हो चुका है।】
“Discipline” is the “backbone” of an “Institution”..

[अनुशासन ही एक संस्था की रीढ़ होती है..]
Discipline is a noble and essential virtue of human life.A life without discipline is like a boat without paddle Where there is no discipline, there is cutter confusion, anarchy or chaos. Discipline is not only the backbone of an institution but also it is the backbone of a nation.A development of a human personality, advancement of civilization and culture cannot be thought of in the absense of discipline. Discipline is a training of mind & character.There are certain rules & principles that bind us to other persons a great philosopher Mr. Aristotle defines it…. “Discipline is an obedience to rule formed by the society for the good of all.”
Obedience, co-operation, avoidance of greed and selfishness, respect for others, sense of service, duty and responsibility are some of the major features of discipline.
These qualities can easily cultivated in a child at a tender age. Wise parents inculcate these qualities in their children from the very beginning. If a child is not trained in discipline he becomes a problem for the family, later at school/college and after that in the society and the community.
Discipline is needed every-walk of life…But its needed more in the educational institutions as the students of today are the citizen of tomorrow. They will shoulder the responsibilities of the country in future.If they are indisciplined and rude, the country will suffer.
And indisciplined student carries with him the infection of terrible disease and spreads it among those who came in to his contract. Moreover, in the absence of discipline, good teaching cannot be imparted or ever thought of.
Thus we see that now a days indiscipline is growing alarmingly in educational institutions. Students go on strikes on a slight cause. they violate the rules & regulations of the institutions and take out processions shouting slogans against their chief proctor & the principal.
Hence it is the duty of all teachers, head of the institution, guardians, managing committees & the department concerned to check this wide spread evil among today’s students.. Otherwise there will be no happiness, peace, progress and prosperity in the country.

Thanks
Pachahara, YUG
K.L. Jain Inter College, Sasni, Residence:

88Aपचहरा-हाउस,वसुन्धरापुरम,

हाथरस
Contact No. 8006943731

48-“चौधरी” जाति नहीं एक “सिद्धांत” है …

समय तो लगेगा मग़र “चौधरी” शब्द को ठीक से समझना या जानना हो तो इस वृतांत को पूरा पढ़ ली जीयेगा…” रेहान फ़ज़ल “बीबीसी संवाददाता,
(23 दिसंबर 2018) की रिपोर्ट।

श्री चरण सिंह, सिर्फ़ एक राजनीतिज्ञ, एक किसान नेता, एक पार्टी के अध्यक्ष और एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री का ही नाम नहीं है, चरण सिंह एक “विचारधारा” का भी नाम है। चरण सिंह जी की राजनीति ऐसी थी जिसमें कोई दुराव या कोई कपट नहीं था, बल्कि जो उन्हें अच्छा लगता था, वो ताल ठोक कर उसे अच्छा बोल देते थे, और जो उन्हें बुरा लगता था, उसे बुरा कहने में उन्होंने कभी कोई गुरेज़ नहीं था। इसमें वो ये नहीं देखते थे कि, अच्छा या बुरा करने वाला कौन है या किस दल का व्यक्ति है।

ये वैचारिक शुद्धता आज कहीं नजर नहीं आती।

वरिष्ठ पत्रकार क़ुरबान अली जिन्होंने उनके व्यक्तित्व को बहुत नज़दीक से देखा है, बताते हैं, “चौधरी साहब का बहुत रौबीला व्यक्तित्व था, जिनके सामने लोगों की ग़लत बात बोलने की हिम्मत नहीं होती थी।

क्योंकि सकारात्मकता के कारण उनके आस-पास का “ऊर्जा-चक्र” (Energy-Circle) इतना स्ट्रॉन्ग था कि यदि मैं बयां करूंगा तो आपको अतिशयोक्ति लगेगी। उनके चेहरे पर हमेशा पुख़्तगी होती थी। जिससे नकारात्मक-स्वभाव वाले व षड्यंत्रकारी लोग उनके सामने आने से डरते थे कि, अपराधी लोग ऐसा सोचते थे कि,चौधरी साहब से हमारा अपराध छुपेगा नहीं, उनकी पारखी नजरें सब जान लेंगी, तब क्या होगा…??? ये साइको फीयर सबको रहता था।

वे हमेशा संजीदा गुफ़्तगू करते थे। बहुत कम मुस्कुराते थे। मैं समझता हूँ, शायद एक आध लोगों ने ही उन्हें कभी “कहकहा” लगाते हुए देखा हो। वो उसूलों के बहुत पाबंद थे और बहुत साफ़-सुथरी राजनीति करने के अभ्यस्त थे।

आज के “टिकिया-चोर” नेताओं जैसी बात करने से बेहतर वो चुप रहना ज्यादा उचित समझते थे। ये ही कुछ आदर्श व “सिद्धांत” हैं जिनके कारण ही उन्हें समूचे देश की जनता हिर्दय से उनकी “चौधराहट” को स्वीकारती थी।

रेहन फ़जल बताते हैं, 1937 से लेकर 1977 तक यानि लगातार 08 सत्र तक वो “छपरौली-बागपत” क्षेत्र से विधायक रहे। प्रधानमंत्री बनने के बावजूद मैंने कभी नहीं देखा कि उनके साथ किसी तरह का कोई अनावष्यक”लाव-लश्कर” चलता हो.”वो सदैव एंबेसडर कार में चला करते थे। वो अपने देश में जहाज़ पर उड़ने के ख़िलाफ़ थे। और प्रधानमंत्री होने के बावजूद भी लखनऊ ट्रेन से जाया करते थे। फ़िजूल खर्ची बर्दास्त नहीं थी। अगर घर में कोई अतिरिक्त बल्ब जला हुआ है, तो वे डांटते थे कि इसे तुरंत बंद करो। मैं कहूंगा कि चौधरी चरण सिंह भारतीय राजनीति के ऐसे व्यक्तित्व थे, जिन्होंने अपने वक्त में न्यूनतम लिया और अधिकतम दिया।”

“कोर्टपीस खेलने के शौकीन” ;–

चौधरी चरण सिंह से लोगों का रिश्ता दो तरह का हो सकता था – या तो आप उनसे नफ़रत कर सकते थे या असीम प्यार। बदले में आपको भी या तो बेहद ग़ुस्सा मिलता था या अगाध स्नेह। उनका व्यवहार कांच की तरह पारदर्शी और ठेठ देहाती बुज़ुर्गों जैसा.. अर्थात वे जमीन से जुड़े हुए नेता थे। और उस वक्त अधिकतर नेता ऐसे ही सच्चे सेवक हुआ करते थे। चौधरी चरण सिंह के नाती और चरण सिंह अभिलेखागार का काम देख रहे हर्ष सिंह लोहित चरण सिंह की शख़्सियत के कुछ दूसरे पहलुओं पर रोशनी डालते हुए कहते हैं,

”कम लोगों को मालूम होगा कि वो संत कबीर के बड़े अनुयायी थे। कबीर के कितने ही दोहे उन्हें याद थे।जिन्होंने उन्हें अपने जीवन में आत्मसात किया। वे धोती-कुर्ता अर्थात देसी लिबास पहनते थे। और हाथ में पुरानी ‘एचएमटी’ घड़ी बाँधते थे, वो भी उल्टी ताकि मीटिंग के दौरान समय देखते वक्त सामने वाले को वेइज्जती का एहसास न हो।

वो सौ फ़ीसदी शाकाहारी थे। हर्ष सिंह लोहित बताते हैं, ”अगर वो जानते हों कि आपका शराब से कोई ताल्लुक है तो आपकी और उनकी कभी बात हो नहीं सकती थी। जब भी कोई उनके घर आता था, वो अदब से उनको छोड़ने उनकी गाड़ी तक जाया करते थे और गाड़ी के चलने तक, वो वहीं खड़े रहते थे। वे ऑफ़ मीटिंग/ वे ऑफ मूविंग अर्थात आगमन-निर्गमन के गुण तो कोई उनसे सीखे!!!

कई बार तो ऐसा होता था कि कोई गाँव से आया हो, चाहे वो हमारा जानकार हो या नहीं, वो उसे अपनी गाड़ी से स्टेशन छुड़वाया करते थे। दिल्ली में वो तुग़लक रोड पर रहा करते थे। ”वो कहते हैं, ”हमारे पिता सरकारी मुलाज़िम थे और वे राममनोहर लोहिया अस्पताल के मेडिकल सुपरिनटेंडेंट हुआ करते थे।

इसलिए हम लोग “लोदी-स्टेट” में रहा करते थे, और हमारे और दादाजी के निवास स्थानों के बीच दस मिनट की दूरी हुआ करती थी। वे अक्सर हमारे माताजी व पिताजी को अपने पास बुलवा लेते थे। और एक ज़माने में दिल्ली विश्वविद्यालय के उप कुलपति रहे डॉक्टर सरूप सिंह और ये सब मिलकर कोर्ट पीस खेला करते थे। शाम को घंटा डेढ़ घंटा कोर्ट पीस और हंसी मज़ाक यही उनका काम के तनाव को कम करने का तरीका होता था।

“रोते हुए छोड़ी थी कांग्रेस”
लगातार 40 सालों तक कांग्रेस पार्टी का सदस्य रहने के बाद उन्होंने 1967 में पार्टी से इस्तीफ़ा दिया और एक साल बाद भारतीय क्रांति दल का गठन किया था। क़ुरबान अली बताते हैं, ”बहुत पढ़े लिखे शख़्स थे चौधरी चरण सिंह। 1946 में वो संसदीय सचिव हो गए जिसका कि मंत्री का दर्ज़ा होता था। उसके बाद वो लगातार कैबिनेट मंत्री रहे। जब सुचेता कृपलानी मुख्यमंत्री हुईं तो उन्हें लगा कि शायद उन्हें पीछे छोड़ा जा रहा है। उसी वक़्त ग़ैर-कांग्रेसवाद की राजनीति शुरू हुई। कांग्रेस के सी बी गुप्ता ने सरकार बना ली। उस वक्त सोचा गया कि अगर कांग्रेस का कोई नेता टूट कर आ जाए 10-12 विधायकों के साथ, तो एक ग़ैर-कांग्रेसी सरकार बनाई जा सकती है। ”वो बताते हैं, ”जब इनसे स्थानीय विपक्षी नेताओं ने बात की तो उन्होंने कहा कि मुझे तुम पर विश्वास नहीं है। तुम अपने केंद्रीय नेताओं से मेरी बात कराओ। तब इनकी राम मनोहर लोहिया और अटल बिहारी वाजपेई से बात कराई गई। उन्होंने कहा चौधरी साहब आप हिम्मत करिए और कांग्रेस छोड़िए। हम आपको मुख्यमंत्री बनाएंगे। ”जब 1 अप्रैल, 1967 को उन्होंने कांग्रेस छोड़ी तो उन्होंने ज़ारोक़तार रोते हुए भाषण दिया कि सारी उम्र उन्होंने “कांग्रेस- संस्कृति” में बिताई है। अब कांग्रेस छोड़ते हुए मुझे बहुत तकलीफ़ हो रही है। मग़र स्वाभिमान के हाथों मजबूर हूँ.. दो दिन बाद चौधरी साहब ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली और उनके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में पहली ग़ैर कांग्रेस सरकार बनी जो अद्भुत सरकार थी, जिसमें जनसंघ के साथ कई दिग्गजों का साथ था।

”मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बने थे। चरण सिंह के समर्थन से 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद जनता पार्टी के गठन में भी चरण सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। क़ुरबान अली बताते हैं कि उनके समर्थन से ही जगजीवन राम की जगह मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। उस समय चौधरी साहब वेलिंगटन अस्पताल में भर्ती थे। जनता पार्टी के सभी सांसदों को जे.पी.ने गाँधी पीस फ़ाउंडेशन पर बुलाया। वहाँ नेता चुने जाने के लिए पर्चियाँ डाली जाने वाली थीं। उस वक़्त एक खेल खेला गया जिसमें राज नारायण का इस्तेमाल किया गया। सांसदों से कहा गया कि अगर आपने मोरारजी देसाई का समर्थन नहीं किया तो जगजीवन राम प्रधानमंत्री बन जाएंगे। इस षड्यंत्र में धोखे से चौधरी साहब को फंसा लिया था। कई सासंदों ने मुझे बताया कि, चौधरी साहब ने बाद में अपनी भूल को स्वीकारा और जगजीवन राम से भी माफ़ी मांगी क्योंकि उनकी वजह से वो प्रधानमंत्री नहीं बन पाए। मोरारजी देसाई से चरण सिंह की तल्ख़ी।
लेकिन इन्हीं चरण सिंह की जनता पार्टी सरकार को तोड़ने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही।

दो वर्ष से कम समय में ही केंद्र में ग़ैर कांग्रेस सरकार का प्रयोग असफल हो गया और मोरारजी देसाई को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.पूर्व क़ानून मंत्री शाँति भूषण अपनी आत्मकथा ‘कोर्टिंग डेस्टेनी’ में चरण सिंह और मोरारजी देसाई के संबंधों की तल्ख़ी का बयान कुछ इस तरह करते हैं,

”1978 आते आते इस अफवाह ने ज़ोर पकड़ लिया कि चरण सिंह सरकार का तख़्ता पलटने वाले हैं।उन्हीं दिनों चुनाव सुधार पर एक मंत्रिमंडलीय समिति का गठन किया गया था। जिसके सदस्य थे चरण सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, प्रताप चंद्र और मैं ”
वो बताते हैं, ”इस समिति की बैठक ठीक 11 बजे हुआ करती थी. एक दिन चरण सिंह इस बैठक में देर से पहुंचे और हम सब को अपना इंतज़ार करते देख बहुत शर्मिंदा हुए। फिर वो बताने लगे कि उन्हें देर क्यों हुई।

जब वो कार में बैठ रहे थे तो एक पत्रकार ने सवाल पूछ लिया कि क्या आप प्रधानमंत्री बनने के लिए बहुत तत्पर हैं..? इस पर चरण सिंह को ग़ुस्सा आ गया और वो बोले कि प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखने में क्या बुराई है। ” उल्टा उन्होंने उस पत्रकार से ही सवाल कर डाला कि क्या तुम एक अच्छे अख़बार के संपादक बनना नहीं पसंद करोगे? और अगर तुम ऐसा नहीं सोचते तो तुम्हारा जीवन निरर्थक है। फिर उन्होंने उस पत्रकार से कहा कि मैं एक दिन इस देश के प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा ज़रूर रखता हूँ.. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि मैं मोरारजी देसाई को उनके पद से हटाने के लिए षडयंत्र कर रहा हूँ।

चरण सिंह यहाँ पर ही नहीं रुके और बोले एक दिन मोरारजी देसाई मरेंगे और तब मैं प्रधानमंत्री बन जाऊं, तो इसमें बुराई क्या है। मुझे लगा कि किसी जीवित व्यक्ति की मौत के बारे में कोई इस तरह बात नहीं करता। मुझे ये देख कर ताज्जुब हुआ कि चौधरी साहब मोरारजी देसाई की मौत के बारे में इतनी सहजता से बात कर रहे थे,

”पार्टी तोड़ने के लिए मजबूर हुए चरण सिंह..

लेकिन उस समय चरण सिंह के नज़दीकी रहे और इस समय जनता दल (यू) के महासचिव के सी त्यागी मानते हैं कि चरण सिंह के सामने ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी गईं कि उनके सामने पार्टी तोड़ने के सिवा कोई चारा नहीं रहा। केसी त्यागी बताते हैं,

”जो लोग पार्टी बनाए जाने के ख़िलाफ़ थे, वो लोग पार्टी के मालिक बन गए, चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में 100 से अधिक एमपी आए थे और दो बड़े मंत्रालय देकर लोक दल के घटक को बहलाने की कोशिश की गई, मोरारजी जिनके मुश्किल से 20-22 सांसद थे, उनके सात कैबिनेट मंत्री बनाए गए और पहले दिन से ही भारतीय जनसंघ, चंद्रशेखर के नेतृत्व का धड़ा और मोरारजी देसाई चरण सिंह को कमज़ोर करने की मुहिम में लग गए.””किसानों के हितों की भी अनदेखी होती रही.. और एक स्थिति ऐसी आ गई कि हमारे लिए जनता पार्टी में रहना ग़ुलामी जैसा हो गया.. जो चौधरी चरण सिंह के बनाए हुए मुख्यमंत्री थे। वो जनसंघ और अन्य नेताओं के षडयंत्र से हटाए जाने लगे..

उत्तर प्रदेश से रामनरेश यादव, बिहार से कर्पूरी ठाकुर और हरियाणा से देवीलाल को हटा कर किसान विरोधी और पिछड़ा विरोधी सरकारें राज्यों में बनाई जाने लगीं., तब हमारे सामने उस पार्टी से अलग होने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचा.”

इंदिरा गांधी को कराया गिरफ़्तार ;-

चरण सिंह ने जब गृह मंत्री के तौर पर इंदिरा गाँधी को गिरफ़्तार करने के आदेश दिए तो उस पर भी कई सवाल उठाए गए. अगले ही दिन मजिस्ट्रेट ने उनकी रिहाई के आदेश दे दिए, क़ुरबान अली बताते हैं, ‘ इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ उनका पूर्वाग्रह तो पहले दिन से ही था। उनका मानना था कि जिस तरह इंदिरा गाँधी ने आपातकाल के दौरान एक लाख लोगों को फ़र्ज़ी मुक़दमें लगा कर जेल में बंद कर दिया था, उसी तरह से इंदिरा गाँधी को भी जेल में बंद किया जाना चाहिए। ‘एक बार उन्होंने इतनी सख़्त बात कही कि मैं तो चाहता हूँ कि इंदिरा गाँधी को क्नॉट प्लेस में खड़ा कर कोड़े लगवाए जाएं।

लोग उन्हें समझाते भी थे कि लोकतंत्र में सबसे बड़ी सज़ा होती है कि जनता किसी व्यक्ति को चुनाव में हरा दे। जनता ने उनके ख़िलाफ़ अपना फ़ैसला सुना दिया है। लेकिन अगर आप उन्हें और तंग करेंगे तो इसका राजनीतिक लाभ उन्हें मिलेगा। इस मामले में मोरारजी देसाई भी उनके साथ थे। उन्होंने शाह कमीशन बनवाया, शाह कमीशन में इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ रोज़ गवाहियाँ और बयानात होते थे, आख़िरकार उन्होंने इंदिरा गाँधी को जेल भिजवा कर ही दम लिया।

‘सरकार बनाने के लिए कांग्रेस का सहारा;-

चरण सिंह जी की उस समय भी बहुत किरकिरी हुई जब उन्होंने जनता पार्टी टूटने के बाद सरकार बनाने के लिए कांग्रेस का सहारा लिया, जिसने कुछ दिनों बाद ही उनकी सरकार से समर्थन वापस ले लिया।क़ुरबान अली कहते हैं, ”ये तो उनका बहुत ही बचपना था। उस समय संजय गाँधी सक्रिय थे,जनता पार्टी को पूरी तरह से तोड़ना उनका मक़सद था,राजनारायण तो पहले ही जनता पार्टी से निकाल दिए गए थे। चौधरी साहब तो वापस ले लिए गए, लेकिन जब राजनारायण को वापस लेने की बात आई तो मोरारजी देसाई ने साफ़ इंकार कर दिया, उनकी जगह रवि राय को ला कर स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया। राजनारायण बहुत विध्वंसक राजनीति करते थे। ”वो बताते हैं, ”जनता पार्टी में झगड़े बहुत बढ़ रहे थे, एक दूसरे के ख़िलाफ़ लेख लिखे जा रहे थे और रोज़ अनुशासनहीनता बढ़ रही थी, लेकिन चौधरी साहब ने आख़िरी वक़्त तक इन सबसे अपनेआप को अलग रखा। वो जनता पार्टी से इस्तीफ़ा देने वाले आख़िरी व्यक्ति थे।

जब तक उनके साथ 82 सांसद इकट्ठा नहीं हो गए, उन्होंने इस्तीफ़ा नहीं दिया। इस्तीफ़ा देने के बाद उन्होंने कांग्रेस के दोनों धड़ों के समर्थन को ‘टेकेन फ़ॉर ग्रांटेड’ लिया।”
”इंदिरा गाँधी अपने 12 विलिंग्टन क्रेसेंट के निवास पर बैठी इंतज़ार कर रही थीं कि चौधरी साहब शपथ लेने के बाद उन्हें धन्यवाद देने आएंगे। लेकिन जब चौधरी साहब वहाँ आ रहे थे तो कहा ये जाता है कि उनके एक दामाद ने उनसे कहा कि आपको इंदिरा गाँधी के पास जाने की क्या ज़रूरत है, उल्टे इंदिरा गांधी को आपके पास आना चाहिए। उसी दिन इंदिरा गांधी ने चरण सिंह की सरकार गिराने का फ़ैसला ले लिया। यह भी भारत के इतिहास में दर्ज़ हो गया कि चौधरी साहब अकेले ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्होंने प्रधानमंत्री रहते कभी संसद का सामना नहीं किया. कुछ ही दिन में छठी लोकसभा भंग हो गई और चुनाव की घोषणा हो गई.”

जब चरण सिंह ने कोटे का स्कूटर वापस करवाया;-

इस सबके बावजूद चौधरी चरण सिंह ने सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी के जो प्रतिमान स्थापित किए उनकी आज के युग में कल्पना भी नहीं की जा सकती,उनके नाती हर्ष सिंह लोहित एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं..

”हमारे मौसाजी वासुदेव सिंह आजकल अमरीका में रहते हैं,उन दिनों वो दिल्ली में काम करते थे. उस ज़माने में सब कुछ कोटे से मिलता था। उनको एक स्कूटर चाहिए था, उनको मालूम पड़ा कि मुख्यमंत्री का एक कोटा होता है स्कूटर बुक करने के लिए यूपी से..”
”वासुदेव सिंह ने चौधरी साहब के पीए से मिल कर एक स्कूटर बुक करा दिया.. वो समय आने पर स्कूटर की डिलीवरी लेने लखनऊ आए। जब वो चरण सिंह जी से मिलने उनके घर पहुंचे, तो उन्होंने उनके आने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि वो स्कूटर लेने आए हैं, जब चौधरी साहब को पूरी बात पता चली तो उन्होंने मौसाजी से तो कुछ नहीं कहा पर अपने पीए को बुला कर पूछा कि आपने इन्हें कोटे से स्कूटर कैसे दिलाया ? ये उत्तरप्रदेश में तो रहते नहीं हैं..

ये तो दिल्ली निवासी हैं. आप तुरंत स्कूटर की बुकिंग कैंसिल करिए और इनके पैसे वापस दिलवाइए. बाद में हमारे मौजाजी वासुदेव सिंह ने मुझे बताया कि मेरा लखनऊ आकर चरण सिंह के साथ बैठना मुझे बहुत मंहगा पड़ गया, इतने नियमों के पाबंद थे चौधरी साहब!!

”नाच गाना और फ़िल्में बिल्कुल पसंद नहीं थी। वे
किताबें पढ़ने के बहुत शौकीन थे, लेकिन फ़िल्में वगैरह देखने से उनका दूर दूर का वास्ता नहीं था।

हर्ष सिंह लोहित याद करते हैं, ”मुझे याद है लखनऊ में उन्होंने हमें सिर्फ़ एक पिक्चर देखने की इजाज़त दी थी और वो थी मनोज कुमार की उपकार.””जब वो गृह मंत्री थे तो एक बार हम उनके पास बैठे हुए थे. किन्हीं साहब ने गाँव पर एक पिक्चर बनाई थी जिसे वो चौधरी साहब को दिखाना चाहते थे. चौधरी साहब कोई ख़ास रुचि नहीं दिखा रहे थे.. लेकिन जब उन्होंने बहुत ज्यादा इसरार किया तो उन्होंने पिक्चर शुरू करने की अनुमति दे दी. पिक्चर शुरू होने के कुछ देर बाद जैसे ही एक अभिनेत्री ने नाचना शुरू किया, उन्होंने उसी सेकेंड उसे बंद करवा दिया, और बाहर उठ कर चले गए।

सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़;-

चौधरी चरण सिंह का सबसे बड़ा योगदान था हिंदु और मुस्लिम सांप्रदायिकता को कमज़ोर करना.. उन्होंने हमेशा सांप्रदायिक दंगों को सख़्ती से कुचला.

.क़ुरबान अली बताते हैं, ”हालांकि इस्लाम के बारे में उनकी राय अच्छी नहीं थी. लेकिन वो मुस्लिम वोट बैंक और उसके मनोविज्ञान को बहुत अच्छी तरह समझते थे. वो मुसलमानों को चुनाव लड़ने के लिए बहुत टिकट देते थे. जब भी वो उत्तरप्रदेश में रहे या केंद्र में रहे, दंगों के ख़िलाफ़ उन्होंने बहुत कड़ा रुख़ अपनाया.””मुझे याद है कि 1977 से 1980 के बीच उत्तरप्रदेश में दो तीन बड़े दंगे हुए – अलीगढ़ ,बनारस और संबल में. उन्होंने मुख्यमंत्री रामनरेश यादव को बहुत सख़्ती से डांट कर कहा कि ये दंगे हर हालत में रुकने चाहिए।

राजनीतिक विरासत पर संघर्ष;-

चरण सिंह की राजनीतिक विरासत पर कई लोगों ने अधिकार जमाने की कोशिश की, वो चाहे मुलायम सिंह यादव हों, महेंद्र सिंह टिकैत हों या जनता दल परिवार के अन्य नेता।

क़ुरबान अली कहते हैं, ”उनकी विरासत कई जगह बंटी, आज जितनी भी जनता दल परिवार की पार्टियाँ हैं, उड़ीसा में बीजू जनता दल हो या बिहार में राष्ट्रीय जनता दल हो या जनता दल यूनाएटेड ले लीजिए या ओमप्रकाश चौटाला का लोक दल , अजीत सिंह का ऱाष्ट्रीय लोक दल हो या मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी हो, ये सब चरण सिंह की विरासत हैं.””आज कल व्यक्तिवादी और परिवारवादी राजनीति का बोलबाला है, कुछ कम्यूनिस्ट पार्टी को छोड़ दीजिए, कोई भी दल इस बीमारी से अछूता नहीं है, आप चरण सिंह पर जातिवादी होने का आरोप लगा सकते हैं, उन पर आप अवसरवादी होने का आरोप भी लगा सकते हैं, लेकिन उन पर भ्रष्टाचार का आरोप कभी नहीं लगा

।””वो बहुत सादगी के साथ अपने आख़िरी दिनों में 12, तुग़लक रोड में रहते थे. उनकी पत्नी गायत्री देवी, जो कि सांसद भी थी, उन्हीं के हाथ का बना खाना खाते थे. चार चपाती, एक दाल और एक सब्ज़ी. इसके अलावा मैंने चौधरी साहब को कभी कुछ और खाते नहीं देखा. उन पर ये आरोप भी लगता था कि उनका भूगोल झाँसी तक सीमित था. ये बात सही है. उनको लगता था कि मैं चेन्नई में जा कर क्या करूंगा. वहाँ मेरी बात कौन सुनेगा ?”

“शोषित वर्ग की आवाज़” ;-

चरण सिंह इसलिए नहीं याद किए जाएंगे कि वो उत्तरप्रदेश, हरियाणा या राजस्थान में अपने बूते पर विधायक चुनवा सकते थे, या वो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री या भारत सरकार के गृहमंत्री व प्रधानमंत्री थे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने समाज के उस वर्ग को आवाज़ दी जो शोषित और उपेक्षित था और उस वक्त जिसकी कोई लॉबी नहीं थी।हालांकि इसकी कीमत उन्हें शहरी तबक़े के भारी विरोध और असहयोग से चुकानी पड़ी. अपनी समस्त कमज़ोरियों और भूलों के बावजूद चरण सिंह भारतीय राजनीति के असली ”चौधरी” थे। जो सदैव रहेंगे।

आज पूर्व प्रधानमंत्री श्री चौ.चरण सिंह जी की 36

वीं पुण्यतिथि पर उनको इस लेख के द्वारा योगेंद्र पचहरा की विनयांजलि..

47-“भाग्य-विधाता” कौन?

हमेशां से काफ़ी उलझा हुआ सवाल…?

आख़िर मानव जीवन के भाग्य या किस्मत का उत्तरदायी कौन..?
क्या आप इस बात से इत्तिफ़ाक़ रखते हैं =?
कि प्रत्येक जीव द्वारा किये गए कर्मों के आधार पर ही उसके अपने “भाग्य” का निर्धारण होता है। क्योंकि मनुष्य के कर्म संचित होते रहने की प्रक्रिया के कारण उसके कर्म “स्टोर-कर्म” कहे जाते हैं। और फिर वे ही ‘स्टोरकर्मा’ प्रारब्ध बनकर आत्मा में निहित एक स्थायी खाते की तरह प्राणी के जीवन में होने वाले उतार-चढ़ाव उसके अपने कर्मों के ही प्रतिफल होते हैं।
आइये इस तथ्य को गम्भीरपूर्वक समझने का एक प्रयास करते हैं……….
“कर्म” की गहराई में जाएं और देखें तो इसकी तीन श्रेणी होती हैं…,
1- अकर्म;– “लोकहितार्थ-कर्म”। अर्थात जन कल्याण हेतु किये गये कर्म। निष्काम कर्म, श्रेष्ठ-कर्म।

(जो बार-बार इस मृत्युलोक में हिचकोले खाने से बचा कर हमें मुक्ति दिलाते हैं।)

2- कर्म;– “स्वहितार्थ-कर्म”। अर्थात परिवार के सीमित दायरे में रहकर सिर्फ अपने ही अपने लिए किये गये कर्म। आशक्ति युक्त-कर्म, सामान्य-कर्म।

(जो बार-बार नए-नए शरीर धारण करके इसी मृत्युलोक में हिचकोले खाने को मजबूर करने वाले कर्म।)

3- विकर्म ;– “पाप जन्य-कर्म”। अर्थात चालाकी से अहंकारवश जाने अनजाने दूसरों को आघात पहुंचाने वाले कर्म जो दुष्कर्म की श्रेणी में आते हैं। इनके परिणामस्वरूप

(“जीव” नए-नए शरीर तो पाता है मग़र निम्न स्तर के अधम व्यक्ति या जैसे; कीड़े-मकीडे (परजीवी) आदि जो दूसरों पर आश्रित रह कर पूर्व में किये गए विकर्मों के पापों को भोगते हुए प्राणी को निरन्तर कष्ट में रखने वाले कर्म।)

इन सभी कर्मों का लेखा-जोखा ( Right-Calculation) ही ‘जीवन’ का एक आधार बनता है।
सामान्य स्तर पर ये किसी न किसी द्वारा अक्सर कहा भी जाता रहा है कि,
“जैसा कर्म वैसा जीवन”

जो न केवल ‘अकाट्य सत्य’ है, वल्कि ‘मानव जीवन’ की सच्चाई है। क्योंकि हम जो कुछ भी करते हैं मानो एक तरह से “कर्म-बीज” बोते हैं ,वो कुछ समय के अंतराल पर उगकर फल (परिणाम) के रूप में हमारे सामने आते हैं। दरअसल ये “संचित-कर्म” ही हमारा “भाग्य” होते है। तो फिर आप ही विचार कीजिये कि,.. “भाग्य-विधाता” कौन हुआ..? जीवन मे अच्छे और बुरे का जिम्मेदार…आख़िर कौन है..? तो ध्यानपूर्वक अपनी अन्तरात्मा की आवाज सुनियेगा.. इस प्रश्न के जवाब में आपके जमीर की आवाज भी आपको यही अनुभूति कराएगी.. कि, “कर्म-कर्ता” ही जिम्मेदार होता है। अर्थात कर्म-कर्ता कौन..? वो “व्यक्ति” जो “कर्म” करता है।यानि ख़ुद। न कोई ईश्वर न अल्लाह, न कोई अन्य शक्ति। इंसान ख़ुद ही अपने भाग्य का जिम्मेदार होता है।

इसीलिए अध्यात्म की भाषा में उसे ही भाग्य “विधाता” कह दिया जाय तो भी कोइ अतिश्योक्ति नहीं होगी।

मेरा विश्वास है कि अध्यात्म का ये सरलीकरण आपके दिल की गहराई को कुछ तो अवश्य बढ़ाएगा।
निष्कर्ष स्वरूप यही कह सकते हैं कि, करते समय जो ‘कर्म’ था, लौटते समय (जीवन में भुगतते वक़्त) वही ‘किस्मत” का रूप ले लेता है। इसीलिए इस सम्पूर्ण विधान के मूल में जाएं, तो तश्वीर एकदम स्पष्ट हो जाती है। मेरे कहने का आशय विल्कुल स्पष्ट है कि, “दूध का दूध और पानी का पानी” हो जाता है।

….मगर अफसोस! .की बात तो तब होती है। जब सब कुछ देखने-सुनने के बाद भी इंसान दैनिक जीवन में वही करता है जो करता आया है। इसी को मैं सदैव “Knowledge” & “wisdom” के बीच एक बहुत बड़े फ़र्क की दृष्टि से देखता हूँ। जैसे; –

लोगों को ज्ञान तो बहुत होता है, परन्तु बुद्धिमानी पूर्ण तरीके से अपने “असल जीवन” में न जाने क्यों उस ज्ञान का उपयोग या कायदे से क्रियान्वयन (implimentaion) होता दिखता नहीं है ..? आखिर क्यों…?

विषय थोड़ा गम्भीर है। विचार अवश्य कीजियेगा.. धन्यवाद।

सभी को नमस्कार।
;पब्लिक राइटर:
युग पचहरा,
जन्मभूमि; श्री साहब सिंह सदन,
नीमगाँव,राया,मथुरा

46-“कोरोना से डरो..ना !”

डॉक्टर लोग अक्सर अपने-अपने तरीके से हमें समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि हमें अपने अंदर से कोरोना का डर निकाल देना चाहिए। बात भी ठीक है।
लगभग दो महीने के लोकडाउन से एक बात तो हम लोग समझ ही गए हैं कि कोरोना तो अब हमारे साथ रहेगा। इसलिए..कम से कम वैक्सीन आने तक।
अब सवाल बनता है कि बिना डरे कोरोना के साथ..अपने आपको सुरक्षित रखते हुए Q.जीया कैसे जाय..?

सबसे पहले हमें ये समझना है कि ये वायरस नाक और मुंह के जरिये ही शरीर में प्रवेश करता है।

दूसरे मास्क अवश्य पहनना है।
तीसरी बात ये कि हमें साथ में एक सेनेटाइजर की बोतल भी रखनी चाहिए, ताकि जाने अनजाने में यदि किसी से टच भी कर जाएं तो अपने हाथों को सेनेटाइज सकें। सिर्फ सोशल-डिस्टेनसिंग-मेन्टेन करना है। अगर कभी गलती से किसी के नज़दीक आ भी जाय,तो घबराना नहीं है क्योंकि ऐतियात तो वो सामने वाला भी बरत रहा है।

जब इतना पालन कर लिया, तो यदि आप रेडजोन में भी है, तो भी आपको चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योकि डर लोगों को कहीं ज्यादा सता रहा है असल में “रोग” इतना नहीं सताता। और भगवान न करे अगर ये रोग किसी को लग भी गया तो भी कोई बात नहीं है अपने शरीर के अंदर प्रतिरोधक-क्षमता(ईमयूनिटी) को सही रखना है।और हाँ ये रोग थोड़ा जल्दी फैलने वाला तो है, इसलिए दूरी तो सदैव बनाके रखनी ही है। कई बार कॉलोनी में आते जाते मुझ से साथी-लोग पूछ लिया करते हैं कि sir ये इम्युनिटी कैसे बढ़ेगी..? तो मेरा उनसे यही कहना होता है कि अगर कर सको..और मेरे तरीके से चलो, तो भई ये एक बड़ा आसान सा फार्मूला है।
1- रात को सोने से पहले परिवार में बोल दीजिए जो भी दूध बनाएं, वो लगभग एक जग दूध में एक या ढेड़ चम्मच हल्दी डाल के उबाल दें। और परिवार में सब को दवा के माफ़िक एक-एक कप पीने को दे दें। और..

2- विल्कुल इसी प्रकार सुबह उठें तब एक जग नीबू पानी गर्म करके बना दें और जो भी विस्तर या बेड-रूम से निकले पहले एक गिलास पानी पिएं तभी आगे बढे..जब तक हम ये सारी बातें मेन्टेन करते रहेंगे तो हमारी इम्युनिटी गेरण्टी के साथ सही रहेगी। अब आप जान लीजिए आपने देखा होगा कि हर बड़े बदलाव के लिए एक हादसा जरूरी है। जिससे ज़हन में स्वतःएक इमरजेंसी क्रिएट हो जाती है। जो इंसान से काफ़ी दुर्लभ सी लगने वाली बातों को भी बडी आसानी से अपने अंजाम तक पहुंचवा देती है। ये आप भी जानते हैं कि इंडियंस ने कभी भी क्वालिटी “लाइफ-स्टाइल” की तरफ बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया, तो मेरे ख्याल से अब वो समय आ गया है कि, कुदरत हमें फ़ोर्स करके नीट & क्लीन रहने, बिना किसी ख़ास कारण के लोगों से मिलने, होटल या मार्किट का कचड़ा जैसा खाना न खाने ,पार्टी से बचने आदि हमारे रोज मर्रा के तौर-तरीके जो बिगड़ गए थे, अब कुदरत हमें उनके सही तरीके सिखा रही है। तो कोई बात नहीं ये सब हमें ख़ुशी-ख़ुशी सीख भी लेने चाहिए। किसी तरह का ऑब्जेक्शन, ना पसन्द जैसी बातें नही करनी हैं, हो सकता है इस लोकडाउन में आपकी पसंद की चीजें न हो पा रहीं हों। मग़र चिंता करने की जरूरत नहीं है। पौष्टिकता के हिसाब से अगर आप मूंग,चने की दाल व चावल या दो एक चपाती सुबह-शाम दो दफ़े खाते हो, और सुबह दूध के साथ ब्रेड हल्का सा ब्रेक-फ़ास्ट भी लेते हो, तो आपके शरीर को सब कुछ मिल जायेगा आपको फिर कुछ भी होने वाला नहीं है। क्योंकि ये तो आप भी समझ रहे हो ये समय कोई लाइफ-टाइम तो रहने वाला नहीं है। दो या चार महीने दाल-चावल खा कर मूंग-चने की दाल में सारे पौष्टिक आहार आ जाते हैं तो बताओ क्या फर्क पड़ने वाला है, मैं कहता हूँ कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।अगर ये व्यवस्था बना लेते हो तो
ज़नाब! अब लाइफ को इसी तरह पोजीटिवली मैनेज कीजिये, और अपने-अपने काम धंधे पर खुशी-खुशी लग जाये। कुछ लोग हैं बात का बतंगड़ बनाने में माहिर होते हैं ,अफवाएँ फैला कर मज़ा लेते हैं कि “अरे वहां इतनी भीड़ है, प्रशासन क्या कर रहा है.. ? वगैरा वगैरा। तो क्या हुआ घबराओ नहीं भीड़ लगी है तो छट भी जाएगी। इसीलिए आप पिछले लगभग दो महीने से देख भी रहे हो लोग सीख रहें हैं कुछ पुलिस के थापड़ से, कुछ डंडे से और कुछ ज्यादा ही ढीठ हैं वो बीमार होकर.. मग़र सीख अवश्य रहे हैं..पर इस हादसे से गुज़रना जरूरी है। अगर हादसे से गुज़रेंगे नहीं, तो कोरोना के बाद का जो “नया जीवन” है उस तक पहुंचेंगे नहीं। इसलिए उस जीवन तक पहुंचने के लिए इस हादसे को postponed नहीं करना है, उससे गुज़रना है। परेशानियों का अनुभव लेना है। इन सारे नियमों का पालन करते हुए एक जांबाज सियाही की तरह safe रहेंगे। जिस प्रकार सीज़नल रोग ड़ेंगू, मलेरिया, हैजा हर वर्ष आते हैं हम उन्हीं के अनुसार एतियात भी बरतते हैं,और वो वक्त गुज़र जाता है। उम्मीद रखो ठीक वैसे ही ये महामारी का वक़्त भी गुज़र जाने वाला है। इसलिए किसी को डरने की कोई जरूरत नहीं है। मतलव “कोरोना से डरो.. ना ! ”
जय हिंद जय भारत ;
पब्लिक राइटर ; युग पचहरा

मूलनिवासी ; नीमगाँव, मथुरा।

45- “अहंकार” की कोई कीमत नहीं होती…”

वाक़ई “अहंकार” की कोई कीमत नहीं होती…। आइए, इसे एक ऐतिहासिक कहानी के जरिये जानने का प्रयास करते है..
गांव में एक भिक्षु आया करता था। एक दिन अशोक उठा.. और उस भिक्षु के चरणों में सिर रख दिया। सम्राट अशोक के राज्य का जो वरिष्ठ वजीर था, उसे सम्राट का ये वर्ताव विल्कुल भी अच्छा नहीं लगा।
“अशोक जैसा सम्राट गांव में भीख मांगते किसी भिखारी के पैरों पर सिर रखे,”
महल लौटते ही उसने कहा कि नहीं सम्राट, यह मुझे ठीक नहीं लगा। आप जैसा सम्राट, जिसकी कीर्ति शायद सम्पूर्ण जगत में कभी कोई सम्राट नहीं छू सकेगा फिर, वह एक साधारण से भिखारी के चरणों पर सिर रखे !ये कौन सा तरीका है।

अशोक हंसा और चुप रह गया। दो महीने बीत जाने पर उसने बड़े वजीर को बुलाया और कहा कि चलो एक काम करते है। एक प्रयोग करके देखते हैं, तुम ये कुछ सामान ले जाओ और गांव में बेच कर आ जाओ। सामान बड़ा अजीब था।
उसमें बकरी का सिर था, गाय का सिर था, आदमी का सिर था, कई जानवरों के सिर थे।

वह वजीर बेचने गया। गाय का सिर भी बिक गया और घोड़े का सिर भी बिक गया, यानि धीरे-धीरे सारे सिर बिक गये, सिवाय आदमी के। मनुष्य का सिर कोई लेने को तैयार नहीं हुआ। लोग कहने लगे इस गंदगी को लेकर कोई क्या करेगा? इसका क्या औचित्य..?आखिर वह वापस लौट आया और कहने लगा कि महाराज! बड़े आश्चर्य की बात है, सब सिर बिक गए हैं, सिर्फ आदमी का सिर नहीं बिक सका। इसे तो कोई लेने को तैयार ही नहीं है।

सम्राट ने कहा कि मुफ्त में दे आओ। वह वजीर वापस गया और कई लोगों के घर जा जा कर पुनः आग्रह किया कि चलो मुफ्त में दे रहे हैं इसे , आप रख लें। उन्होंने कहा पागल हो गए हो! अभी फिंकवाने की मेहनत कौन करेगा? आप ले जाइए। वह वजीर वापस लौट आया और सम्राट से कहने लगा कि नहीं, कोई मुफ्त में भी नहीं लेता।

अशोक ने कहा कि अब मैं तुमसे यह पूछता हूं कि अगर मैं मर जाऊं और तुम मेरे सिर को बाजार में बेचने जाओ तो कोई फर्क पड़ेगा क्या ? वह वजीर थोड़ा डरा और उसने कहा कि, मैं कैसे कहूं महाराज…हाँ, क्षमा करें तो कहूं। हाँ कहो भई ..
गुस्ताख़ी मांफ हुजूर, आपके सिर को भी कोई नहीं लेगा। क्योंकि सिर तो सिर है, उसमें महाराज या सामान्य नागरिक के सिर से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। लेकिन है तो वो “मनुष्य का” ही। आज मुझे पहली दफा पता चला कि आदमी के सिर की कोई कीमत नहीं होती।

सम्राट अशोक ने कहा, ना.. ना असल बात ये है कि वह इंसान का सिर ही है जो अहंकार युक्त होता है। इसलिए इसकी की कोई कीमत नहीं होती। बताओ ! फिर इस बिना कीमत के सिर को अगर मैंने एक भिखारी के पैरों में रख दिया था तो क्यों तुम इतने परेशान हो गए थे,

आदमी के “सिर” की कीमत नहीं, अर्थात आदमी के अहंकार की कोई भी कीमत नहीं होती। आदमी में अगर भलाई ,सद्गुण सदाचार आदि हैं तो लोगों के जहन में उसकी बहुत इज्जत ,सम्मान है।
मग़र आदमी का सिर तो एक प्रतीक है आदमी के अहंकार का, ईगो का। और अहंकार की सारी चेष्टाएं सब कुछ अपने भीतर लाने की रहती हैं। जबकि भीतर कुछ भी नहीं जाता—न धन जाता है, न त्याग जाता है, न ज्ञान जाता है। कुछ भी भीतर नहीं जाता। सवाल बाहर से भीतर ले जाने का नहीं है…? बाहर से भीतर ले जाने की सारी चेष्टाएं खुद की आत्महत्या करने जैसी ही हैं क्योंकि “जीवन-धारा” सदा भीतर से बाहर की ओर बहती है।
सत्य तो ये है कि छोटा या बड़ा प्रत्येक जीव समान हैं। इसलिए मानव को भी सबके प्रति एकरूपता अर्थात समान भाव रखना चाहिए। जब कण-कण में ईश्वरीय तत्व होता है, तो फिर ऊंच-नीच का भाव क्यों..? धन्यवाद

; युग पचहरा नीमगाँव, मथुरा
जो प्राप्त है दरअसल वही “पर्याप्त” है!!”
🙏🙏🙏🙏🙏🌳🌳🙏🙏🙏🙏

44- “दायित्व-बोध”…

सामान्य तौर पर “दायित्व-बोध” की समझ थोड़ा बहुत तो दुनियाँ के हर जीव को होती ही है। और होनी भी चाहिए।

मग़र एक शिक्षक होने के नाते, इस विषय में मेरी अपनी कुछ अलग मान्यतायें हैं,क्योंकि, भारत में जो “दायित्व” एक शिक्षक का है, मेरे ख्याल से अन्य की तुलना में वो सर्वोपरि है। या ऐसे समझो कि प्रत्येक जीवधारी की “जीविका” को सुव्यवस्थित करने का “श्रीगणेश” प्रथम गुरु कही जाने वाली “माँ” के “दायित्व” से आरंभ होता हुआ, स्कूली शिक्षक और फिर सद्गुरु तक का लम्बा सफर तय करता है। इसीलिए “एक-शिक्षक” ही है। जो देश के लिए बलिष्ठ एवं सुयोग्य “नागरिक” तैयार करता है।

प्राचीन काल में शिक्षकों को हर-पल अपने “दायित्व” के प्रति पूर्ण समर्पित देख ..समाज की कुछ पारखी नज़रों ने निष्पक्ष भाव से उसकी अपने कर्त्तव्य के प्रति पूर्णनिष्ठा को परिभाषित करते हुए हौसला-अफ़जाई में “राष्ट्र-निर्माता” या “नेशन-बिल्डर” कह कर पुकारा गया। जो आज तक प्रचलन में हैं। मांफ कीजियेगा जबकि दिन प्रतिदिन सरकार द्वारा शिक्षा का व्यवसायीकरण करने से आज शिक्षको को महज़ एक टीचर वाली मानसिकता से ट्रीट किया जाने लगा है।उसकी “शिक्षण-कला” को सिर्फ एक “कार्य” के रूप में देखा जा रहा है। जैसे मजदूर को मनमर्जी जिस जगह लगा देते हैं वैसे ही उसे भी कहीं भी किसी भी कुछ भी करने के लिए लगा दिया जा रहा है। जो सरासर ग़लत है मग़र कई दशकों से हो रहा है। सरकारी तंत्र के लिए “शिक्षक सर्फ एक नौकर बनके रह गया है। ऐसी मानसिकता राष्ट्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।

शिक्षक को अपने विद्यार्थी के प्रति विश्वास रखना, उसके प्रति आदर-भाव रखना, विशेषतः अपने विद्यार्थी के ह्रदय में जगह बना के शिक्षा देना, प्रतिक्षण उसके सर्वांगीण विकास के बारे में सोचना ही विद्यार्थी के “जीवन में मिली सफलता ” को सार्थक सिद्ध करता है।
किसी भी राष्ट्र का …
1-आर्थिक,
2-सामाजिक,
और

3-सांस्कृतिक विकास
उस देश की शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है। यूं तो शिक्षा के अनेकों आयाम हैं जो देश के विकास में शिक्षा के महत्व को दर्शाते हैं,
मग़र वास्तव में शिक्षा का अर्थ है… “ज्ञान”अर्जित करके उसे अपने जीवन में क्रियान्वित करना। अर्थात नॉलेज को विजडम में तब्दील होने तक।

क्योंकि इतिहास साक्षी है कि, संस्कार रहित “ज्ञान का भंडार” भी किसी काम का नहीं होता। वो व्यक्ति को कभी भी पथभृष्ट कर सकता है।
विद्यार्थी ज्ञान का आकांक्षी है,
और उसे इस ज्ञान को संस्कारों सहित उपलब्ध कराने का “दायित्व” है, एक “शिक्षक” का। वशर्ते उसे शिक्षक के चोला में रहने दिया जाय,तो…
ध्यान दीजिए ये तीन महत्वपूर्ण इकाई हैं;–
1- विद्यार्थी,
2- शिक्षक एवं
3- प्रबंधक।
ये तीनो एक दूसरे पर निर्भर हैं एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं। पिछले कुछ दशकों से यहां शिक्षा व्यवस्था को संचालित करने वाली “प्रबंधन-इकाई” को राज्य या केंद्र स्तरीय “प्रशासन” के हस्तक्षेप ने उपर्युक्त वर्णित इन तीनों के विशुद्ध संश्लेषण को आज लगभग “प्रभाव-हीन” ही कर दिया है। जिससे “शिक्षा” का व्यवसायीकरण निरन्तर होता ही चला जा रहा है।
इसीलिए “शिक्षक” एवं “गुरु” शब्द में स्वतः ही भिन्नता आ गयी है, एक और अहम बात आज अधिकतर संस्थानों में “जिम्मेदार-पदों” पर आसीन व्यक्ति अपने पद के प्रति गम्भीर नज़र नहीं आते।
मैं, अक्सर देखता हूँ कि उनका खुद का “होम-वर्क” पद के अनुरूप कभी भी पूरा नहीं होता…, हर तरफ “शोइंग ऑफ नेचर” पत्रकारों के जैसी सबूत जुटाते रहने की सी फ़ितरत ,अपने अधीनस्थों के साथ धमकी भरी भाषा में बात करने का तरीका ये सब उनका पद के “अनुरूप-गरिमा” न होने को ही दर्शाता है। जिससे संस्था में अनुशासन या अन्य व्यवस्थाएं भी दिन प्रतिदिन ध्वस्त होती चली जा रहीं है। जो किसी भी संस्था की रीढ़ होती हैं। और फिर दुहाई दें पूर्व में स्थापित किये गए आदर्शो व मानकों आदि की तो उसका क्या औचित्य है। वो व्यवस्थापक अलग थे। (शिक्षा सहकर्मी/ लिपिक/शिक्षक/प्रधानाचार्य/प्रबन्ध-तंत्र) इसलिए उनके परिणाम भी अलग थे।
दूसरी अहम बात यदि जिम्मेदार व्यक्ति किंकर्तव्यविमूढ़ होकर प्रमुख से इतर कई अन्यों में जिम्मेदारी को बाँटने की भूल करता है , तो स्थिति और भी भयावय होती चली जाती है। इसे मैं श्रेष्ठ कवि रहीमदास जी के एक दोहा के माध्यम से स्पष्ट करना चाहूंगा।

“एकै सादे सब सदे, सब सादे सब जाई।
रहिमन मूलहिं सींचिये,फूलहिं फ़लहिं अघाहि।

किसी कुपोषण के शिकार वृक्ष के मूल (जड़) पर हम ध्यान न देकर उसकी शाखाओं का वाह्य ट्रीटमेन्ट करते रहेंगे और फिर मीठे फलों की आशा करेंगे, तो दोष उस वृक्ष का है या ट्रीटमेन्ट निर्णायक का…?
ये बात अपनी जगह सही है कि, राष्ट्रीय “शिक्षा-नीति” को लेकर देश में समय समय पर बहस होती रही हैं। परिणाम सदैव वही “ढाक के तीन पात” ही रहता है। क्योंकि हम तुष्टीकरण की नीति के चलते अभी तक 1847 की अंग्रेजों वाली शिक्षा-प्रणाली को ही ढो रहे हैं, जो पूर्ण भौतिकवाद सिखाती है, स्वामी विवेकानंद जी ने तो अपने एक लेख में “भारतीय शिक्षा प्रणाली” के सन्दर्भ में कहा था, ” इंडियन एजुकेशन सिस्टम इज कम्प्लीटली-रोंग” फिर बच्चों से ये कहते हो भाई! जीवन में अध्यात्म से चलो। मग़र चलें..भी तो कैसे.. ? देश का युवा भारतीय “शिक्षा-प्रणाली” व “असल-जीवन” के बीच इस “अन्तरभेद” में हिचकोले खा रहा है। भारत में बच्चे को शुरू से ही ऐसा वातावरण दिया जाता है कि वह स्कूल में एक “रट्टू-तोता” और आगे कॉलेज व विश्वविद्यालय में आते-आते घर परिवार के लिए महज़ एक कमाऊ मशीन बनना ही उसके जीवन का धेय बनके रह जाता है। और फिर स्ट्रेस,टेंशन और डिप्रेसन आदि के बाद उनके वर्ताव में चिड़चिड़ापन नहीं होगा तो क्या होगा..?
दूसरी तरफ कुछ जो इस मिथक को समझ कर अपनी संवेदनाओं,अपने पैशन आदि को तरज़ीह देते हुए इस बहुमूल्य जीवन को कायदे से जी…ना चाहते हैं, तो घर-परिवार , समाज व देश में उनके अनुकूल वातावरण ही उपलब्ध नहीं। जो उन्हें उनके “कार्य-क्षेत्र” में आगे बढ़ने के अवसर प्रदान कर सके। ये उन युवाओं में दोष है या देश की व्यवस्थाओं में..? इस पर विचार न करते हुए..अधिकतर माता-पिता उनमें छिपी प्रतिभा को इंगित कर प्रोत्साहित करने के बजाय उन्हें कोषना शुरू कर देते हैं जो एकदम ग़लत है।
जनाव, देश में लागू.. “रोंग-एजुकेशन-सिस्टम” में वो अपने आपको फिट नहीं कर सके..तो दोष उनमें नहीं हमारी व्यवस्था में है। भटकाव युवाओं में नहीं देश के शीर्षस्थ नीति-निर्धारकों में है। बहुत बड़े स्तर पर है। देश में आज नहीं पिछले छह-सात दशकों से “शिक्षा एवं खेल-जगत” के क्षेत्र में अमूल-चूल परिवर्तन की महती आवश्यकता महसूस की जाती रही है।मग़र…
शिक्षा समिति ने कभी किसी पाठ्यक्रम में से दो पुस्तक घटा दी या चार बढ़ा दीं या फिर कोई एक/ दो अध्याय जोड़ दिया या कम कर दिया। बस ..सत्ता में बैठे मौका परस्तों ने सदैव से भारतीय “शिक्षा-प्रणाली” के साथ सिर्फ यही खेला है। कितनी सरकारें आयी.. और गयीं…अफ़सोस शिक्षा-प्रणाली को गम्भीरता से कभी किसी ने लिया ही नहीं। प्रतिवर्ष पुस्तकों में अदला-बदली करके उल्टे छात्रों के माता-पिता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ और बढ़ाते रहे हैं। आपको याद होगा,पहले पुरानी पुस्तकों से एक परिवार के लगभग सभी बच्चे पढ़ लिया करते थे। विदेशों में ये व्यवस्था आज भी है।
एक बात और अन्य देशों में तो पुरानी पुस्तकों के मूल्य में 20℅ कम करके वापस ले लेते हैं। और अगली कक्षा की न्यू बुक्स दे देते हैं। मग़र मै फिर वही दुहराऊंगा कि भारत में तो व्यवसायिकता की आंच ने मनुष्य की मानवीय संवेदनाओं को बुरी तरह ध्वस्त कर दिया है।
औऱ विडम्बना तो देखिए ..अनादिकाल से कहा जाने वाला हमारा भाग्य-विधाता “शिक्षक” भारतीय समाज में व्याप्त इस भयावह स्थिति को निरीह और असहाय प्राणी की तरह मूकदर्शक की भांति देखने को विवश है। हाँ कभी-कभी अपने मन का गुवार कुछ इस तरह बयां करता है कि,
“दर्द सहने की इस कदर आदत सी हो गयी है, दर्द होता..है, मग़र हो…ता नहीं है।”
दुर्भाग्य से भारत देश में सर्वाधिक प्रतिष्ठित और आदर प्राप्त “शिक्षक” की हालत “शिक्षा में प्रशासनिक हस्तक्षेप” होने से अत्यधिक दयनीय और जर्जर हो गयी है।
अधिकतर शिक्षक से उसका शिक्षण कार्य छुड़वाकर अन्य ऐसी गतिविधियों में लगा दिया जाता है, जिसे थोड़े कम पढे-लिखे व्यक्ति या किसी मजदूर से भी कराया जा सकता है। अगर उस वक़्त शिक्षक के अंदर का “शिक्षकत्व” (उसका-ज़मीर) उसे ऐसा करने से रोकता भी है, अपने विद्यार्थियों से सम्बंधित “दायित्व” निर्वहन की बात रखता है, तो ऐसी प्रतिक्रियाओ को प्रधानाचार्य व प्रबंधतंत्र या सरकारी तंत्र द्वारा स्वयं का विरोध समझ लिया जाता है।
यहां मैं एक बात और स्पष्ट कर देता हूँ।जो आंकड़े कहते हैं कि देश में शिक्षक दो प्रकार के ही है ;
1-एक तो वे जो शिक्षण-कार्य को बड़ी तल्लीनता से करते हैं। जो बाई-चॉइस शिक्षक हैं। ये वो हैं जो हर दशा में शिक्षा के प्रति पूर्ण समर्पित रहते हैं।
2-दूसरे वे जो शिक्षण-कार्य के लिए बने ही नहीं, उन्हें करना तो कुछ और ही था, लेकिन शिक्षा विभाग में भ्र्ष्टाचार का बोलबाला होने से चेक/जैक के खेल ने “बाई-चांस” उन्हें एक सरकारी नौकर बना कर छात्रों के जीवन के साथ खिलवाड़ करने को तैनात कर दिया है। जिसका खामियाजा छात्र, उसका परिवार, समाज और फिर समूचा राष्ट्र भुगतता है। जो सभी के लिए
चिंता का विषय हैं।

अतः गेट न.2 से एंट्री पाने वाले सभी विभागों के सैलरी-पेड लोगों को मेरी व्यक्तिगत सलाह है कि नौकरी आपने चाहे जिस रास्ते से पाई हो मगर कम से कम अब आपको अपना कार्य पूर्ण-निष्ठा से ही करना चाहिए। ये “दायित्व-बोध” हर स्तर के व्यक्ति को अवश्य होना ही चाहिये। तो निश्चित है समस्याएं काफ़ी हद तक लगभग खत्म हो जाएंगी। धन्यवाद।
; युग पचहरा (नीमगाँव, मथुरा)
के.एल.जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस
8006943731

43- ||संकल्प||

सवाल – क्या आपने कभी विचार किया है, ..कि “मानव-जीवन” में संकल्पों का क्या महत्व होता है..?

जवाब – हाँ, मैंने देखा…
है अधिकतर लोग नव-वर्ष के पहले दिन अपने जीवन की बेहतरी के लिए अक्सर छोटे या बड़े संकल्प (Resolutions) लिया करते हैं।
यद्यपि कुछ.. ही होते हैं, जो पूरे वर्ष या जीवन भर उन पर खरे उतर पाते हैं। लेकिन इस नेक काम के लिए “पूरे-वर्ष” जैसा लम्बा इंतज़ार क्यों..?
इस सन्दर्भ में मेरा “सिद्धांत” तो सदैव ये कहता है…कि “जब आँख खुलीं तभी सबेरा..अर्थात हम को अपनी कोई बुरी आदत या किसी ग़लत चीज़ का स्वयं जैसे ही आभास हो या कोई शुभचिंतक उस ओर संकेत कर दे।, तत्काल,उसे छोड़ देना चाहिये। अपनी “विल-पॉवर”ऐसी हो। क्योंकि इन बातों के लिए कोई मुहूर्त नहीं निकलते। मगर मैं ये समझ रहा हूँ कि, अपनी बात की पुष्टि करने के लिए this is a very great & legendary example of all humanity..about Resolutions ये सर्वोत्तम संकल्प इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि I.I.T. दिल्ली के 68 वर्षीय पूर्व प्रोफेसर “Mr.आलोक सागर” को अपने सेवाकाल में लक्ज़री लाइफ जीते-जीते उन्हें एक दिन जब “असल-जीवन” के पहलू ने स्पर्श किया तो उन्होंने सरकारी कार्य से सेवानिवृत्त होने तक का इंतजार भी नहीं किया तुरन्त वे स्वेच्छा से मध्यप्रदेश में आदिवासियों के बीच रह कर बहुत सारे वृक्ष लगाने और उनकी देखभाल में अपना वाकी जीवन समर्पित करने का “संकल्प” लिया और उस नेक कार्य में जुट गए। उनकी इस “डाउन-टू-अर्थ” वाली सोच ने आज हम सबको जीवन के असल माइने समझने की प्रेरणा दी हैं।

अतः पुनः ऊपरयुक्त वीडियो को देखिए और इस संकल्पित महापुरुष को ध्यानपूर्वक सुनिए..धन्यवाद

प्रोफ़ेसर आलोक जी सागर सहित सम्पूर्ण प्रबुद्ध-वर्ग को योगेन्द्र सिंह पचहरा का नमस्कार…..

42-Unconditional.. “LOVE”

अभी लॉकडाउन के समय की ही एक सच्ची एवं प्रेरणादायक घटना है जो “अनकंडीशनल-लव” अर्थात ऐसा प्रेम जिसमें कोई शर्त नहीं होती, जो निःस्वार्थ होता है, ये घटना उसकी पुष्टि करती है। मेरा विश्वास है, आपको आश्चर्यचकित कर देगी।

मेरे फ्रेंड सरकल के कुछ लोग जरूरत मंदों को इस कोरोना नामक महामारी के आपातकाल में पिछले कई दिनों से खाने के पैकिट बाँट रहे थे।

हैरानी की बात ये थी कि एक कुत्ता हर रोज आता, और किसी न किसी के हाथ से खाने का पैकेट छीनकर ले जाता था। आज उन्होने एक आदमी की ड्यूटी भी लगाई थी ताकि खाना लेने के चक्कर में कुत्ता किसी को न काट ले।

लगभग ग्यारह बजे का समय हो चुका था और वे लोग अपना खाना वितरण शुरू कर चुके थे। तभी देखा कि वह कुत्ता बड़ी तेजी से आया और प्रतिदिन की तरह एक आदमी के हाथ से खाने की थैली झपटकर भाग निकला। वह व्यक्ति जिसकी ड्यूटी थी, कोई जानवर किसी पर हमला न कर दे, वह डंडा लेकर खड़ा था, तुरन्त उस कुत्ते का पीछा करते हुए भागा। कुत्ता हाई-वे स्थित श्री बांके बिहारी मन्दिर के पीछे जंगल की ओर भागता हुआ थोड़ी दूर जा कर एक झोंपड़ी में घुस गया। वह आदमी भी उसका पीछा करता हुआ झोंपड़ी तक आ गया। कुत्ता खाने की थैली को झोंपड़ी में रख, तुरन्त अपने अपराध की सजा पाने झोंपडी से बाहर ‘पीछा करने वाले व्यक्ति’ के सामने आकर खड़ा हो गया। ये सब देख समाज सेवी के हाथ से यकायक डंडा छूट गया। अब उसने झोंपड़ी में घुसकर देखा, तो एक आदमी अंदर लेटा हुआ है। जिस के चेहरे पर बड़ी सी दाढ़ी है और उसके घुटने से नीचे दोनों पैर ही नहीं है।चलने के लिए दो बेसाखी जरूर रखी हैं लेकिन अब शरीर इतना जीर्ण है कि आज वो बैसाखी भी किसी काम की न थी। उसने पूछा..

“ओ भैया! ये कुत्ता तुम्हारा है.. क्या?”

झोंपड़ी में पड़े दिव्यांग व्यक्ति ने कहा, ओ बाबू ! कौन हो तुम जो मेरे बेटे कालू को बार-बार “कुत्ता” बोले जा रहे हो। कालू मेरा बेटा है। उसे फिर से कुत्ता मत कहियेगा।”

“अरे भाई ! हर रोज खाना छीनकर भागता है अगर इसने किसी को काट लिया तो ऐसे में डॉक्टर भी न मिलेगा. भाइया !… इसे बांध के रखा करो। खाने की बात है तो तुम्हें कल से मैं यहीं दे जाया करूँगा,” उस व्यक्ति ने कहा।

“बात खाने की नहीं है। मैं उसे मना नहीं कर सकूँगा। मेरी भाषा भले ही न समझता हो लेकिन न जाने कैसे ये मेरी भूख को समझ लेता है। जब मैं दुनियादारों की बातों से तंग आकर घर छोड़ के यहां जंगल में आया था तब ये भी मेरे पीछे-पीछे मेरे साथ आ गया था। इसको न जाने मुझ से क्या लगाव है । मैं नहीं कह सकता कि, मैंने इसे पाला है। जबकि सही तो ये है कि, यह मुझे पाल रहा है। मेरे तो बेटे से भी बढ़कर है, मेरा कालू.. मैं तो रोड के ब्रेकर्स पर जब गाड़ियां धीमी होती थीं तब बाबू लोगों से “शनि” के नाम से कुछ पैसे अपने डिब्बे में डलवा लेता था,जिससे मेरी जीविका चलती थी। मग़र अब तो इतना कमज़ोर हो गया हूँ सब बंद है।”

गरीबों की मदद करने वाले ने उन दोनों के बीच …ये अजीब रिश्ता देखा जो “बे-शर्त-प्यार” (अनकंडीशनल-लव) ही था। हैरानी से एकदम मौन हो गया। उसे ये संबंध समझ ही नहीं आ रहा था। तब दिव्यांग ने खाने का पैकेट खोला और आवाज लगाई, “कालू ! ओ बेटा कालू ….. आ जा खाना खा ले।”

कुत्ता दौड़ता हुआ आया और उस आदमी का मुँह चाटने लगा।खाने को उसने सूंघा भी नहीं। उस आदमी ने खाने की थैली खोली और पहले कालू का हिस्सा निकाला, फिर अपने लिए खाना रख लिया।

“खाओ बेटा !”उस आदमी ने अपने बेटा समान दायित्व निभा रहे कुत्ते (कालू ) से कहा। मगर कुत्ता तब तक उस खाने को सिर्फ देखता रहा। जब उसके मालिक ने खाने से अपना पहला “निवाला” लेकर खाया, तब उसे खाते देख..कुत्ते ने भी खाना शुरू कर दिया। दोनों खाने में व्यस्त हो गए। जब तक दोनों ने खा नहीं लिया.. वह समाज सेवी अपलक उन्हें देखता ही रहा।इस दौरान उसका अन्तर्मन इस सच्चे प्रेम को देख अपने ही विचारों की गंगा में गोते लगता रहा था।और आनंदित हो रहा था। फिर उसने चलते वक़्त बोला..!

“भैया जी ! आप जो भी हो,एक बात बता दूँ.. कि दुनियाँ में मा-बाप का अपनी औलाद के प्रति प्यार और फिर औलाद का अपने मा-बाप के प्रति प्यार….अर्थात मानवीय रिश्तों का आपसी प्यार सदैव “सशर्त-प्रेम” (कंडीशनल-लव) या स्वार्थ की श्रेणी में आता है। बिना किसी अपेक्षा के जो प्रेम आप दोनों के बीच है दरअसल इसी को अध्यात्म में “अनकंडीशनल-लव” कहा गया है। जिस कर्म का रिटर्न् न चाहा जाय वही आपके बीच में देख रहा हूँ। हर रिश्ते में अगर ये हो जाय, तो जी…ते जी मोक्ष की अवस्था है ये..धन्य हैं आप दोनों।

आप भले ही गरीब हों ,मजबूर हों, मगर आपके जैसा बेटा किसी के पास नहीँ हैं। क्योंकि ये जानवर-पक्षी निरीह- प्राणी जरूर हैं मगर वफ़ा से ओतप्रोत सदैव नैतिक-मूल्यों से भरे हैं ये, ये पूर्ण प्राकृतिक हैं इसलिये आज स्थितियां एकदम उलट हैं इंसान को इनसे सीख लेने की आवश्यकता है। जो आपकी भावना को स्वतः समझ कर हर सम्भव आपकी मदद करता है। वरना दुनियाँ में अधिकतर माता-पिताओं की सारी धन-संपत्ति पर काविज होकर भी आज के “मानव-सुत” उन्हें एक बोझ के रूप में ही लेते हैं।
उस समाज सेवी पुरुष ने अपनी जेब से कुछ रुपये निकाले और उस बेचारे दिव्यांग के हाथ में रख दिये।

उसने कहा, “रहने दो भाई, किसी और को इनकी ज्यादा जरूरत होगी। मुझे तो खाना कालू कहीं न कहीं से ला देता है। मेरे बेटे के रहते मुझे कोई चिंता नहीं..”

वह व्यक्ति बहुत हैरान था कि आज आदमी, आदमी के “मुह के निवाले” को छीनने को आतुर है, और ये जानवर होकर. अपने मालिक को पहले खाना खिलाये बिना नहीं खाता है। कमाल है निश्चित ही कोई “पूर्व-संस्कार” है। उसने अपने सिर को ज़ोर से झटका और बहुत बड़ी सीख लेकर वापिस चला आया। उन दोनों के सच्चे एवं निःस्वार्थ प्रेम को देख उस समाज सेवी के हाथ से डंडा तो पहले ही छूट गया था।
वैसे भी प्यार पर कोई वार कर भी कैसे सकता है….जबकि ये तो “प्यार की पराकाष्ठा” थी।
धन्यवाद

युग पचहरा,
88 A वसुंधरापुरम, निकट बाई-पास,हाथरस।

41- “धर्म-कर्म”

किसी अल्पज्ञ ने कहा धर्म छुट्टी पर है…

जबकि आप भी अच्छी तरह जानते हैं, कि “धर्म” दुनियाँ के लिए वैसा ही अनवरत चलने वाला “कर्म” है जैसा किसी भी “जीवन” के लिए “हिर्दय” का धड़कना। अगर धर्म छुट्टी पर चला जायेगा, तो उसी वक़्त व्यक्ति, समाज, देश और सम्पूर्ण कायनात पूरी तरह खत्म हो जाएगी, ठीक वैसे ही जैसे हिर्दय गति रुकने से किसी भी “जीव” की जीवन लीला समाप्त हो जाती है।

जब अपनी “वैज्ञानिक-उपलब्धियों” पर इतरा कर स्वयं को ब्रह्माण्ड का नीति-नियंता समझने वाले लोग एक नन्हे विषाणु से पराजित हो जाँय, तो “धर्म” किसी कोने में चुपके से मुस्कुराये नहीं तो क्या करे..?
जब भौतिकता की चकाचौंध में मनुष्य के बड़े-बड़े दावों के बाबजूद नाक के नीचे स्थितियां इतनी विकट हो जाँय कि संक्रमण के भय से पिता अपने पुत्र का शव लेने तक को तैयार न हो….(अमेरिका), तो ये विज्ञान के आगे विकट परिस्थिति नहीं है तो क्या है…? ये “धर्म-कर्म ” की ही सामर्थ्य हैं, जो अपनी जान की भी परवाह किये बगैर मेडिकल टीम, पुलिस फोर्स और अन्य इंसानियत के सच्चे-फ़रिश्ते दिन रात अपनी सेवाएं दे कर “धर्म-कर्म” में जुटे है।
वे लोग, जिन्हें लगता है कि पृथ्वी पर विज्ञान पहली बार इतना सशक्त या अशक्त हुआ है, तो मेरा ऐसा मानना है कि वे अभी भावुक हैं तार्किक नहीं। इतिहास से पूछिये अरबों वर्ष पुरानी पृथ्वी पर मानव-सभ्यता का इतिहास लाखों वर्ष पुराना है। इन लाखों वर्षों में ऐसे मंज़र कई बार आंखों के सामने से गुजरे.. होंगे। असँख्य बार सभ्यताएँ उपजीं और विकास के चरम पर पहुँची हैं, विज्ञान ने कई बार अंतिम ऊंचाई को स्पर्श किया है, और फिर सभ्यताएँ समाप्त भी हुई हैं।आप ये क्यों भुल जाते हैं कि “परिवर्तन” दुनियाँ का नियम है। चाहे व्यक्ति, परिवार, समाज, देश या फिर दुनियाँ इनमें कोई भी क्यों न हो..सदैव से “हर उत्थान का अंतिम पड़ाव पतन होता है”,(यदि समय रहते स्थितियों को न सम्भाला जाये, तो..) और पुनः हर पतन का अगला पड़ाव फिर उत्थान भी होता है….यही ‘जीवन चक्र’ है।”
वैज्ञानिक-उत्थान के मद में चूर हो कर अपने मानव-धर्म को भूल चुकी सभ्यताएँ जब प्रकृति के साथ अत्याचार करती हैं, तो उनका विकास ही उन्हें मार डालता है। फिर वही “धर्म-कर्म ” इन अल्पज्ञों को पुनर्जन्म देकर एक और अवसर देता है। नई आशाएं जगाता है। व्यक्ति हो या कोई सभ्यता, पराजय के बाद उसे सदैव धर्म की गोद में ही शरण मिली है और आगे भी मिलती रहेगी। ये ही शाश्वत है।
असल दिक्कत यह है कि हमने अल्पज्ञता के कारण सम्प्रदायों को ही धर्म मानना शुरू कर दिया। आपस में दीवारें खड़ी कर ली। अपनी तसल्ली के लिए …
बहुत पीछे नहीं, सिर्फ। पाँच हजार वर्ष पुराने इतिहास के पन्नों को उलटिये, “सिन्धु से लेकर नील तक”, “दजला-फ़रात से लेकर दक्षिणी समुद्र तक”, हर सभ्यता का अपना एक धर्म था। उस वक्त सब प्रकृति की ओर निहारते थे, और प्रकृति को ही पूजते थे। ऊर्जा देने वाले सूर्य, जल देने वाले वरुण, वायु के देवता पवन, अलग अलग नामों से जरूर थे, मग़र सभी लोग इनके शुक्रगुज़ार रहते थे। क्योंकि ये दाता हैं, प्रकृति रूपी “भगवान” में सबका विश्वास था। लोग हर पल प्रकृति की गोद में रहते थे। आज के इंसान की तरह उससे दूर… नहीं भागते थे।
फिर मनुष्य शक्तिशाली हुआ, और उसने व्यवस्था के ‘केंद्र’ में से “प्रकृति” को हटा कर “स्वयं” को स्थापित करने की नाकाम कोशिश की। बुद्ध आये, महाबीर आये, जीजस आये, दुनियाँ में कई एक मतावलमवियों का प्रादुर्भाव हुआ.. सबने अपनी-अपनी व्याख्याएं दी, सिद्धान्त प्रतिपादित किये। जिससे लोगों के वर्ताव में भी कुछ फ़र्क आया इसी बीच.. भौतिकता ने भी अपने पांव पसारने शुरू कर दिए, समय को पहचानते हुए व्यवस्था के केंद्र से “प्रकृति” नियति की मनसा समझ ख़ुद-व-ख़ुद धीरे-धीरे सिमटती चली गई… अब मौका पाते ही “व्यक्ति-विशेष” तुरन्त प्रभुत्व में आ गया। अपनी ही पूजा कराने की एक होड़ सी मच गई और असली भटकाव तो तब हुआ जब लोगों ने व्यक्तियों द्वारा अपनी सुविधानुसार चलाये गए सम्प्रदाय को ही “धर्म” कहना शुरू कर दिया। फिर भटके हुए लोगों ने अपनी प्रतिष्ठाए दांव पर लगी समझ.. “किसके बाड़े में कितनी भेड़” वाली मानसिकता से एक दूसरे धर्म/सम्प्रदायों को छोटा बड़ा कहना शुरू कर दिया..सीदे-सादे नागरिकों को अपनी -ओर खींचने की प्रथा शुरू हुई जिसे धर्मान्तरण का नाम दिया गया जो आज वर्तमान में खूब ज़ोरों पर है। स्थिति दिन प्रतिदिन परिस्थिति बनती गयी..ये सब देख कर वास्तव में जो शाश्वत “धर्म-कर्म” है। जो पूर्ण प्राकृतिक है, वह किसी कोने में चुपके से फिर मुस्कुराता रहा है।

क्योंकि उसे पता है। कि अंत में सबको अपनी “सनातन-संस्कृति” जहां से धर्म की पैदाइस है, निःसन्देह देर-सबेर सबको उसी के पास लौटना है।
फिर भी अन्य देशों की तुलना में भारत इस मामले में तनिक अलग है। सनातन-संस्कृति की गोद से भले ही असंख्य धर्म/ सम्प्रदाय निकले हैं, वरन उनका प्राकृतिक-धर्म से नाता नहीं टूटा है। क्योंकि यहां अभी भौतिक एवं आध्यात्मिक के बीच का संश्लेषण सन्तुलन में है, अच्छा है.., ख़ुशी की बात है। प्रकृति से अभी बहुत दूरी नहीं बनी है। क्योंकि “सनातन” सारे सम्प्रदायों को अपनी गोद में रख कर सदैव प्रकृति का हाथ पकड़े रहा है….
धर्म कभी कहीं नहीं गया। धर्म नहीं होता तो चिकित्सक अपने प्राणों को संकट में डाल कर रोगियों का उपचार नहीं कर रहे होते। पुलिस कर्मी यों अपनी जान जोख़िम मौत के जमात में घुस कर रोगियों को होस्पिटल तक नहीं पहुंचा रहे होते, धर्म नहीं होता तो भारत के हजारों लाखों समाज सेवी स्वयं आगे बढ़ कर रोज़ाना लाखों अपने भूखे भाई-बहनों के लिए यूं लंगर नहीं चला रहे होते। आप ही बताओ क्या वो धर्म/जाति पूछ कर सेवा दे रहें है..? धर्म अपने बजूद में है, तभी मनुष्य “कोरोना” (Covid-19) जैसी माहमारी से लड़ पा रहा है।
और जब “धर्म” ड्यूटी कर रहा है, तो अधर्म कितना भी राह में रोड़ा अटकाए, “धर्म” कोरोना को पराजित कर के ही दम लेगा। हमारी चेतना पर प्रकृति द्वारा जड़ दिए गए तालों में ही एक दिन जीवन मुस्कुराएगा, धर्म मुस्कुराएगा। क्योंकि अंत में जीत…..
सत्य_की ही होती है जो सत्य है वहीं सनातन है एवं शाश्वत है। “Stay-Home & be Safe” धन्यवाद

विचारक ; युग पचहरा
जन्मभूमि ; श्री साहब सिंह सदन,नीमगाँव,राया,मथुरा।,

,contact No.8006943731

40- “टैक्स”आमदनी पर क्यों हो …?

ये मंज़र उस दौर का है जब कस्बा सासनी के प्रतिष्ठित शिक्षण-संस्थान “के.एल.जैन इंटर कॉलेज” में विदेशी भाषा “अंग्रेजी” पढ़ाने के लिए एक सरकारी शिक्षक के रूप में मेरी नियुक्ति हुई।
सत्र के अंत में सैलरी के रूप में पूरे वर्ष की “आय का विवरण” कॉलेज के ऑफिस से वार्षिक रूटीन के अंतर्गत सभी शिक्षक-साथियों के साथ-साथ मुझे भी मिला ..सच बता रहा हूँ ये सुनकर न जाने क्यों मुझे बहुत अटपटा लगा कि, अपनी कुल आमदनी पर “कर”..देना होता है ? मेरे अन्तर्मन ने कहा,

क्यों भई ‘कर’ तो हमारे ‘खर्चों’ पर होने चाहिए ताकि लोग अपने जीवन में फ़िजूल खर्ची न करें थोड़ा कैलकुलेशन से चलें।
मग़र ये देश में काफ़ी पुरानी चली आ रही परिपाटी है। तो मैं कौन होता हूँ , टैक्स न देने वाला..? बहुत पहले से तय सुदा माहौल व्यक्ति को सोचने का वक्त ही कहाँ देता है विल्कुल वैसे ही मै भी “लकीर के फकीर” वाले वातावरण में देश के अन्य नागरिकों की तरह समय से “आई.टी.आर”.दाखिल करने को अपना नौकरी-धर्म समझ कर भरने लगा। लेकिन मन में ये सवाल बार-बार कौंध रहा था।..
सवाल- आख़िर आमदनी पर “टैक्स” क्यों…?
परन्तु देश के प्रत्येक नागरिक को देश की नीतियों को फ़ॉलो करना ही होता है चाहे वो उचित हों या अनुचित..?
एक सामान्य सी बात है जब व्यक्ति का बस नहीं चलता है, तो या तो वो इतिहास में झांकता है या किसी अनुभवी व अपने वरिष्ठ लोगों से उस सम्बन्ध में डिसकस करता है। मेरा तो बचपन से स्वभाव भी कुछ ऐसा ही रहा है…
तो मैंने वही किया अपने “मन” की संतुष्टि के लिए वक़्त मिलते ही अपने कॉलेज की विशाल एवं शानदार लाइब्रेरी में गया, वहां इतिहास की पुस्तकों में “टैक्स-सम्बन्धी” प्राचीन पुस्तकों को खंगालना शुरू किया..
उन प्राचीन पुस्तकों में स्पष्ट लिखा था कि, राजा महाराजाओं के समय में ‘कर’ तो अवश्य लगाए जाते रहे थे, मग़र “आमदनी” पर एक भी राजा ने कभी कोई “कर” नहीं लगाया था। ये पढ़कर मेरे अन्तर्मन में एक बहुत ही सुखद अनुभूति हुई। मैने खाली पीरियड में लगातार कई दिन लाइब्रेरी में उन पुस्तकों का गहन अध्ययन करते वक़्त पाया कि मेरी ही विचारधारा से मिली-जुली सोच उस समय के व्यापारी-वर्ग के बारे में कई एक राजाओं की भी थी। इतिहास साक्षी है उन पुस्तकों में उस समय के नीति-नियंता ने भी ऐसे तर्क प्रस्तुत किये हैं, कि “कर” लोगों के असीमित ख़र्च करने की फ़ितरत पर हो, न कि उनकी कमाने की तरक्की पसन्द अच्छी आदत पर। कमाऊ नागरिक तो राष्ट्र के निर्माण में सदैव सहायक ही होते हैं.. उन पर “Tax” क्यों..?
आप ने चाणक्य का नाम तो अवश्य सुना ही होगा। एक समय संयोग से चाणक्य देश के प्रधानमंत्री बन गए। जैसे ही वो प्रधानमंत्री नियुक्त हुए…उन्होंने घोषणा की कि मेरे राज्य में “जनता-जनार्दन” पर कोई किसी भी प्रकार का टैक्स नहीं होगा। सारे टैक्स खत्म करने के
पीछे उनका तर्क था कि राजा पर “कर” के रूप में जब अधिक धन आता है तो उसमें “धन-लालसा” बढ़ती चली जाती है, जिससे वह देश का नेतृत्व करने वाले “निश्वार्थ सेवा भाव” जो उसका कर्तव्य होता है उसे भूल कर वह उसे अपना अधिकार, मान प्रतिष्ठा आदि से जोड़कर देखता है, जिससे वह “पथ-भ्रष्ट” होता चला जाता है। इसीलिये पद का दुरुपयोग होने लगता है।
चाणक्य ने ही जनता को कायदे से “जनता-जनार्दन” का दर्जा दिया। जिसके कि वो सदैव हकदार हैं। उसी के परिणामस्वरूप जनता की कमाई जनता पर रहने से उस समय देश में लोग सुखी होने के साथ-साथ धन धान्य से पूर्ण सम्पन्न रहते थे। और जरूरत मंदों ओर दान-पुण्य करके अपने कर्मों को सुधारते थे।ये वही वक्त था तब भारत को विदेशी लोग “सोने की चिड़िया” कह कर पुकारते थे। बाद में चाणक्य के रास्ते पर और भी कई अन्य राजा चले, जैसे; चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, चन्द्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त और हर्षवर्धन.. ऐसे लगभग बीसियों राजा थे। जिन्होंने चाणक्य की फिलोसोफी को अपनाते हुए जनता पर किसी भी प्रकार का “कर” नहीं लगाया था।
मांफ कीजियेगा लेख थोड़ा बढ़ा हो जाएगा वरना ऐतिहासिक परतें, तो और भी खोली जा सकती हैं ..
प्रश्न न01- भारतीयों की आमदनी पर टैक्स क्यों लगा..?
प्रश्न न0 2- भारतीयों पर ये टैक्स कब से लगाया गया है…?
ये दोनों ही सवाल एक दूसरे के पूरक हैं।
दरअसल “इंडियन इनकम टैक्स” अधिनियम 1960, जब ब्रिटिश संसद में पारित हुआ, तो इस पर अंग्रेज लीडर्स के बीच उस वक्त एक बड़ी बहस हुई। जिसका निष्कर्ष तो काफ़ी विस्तृत है मग़र संक्षिप्त में कहूँ, तो उनकी नीयत में खोट क्यों आया इसे आप एक छोटे से उदाहरण से समझिए.. भारत में उम्दा क्वालिटी की “मल-मल” (एक “प्रकार का मुलायम कपड़ा) तैयार की जाती थी। ऐसी कि एक मीटर “मलमल” को आप तह करके माचिस की डिब्बी में रख सकते थे। जिसकी दूसरे देशों में न केवल अच्छी खासी मांग थी , वल्कि वो तोल के भाव सेल होती थी। अर्थात कपड़े के बदले सोना एवं चाँदी। मिलता था। जिससे देश में भारी मात्रा में सोना-चाँदी न01 की कमाई के रूप में आया करता था। जब ये अंग्रेजों की जानकारी में आया, तो उनकी आँखें चौंदिया गयीं,
हालांकि अब चाणक्य के समय से जनता पर कोई टैक्स तो नहीं लगता था। लेकिन ये आपने भी किस्से कहानियों में सुना होगा कि हमारे देश के सम्पन्न लोग जिन्हें सम्मान से सेठ बोलते थे वे स्वतः अपनी इच्छा से गरीब जनता के लिए परोपकार की भावना से कुंआ,बाबरी,(तालाब) प्याऊ,धर्मशाला एवं निर्धनों की बेटियों की शादी आदि भले कार्य अपने अपने क्षेत्र में अक्सर कराते रहा करते थे। जिससे जनता में आपसी प्रेम एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण बना रहता था। आज की तरह कोई किसी की तरक्की से कुढ़ता नहीं था। उस वक्त के राजा ऐसे लोगों को मान-सम्मान दिया करते थे। यानि जनता में सम्पन्न वर्ग आज की तरह “और… और ” धन अर्जन की अंधी दौड़ में न पड़के वह अपनी आय का कुछ अंश स्वेच्छा से लोक-कल्याण के कार्यों अर्थात “देश-निर्माण” में सहायता करते थे।
मग़र देश में ये सुदृढ़ व्यवस्था फिरंगियों को नहीं भायी। उन्होंने भारत को कमजोर करने के उद्देश्य से 1960 से टैक्स की आड़ में लूटना शुरू कर दिया और लगभग 100 वर्ष में सोने की चिड़िया कहा जाने वाला देश भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया।
अंग्रेजों के मकड़ जाल से भारत को आजादी दिलाने वाले उन तमाम जांबाजों को योगेन्द्र सिंह पचहरा का कोटि कोटि नमन…है।
मग़र भाग्य की विडंबना आपके सामने आज भी है। जिसे हम सभी देशवासी पिछले “सत्तर-बहत्तर” वर्षों से लगातार देख रहे हैं कि हमारे अपने काले अंग्रेज कई मामलों में उनसे कहीं अधिक दुष्ट एवं भ्रष्ट साबित हो रहे हैं।
आज़ादी से पूर्व अंग्रेजों द्वारा जनता पर ..एक्साइज ड्यूटी,सेल्स टैक्स, ऑक्ट्रियो टैक्स (माल की एक जगह से दूसरी जगह लेजा कर बेचने पर) , इनकम टैक्स यानि लगभग 23 टैक्स लगते थे।
लेकिन आज़ादी के बाद आज भारत की जनता पचासों तरह के टैक्स भरकर भी सरकार के खौप के साये में जीती है। ये भी दिख रहा है कि टैक्स का पैसा नेता मनमाने तरीके से खर्च करते हैं।
अंग्रेज भारत से अपनी टैक्स नामक लूट के द्वारा सत्तर(70) हजार करोड़ रु. ब्रिटिश की बैंकों में यहां से ले जाकर प्रति वर्ष भरा करते थे। ये आंकड़े मेरे नहीं ब्रिटिश पार्लियामेंट के हैं।
15 अगस्त,1947 के बाद देश की सत्ता काले अंग्रेजों के हाथ में आ गयी। सोचा था टैक्स खत्म हो जाएंगे मग़र जनता से आज भी पचासों प्रकार के टैक्स मनमाने तरीके से वसूले जा रहे है। क्या ये व्यवस्था आपको लूटतंत्र के अतिरिक्त किसी भी एंगल से लोकतंत्र नज़र आती है..?
1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था, कि मैं जब दिल्ली से “गरीब” के लिए “एक रुपया” पास करके भेजता हूँ, तो ये मैं भी अच्छी तरह जानता हूँ कि, उसमें से गरीब तक केवल “15 पैसे” ही पहुँच पाते हैं। वाकी के 85 पैसे तो सम्बन्धित नेता, अधिकारी अर्थात बिचौलिए खा जाते हैं। अब आया कुछ समझ में ..
जो भ्र्ष्टाचार 1984 में 85 % था। वो आज बढ़कर 95% हो गया है, क्योंकि आज एक रुपये में से मुश्किल से 05 पैसे ही गरीब तक पहुँच पा रहे हैं। वो भी किसी किसी तक हर गरीब तक तो वो भी नहीं।
किसी चर्चा के दौरान जब आप किसी से
ये पुछ लो कि पिछले 70-72 वर्षों से देश में गरीबों के लिए इतनी योजनाएं चलाई जाती रही हैं, फिर भी ये गरीबी क्यों नहीं मिटती..?
तो लोग वही नेताओं वाला आसान सा जबाब दे ते हैं कि देश में कई गुना आबादी बढ़ने के कारण ….
चलो मान लेते हैं ये बात भी ठीक है मग़र एक हद तक।
मान लो गरीबों की आबादी सात गुना बढ़ गयी तो उनकी “गरीबी” भी तो सात गुना ही बढ़नी चाहिए..वो फिर 25 गुना कैसे बढ़ जाती है। साथियो हक़ीक़त तो ये है कि, आजादी के बाद देश में टैक्स और योजनाओं के नाम पर देश के नेताओं द्वारा अपने ऐशो-आराम के लिए लूट 25 गुना बढ़ गयी है इसलिए गरीबी की दर बढ़ी हुई है।
प्रबुद्ध वर्ग के लिए न केवल ये चिन्तनीय है,वल्कि बहुत ही विचारणीय प्रश्न है। धन्यवाद।
विचारक : युग,पचहरा,
88A वसुन्धरापुरम,हाथरस