59-“स्वीट-कॉफ़ी”

उत्तर प्रदेश की ए श्रेणी में सुमार की जाने वाली संस्था जो अपनी अच्छी परम्पराओं के लिये लगभग पिछले आठ दशकों से जानी जाती है। ये वो संस्थान है, “जहाँ परम्पराएँ सदैव कानून से बढ़कर रहीं हैं।”

जी, वही माँ सरस्वती का मन्दिर जो आगरा – अलीगढ़ हाई वे पर सासनी में प्रवेश करते ही “करोड़ी लाल जैन इंटरमीडिएट कॉलेज,सासनी अर्थात “के.एल.जैन के नाम से स्थिति है। जिसका मैं भी एक छोटा सा पुजारी हूँ।

शायद मेरा कोई पूर्व-प्रारब्ध उदय हुआ होगा, जो 15 अगस्त,1994 दिन सोमवार को मुझे इस आदर्श संस्था में एक शिक्षक के रूप में तैनाती मिली, कुछ दिन बाद कक्षा में ‘शिक्षण-कार्य’ करते..करते मैंने महसूस किया कि कुछ विद्यार्थी पढ़ने में तो कहीं तक ठीक हैं। लेकिन उनके परिवार की माली हालत ठीक नहीं हैं।

मग़र ये भी सत्य है कि, “महानता का पुष्प” हमेशा अभाव की दुर्गम पहाड़ियों पर ही खिला करता है।

व्यक्तिगत तौर पर एक शिक्षक का असली गुण “मित्रवत-व्यवहार” के जरिये धीरे-धीरे अपने छात्रों के दिल के करीब होते चले जाना है।

जब मैंने ऐसा महसूस किया,तो मैं अपने विद्यार्थियों को शिक्षा के अतिरिक्त स्नेह, सहानुभूति, कुछ नैतिक एवं मानवीय संवेदनाओं के साथ-साथ
कैरियर के प्रति भी उन्हें थोड़ा थोड़ा जागृत..करता गया। इसके लिए मेरे अंदर अपने आपको अपडेट रखने की जिज्ञासा पनपने लगी।

अपने छात्रों के लिए जानकारियाँ जुटाने के लिहाज़ से मैं वक्त मिलते ही कॉलेज की लाइब्रेरी में जाकर कुछ ऐसी पुस्तकें खंगालने लगा.. जो व्यक्ति के ‘दिमांग की ऊँचाई’ बढाने में सहायक होती हैं।

क्योंकि कि छात्रों के ‘हिर्दय की गहराई’ बढ़ाने.. उन में नैतिक एवं मानवीय मूल्यों का समावेश करने.. और विद्यार्थियों के कोमल मन में अच्छे संस्कार..स्थापित करने के पहले “शिक्षक” में “समर्पण भाव” का होना नितांत आवश्यक है।

कोई व्यक्ति जब अपना ‘धेय’ निश्चित कर लेता है, तो ही वह एक अच्छा-नागरिक बन कर देश दुनियां की सेवार्थ तैयार हो पाता है।

मग़र छात्रों का आत्मीय रिश्ता भी सिर्फ कुछ ही शिक्षकों के साथ बन पाता है। जो शिक्षक उनके साथ एक हद तक मित्रवत जैसे हो जाते हैं।

वे शिक्षक जिनमें “शिक्षकत्व”(Pedagogy) अर्थात गुरुत्व होता है। जो पढ़ाई के अतिरिक्त कभी-कभी उनकी मनः-स्थिति की खैर-ख़बर भी ले लिया करते हैं। जैसे;

निर्धन छात्रों में फीस वक़्त पर न दे पाने की खिन्नता,अक्सर बनी रहती है।

गरीब-छात्रों का कॉलेज के लिए प्रोपर यूनिफार्म में न आना.. सुबह ईश वंदना के दौरान सबके सामने दण्डित होने का भय,

पुस्तकें आदि न होने पर कई बार कक्षा से निकाले जाने की विवशता..

आदि कुछ चीजें बड़े विद्यालयों में भले ही एक रूटीन चेक अप में आती हैं। मग़र ऐसी व्यवस्थाएं आर्थिक रूप से बेवश छात्रों की कुछ चिंताएं अवश्य बढ़ा देती हैं।

जिससे न केवल उनकी पढ़ाई बाधित होती है। वल्कि उनका अंतर्मन भी काफ़ी कुपित रहता है।

ये सब आंकलन करने के बाद, धीरे-धीरे उनकी इन समस्याओं के कुछ हद तक निदान में अपनी सामर्थ्य के मुताबिक जितना सहयोग बन पड़ता है हम शिक्षक, एवं हमारे स्टाफ के कई एक लोग..समय समय पर करते रहते हैं ! शायद इससे हम शिक्षकों व स्टाफ मेंबर्स का अपने विद्यार्थियों के साथ स्वतः ही एक “आत्मीय रिश्ता” बन जाता है।

मेरे सेवाकाल के दूसरे सत्र अर्थात जनवरी,1995 में शायद मेरे कुछ पारिवारिक-संस्कारों, दूसरे मेरी पूज्यनीय मां सहित उन सभी गुरुओं ( शिक्षकों ) का आशीर्वाद जिन्होंने मुझे पढ़ाया था व कुछ अच्छी मित्र मंडली की संगति, इन सबसे अधिक शायद ब्रह्ममंडीय संवाद ईश्वर प्रदत्त सद्बुद्धि..आदि से मुझे कुछ ऐसी प्रेरणा होती चली गईं ..कि मैंने अपने खाली पीरियड्स में अपनी दिनभर की सभी कक्षाओं के ‘पुअर’ बट ‘लेबोरियस’ स्टूडेंट्स को किसी खाली क्लास रूम में बैठाकर उनके कमज़ोर चैप्टर्स में मदद करना शुरू कर दिया..

हालांकि हमारे विद्यालय में अधिकतर शिक्षकों द्वारा “अतिरिक्त-कक्षाओं” का चलन बहुत पहले से है।
इस “जन-कल्याण” सम्बन्धी कार्य में अपने कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पित होकर तन्मयता से जुटे रहना ही शायद किसी शिक्षक को

“A teacher by choice”

की परिधि में लाता है।

इस सब से मेरे मन को जो सुकून मिलता है। शायद उसे शब्दों में, कभी बयां नहीं किया जा सकेगा।

हाँ, सौभाग्यवश जब कभी उन मेधावियों या उनके संरक्षकों से, ज़िन्दगी के किसी मोड़ पर यकायक भेंट हो जाती है, तो उस वक्त एक शिक्षक का अन्तर्मन गदगद जाता है।

मेरे जीवन की “असल कमाई” बिना किसी ‘अपेक्षा’ के इन मेधावियों के ह्रदय की वो “गहराई” है। जिन्होंने एक “शिक्षक” को उसमें जगह दी है। इसके लिए.. कम से कम मैं, तो उनका सदैव आभारी रहूंगा।

शायद ऐसे प्रेम को विद्वानों ने अपनी भाषा में “अनकंडीशनल-लव” अर्थात ‘बिना शर्त वाले प्रेम’ की संज्ञा दी हुई है।

एक बार की बात बताऊँ, मेरे कुछ अज़ीज शिष्यों में से कॉलेज छोड़ने के बहुत दिनों बाद अपना कैरियर सेट हो जाने पर उसी आत्मीय-रिश्ते से जुड़े हुए कुछ ओल्ड-बॉयज का “एक पुराना ग्रुप” मुझसे मिलने मेरे “88-A वसुन्धरापुरम, हाथरस” वाले घर पर अचानक चला आया।
इस बात के लिए वे सभी बधाई के पात्र हैं।

क्योंकि आज वे अच्छे कैरियर के साथ साथ लगभग देश के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं। जैसे; लेक्चरर, यू .पी. पी.सी.एस., एम.पी. पी.एस.सी.,राजस्थान आर.ए.एस., लोअर पी.सी.एस., इंजीनियर्स, डॉक्टर्स,प्रोफेसर्स आदि।

जब वो आये, तो मैं बहुत सरप्राइज था! हाँ, मुझे अच्छा लगा कि, वे अपने शिष्य स्वरूप में ही आए थे वरना, उनके पदों के प्रोटोकॉल के अनुसार एरिया वाइज पुलिस के सायरन-वायरन के साथ आए होते,तो उनके साथ इतने इत्मीनान से बैठ कर बात भी नहीं हो पाती।

जब ड्राइंग रूम में बैठ गए..,तो मैंने, शुरुआत उनके “रूटीन वर्क ” के साथ की, औऱ उनसे मेरा सबसे पहला सवाल यही था कि,

आज आप जहाँ भी हैं, संतुष्ट हैं..?

धीरे-धीरे डिस्कशन आगे बढ़ा.. बात लाइफ में बढ़ते “तनाव” और

सत्तासीनों के हस्तक्षेप से आज हर विभाग में काम के अनावश्यक “दबाव” की जो जमीनी हकीकत है। बात उस पर आ गई, जो अब शायद हर विभाग के लिए एक सामान्य सी बात हो गई है।

इस मुद्दे पर सभी एक मत थे कि, भले ही वे अब आर्थिक एवं समाजिक रूप से काफी सम्पन्न.. एवं देश व प्रदेश के महत्वपूर्ण ओहदों पर काबिज़ हैं..,

फिर भी वे लगभग एक सुर में बोले, गुरुदेव !

अब हमारी जिंदगी में सुकून व आनंद तो नहीं रह गया है, जिसकी अपेक्षा आम या खास हर इंसान को होती है।

मैं, शुरू से ही बड़े ध्यान से उन्हें सुन रहा था।………..लेकिन “अतिथि देवो भव..” के विचार से..

फिर अचानक मैं एक बहाना करके उनके बीच से निकला, और थोड़ी देर बाद लौटकर उनको ड्राइंग-रूम से डाइनिंग-हॉल में चलने का आग्रह करते हुए.. बोला! चलो! अब आप सभी डाइनिंग हॉल में आइए ..

डायनिंग-हॉल में बैठते ही मैंने कहा!

“प्रिय मित्रो!
इस बात के लिए..मैं क्षमा चाहूंगा..आप सब के इस “सरप्राइजिंग-आगमन” से पूर्व मैडम ‘नीरज चौधरी’, जिनका नाम घर की नेम प्लेट पर देखकर..आप एक बार को मेल कैंडिडेट समझकर थोड़ा कन्फ्यूज हो गए थे, वे आपकी आंटी कॉलोनी के ही मन्दिर पर भागवत सुनने गई हुई हैं। ऐसी स्थिति में उनको डिस्टर्ब न करने के भाव से..

आपके लिये जैसी भी बना पाया हूं.. गरमा-गरम “स्वीट-कॉफी” मैंने तैयार कर दी है। इसलिए आप लोग कॉफी में कोई मीन मेक न निकालते हुए..

अब प्लीज “कपबोर्ड” से अपने लिए कप उठाने का तकल्लुफ स्वयं ही कर लीजियेगा….

हमारे “पुरातन-छात्र” जो “वर्तमान के ऑफिसर्स” हैं। बिना किसी तकल्लुफ़ के फ्रैंकली उठे….
किचन में कई तरह के कप रखे हुए थे,
सभी अपने लिए “अच्छे से अच्छा” कप उठाने में जुट गए।

किसी ने “क्रिस्टल का शानदार कप” उठाया, तो किसी को “पोर्सिलेन का कप” पसंद आया….. किसी ने “कांच का,तो किसी ने चीनी मिट्टी का कप” उठाया।

जब सभी ने अपनी अपनी पसंद के प्यालों में मेरी बनाई हुई “स्वीट-कॉफी” ले ली।

तब मैंने कहा!

अगर आपने ध्यान दिया हो तो, कपबोर्ड में जो “कप” दिखने में अच्छे क्या..जो मँहगे थे,
आपने उन्हें ही चुना..है !!

और साधारण दिखने वाले कप की तरफ आप में से किसी ने देखा तक नहीं….है।

क्या आपको नहीं लगता ! अपने लिए “सबसे अच्छे की चाह रखना..” आज के लोगों का एक स्वभाव सा बन गया है।…..

मेरे ख़्याल से यही वो “एक चीज़ है”

जो हमारी जिंदगी में आये दिन “समस्याएंँ” और “तनाव” लेकर आ रही है। जिसकी चर्चा आप अभी ड्राइंग रूम में कर रहे थे।

मान्यवर! क्या इस बात से कोई इनकार कर सकेगा कि “कप” के अच्छे या महंगे होने से
“कॉफी” या किसी भी “पेय पदार्थ” की क्वालिटी पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता..।

ये “कप” तो बस एक साधन है, जिसके माध्यम से हम “कॉफी” या कोई “पेय पदार्थ” पीते हैं….

दरअसल, आपको जो चाहिए थी…..

वो “स्वीट-कॉफ़ी”, न कि, “कप”

एम आई राइट..?

पुनः मांफ कीजियेगा, आज आप भले ही ऑफिसर्स हैं,

मग़र अभी भी आप एक “सामान्य मानसिकता” के शिकार हैं।
क्योंकि आप सभी सबसे अच्छे कप के पीछे.. ही गए ..?”

इसी दौरान एक और बात मैंने ऑब्जर्व की, अपनी चॉइस का अच्छा “कप” लेने के बावजूद भी आप संतुष्ट नहीं हुए..? बल्कि चुपके-चुपके तुलनात्मक नज़रों से दूसरों के “कप्स” भी निहार रहे थे.. कि किसने कैसा कप लिया है..??

अब मेरी एक बात ध्यान से समझिए…

“ये ” जिंदगी” भी बिल्कुल इस “कॉफ़ी” की तरह ही है…..

ठीक उसी प्रकार हमारी नौकरी, पैसा, पोजीशन,
“कप” की तरह हैं।

लेकिन सदैव ध्यान रहे.. ये पोजिशन, पैसा..रुतबा आदि। बस “जिंदगी जीने के ‘साधन’ मात्र होते हैं।
इन्हें कभी “ज़िन्दगी” समझने की गलती मत कर बैठिएगा। और यदि कभी ऐसा हुआ, तो बहुत बड़ी भूल हो जाएगी।

दूसरी बात हमारे पास कौन सा “कप” है…..?

ये ना तो हमारी जिंदगी को “डिफाइन” करता है और ना ही हमें वैचारिक स्तर पर “ट्रांसफॉर्म” करने की सामर्थ्य रखता है।

इसीलिए

यदि चिंता कभी करो भी, तो सिर्फ “कॉफ़ी” यानी “जिंदगी” की।

“कप” की, तो कभी नहीं ।

दुनिया के सबसे खुशहाल
लोग वे नहीं होते ,
जिनके पास सब कुछ
सबसे बढ़िया अथवा ब्रान्डेड होता है…..

वल्कि खुशहाल वे लोग कहीं अधिक होते हैं, जिनके पास जो भी होता है,
वे उसका इस्तेमाल न सिर्फ “बड़े-अच्छे” से करते हैं, अपितु फुल एन्जॉय के साथ करते हैं।

वे जीवन को भरपूर तरीके से जी..ते हैं…….! आम लोगों की तरह ढोते नहीं !

इतिहास गवाह है। ऐसे लोग दुनियाँ की अंधी दौड़ में न तो कभी शामिल हुए हैं और न कभी होंगे।

इसीलिए, बन्धुवर! सदा हंँसते-मुस्कराते रहें.. और जीवन को पूरी सादगी एवं सिद्दत के साथ जियें

“प्रत्येक जीव” में “स्वयं” को देखें, ताकि पाप-कर्म से बचे रहें। सबसे प्रेम करें…..प्रति “पल” जी..ने का प्रयास करें।

धन्यवाद

: योगेंद्र सिंह पचहरा,

के एल जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस।

58- “राष्ट्र-हित” सर्वोपरि..

✍✍ ..जी विल्कुल लीडरशिप हो तो ऐसी।… ये श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी ही है ,जिनके दिमाग को विश्व के चुनिन्दा , चतुर नेता तक नही समझ पा रहे हैं..,तो अपने देश में बैठे तथाकथित चीन और पाकिस्तानी.. समर्थक, देशद्रोही कांग्रेस और वामपंथियों औऱ उनके साथियों की फ़ौज गरियाती फ़िर रही है…कि मोदी ऐसी जगह ले जाकर छोडेगा जहाँ से वापसी भी संभव नही होगी…ये विल्कुल सत्य वचन है।..समय रहते सम्भल जाओ,वरना देश द्रोहियों की तो वाकई खैर नहीं।

ध्यानपूर्वक पढियेगा…
मोदी ने हिंद महासागर में भारत के दो ‘सीक्रेट आइलैंड’ स्थापित किये हुए हैं..ये कार्य 2014 से अनवरत चल रहा है।

ये एक ऐसी खबर है जिसके बारे में बाहर तो क्या ! हमारे देश में ज्यादातर लोगों को भी अभी ठीक से पता नहीं है। दरअसल “राष्ट्रहित-सर्वोपरि” वाले दृष्टिकोण से यह एक “टॉप सीक्रेट मिशन” है, जिसने चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मन देशों की नींद उड़ा रखी है।

भारत की समुद्री सीमा से दूर हिंद महासागर में 2 फौजी अड्डे स्थापित किए जा चुके हैं। मतलब यह है कि भारतीय सेना ने इन आइलैंड पर अपना “मिलिट्री-बेस” बनाया है। दुनिया के नक्शे में इन दोनों द्वीपों की लोकेशन इतनी जबर्दस्त है कि चीन और पाकिस्तान इससे बेहद परेशान हैं।

इनके नाम हैं- “अगालेगा” और “अजंप्शन’ आइलैंड। इन द्वीपों पर भारतीय सेना आधुनिक हथियारों और साजो-सामान के साथ मौजूद है। बेहद खुफिया तरीके से यहां भारतीय सेना खुद को मजबूत बनाने में जुटी है।

अगालेगा आइलैंड पर तो भारत ने बाकायदा एयरपोर्ट भी बनाया हुआ है। जबकि अज़ंप्शन आइलैंड पर आने जाने के लिए अभी सिर्फ हवाई पट्टी बनाई गई है। इन दोनों आइलैंड्स को भारत को सौंपे जाने पर चीन और यहां तक कि भारत के चीनी और पाकिस्तानी समर्थक कांग्रेस और वामपंथी पत्रकारों ने बहुत अड़ंगेबाजी की..।

इस सैनिक समझौते के खिलाफ कई झूठी खबरें उड़वाई गईं। आज इन दोनों द्वीपों पर क्या चल रहा है इसका बाकी दुनिया सिर्फ अंदाजा लगा सकती है। क्योंकि यहां भारतीय सेना के अलावा किसी को जाने की अनुमति ही नहीं है।

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभालने के फौरन बाद जिन देशों की यात्रा की थी, उनमें मॉरीशस और सेशेल्स भी थे। सरकार ने औपचारिक तौर पर बताया कि ये दौरा दोनों देशों के आपसी रिश्ते सुधारने और काले धन पर बातचीत के लिए है। लेकिन असली मकसद कुछ और ही था।

इस यात्रा में मोदी ने सेशल्स और मॉरीशस को इस बात के लिए मना लिया कि वो अपने 1-1 द्वीप भारत को लीज़ पर देंगे। इसी दौरे में शुरुआती समझौते पर दस्तखत भी कर लिए गए।

अगालेगा आइलैंड मॉरीशस में पड़ता है, जबकि अजंप्शन द्वीप सेशेल्स देश का हिस्सा है। हिंद महासागर में ये वो लोकेशन थी जिसके महत्व की चीन को भी कल्पना नहीं थी। ये है दमदार लीडरशिप का कमाल।
डील पर दस्तखत होने के कुछ दिन बाद जब मामला मीडिया में आया तो भारत में चीन के लिए प्रोपेगेंडा करने वाले कुत्ते पत्रकार और चीन सरकार बुरी तरह बौखला गए।

यही वो समय था जब मीडिया ने पीएम मोदी की विदेश यात्राओं की खिल्ली उड़ानी शुरू कर दी थी। क्योंकि उन्हें लग गया था कि पीएम मोदी इन यात्राओं के जरिए कुछ ऐसा कर रहे हैं जो वो नहीं चाहते कि मीडिया को पता चले।

इन दोनों द्वीपों के लिए की गई संधियों को रद्द कराने के लिए वहां के विपक्षी दलों के जरिए भी दबाव बनाया गया। इन्हीं का नतीजा था कि अज़ंप्शन आइलैंड के लिए आखिरी समझौते पर दस्तखत जनवरी 2018 में हो सके।

अगालेगा आइलैंड मॉरीशस के मुख्य द्वीप से 1100 किलोमीटर दूर उत्तर यानी भारत की तरफ है। ये सिर्फ 70 वर्ग किलोमीटर दायरे में है। इसी तरह सेशल्स का अज़ंप्शन आइलैंड वहां के 115 द्वीपों में से एक है। ये सिर्फ 11 वर्ग किमी की जमीन है, जो कि मेडागास्कर के उत्तर में हिंद महासागर में है।

भारत अरब देशों से कच्चा तेल खरीदता है। ये तेल हिंद महासागर के रास्ते ही आता है। कच्चा तेल जिस रूट से आता है वो उन जगहों से काफी करीब है जहां पर चीन बीते कुछ साल में अपना दबदबा बना चुका है। वो इन जगहों पर बैठे-बैठे जब चाहे भारत की तेल की सप्लाई लाइन काट सकता है।

ऐसे में भारत को समंदर में एक ऐसी लोकेशन की जरूरत थी, जहां से वो न सिर्फ अपने जहाजों को सुरक्षा दे सके, बल्कि जरूरत पड़ने पर चीन की सप्लाई लाइन पर भी वार कर सके। यही वो रणनीति है जो नरेंद्र मोदी जी की लीडरशिप में चार चाँद लगाती है, जिसकी कल्पना चीन भी नहीं कर सका।

उसे भरोसा था कि भारत की सरकारें हिंद महासागर पर कब्जे की चीन की रणनीति को कभी समझ नहीं पाएंगी। चीन के रणनीतिकार अपने इस प्लान को ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (मोतियों की माला) कहते हैं। चीन ने अपनी इसी रणनीति के कारण एक तरफ भारत को दबोच सा लिया था। साथ ही अमेरिका के लिए भी मुश्किल हालात पैदा कर दिए थे।

पीएम मोदी ने इस खतरे को भांपते हुए चीन के जवाब में ‘स्ट्रिंग ऑफ फ्लावर्स’ (फूलों की माला) नाम से रणनीति बनाई। इसी के तहत सबसे पहले अज़म्प्शन और अगलेगा आइलैंड को लीज़ पर लिया गया।

ये दोनों द्वीप आज चीन की आंखों में किरकिरी बने हुए हैं। क्योंकि वहां से भारत ने पूरे हिंद महासागर पर घेरा बना लिया है। फिलहाल इन द्वीपों पर बुनियादी ढांचा विकसित करने का काम तेजी से चल रहा है। दोनों द्वीपों पर कुछ लोग रहते भी थे, जिन्हें भारतीय सेना ने ही दूसरी जगहों पर घर बनाकर बसा दिया है। अब इन दोनों द्वीपों पर भारतीयों के अलावा किसी को जाने की इजाज़त नहीं है।

पिछले दिनों अमेरिका ने भारत को 22 गार्जियन ड्रोन देने पर रजामंदी जताई है, इन ड्रोन से इस पूरे रीजन के समुद्र पर निगरानी की जाएगी। अमेरिका भी चाहता है कि हिंद महासागर के इस इलाके में चीन को बहुत ताकतवर न होने दिया जाए। लिहाजा वो भारत के साथ सहयोग कर रहा है

दरअसल भारत से दूर दुनिया भर में “मिलिट्री-बेस” बनाने का आइडिया पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का था। उनकी सरकार के वक्त इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू भी किया जा चुका था। लेकिन अफसोस उसी दौरान 2004 में वो चुनाव हार गए। इसके बाद आई मनमोहन सरकार ने इस पूरे प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया था।

10 साल तक इस पर कोई भी काम आगे नहीं बढ़ा। 2014 में फिर से बी.जे.पी.की सरकार बनी। इस बार देश को श्री नरेंद्र मोदी के रूप में 56 इंची सीने वाला पी.एम. मिला तो उन्होंने सबसे पहले जो फाइलें क्लियर कीं, उनमें से एक इसके बारे में भी थी। वाजपेयी की सोच थी, कि हर कीमत पर भारत को दुनियां का ताकतवर मुल्क बनाना है, तो कुछ ऐसा करना होगा जिससे कोई दुश्मन भारत की ओर आंख उठाकर देखने की हिम्मत भी न कर सके।

अमेरिका, रूस, ब्रिटेन जैसे देशों ने पूरी दुनिया में ऐसे द्वीपों पर “मिलिट्री-बेस” पहले ही से बना रखे थे। वाजपेयी, तजाकिस्तान के फारखोर में भारत का पहला “एयरफोर्स बेस” स्थापित कर चुके थे। लेकिन हिंद महासागर पर दबदबे का उनका सपना अधूरा रह गया था। जो उनके चहेते मोदी जी ने पूरा कर दिखाया।

अगालेगा और अज़ंप्शन आइलैंड पर फिलहाल सिर्फ भारतीय सेना को ही जाने की छूट है। दोनों जगहों पर जा चुके नौसेना के एक जवान ने बताया था कि ये दोनों द्वीप बेहद खूबसूरत हैं। चारों तरफ नीले समुद्र से घिरे इन द्वीपों पर अब तक बहुत कम आबादी रही है। सेना की कोशिश है कि यहां की कुदरती खूबसूरती को बनाए रखते हुए यहां के बुनियादी ढांचे का विकास किया जाए।
वाक़ई हमें गर्व होना चाहिए हमारे प्रधानमन्त्री माननीय श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी की ऐसी सुदृढ और राष्ट्रवादी नीतियों पर।
हरि 🕉 हरि विचारक ; युग पचहरा, नीमगाँव, राया,मथुरा।
(जैन,कॉलेज,सासनी,हाथरस)

57- “Do You Know.?”

Would You have in your memory…?

जाटों के बहादुरी भरे इतिहास को झुटलाने वालो..को क्या आप जानते हैं..?

Q-1 तैमूर को किसने मारा..?
उत्तर : चौधरी हरवीर गुलिया( जाट) ने।

Q-2 सोमनाथ मंदिर के सोने के गेट को वो भी काबुल से लड़कर कौन लाया ..?
उत्तर- “जाट रेजिमेंट” ऑफ इंडिया।

Q-3 हिन्दुस्तान से.. सबसे पहले गांधी जी के साथ किस जाट का नाम नोबेल पुरस्कार के लिए भेजा गया था..?
उत्तर- (मुरसान वाले) महाराजा महेन्द्र प्रताप सिंह जी ठेनुआ का

Q-4 पृथ्वीराज चौहान की हत्या करने वाले मोहम्मद गौरी को किसने मारा ?
उत्तर : चौधरी रामलाल खोखर (जाट ) ने।

Q-5 महाराणा प्रताप को युद्ध में हराने वाले अकबर की हड्डियों को किसने जलाया..?
उत्तर : बृज के राजाराम (जाट) ने।

Q-6 सिकंदर महान को किसने अधमरा किया जिससे बेबीलोन में जाते-जाते ही उसकी मौत हो गई..?
उत्तर – मल्ही जाटो ने। ( सन्देह हो,तो इतिहास उठाके देख लीजियेगा।

Q-7 अलाउद्दीन ख़िलजी ने चित्तौड़ जीतकर निशानी के तौर पर जो चित्तौड़ किले के किवाड़ लाकर दिल्ली लाल किले में लगा दिए थे , उसे मुग़लो से जीतकर वापस कोण लाया..?
उत्तर – जवाहर सिंह (जाट) (भरतपुर के अजेय महाराजा सूरजमल के सपूत।

Q-8 अफगानिस्तान जिस पे कभी कोई देश जीत हासिल नहीं कर सका, यहां तक अमेरिका भी नहीं। , उस अफगानिस्तान में किसने बार-बार घुस कर हिंदुस्तान का झंडा फहराया था..?
उत्तर – महाराजा रणजीत सिंह ने।

Q-9 अफगानिस्तान में आज भी किस यौद्धा के नाम का ख़ौफ है ?
उत्तर – सरदार हरी सिंह नलवा (जाट) का।

Q-10 औरंगजेब के नाक के नीचे उसके खिलाफ खुला विद्रोह करके उसके नियम मानने से इंकार करने वाला एकलौता यौद्धा कोन था..?
उत्तर – वीर गोकुला (जाट)

Q-11 क्या तुम अंजान नही हो कि भारत पर हूणों के आक्रमण पर हूणों को मारते हुए भारत से बाहर किसने भगाया..?
उत्तर – महाराजा यशोवर्धन विर्क (जाट) ने।

Q-12 भारत को एक करके राज करने वाला अंतिम बोद्ध शासक कोण था?
उत्तर- जाट महाराजा हर्षवर्धन बैंस थानेश्वर।

Q-13 : 1857 कि क्रान्ति में दिल्ली के सबसे नजदीक होकर बिना किसी स्वार्थ के अंग्रेजो को ललकारा था और जिसे दिल्ली में फांसी दी गयी..कौन था वो शेर 1857 का पहला शहीद कहलाया?
उत्तर – राजा नाहर सिंह (जाट) ही था

Q-14 क्या तुम्हे ये भी पता नही है कि 19 साल की उम्र में ग़दर पार्टी का लीडर कोण था जो विदेश से पढ़ाई छोड़कर भारत आया और देश के लिए मात्र 19 साल में ही शहीद हो गया..?
उत्तर – सरदार करतार सिंह सराभा (जाट)

Q-15 भारत में अंग्रेजों की चूल और पाट किसने इस कदर हिला दी कि उसीके कहे अनुसार उन्हें 15 साल बाद भारत छोड़ कर जाना ही पड़ा..?
उत्तर – शहीद ए आजम सरदार भगत सिंह (जाट)।

ये महज़ “15 सवाल” ही नहीं हैं। इतिहास साक्षी है, 1948 ,1965 ,1971और 1999 के युद्धों तथा आजादी के बाद हुये सभी खेलो की लिस्ट लिखने लगोगे, तो घण्टे ही नहीं कई दिन भी कम पड़ जायेंगे… इतना लम्बा और गौरवशाली इतिहास है। इस “जाट” जाति का…

हालांकि व्यक्तिगत मैं, “जाति” / “धर्म” आदि का कभी भी पक्षधर न रहा हूँ और न अभी भी हूँ।

यदि भारत में मौजूद किसी भी जाति/धर्म के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने की या किसी को उपेक्षित करने की बात कोई करेगा, तो मैं कभी उसका पक्षधर नहीं हो सकता।

क्योंकि मैं “जातिवादी” नहीं एक “मानवतावादी” विचारक हूँ।

जाटों के इतिहास से जान बूझकर वैमनश्यता के कारण अंजान बने लोगो !
“जाट” वो हस्ती है जिसने राष्ट्र और समाज हित में सदैव सच्चे चरित्र के साथ अपनी “अक्षुण्य-पहचान” खुद बनायी है और जब तक ये सृष्टि है, आगे भी इसी तरह बरकरार रखेगा क्योंकि अच्छे संस्कार जो पाए हैं।
अब आप अपनी अंतरात्मा से पूछिये..? कि बहादुरी, खुद्दारी और आत्मसम्मान का प्रतीक “जाट” है, या नहीं ! अगर आपका ज़मीर कहे, “हां विल्कुल है” तो ये वर्षों से चली आ रही वैमनष्यता मिटा कर उसे नज़र अंदाज़ करना छोड़ दीजिए..

वो सच्चा देशभक्त होने के साथ-साथ आपका अपना ही भाई है, कोई गैर नहीं है। बहुत हो चुका.. हमेशा बुरे वक्त में अपने साथ रखकर, और अच्छे समय में उपेक्षित करके उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने वाला रवैया बंद कर दीजिएगा। धन्यवाद👍

जाट बलवान

जय भगवान
जय हिन्दुस्तान 💪💪💪 🙏🙏🙏

; YUG पचहरा,
नीमगाँव,राया,मथुरा।
(जैन कॉलेज,सासनी,हाथरस)

56- “नौ आदतें” बनाम “नवग्रह-शांति”

👇जरूर ध्यान दे:- “नौ आदतें या नौ ग्रह”
🕉 ज्योतिष व सांईटिफिक सोच के अनुसार आपके यश व सफलता के लिए नीचे लिखी “नौ आदतें” आपके जीवन में यदि हैं, तो बहुत अच्छा है और अगर ये आदतें नहीं हैं, तो आप मनुष्य-जीवन मिलने के बाद भी पशु समान ही हैं।

✒ आदत नम्बर 1…
अगर आपको बेवज़ह कहीं पर भी थूकने की आदत है तो यह निश्चित है कि, आपको यश, सम्मान मुश्किल से ही मिलेगा और यदि अकारण मिल भी जाता है तो ज्यादा देर नहीं टिकेगा।

✒ आदत नम्बर 2…
जिन लोगों को अपनी ‘जूठी थाली या बर्तन’ खाना खाने वाली जगह पर ही छोड़कर उठ जाने की आदत होती है “उनको सफलता,” स्थायी रूप से नहीं मिलती.. ऐसे लोगों को औरों की तुलना में अधिक मेहनत करनी पड़ती है।

✒ आदत नम्बर 3…
आपके घर पर जब भी कोई बाहर
से आये, चाहे मेहमान हो या कोई काम करने वाला, उसे कम से कम स्वच्छ पानी तो ज़रुर पिलाएं। ऐसा करने से हम राहु का सम्मान करते हैं। ये आदत अचानक आ पड़ने वाले कष्ट-संकट नहीं आने देती।

✒ आदत नम्बर 4…
घर के पौधे आपके अपने परिवार के सदस्यों जैसे ही होते हैं, उन्हें भी प्यार और थोड़ी देखभाल की जरुरत होती है। जो लोग नियमित रूप से पौधों को पानी देते हैं, उन लोगों को Depression या Anxiety जैसी परेशानियाँ कभी नहीं पकड़ पातीं।

✒ आदत नम्बर 5…
जो लोग बाहर से आकर घर में
अपने जूते,चप्पल, मोज़े इधर-उधर फैंक देते हैं, यथा स्थान नहीं रखते, उन्हें उनके शत्रु या प्रतिद्वन्दी सदैव परेशान करते हैं। इससे बचने के लिए अपने चप्पल-जूते करीने से लगाकर रखें, आपकी प्रतिष्ठा न केवल बनी रहेगी अपितु दिन प्रतिदिन बढ़ेगी।

✒ आदत नम्बर 6…
उन लोगों का राहु और शनि खराब होगा, जिनका अपना बिस्तर उनके उठकर जाने के बाद हमेशा फैला हुआ होगा, सिलवटें ज्यादा होंगी, चादर कहीं, तकिया कहीं, कम्बल कहीं.. ? ऐसे लोगों की दिनचर्या भी कभी भी व्यवस्थित नहीं रह पाती जीवन में सदैव उथल-पुथल बनी रहती है।

✒ आदत नम्बर 7…
पैरों की सफाई पर हम लोगों को हर वक्त ख़ास ध्यान देना चाहिए, जबकि हम में से बहुत सारे लोग पैरों को धोना या साफ करना भूल जाते हैं। रोज़ाना नहाते समय अपने पैरों को अच्छी तरह से धोयें, जब कभी भी बाहर से घर आयें तो हमेशा पांच मिनट रुककर मुँह और पैर अवश्य धोयें। आप खुद यह पाएंगे कि आपका चिड़चिड़ापन कम होगा, दिमाग की शक्ति बढे़गी और क्रोध धीरे-धीरे कम होने लगेगा और आपके जीवन में आनंद और शान्ति बढ़ेगी।

✒ आदत नम्बर 8…
जो लोग रोज़ खाली हाथ अपने घर लौटते हैं, धीरे-धीरे उस घर से “धन-लक्ष्मी” दूर चली जाती है और उस घर के सदस्यों में नकारात्मक या निराशा के भाव आने लगते हैं। इसके विपरीत घर लौटते समय बच्चों या बुजुर्गों के लिए कुछ न कुछ आवश्यक वस्तु या खाने के लिए जैसे; फल,टॉफी,चॉकलेट,मूंगफली,चना-चिरवा आदि मौसम के मुताविक लेकर आएं तो इस आदत से उस घर में बरकत बनी रहती है। उस घर में लक्ष्मी का वास स्थायी होता जाता है। हर रोज घर में कुछ न कुछ लेकर आना वृद्धि का सूचक माना गया है। ऐसे घर में सुख, समृद्धि और धन हमेशा बढ़ता जाता है। और घर में रहने वाले सदस्यों की भी तरक्की होती है।

✒ आदत नम्बर 9…
थाली में जूठन बिल्कुल न छोड़ें और ऐसी आदत अपनाने के लिए आज ही ठान लें और एकदम पक्का तय कर लें। इस आदत से आपको पैसों की कभी कमी नहीं होगी। अन्यथा सभी नौ के नौ ग्रहों के खराब होने का खतरा सदैव मंडराता रहेगा। कभी कुछ तो कभी कुछ करने योग्य फायदे वाले काम अधूरे पड़े रह जायेंगे और आपका समय, पैसा व ऊर्जा कहां नष्ट हो जायेगी, आपको पता ही नहीं चलेगा।
👉मेरा मानना है कि अच्छी बातें बाँटने से किसी न किसी का फायदा तो होता ही है। साथ साथ इस तरह के ज्ञान की बहुत अच्छी बातों का महत्त्व समझने वाले लोगों में आपकी इज़्जत भी बढ़ने की सम्भावना बनी रहती है…🥀 धन्यवाद

🌷 ईश्वर सबका भला करें 🌷

🙏राम राम जी🙏🌻आपका आने वाला वक्त शुभ व मंगलकारी हो🌻
विचारक

;युग पचहरा,
नीमगाँव, राया,मथुरा।

55- देश का गौरव

“श्रीकांत जिचकर” एक अद्भुत-व्यक्तित्व

यदि आपसे कोई पूछे भारत के सबसे पढ़े-लिखे और ऐसे व्यक्ति का नाम बताइए जो,

उच्च कोटि का डॉक्टर भी रहा हो,

बैरिस्टर भी रहा हो,

IPS & IAS (दोनों) स्तर का अधिकारी भी रहा हो

सबसे कम उम्र में विधायक, सांसद और फिर मंत्री भी रहा हो,

चित्रकार एवं फोटोग्राफर भी रहा हो,

बहुत ही अच्छा “मोटिवेशनल-स्पीकर” भी रहा हो,

पत्रकार भी रहा हो,

यूनिवर्सिटी का कुलपति भी रहा हो,

संस्कृत, गणित का प्रोफॉउंड-स्कॉलर (प्रकांड) भी रहा हो,

इतिहासकार भी रहा हो,

समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र का भी अच्छा खासा ज्ञान रखता हो,

जिसने काव्य रचना भी की हो !

इसे पढ़ते-पढ़ते अधिकांश लोग यही कहेंगे कि, इतने असीमित गुणों की खान क्या किसी एक इंसान में हो सकती है..? ,”क्या ऐसा संभव है..? आप एक व्यक्ति की बात कर रहे हैं या किसी संस्थान की.. ?” विल्कुल ठीक सोच रहे हैं आप… ऐसे “व्यक्तित्व” महज़ एक व्यक्ति नहीं वास्तव में वे किसी “संस्थान” से कम नहीं होते।
हाँ ऐसा चरित्र भारत में ही है। इसलिए सदैव याद रखियेगा। ऐसे महान व्यक्तित्व के लिए “था” नहीं कहा जाता। हालांकि शरीर से वो हमारे बीच नहीं होते, मग़र ऐसे चरित्र अपने विचारों एव कृतित्व से सदैव लोगों के दिलों में ही रहते हैं।

मग़र अफसोस! भारतवर्ष में ऐसा ही एक व्यक्ति मात्र 49 वर्ष की अल्पायु में एक बहुत ही भयंकर सड़क हादसे में अपना स्थूल-शरीर गवां चुका है।

यहाँ मै, मानव-शरीर के तीनों रूपों का ज़िकर करना जरूरी समझता हूँ..

1- स्थूल-शरीर, (दृश्य)

2- सूक्ष्म-शरीर (अदृश्य-आत्मिक) और

3- आभा-शरीर (अदृश्य-छवि-रूपी)

जो परिवार, समाज व देश दुनियाँ में व्यक्ति के कर्मों से उसकी व्यक्क्तिगत एक “छवि” एक पहचान बनती है, अच्छी या बुरी जैसी भी वो शरीर। अब उस अद्भुत व्यक्तित्व का..

वो महान नाम है “श्रीकांत जिचकर ! ”
श्रीकांत जिचकर का जन्म 1954 में संपन्न मराठा एक किसान परिवार में हुआ था ! वह भारत के सर्वाधिक पढ़े-लिखे व्यक्ति थे,जिनकी सभी खूबियों का रिकॉर्ड “गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड” में दर्ज है !

क्योंकि श्रीकांत जी ने 20 से अधिक डिग्री हासिल की थीं !

कुछ रेगुलर व कुछ पत्राचार के माध्यम से ! वह भी फर्स्ट क्लास, गोल्डमेडलिस्ट,कुछ डिग्रियां तो उच्च शिक्षा में नियम ना होने के कारण उन्हें नहीं मिल पाई जबकि इम्तिहान उन्होंने दे दिया था !

उनकी डिग्रियां/ शैक्षणिक योग्यता इस प्रकार थीं…

MBBS,MD gold medalist,

LLB,LLM,

MBA,

Bachelor in journalism ,

संस्कृत में डी.लिट. की उपाधि यूनिवर्सिटी टॉपर ,

M. A:
इंग्लिश,हिंदी, हिस्ट्री, साइकोलॉजी, सोशियोलॉजी,
पॉलिटिकल साइंस, आर्कियोलॉजी, एंथ्रोपोलॉजी।

श्रीकान्तजी 1978 बैच के आईपीएस व 1980 बैच आईएएस अधिकारी भी रहे !
1981 में महाराष्ट्र में विधायक बने,

1992 से लेकर 1998 तक राज्यसभा सांसद रहे !

श्रीकांत जिचकर ने वर्ष 1973 से लेकर 1990 तक तमाम यूनिवर्सिटी के इम्तिहान देने में समय गुजारा !

1980 में आईएएस की केवल 4 महीने की नौकरी कर इस्तीफा दे दिया !

26 वर्ष की उम्र में देश के सबसे कम उम्र के विधायक बने, महाराष्ट्र सरकार में मंत्री भी बने,

14 पोर्टफोलियो हासिल कर सबसे प्रभावशाली मंत्री रहे !

महाराष्ट्र में पुलिस सुधार किये !

1992 से लेकर 1998 तक बतौर राज्यसभा सांसद संसद की बहुत सी समितियों के सदस्य रहे,वहाँ भी महत्वपूर्ण कार्य किये !

1999 में भयंकर कैंसर लास्ट स्टेज का डायग्नोज हुआ,डॉक्टर ने कहा आपके पास केवल एक महीना है !

अस्पताल पर मृत्यु शैया पर पड़े हुए थे…लेकिन आध्यात्मिक विचारों के धनी श्रीकांत जिचकर ने आस नहीं छोड़ी उसी दौरान कोई सन्यासी अस्पताल में आया उसने उन्हें ढांढस बंधाया संस्कृतभाषा,शास्त्रों का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया कहा तुम अभी नहीं मर सकते…अभी तुम्हें बहुत काम करना है…!

चमत्कारिक तौर से श्रीकांत जिचकर पूर्ण स्वस्थ हो गए…!

स्वस्थ होते ही राजनीति से सन्यास लेकर…संस्कृत में डी.लिट. की उपाधि अर्जित की !

वे कहा करते थे संस्कृत भाषा के अध्ययन के बाद मेरा जीवन ही परिवर्तित हो गया है ! मेरी ज्ञान पिपासा अब पूर्ण हुई है !

पुणे में संदीपनी स्कूल की स्थापना की,

नागपुर में कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की जिसके पहले कुलपति भी बने !

उनका पुस्तकालय किसी व्यक्ति का निजी सबसे बड़ा पुस्तकालय था जिसमें 52000 के लगभग पुस्तकें थीं !

उनका एक ही सपना बन गया था, भारत के प्रत्येक घर में कम से कम एक संस्कृत भाषा का विद्वान हो तथा कोई भी परिवार मधुमेह जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का शिकार ना हो !

यूट्यूब पर उनके केवल 3 ही मोटिवेशनल हेल्थ फिटनेस संबंधित वीडियो उपलब्ध हैं !

ऐसे असाधारण प्रतिभा के लोग, आयु के मामले में निर्धन ही देखे गए हैं,अति मेधावी, अति प्रतिभाशाली व्यक्तियों का जीवन ज्यादा लंबा नहीं होता,शंकराचार्य महर्षि दयानंद सरस्वती,विवेकानंद भी अधिक उम्र नहीं जी पाए थे !

2 जून 2004 को नागपुर से 60 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र में ही भयंकर सड़क हादसे में “श्रीकांत जिचकर” का निधन हो गया !

दुर्भाग्यबस, संस्कृत भाषा के प्रचार प्रसार व Holistic health को लेकर उनका कार्य अधूरा ही रह गया !

धन्यवाद सभी को नमस्कार 🙏
ऐसे शिक्षक, चिकित्सक, विधि-विशेषज्ञ, प्रशासक व राजनेता आदि के मल्टी-टैलेंटेड “पर्सनलिटी” को
युग पचहरा फ्रोम नीमगाँव,दिल की गहराइयों से शत शत नमन करते हैं। जय हिन्द जय भारत।

54- एक कारगर कदम..

राष्ट्रहित में मेरा एक सुझाव है कि,
यदि हम सभी भारतीय नागरिक देश के रण-बाँकुरों को जो अपने देश की “आन-वान-शान” पर हँसते-हँसते शहीद हो जाते हैं उनकी शहादत के पीछे छूट जाने वाले परिवार की मदद हेतु….

“एक कारगर कदम” भारत में जितने भी बैंक खाता धारक है, उनके खाते से सिर्फ “एक रुपया” उस वक़्त स्वतः ही कट जाया करे। जब कोई भी सैनिक दुर्भाग्यवश बॉर्डर पर हमारे देश की रक्षा करते-करते शहीद हो जाय..,
और वो पैसा उस शहीद सैनिक के परिवार को बिना किसी लाग-लपेट के आसानी से मिल जाए। सरकार ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करे, धन्यवाद।
सुझाव अच्छा लगे.. तो msg प्राप्त करने वाला प्रथम व्यक्ति इसे तीन लोगों को शेयर करें, एवं
उनसे आग्रह करें वो और तीन-तीन लोगों को शेयर करें। ताकि ये मिशन सफल हो सके।
जय जवान जय बलवान
I’m agree
I’ll send it to 3 people
:युग पचहरा,
(परामर्श-कर्ता / समर्थक )
【भारतीय-शिक्षक】

53- एक “नेक-कार्य” ऐसा भी..

मुझे पैदल चलना बहुत ही अच्छा लगता है। एक दिन की बात बताऊं घूमते-घूमते मैं, आदर्श-कॉलोनी की तरफ शहर में काफ़ी अंदर तक चला गया, फिर पैदल घर की ओर ही आ रहा था। कि रास्ते में बिजली के खंभे पर एक कागज चिपका हुआ था। अचानक मेरी नज़र उस पर पड़ी। पास जाकर देखा, तो उस पर लिखा था कि,

“इस रास्ते पर कल मेरा एक 50/- रु.का नोट गिर गया था। चूंकि मैं वृद्ध के साथ-साथ एक असहाय महिला हूँ। ये भी किसी मददगार ने दिये थे। इसलिए ये 50 रु मेरे लिए बहुत कुछ हैं। मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता। अतः जिस किसी भी महानुभाव को मिले कृपया इस पते :–>[xxx] पर पहुंचाने की कृपा करें।”

विशेष ;- कृपया मानवता के नाते ये “नेक-कार्य” अवश्य करें।

यह पढ़कर पता नहीं क्यों..? क्या ईश्वर कृपा हुई कि, मेरे हिर्दय में उस पते पर जाने की तीब्र-इच्छा होने लगी। पते के मुताविक मेरे कदम स्वतः उस ओर चल पड़े..एक काफ़ी संकरी सी गली के आखिर में एक आशियाना था। वहाँ जाकर मैंने आवाज लगायी, तो..

(एक वृद्धा लाठी के सहारे धीरे-धीरे बाहर आई , ऐसा प्रतीत हो रहा था, कि वह अकेली ही रहती हों। लग रहा था उन्हें ठीक से दिखाई तक नहीं देता।

शायद उन्होंने भी, अनेकों हिंदुस्तानी भाइयों की तरह अपने बेटों को वो “तालीम” दिलवा दी थी जिससे मनुष्य सारे रिश्ते-नाते, हया-शर्म एवं दया-संवेदना आदि सब मानवीय गुणों को भूल कर सिर्फ “नोट छापने की मशीन” बन के रह जाता है। जिससे आज एक मां को मातहतों के जैसे अपना जीवन काटना पड़ रहा है। देखो कर्मों की क्या विडम्बना है ! माता-पिता अपने बच्चों की खुशी के लिए अपना सब कुछ दांव पे लगा देते हैं, और ये औलाद है कि शादी के बाद अपनी दुनियाँ का दायरा सिर्फ “अपने बीबी बच्चों” तक ही निश्चित कर लेते हैं।

मैने, बाद में पूछा तो, मेरा अनुमान सही था। वर्षों पहले अच्छी नौकरी के चक्कर में उनके दोनों बेटे एक एक कर विदेश चले गए, वहीँ बस गए। तब से आज तक किसी ने भी पलट कर माँ की ओर नहीं देखा..?)

हां, मैंने कहा, “माँ जी आपका खोया हुआ 50/-रु का नोट मुझे मिला है। मैं उसी को देने आया हूँ।”

यह सुनकर, वह वृद्ध “देवी-तुल्य” माँ एकदम से रोने लगी… ये देख मैं भी कुछ भावुक सा हुआ..
फिर कुछ देर बाद वो बोली,

“बेटा ! तेरे जैसे अब तक करीब 50-60 लोग इसी तरह मुझे 50-50 रु के नोट दे कर जा चुके हैं,न तो मै पढ़ी-लिखी हूँ, न ही मुझे ठीक से दिखाई देता है। पता नहीं कौन फरिश्ता है जो मेरी इस हालत को देखकर “मदद” करने के उद्देश्य से ये सब लिख गया है। जो तुम जैसे देवदूत लगातार मेरी सहायता को चले आ रहे हो।”

मेरे बहुत कहने पर माँ जी ने वो रुपये रख तो लिए। पर उन्होंने मुझसे निवेदन करते हुए कहा, बेटा! वह मैंने नहीं लिखा है। क्योंकि मैं तो एक असहाय अनपढ़ हूँ। किसी ने मुझ पर तरस खाकर ये लिख दिया होगा । मग़र बेटा अब मेरे “खर्चने” के लायक लोग काफ़ी रुपये मुझे दे गए हैं। बेटा तू, जाते-जाते अब उस कागज़ को फाड़कर फेंक देना। भला मैं इतने रुपयों का क्या करूंगी..? ( एक माँ का संतोषी स्वभाव तो देखिये…)
‘मैनें हाँ कहकर टाल तो दिया पर मेरी अंतरात्मा ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि उन 50-60 लोगों से भी “माँ जी” ने शायद यही कहा होगा। लेकिन किसी ने भी उस कागज़ को फाड़ने की हिमांकत नहीं की।, तो फिर मैं, ही क्यों किसी के “नेक-कार्य” में दख़ल दूँ।

जिंदगी में हम कितने सही और कितने गलत हैं, ये सिर्फ दो ही जगह अंकित होता है।..
परमात्मा के यहाँ और अपनी ख़ुद की अंतरात्मा..में !!

मेरा हृदय उस व्यक्ति के प्रति “कृतज्ञता” से लबालब हो गया, जिसने इस वृद्धा की सेवा का ये “नायाब-तरीका” ढूँढ निकाला था।

यदि जरूरत मंदों की कोई मदद करना चाहे, तो बहुत से मार्ग हैं , बस “सोच का दायरा” बढ़ा होना चाहिए। इस तरह की सेवा मेरे हृदय को छू गई.. और मांफ कीजियेगा मेरी अंतरात्मा ने एक माँ का निवेदन नहीं माना.. अर्थात मैं उस कागज को नहीं फाड़ सका।

मदद करने के उपाय तो कई-एक हो सकते हैं..सिर्फ व्यक्ति के हृदय (मन) में “कर्म” (अकर्म) करने की “तीव्र-इच्छा” का होना पहले आवश्यक है।
यहां मेरा खुद का ऐसा मानना है कि,
“कुछ नेकियाँ एवं अच्छाइयां”

“मानव-जीवन” हमें चुपके से ऐसी भी करते रहना चाहिए, जिनका ईश्वर के सिवाय..इस भू-लोक पर..
कोई “अन्य गवाह्” ना हो…!!

“ताकि “लोकप्रियता” के बाद मन में उत्पन्न होने वाले “अहम” से अपने आप को दूर रख सके।
धन्यवाद ; सभी को नमस्कार

युग पचहरा,

जन्मभूमि: श्री साहब सिंह (मुखिया जी) सदन, नीमगाँव

रेजीडेंस: पचहरा-हाउस, 88 A वसुन्धरापुरम, हाथरस।

【शिक्षक एवं विचारक】

contact No.
(8006943731)

52- जाट दा “जबाव:लाजबाव”

“जाट” पुत्तर का जवाब : लाजबाव

एक बार गणित के टीचर ने कक्षा में एक बच्चे से सवाल पूछा :- मान लो तुम्हारी भैंस ने दूध नही दिया और तुम्हे घर आए मेहमानों को चाय पिलानी है तो क्या करोगे … ?

बच्चा बोला … जी बजार से दूध ले आंउगा …

टीचर ( मुस्कुराते हुए ) :- वैरी गुड , अच्छा मान लो घर की भैंस का दूध पड़ता है बियालिस रुपये किलो , और बजार से मिलता है साड्डे बावन रुपये किलो … तुमने दूध लिया डेढ़ पाव , और दूध वाले नें उसमें पैंसठ ग्राम पानी मिला रखा था … तो बताओ तुम्हे कुल कितना नुक्सान हुआ … ?

जवाब ना देने पर मास्टर ने उस बच्चे को धूप में मुर्गा बना दिया …

अब दूसरे छात्र जो जाति से “जाट” था वही सवाल पुनः पूछा …

छात्र बोला : जी अपणे ताऊ के घर तै दूध लिआऊंगा …

टीचर बोला :- मान लो उनके घर भी दूध नही है तो …

छात्र :- जी पड़ोस आली चाची तै दूध मांग लूंगा …

टीचर चिढ़ के :- अगर उनके घर भी ना मिला तो …

छात्र :- मास्टर जी! दूध मांगण की ख़ातिर सारे गाम मैं हांड जाऊंगा, फिर भी ना मिलया, तो मेहमाना तै नींबू पाणी प्या दूंगा … पर बजार तै मोल कोनी ल्यांऊ … मन्नैं धूप मैं मुर्गा ना बणना … 🤔😜😜😜😜😜😜 नमस्कार,
मस्त रहो, स्वस्थ रहो..
युग पचहरा,
नीमगाँव,राया,मथुरा।

51-“आत्म-निर्भर” बनें..

हमारे बॉर्डर्स पर कभी “पाकिस्तान- भारत” तो कभी “चीन और भारत” के बीच टकराव की स्थिति अक्सर बनी रहती है।
आज, इसी विषय पर मै, आप से बात करना चाहता हूँ कि, जब कभी देश की सीमाओं पर ऐसी परिस्थितियां बनती हैं, तो उनसे निपटने का क्या सिर्फ सैनिकों का ही दायित्व है..? देश के आम नागरिकों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती…?
अधिकतर देश के लोगों की मनः स्थिति यही रहती है कि बॉर्डर पर हमारे जांवाज़ सिपाही मौजूद हैं, और वे सक्षम हैं ,सब देख लेंगे।
हाँ, वाक़ई, इसमें कोई दोराय नहीं है, हमारे सैनिक वास्तव में पूरी मुस्तैदी के साथ बॉर्डर्स पर तैनात रहते हैं।

इस विचार से देश के अन्य नागरिक रात में चैन से सो जाएं यहां तक तो ठीक है। मग़र इसका ये मतलव तो कतई नहीं होता है। कि हमारी अपने देश के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं बनती।

बन्धुवर, अब वक्त आ गया है, कि इस चाइना, को जवाब… तो नागरिकों के स्तर से भी होना चाहिए।

ध्यान रहे कि सिर्फ सैनिकों द्वारा जवाब देना ही पर्याप्त नहीं है।
हाँ, जवाब देने से पूर्व जरा एक बात पर विचार कीजिएगा।

“आखिर चीन ऐसी हरकत करता ही क्यों है..?”
ये तो न्यूज़ चैनल्स द्वारा आप जान ही रहे होंगे कि भारत इकलौता देश नहीं है जिसके साथ चीन ये हरकतें कर रहा है, अन्य और भी हैं, जैसे;- दक्षिण चीनी सागर में वियतनाम, ताइवान और अब ये होंकोंग के साथ भी छेड़खानी करने लगा है। मेरा ऐसा मानना है कि, कोई भी देश ऐसा अन्य देशों के साथ दुश्मनी से कहीं ज्यादा अपने खुद के अंतर्विरोध, जो “सरकार और जनता” के बीच होता है, उसे संतुलित रखने के लिए करता है। ये “डिप्लोमेटिक-लैंग्वेज” में एक “कूटनीतिक-चाल” होती है।
क्योंकि इसकी सुगबुगाहट आपके कानों तक भी अवश्य पहुंच रही होगी कि, चीन की 140 करोड़ की आबादी वर्तमान तानाशाह सरकार के सामने महज एक “बंधुआ- मजदूर” की तरह.. बिना “किन्हीं मानव-अधिकारों” के चुप-चाप काम करती रहती है। उन्हीं की कड़ी मेहनत चीन को अमीर बनाती है। यदि वे नाराज हुए और सत्ता के विरुद्ध असंतोष ज़ाहिर करने की नहोबत आयी, तो फिर “चीन में क्रांति” होने से कोई नहीं रोक सकेगा।

चीन इस बात से डरकर सीमाओं पर अपने को सक्रिय दिखा कर अपने घर में शांतिपूर्ण वातावरण बनाये रखने का अक्सर प्रयास करता रहा है। क्योंकि “कोरोना” के कारण चीन में सारा कारोबार ठप्प पड़ जाने से बेरोजगारी 20% के आंकड़े को पहले से ही पार कर चुकी है। चीनी लोग अपनी सरकार से इतने खपा हैं कि चीन में “तख्ता-पलट” के आसार बनने लगे हैं।

यदि आप इतिहास में थोड़ी बहुत रुचि रखते हों, तो 1962 में चीन ने भारत के साथ एक जंग की थी, वो जनता का ध्यान हटाने के लिए ही तो थी। चीन ही क्या किसी भी देश के लिए अपनी जी.डी.पी.और खुशहाली को बढ़ाते रहना बहुत आवश्यक होता है।

याद रखियेगा यदि चीन की जी.डी.पी. घटने लग जाए, तो वहां की जनता, सरकार से अंदरखाने इतनी खपा हो जाती है कि, चीन में क्रांति होने में बहुत ज्यादा देर नहीं लगेगी।

इसलिए “कूटनीतिक-विद्वानों” का कहना है कि, इसमें भारत की “बुलेट-पॉवर” से “बॉयकॉट-पॉवर” कहीं अधिक काम.. आयेगी।
इतनी बात तो आप और हम भी भलीभाँति जानते हैं कि हमारे देश में लोग “चाइनीज-प्रोडक्ट्स” सस्ते के चक्कर में कुछ ज्यादा ही इस्तेमाल करते हैं।

मग़र ये बात भी अपनी जगह सत्य है कि भारत में स्वदेशी के नाम पर लूट भी खूब धड़ल्ले से होती है। सरकार को पहले इसे दुरुस्त करना होगा।..तब कहीं उसकी आत्मनिर्भर वाली मुहिम आगे बढ़ सकेगी।

आप जाने अनजाने में चीन के प्रोडक्टस खरीदकर चीन को प्रतिवर्ष लगभग “5 लाख करोड़ रुपये” का फायदा पहुँचाते हो। हमारे उसी रुपये से चीन हथियार,बंदूक आदि से लैस होकर हमारे सैनिकों को मौत के घाट उतारने पर अमादा रहता है।

दरअसल न केवल हम भारतीय नागरिक अपितु सत्ता में बैठे धन लोलुप “नीति-नियंता” भी भटकाव और बेहोशी से बाहर निकलकर आएँ, और अपने जरूरतों का सामान थोड़ा सोच-विचार कर खरीदने की आदत बनाएं, तो इससे अपने देश की अर्थवस्था तो मजबूत होगी ही, साथ ही दुश्मन देश चीन की हालत खस्ता अवश्य हो जाएगी।

आज वक्त आ गया है कि “बायकॉट मेड इन चाइना-मूवमेंट” की शुरुआत हो जानी चाहिए। इसमें 130 करोड़ भारत में रहने वाले भारतीय + 03 करोड़ विदेश में रहने वाले “भारतीय” सभी जोर-शोर से शामिल हों, पूरी दुनियाँ को ये सन्देश दें.. जिससे चाइना के खिलाफ़ दुनियाँ भर के अन्य देशों में आज जो रोष है, वे सभी देश लामबंद होकर चीन को उसकी औकात बताएं..और उसे शांति वार्ता हेतु मेज पर ले आएं।

जैसे, कि हमारे देश में 80% लोगों की भीड़ “भटकाव-मोड” पर है। इसलिए इसका उलट भी सोचना लाज़मी है।
मान लो, हम भारतीय अपने कुछ व्यक्तिगत कारणों से.. न बायकॉट अभियान से जुड़ें और न पी.एम. के “आत्मनिर्भर-भारत” को समर्थन ही दें,तो

देश के लिए इससे बड़ी बदनसीबी कोई हो नहीं सकती।
ज़रा विचार कीजियेगा, हमारे भारतीय युवा “पढ़े-लिखे बेवकूफ़” (अधकुचले लोग) चीनी सॉफ्टवेयर,एप्प्स,गेम्स,टिकटोक आदि सब में मस्त, थोड़े से लालच के कारण तमाम चीनी कम्पनीज को करोड़ों रुपये भेजकर मालामाल कर रहे हैं।

एक और बात “टिकटोक” के खिलाफ़ तो भारत में कुछ लोगों ने FIR एवं “कोर्ट-केश” तक कर रखे हैं।

चाहे तो देश की सरकार “टिकटॉक” जैसे सॉफ्टवेयर को वैन भी कर सकती है, परन्तु लालच बड़ी बुरी वला होती हैं।
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए सैनिकों के अतिरिक्त आज देश के अन्य सभी नागरिकों का भी दायित्व बन जाता है कि, वो “चाइनीज़ उत्पादों” का त्याग कर “बायकॉट-मेड-इन- चाइना-अभियान” को एक “ग्लोवल-मूवमेंट” का आकार दे सकते हैं, जिससे न केवल भारत में रोजगार के नए आयाम खुलेंगे अपितु देश की खुशहाली के साथ-साथ ये मुहिम भारत के लिए वरदान साबित भी होगी। जिससे भारत का विश्व गुरु बनने का सपना अवश्य साकार होगा।
मैं, देश के सभी सभ्रान्त नागरिकों से निवेदन करता हूँ। कि, अपनी एक सही प्रोग्रामिंग करके “किसी भी कीमत पर” “चाइना-प्रोडक्ट्स” का इस्तेमाल करने से बचें,और देश के साथ-साथ ख़ुद भी “आत्मनिर्भर-बनें” …धन्यवाद एवं नमस्कार..
; पचहरा,योगेंद्र सिंह
नीमगाँव, राया,मथुरा।
( जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस )

50-रुको,ठहरो ! ज़रा..सोचो

माँ शारदे को नमन करते हुए, आज मैं, अपनी बात की शुरुआत सम्पूर्ण विश्व को संचालित करने वाली उस “परम-शक्ति” जिसे हम मनुष्य आत्माएं अपनी अलग-अलग धारणा, आस्था एवं मान्यताओं के कारण भिन्न-भिन्न धर्मों के चलते अनेक नामों से जानते हैं।

लेकिन मुझे यकीन ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि इस “तुलनात्मक-अध्ययन” को समझने के बाद लोगों की भ्रांतियां क़ाफी हद तक दूर हो जाएंगी।
क़ुरान शरीफ़ में ख़ुदा क्या है..क्या है परवरदिगार..?
“वल अव्वल, वल आख़िर।
वल ज़ाहिर,वल बातिन,
वहुवा वकुल्लई, शइन अलीम।”

हिंदी-अर्थ– वल अव्वल-वह सबसे पहले है।,
वल आख़िर-वही सबसे अंत में भी है।
वल ज़ाहिर-जो भी कुछ दिख रहा है वह सब वही है।
वल बातिन- जो हम देख पा रहे हैं केवल वही नहीं है..(जैसे;- किसी बड़ी चीज को हम देख रहे हैं मग़र उसके ओट में जो हम नहीं देख पा रहे हैं क्या वह हिस्सा होता नहीं है।अवश्य होता है.. विल्कुल ठीक वैसे ही..)
वहुवा वकुल्लई शइन-अलीम- “हर बात को जानने वाला ” अर्थात वो ही “परवरदिगार” है।

वेद क्या कहते हैं..? भगवान के हज़ारों नाम हैं…”अनादि न अंतः
व्यक्ता अवक्ता:
वहुश्रुता: सर्वज्ञ:”

हिंदी-अर्थ– अनादि है न अंतः-जिसका न आदि है न अंत है।
व्यक्ता अवक्ता: -जो व्यक्त हैं वो भी और जो अव्यक्त है वो भी। सब कुछ वही है।
बहु श्रुता सर्वज्ञ: – सबकुछ जानने वाला।
जो “चेतना” का श्रोत है। दरअसल वही “परमात्मा” है।

बाइबिल क्या कहती है..?
” I am the alpha.
End the omega
हिंदी-अर्थ- आदि और अंत में (First & the last) जो कुछ हूँ.. मैं ही हूँ।

मेरा इस विषय पर लिखने का मकसद एक ही है कि भारतीय समाज में जबरदस्ती बन बैठे हर मज़हब में कुछ ठेकेदार जो दिन प्रतिदिन अपनी मनगढ़ंत कहानियों से वैमनष्यता फैला कर लोगों में बहुत सी भ्रांतियां पैदा कर रहे हैं..मग़र ये भ्रांतियों इस Comparative- Study से काफी हद तक दूर हो सकती हैं। यदि इन धर्मों के बताए हुए मूलमन्त्र को समझ कर हम चलें…
ख़ुद को किसी भी मज़हब की दृष्टि से देख कर आप विचार करियेगा…कि, आप किससे लड़ रहे हो..? और क्यों लड़ रहे हो..? आख़िर हम जड़ में क्यों नहीं जाते..?
उन बातों में जो समानता है, एक रूपता है। परवरदिगार, कहो या परमात्मा या फिर “सार-तत्व” परब्रह्म जो भी..

कुल मिलाकर हम गूदे को छोड़कर छिलकों पर लड़ाइयां लड़कर इस अमूल्य “मानव-जीवन” को क्यों बर्बाद कर रहे हैं।
अज्ञानताबस अपनों की जान ले रहे हैं, दुकानें लूट रहे है.. शहर के शहर फूंक रहे हैं। देश के कई राज्यों में तबाही मचा के रखी हुई है ।
सूफ़ी फ़क़ीर भी कहता है…
Un-al-haq-यानी–अहम ब्रह्मास्मि….. ( I am the same..) un-al-haq ये सूफ़ी फकीर बोलते है..
लेकिन हम हैं कि, लड़ने-झगड़ने से बाज नहीं आते। कुछ महानुभाव तो ऐसे लेखों को पूरा पढ़ते भी नहीं हैं, कुछ के पास जीवन के असल पहलू को नजदीक से देखने या समझने के लिए वक्त ही नहीं है। उन्होंने माया की अंधी दौड़ में जो हिस्सा ले रखा हैं।,..फिर सुधार की कोई गुंजाइश कहाँ..बचती है..?
वो कहेंगे ये सब हम पहले से जानते है क़ुरान, वेद, बाइबिल आदि धर्म ग्रँथ तो सब एक ही बात कहते है..
मग़र फिर भी वे अपने सारे कार्य इन पवित्र ग्रन्थों के मूल सिद्धांत से हट कर ही करते रहेंगे। और ये बात जग ज़ाहिर है..” कि कोई भी मज़हब हमें आपस में बैर करना कभी नहीं सिखाता, ये धर्म के ठेकेदार,जिन्हें पाखंडी कह दिया जाय, तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ये भोली-भाली जनता को गुमराह करने का काम सिर्फ अपनी दुकान चलाने के लिए करते हैं, और करते रहेंगे, ऐसे पाखंडी हर मज़हब में बैठे हैं। अपनी आने वाली सन्तति को बचाना है, तो
विचार एवं निर्णय आपको और हमको स्वयं “करना होगा” ये न कहें , “करना.. है”..क्योंकि मनुष्य के सॉफ्ट-वेयर (Internal-Forces) में वैचारिक-रूपांतरण (Thoughts-transformation )की प्रक्रिया तो सही बात को सुनते या पढ़ते वक्त स्वतः ही सक्रिय होने लग जाती है। लेकिन लोगों की आत्मा पर जमी कार्मिक-लेयर व कुछ उनके निजी पूर्वाग्रह उन्हें दुविधा में डालने का काम जरूर करते हैं, तो
बस आपको जरूरत है उन्हें दरकिनार करते हुए एक “फाइनल-संकल्प” लेने की। देरी तो पहले से ही बहुत हो चुकी है।
यहां वेद एक और.. बात से पर्दा उठाते हैं कि, परब्रह्म “शक्ति” जिस से संसार संचालित होता है वह स्वतः है स्वचालित है। उसका खुद का कोई रूप या “नियत-आकार” नहीं है। इसीलिए वह “निराकार” है। दुनियाँ के कण कण में वह “GOD-PARTICLE” विद्यमान है।
“न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्थ नामः महाध्यसा ”
अर्थात कोई भी कलाकार उस शक्ति को “एक” मूर्ति रूप में “नियत” नहीं कर सकता। केवल परमात्मा के गुणों एवं चरित्र को प्रतिबिम्बित करने के उद्देश्य से पूर्व में हमारे प्रबुद्ध-जनों ने “प्रारम्भिक-अवस्था” के भक्तों को ईश्वरीय शक्तियों में आस्था व एकाग्रता जगाने के लिहाज से कुछ “प्रतीकात्मक – चिन्ह” बतौर जगह-जगह “सांकेतिक-चिन्ह रूप स्थापित कर दिए थे।
मग़र धर्म की आड़ में बैठे ठेकेदार (पाखंडी) इस व्यवस्था को ले उड़े और ऐसे ले उड़े कि गाँव-गाँव, नगर-नगर मठाधीश बन कर इस व्यवस्था को “एस की जिंदगी जीने” का जरिया बना लिया।
मेहनतकश इंसान की गाड़ी कमाई को दान एवं इष्ट के प्रतीकचिन्ह पर चढ़ावे के नाम से ये ढ़ोंग-ढ़पाड अब इतना आगे निकल गया है कि, इसने कमाई में बिजनिस को भी काफी पीछे छोड़ दिया हैं। बताइये ये सरासर पागलपन नहीं है तो क्या है..? धर्म का चोला पहनकर खुल्लमखुल्ला “अधर्म” हो रहा है।
प्रबुद्ध-वर्ग मेरे कहने का आशय बखूबी समझ रहै हैं कि, मैं क्या कहना चाह रहा हूँ…
वर्तमान भारत में जो समस्याएं दिन प्रतिदिन बढ़ रही हैं और रुकने का नाम नहीं ले रहीं। इस विषय पर..
अगर “To the point” बात करूँ तो मैं काफ़ी दिन से देख रहा हूँ कि,
“अधर्म ने धर्म का लबादा ओढ़ लिया है” और उसी आड़ में सारी सही चीजों को ध्वस्त करता हुआ निरन्तर आगे बढ़ता चला जा रहा है।
और हम भारतीय लोग जाति-धर्मों में ऐसे बंटे हुए.. हैं कि, मूक-दर्शक बने निरीह नजरों से न केवल देख रहे हैं, वल्कि कुछ तो इतनी बेहोशी में हैं कि इस “विध्वंशक-लीला” को सही का प्रमाण-पत्र भी दे रहे हैं। विडम्बना तो देखिये,अधर्म को ही धर्म मानते चले जा रहे हैं।
इसे समझने के लिए थोड़ा इतिहास के पन्नों में झांकिए..इस देश में हमने अपनी बेहोशी में “सती-प्रथा” को एक सही और धार्मिक-परम्परा समझते हुए भारत की असंख्य बेटियों को काफी लम्बे अर्से तक जबरदस्ती मार-पीट कर चिताओं में जिंदा जलाया है। मग़र जब हम जागरूक हुए, तो समझ आया कि, ये तो सरासर पागलपन था।”अधर्म” था। और इस मुद्दे पर हमने सही राह पकड़ ली।
ऐसे ही आज अनेकों कार्य धर्म की आड़ लिए जघन्य पापों को अंजाम दे रहे हैं। खुले आम “अधर्म” हो रहा है। और हम “सती-प्रथा” वाले वक्त की तरह वैसे ही उसे धर्म समझे चले जा रहे हैं।
उदाहरण स्वरूप दीपावली को ही ले लो, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के अयोध्या लौटने की खुशी की धार्मिक आड़ लेकर प्रति वर्ष लगभग छह हज़ार करोड़ रुपये का बारूद हमारे ही लोगों द्वारा आसमान में भर दिया जाता है। जो न केवल प्रदूषण देता है, अपितु धन की बर्वादी के साथ-साथ दीपावली पर बोनस के रूप में कई युवाओं और बच्चों के साथ अनेकों दुर्घटनाएं भी देता है, जो किसी किसी को तो जीवन भर के लिए अपंग बना जाता है।
इस बिगड़े हुए रूप को भी क्या आप “धर्म” कह पाओगे..?
जश्न तो मर्यादाओं में रहकर आपसी सौहार्द के साथ मनाये जाते हैं।
धन में इस तरह आग लगाने से तो बेहतर है हम उस दिन देश के असहाय जानवरों, पक्षियों और कुछ जरूरतमंद इंसानों को…
अपनी सामर्थ्य के मुताविक कम से कम एक वक्त का अच्छा भोजन, वस्त्र आदि जरूरतों की ओर ध्यान दिया जाय, तो कम से कम आप अपनी अगली पीढ़ी के लिए दुआएँ तो कमा सकते हैं।

करने को तो इस देश में बहुत कुछ संभावनाएं हैं। बस आवश्यकता है खुद का आत्मावलोकन करके “सही दिशा में कदम”उठाने की।
इस लेख की समाप्ति पर काफ़ी भारी बोझ मेरे सिर से आज उतर गया है। वाक़ई मैं अपने आपको काफ़ी हल्का महसूस कर रहा हूँ। मैं, इस जिम्मेदारी के बोझ तले प्रतिदिन अकेला कुपित होता था। मग़र अपना ये विचार आप से शेयर करके, आज मुझे ऐसा लग रहा है कि मैने आपके कंधों को भी इस जिम्मेदारी में शामिल कर लिया है। अब मैं ही अकेला नहीं हूँ, मेरे असंख्य साथी मेरे देश के साथ हैं। जाति-मजहबों से ऊपर उठकर हम सभी भारतीय भाई-बहनों की ये एक नैतिक जिम्मेदारी है। अब हम सभी राह से भटके हुए उन साथियों से एक साथ बोलें..! “रुको, अब और कितना भटकोगे, ठहरो ! ज़रा..सोचो !”फिर आगे बढ़ो…
!!जय हिन्द जय सनातन!!
Public-writer

:युग,नीमगाँव

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