47-“भाग्य-विधाता” कौन?

हमेशां से काफ़ी उलझा हुआ सवाल…?

आख़िर मानव जीवन के भाग्य या किस्मत का उत्तरदायी कौन..?
क्या आप इस बात से इत्तिफ़ाक़ रखते हैं =?
कि प्रत्येक जीव द्वारा किये गए कर्मों के आधार पर ही उसके अपने “भाग्य” का निर्धारण होता है। क्योंकि मनुष्य के कर्म संचित होते रहने की प्रक्रिया के कारण उसके कर्म “स्टोर-कर्म” कहे जाते हैं। और फिर वे ही ‘स्टोरकर्मा’ प्रारब्ध बनकर आत्मा में निहित एक स्थायी खाते की तरह प्राणी के जीवन में होने वाले उतार-चढ़ाव उसके अपने कर्मों के ही प्रतिफल होते हैं।
आइये इस तथ्य को गम्भीरपूर्वक समझने का एक प्रयास करते हैं……….
“कर्म” की गहराई में जाएं और देखें तो इसकी तीन श्रेणी होती हैं…,
1- अकर्म;– “लोकहितार्थ-कर्म”। अर्थात जन कल्याण हेतु किये गये कर्म। निष्काम कर्म, श्रेष्ठ-कर्म।

(जो बार-बार इस मृत्युलोक में हिचकोले खाने से बचा कर हमें मुक्ति दिलाते हैं।)

2- कर्म;– “स्वहितार्थ-कर्म”। अर्थात परिवार के सीमित दायरे में रहकर सिर्फ अपने ही अपने लिए किये गये कर्म। आशक्ति युक्त-कर्म, सामान्य-कर्म।

(जो बार-बार नए-नए शरीर धारण करके इसी मृत्युलोक में हिचकोले खाने को मजबूर करने वाले कर्म।)

3- विकर्म ;– “पाप जन्य-कर्म”। अर्थात चालाकी से अहंकारवश जाने अनजाने दूसरों को आघात पहुंचाने वाले कर्म जो दुष्कर्म की श्रेणी में आते हैं। इनके परिणामस्वरूप

(“जीव” नए-नए शरीर तो पाता है मग़र निम्न स्तर के अधम व्यक्ति या जैसे; कीड़े-मकीडे (परजीवी) आदि जो दूसरों पर आश्रित रह कर पूर्व में किये गए विकर्मों के पापों को भोगते हुए प्राणी को निरन्तर कष्ट में रखने वाले कर्म।)

इन सभी कर्मों का लेखा-जोखा ( Right-Calculation) ही ‘जीवन’ का एक आधार बनता है।
सामान्य स्तर पर ये किसी न किसी द्वारा अक्सर कहा भी जाता रहा है कि,
“जैसा कर्म वैसा जीवन”

जो न केवल ‘अकाट्य सत्य’ है, वल्कि ‘मानव जीवन’ की सच्चाई है। क्योंकि हम जो कुछ भी करते हैं मानो एक तरह से “कर्म-बीज” बोते हैं ,वो कुछ समय के अंतराल पर उगकर फल (परिणाम) के रूप में हमारे सामने आते हैं। दरअसल ये “संचित-कर्म” ही हमारा “भाग्य” होते है। तो फिर आप ही विचार कीजिये कि,.. “भाग्य-विधाता” कौन हुआ..? जीवन मे अच्छे और बुरे का जिम्मेदार…आख़िर कौन है..? तो ध्यानपूर्वक अपनी अन्तरात्मा की आवाज सुनियेगा.. इस प्रश्न के जवाब में आपके जमीर की आवाज भी आपको यही अनुभूति कराएगी.. कि, “कर्म-कर्ता” ही जिम्मेदार होता है। अर्थात कर्म-कर्ता कौन..? वो “व्यक्ति” जो “कर्म” करता है।यानि ख़ुद। न कोई ईश्वर न अल्लाह, न कोई अन्य शक्ति। इंसान ख़ुद ही अपने भाग्य का जिम्मेदार होता है।

इसीलिए अध्यात्म की भाषा में उसे ही भाग्य “विधाता” कह दिया जाय तो भी कोइ अतिश्योक्ति नहीं होगी।

मेरा विश्वास है कि अध्यात्म का ये सरलीकरण आपके दिल की गहराई को कुछ तो अवश्य बढ़ाएगा।
निष्कर्ष स्वरूप यही कह सकते हैं कि, करते समय जो ‘कर्म’ था, लौटते समय (जीवन में भुगतते वक़्त) वही ‘किस्मत” का रूप ले लेता है। इसीलिए इस सम्पूर्ण विधान के मूल में जाएं, तो तश्वीर एकदम स्पष्ट हो जाती है। मेरे कहने का आशय विल्कुल स्पष्ट है कि, “दूध का दूध और पानी का पानी” हो जाता है।

….मगर अफसोस! .की बात तो तब होती है। जब सब कुछ देखने-सुनने के बाद भी इंसान दैनिक जीवन में वही करता है जो करता आया है। इसी को मैं सदैव “Knowledge” & “wisdom” के बीच एक बहुत बड़े फ़र्क की दृष्टि से देखता हूँ। जैसे; –

लोगों को ज्ञान तो बहुत होता है, परन्तु बुद्धिमानी पूर्ण तरीके से अपने “असल जीवन” में न जाने क्यों उस ज्ञान का उपयोग या कायदे से क्रियान्वयन (implimentaion) होता दिखता नहीं है ..? आखिर क्यों…?

विषय थोड़ा गम्भीर है। विचार अवश्य कीजियेगा.. धन्यवाद।

सभी को नमस्कार।
;पब्लिक राइटर:
युग पचहरा,
जन्मभूमि; श्री साहब सिंह सदन,
नीमगाँव,राया,मथुरा

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