42-Unconditional.. “LOVE”

अभी लॉकडाउन के समय की ही एक सच्ची एवं प्रेरणादायक घटना है जो “अनकंडीशनल-लव” अर्थात ऐसा प्रेम जिसमें कोई शर्त नहीं होती, जो निःस्वार्थ होता है, ये घटना उसकी पुष्टि करती है। मेरा विश्वास है, आपको आश्चर्यचकित कर देगी।

मेरे फ्रेंड सरकल के कुछ लोग जरूरत मंदों को इस कोरोना नामक महामारी के आपातकाल में पिछले कई दिनों से खाने के पैकिट बाँट रहे थे।

हैरानी की बात ये थी कि एक कुत्ता हर रोज आता, और किसी न किसी के हाथ से खाने का पैकेट छीनकर ले जाता था। आज उन्होने एक आदमी की ड्यूटी भी लगाई थी ताकि खाना लेने के चक्कर में कुत्ता किसी को न काट ले।

लगभग ग्यारह बजे का समय हो चुका था और वे लोग अपना खाना वितरण शुरू कर चुके थे। तभी देखा कि वह कुत्ता बड़ी तेजी से आया और प्रतिदिन की तरह एक आदमी के हाथ से खाने की थैली झपटकर भाग निकला। वह व्यक्ति जिसकी ड्यूटी थी, कोई जानवर किसी पर हमला न कर दे, वह डंडा लेकर खड़ा था, तुरन्त उस कुत्ते का पीछा करते हुए भागा। कुत्ता हाई-वे स्थित श्री बांके बिहारी मन्दिर के पीछे जंगल की ओर भागता हुआ थोड़ी दूर जा कर एक झोंपड़ी में घुस गया। वह आदमी भी उसका पीछा करता हुआ झोंपड़ी तक आ गया। कुत्ता खाने की थैली को झोंपड़ी में रख, तुरन्त अपने अपराध की सजा पाने झोंपडी से बाहर ‘पीछा करने वाले व्यक्ति’ के सामने आकर खड़ा हो गया। ये सब देख समाज सेवी के हाथ से यकायक डंडा छूट गया। अब उसने झोंपड़ी में घुसकर देखा, तो एक आदमी अंदर लेटा हुआ है। जिस के चेहरे पर बड़ी सी दाढ़ी है और उसके घुटने से नीचे दोनों पैर ही नहीं है।चलने के लिए दो बेसाखी जरूर रखी हैं लेकिन अब शरीर इतना जीर्ण है कि आज वो बैसाखी भी किसी काम की न थी। उसने पूछा..

“ओ भैया! ये कुत्ता तुम्हारा है.. क्या?”

झोंपड़ी में पड़े दिव्यांग व्यक्ति ने कहा, ओ बाबू ! कौन हो तुम जो मेरे बेटे कालू को बार-बार “कुत्ता” बोले जा रहे हो। कालू मेरा बेटा है। उसे फिर से कुत्ता मत कहियेगा।”

“अरे भाई ! हर रोज खाना छीनकर भागता है अगर इसने किसी को काट लिया तो ऐसे में डॉक्टर भी न मिलेगा. भाइया !… इसे बांध के रखा करो। खाने की बात है तो तुम्हें कल से मैं यहीं दे जाया करूँगा,” उस व्यक्ति ने कहा।

“बात खाने की नहीं है। मैं उसे मना नहीं कर सकूँगा। मेरी भाषा भले ही न समझता हो लेकिन न जाने कैसे ये मेरी भूख को समझ लेता है। जब मैं दुनियादारों की बातों से तंग आकर घर छोड़ के यहां जंगल में आया था तब ये भी मेरे पीछे-पीछे मेरे साथ आ गया था। इसको न जाने मुझ से क्या लगाव है । मैं नहीं कह सकता कि, मैंने इसे पाला है। जबकि सही तो ये है कि, यह मुझे पाल रहा है। मेरे तो बेटे से भी बढ़कर है, मेरा कालू.. मैं तो रोड के ब्रेकर्स पर जब गाड़ियां धीमी होती थीं तब बाबू लोगों से “शनि” के नाम से कुछ पैसे अपने डिब्बे में डलवा लेता था,जिससे मेरी जीविका चलती थी। मग़र अब तो इतना कमज़ोर हो गया हूँ सब बंद है।”

गरीबों की मदद करने वाले ने उन दोनों के बीच …ये अजीब रिश्ता देखा जो “बे-शर्त-प्यार” (अनकंडीशनल-लव) ही था। हैरानी से एकदम मौन हो गया। उसे ये संबंध समझ ही नहीं आ रहा था। तब दिव्यांग ने खाने का पैकेट खोला और आवाज लगाई, “कालू ! ओ बेटा कालू ….. आ जा खाना खा ले।”

कुत्ता दौड़ता हुआ आया और उस आदमी का मुँह चाटने लगा।खाने को उसने सूंघा भी नहीं। उस आदमी ने खाने की थैली खोली और पहले कालू का हिस्सा निकाला, फिर अपने लिए खाना रख लिया।

“खाओ बेटा !”उस आदमी ने अपने बेटा समान दायित्व निभा रहे कुत्ते (कालू ) से कहा। मगर कुत्ता तब तक उस खाने को सिर्फ देखता रहा। जब उसके मालिक ने खाने से अपना पहला “निवाला” लेकर खाया, तब उसे खाते देख..कुत्ते ने भी खाना शुरू कर दिया। दोनों खाने में व्यस्त हो गए। जब तक दोनों ने खा नहीं लिया.. वह समाज सेवी अपलक उन्हें देखता ही रहा।इस दौरान उसका अन्तर्मन इस सच्चे प्रेम को देख अपने ही विचारों की गंगा में गोते लगता रहा था।और आनंदित हो रहा था। फिर उसने चलते वक़्त बोला..!

“भैया जी ! आप जो भी हो,एक बात बता दूँ.. कि दुनियाँ में मा-बाप का अपनी औलाद के प्रति प्यार और फिर औलाद का अपने मा-बाप के प्रति प्यार….अर्थात मानवीय रिश्तों का आपसी प्यार सदैव “सशर्त-प्रेम” (कंडीशनल-लव) या स्वार्थ की श्रेणी में आता है। बिना किसी अपेक्षा के जो प्रेम आप दोनों के बीच है दरअसल इसी को अध्यात्म में “अनकंडीशनल-लव” कहा गया है। जिस कर्म का रिटर्न् न चाहा जाय वही आपके बीच में देख रहा हूँ। हर रिश्ते में अगर ये हो जाय, तो जी…ते जी मोक्ष की अवस्था है ये..धन्य हैं आप दोनों।

आप भले ही गरीब हों ,मजबूर हों, मगर आपके जैसा बेटा किसी के पास नहीँ हैं। क्योंकि ये जानवर-पक्षी निरीह- प्राणी जरूर हैं मगर वफ़ा से ओतप्रोत सदैव नैतिक-मूल्यों से भरे हैं ये, ये पूर्ण प्राकृतिक हैं इसलिये आज स्थितियां एकदम उलट हैं इंसान को इनसे सीख लेने की आवश्यकता है। जो आपकी भावना को स्वतः समझ कर हर सम्भव आपकी मदद करता है। वरना दुनियाँ में अधिकतर माता-पिताओं की सारी धन-संपत्ति पर काविज होकर भी आज के “मानव-सुत” उन्हें एक बोझ के रूप में ही लेते हैं।
उस समाज सेवी पुरुष ने अपनी जेब से कुछ रुपये निकाले और उस बेचारे दिव्यांग के हाथ में रख दिये।

उसने कहा, “रहने दो भाई, किसी और को इनकी ज्यादा जरूरत होगी। मुझे तो खाना कालू कहीं न कहीं से ला देता है। मेरे बेटे के रहते मुझे कोई चिंता नहीं..”

वह व्यक्ति बहुत हैरान था कि आज आदमी, आदमी के “मुह के निवाले” को छीनने को आतुर है, और ये जानवर होकर. अपने मालिक को पहले खाना खिलाये बिना नहीं खाता है। कमाल है निश्चित ही कोई “पूर्व-संस्कार” है। उसने अपने सिर को ज़ोर से झटका और बहुत बड़ी सीख लेकर वापिस चला आया। उन दोनों के सच्चे एवं निःस्वार्थ प्रेम को देख उस समाज सेवी के हाथ से डंडा तो पहले ही छूट गया था।
वैसे भी प्यार पर कोई वार कर भी कैसे सकता है….जबकि ये तो “प्यार की पराकाष्ठा” थी।
धन्यवाद

युग पचहरा,
88 A वसुंधरापुरम, निकट बाई-पास,हाथरस।

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