नाम जप प्रगाढ़ होते जाने से “संख्याबल” का महत्व अवश्य जानें..अच्छा! क्या आपको नहीं लगता.. देखते ही देखते संत श्री प्रेमानंद जी महाराज की ख्याति दिन प्रतिदिन आसमान छू रही है.. आज भी सामान्य जन के लिए “वृंदावन” महज़ एक शहर है।
पूज्य श्री प्रेमानंद जी को इस वृंदावन धाम में आए लगभग तीस वर्ष हो गए.. हैं उनका संकल्प है कि वे अब अपने जीते जी इस “चिदानंद नगरी श्री वृंदावन धाम” से कभी बाहर नहीं जाएंगे। वे लोग जो “नाम जप” की सामर्थ्य से अभी अनजान हैं। ऐसे लोग उनके औरा को नहीं समझ पाए हैं वे इसे किसी चमत्कार के रूप में देख रहे हैं। जबकि ये सब “नाम जप” के संख्याबल की सामर्थ्य है। दूसरी कोई बात नहीं।
“नाम जप” में साधक के लिए “संख्याबल” कितना महत्व रखता है इसे संतों की वाणी एवं शास्त्रों में वर्णित उल्लेख के आधार पर समझने का प्रयास करें,तो काफी सहज है। सनातन धर्म में साधक के लिए अपने इष्ट के निरंतर “नाम जप” के संख्याबल में बड़ी ताकत है।
“कल युग केवल नाम अधारा। सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा।।”
रामचरित मानस के उत्तरकांड की इस चौपाई के माध्यम से संत तुलसीदास जी ने भी “नाम जप” पर बल देते हुए सैकड़ों वर्ष पहले ही कह दिया था.. कि चारों युगों में सतयुग-यज्ञ, त्रेता-तप, द्वापर-योग साधना और कलियुग में “नाम जप” का अपना महत्व रहेगा।
एकबार को कोई समय या अर्थ के अभाव में यदि तीर्थ, विधिवत पूजा अर्चना आदि न भी कर पाए, तो कोई बात नहीं..मानव देह मिलने पर केवल नाम जप ही करता रहे,तो वह अपने शरीर को निष्पाप करके भगवत प्राप्त हो जायेगा।
क्योंकि कलयुग के लोग सिर्फ “नाम जप” द्वारा ही संसार रूपी सागर से पार हो जायेंगे। इसलिए कि “इष्ट के नाम में तारण शक्ति होती है।”
शास्त्रों में, नाम जप के “संख्याबल” को मानव जाति के आत्मिक उत्थान के लिए अलग अलग पड़ाव या फिर उन्नति के लिए कई एक सोपानों का,उल्लेख मिलता है।
दूसरी बात ” केलिकुंज,वृंदावन धाम ” में विराजमान प्रातः स्मरणीय अति लोकप्रिय संत श्री पूज्य प्रेमानंद जी महाराज” वर्तमान में असंख्य लोगों की धार्मिक आस्था के आधार स्वरूप हैं। जो नाम जप की संख्याबल के पुरजोर समर्थक हैं।
आप अपने “सत्संग” एवं “एकांत वार्ता” के माध्यम से कई एक वर्षों से “नाम जप” के लिए अपने सभी श्रोताओं एवं साधकों को बार बार प्रेरित करते रहे हैं। परिणामस्वरूप बहुत से लोगों की दिनचर्या में एक बड़े पैमाने पर परिवर्तन भी देखने को मिल रहा है।
दुनियां बिच जनसंख्या घनत्व तो हमेशा ही रहा है। इसलिए भटके हुए.. लोगों की तादाद भी कम नहीं है। ये स्थिति लगभग हर युग में रहती है। इसलिए ये कोई चिंता का विषय नहीं है।
संत श्री प्रेमानंद जी की जैसी भाव भंगिमा..और चेहरे का तेज है..जटिल से जटिल आध्यात्मिक तथ्यों को समझाने की उनकी स्पष्ट एवं सरल शैली ही लोगों को उनकी ओर आकर्षित करती है। जबकि बताते हैं कि, आपने “केवल नवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की” है। यद्यपि आपके संस्कृत श्लोकों को बोलने का उच्चारण और संस्कृत में आपका धाराप्रवाह बहुत कमाल का है।
जिस कदर लोग आपकी ओर आकर्षित होते चले जा रहे हैं.. और आप हमारे लाल जू श्री कृष्ण जी की ही तरह.. “राधा राधा राधा राधा..नाम ” की रट लगाए हुए हैं वैसे ही रट अब करोड़ों..लोग लगाने लगे हैं। सच में सौभाग्यवश जिन लोगों की दिनचर्या संत श्री की गुरुवाणी के अनुरूप बन गई है.. या बनती जा रही है.. उनका जीवन आनंदमय होता जा रहा है।
गीता का ये श्लोक भी यही संकेत करता है..
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम परित्रणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामी युगे युगे।”
भावार्थ में ये श्लोक बताता है कि ” संसार में असंतुलन,अधर्म और अन्याय के बढ़ने पर ईश्वर कहीं न कहीं स्वयं अपने रूप को प्रकट करता है। साधुजनों,धर्म की रक्षा और पापियों का नाश करने, तथा संसार में पुनः धर्म की स्थापना करने के लिए..हर युग में ईश्वरीय तत्व के साथ स्वयं या अपने बंदे (संत) नू प्रकट करता रवा है।”
द्वापर युग में जिस प्रकार गोप-गोपियां अपने लाल जू श्री कृष्ण जी की मनोरम छबि को देखने के लिए पल पल लालायत रहा करते थे। ठीक वैसे ही कई वर्षों से महिलाएं, बच्चे,बूढ़े,जवान सब तरह के लोग श्री वृंदावन धाम जी की सड़कों पर रात्रि दो बजे से .. न सिर्फ डेरा डाले पड़े रहते हैं,अपितु बड़े श्रद्धा भाव के साथ पलक पांवड़े बिछाए..हुए श्री प्रेमानंद जी की एक झलक पाने की लालसा उन लोगों के चेहरों पर देखते ही बनती है।
नाम जप के संदर्भ में..संत श्री प्रेमानंद जी बताते हैं, कि “जीवन का चलना भी उसी को कहते हैं जब मनुष्य का मंत्र जप या हर स्वांस के साथ अपने इष्ट का “नाम जप” चल रहा हो।”
यदि ऐसा नहीं हो रहा है..तो प्रेमानंद जी बड़े दुःखी होकर कहते हैं कि
” न जाने क्यों मनुष्य अपने इस दुर्लभ जीवन को यूं ही दुनियां के प्रपंच में नष्ट कर रहे हैं।”
भजन की एक पंक्ति के माध्यम से वे बोलते हैं कि,”दीपक बाड़ा नाम का महल भया उजियार..” अर्थात नाम रूपी दीपक को शरीर रूपी महल में जलाया है,तो वह कभी भी बुझने न पावे।
ये भी जान लीजिएगा कलयुग में इस “मानव देह” को केवल निरंतर नाम जप के द्वारा ही निष्पाप किया जा सकता है। दूसरा कोई उपाय है नहीं।
ये शास्त्रों में वर्णित है कि जब व्यक्ति के नाम जप का संख्याबल एक करोड़ तक पहुंचता है, तो तन स्थान की शुद्धि होकर मनुष्य पूरी तरह निष्पाप हो जाता है।
श्री प्रेमानंद जी एक पद गाते हैं..
“एक कोटि “जप” से होती है.. तन स्थान की शुद्धि। रज,तम होते अस्त.. हस्तगत होती संत विशुद्धि।।
रोगों के सब बीज नष्ट हो जाते हैं तत्काल। और कल्पना के प्रवाह में आती बाढ़ विशाल।।
सपने में सब देव बंधु और संत आप ही आते। आ आ कर दर्शन दे जाते..करते वार्तालाप।।
शेष कहें मन में लेकर ऐसे अनुभव के भाव। आगे आगे साधन पथ पर चलो बढ़ाते पांव।।”
सांसारिक विडंबना देखिए! इस मार्ग पर कोई गृहस्थ,तो हजारों में से एक ही चल पाता है।
ऐसा कहा जाता है कि,अधिकतर के पैर तो शुरू में ही लड़खड़ाकर दुनियां के प्रपंच के आगे धराशाई हो जाते हैं।
विरक्त जन तो जप ही करते हैं यदि कोई गृहस्थ जन भी नाम जप की संख्याबल के मार्ग पर चल पड़े.. तो एक करोड़ नाम जप के प्रथम पड़ाव पर पहुंचते ही..
“शरीर निष्पाप हो जाता है। साथ ही उसके रजो और तमोगुण दोनों का भी नाश हो जाता है। और फिर बचता है सिर्फ “सतोगुण” जो मनुष्य के निरंतर नाम जप में और अधिक सहायक होता है। शरीर में नए रोग आदि के सारे बीज स्वत: ही नष्ट हो जाते हैं।
यदि किसी पूर्व जन्म के कर्म आदि संस्कार के कारण कोई असाध्य रोग हो भी गया हो, तो उसे सहने की सामर्थ्य भी आ जाती है।
एक करोड़ की संख्याबल वाले साधक या नाम जापक को स्वप्न में बड़े बड़े ऋषिमुनी,संत और देवता आदि का सानिध्य मिलने लग जाता है। फिर ऐसा व्यक्ति अपने आपको प्रतिपल उन्हीं शुद्ध आत्माओं के बीच अनुभव करता है। इसलिए वह सदैव आनंदित रहता है।
जब किसी मनुष्य को नाम जप का संख्याबल एक करोड़ पहुंचने पर ऐसे अनुभव होने लगेंगे,तो जाहिर सी बात है उसका निरंतर नाम जप और प्रगाढ़ होने लग जायेगा।
फिर लोग बड़े उत्सुक होकर.. महाराज जी से पूछते हैं कि, दूसरे पड़ाव “दो करोड़ नाम जप..” का संख्याबल होने पर साधक की स्थिति कैसी हो जाती है..?? गुरुदेव..
तब श्री गुरुदेव फिर पद्य के माध्यम से बताते हैं कि,
” दो करोड़ जब हो जाता है..जप का उपसंख्यान। दोष रहित अत्यंत शुद्ध हो जाता,धन का स्थान।।
निर्धनता की पीड़ा से मिल जाता है निस्तांत। साधक के हित हो जाता है,सुखमय सब संसार।।
दैन्य, दुःख से देशांतर में रहते जो अन्यत्र। शीघ्र लौटकर वे निज घर में हो जाते एकत्र।।
सभी उपद्रव हो जाते हैं शांत। होती रहती है कुटुम्ब में सुख की वृद्धि नितांत।।
शेष कहें मन में लेकर ऐसे अनुभव के भाव..। आगे आगे अधिक वेग से चलो बढ़ाते पांव।। “
दो करोड़ नाम जापक या साधक को धन अभाव की पीड़ा अब कभी नहीं सताती। सब कुछ उसके अनुकूल स्वत: ही होने लग जाता है।
दरअसल, इस अवस्था तक आते आते व्यक्ति के अंतर्मन में धन के प्रति कोई चाह रह भी नहीं जाती होगी..इसलिए चाह नहीं,तो फिर अभाव कैसा..??
नाम जापक की दरिद्रता के सारे उपद्रव लगभग नष्ट हो जाते हैं। जीवन के सारे वैभव उसे स्वत: ही घेरने लगते हैं। जिस प्रकार समुद्र की कोई चाह न होते हुए भी सारी नदियां उसमें स्वयं समाती चली जाती हैं। ठीक वैसे ही।
इसी तरह जब नाम जापक के तीन करोड़ नाम जप होने पर .
“पहले जो अप्रतीत होते थे कार्य अतीव असाध्य।
वे सबके सब हो जाते हैं शीघ्र सहज ही साध्य।। “
तीन करोड़ नाम जप करने वाले का हिरदय पवित्र हो जाता है, जो असाध्य काम व मोह को नहीं छोड़ पा रहे थे, वे इस पड़ाव पर पहुंचते ही स्वतः सहजता से छूटने लग जाते हैं।
दरअसल इस संख्याबल से व्यक्ति की सभी चाहतें स्वयं पूरी होने लग जाती हैं। सब लोग उसे ऐसे प्यार करने लग जाते हैं जैसे सगे भाई आपस में करते हैं। तीन करोड़ नाम जप रूपी धन ऐसी विशिष्टता प्रदान करता है।
शेष कहें मन में लेकर ऐसे अनुभव के भाव.. आगे आगे अधिक वेग से चलो बढ़ाते पांव।
सुख स्थान जो व्यक्ति का ह्रदय को माना जाता है अब चार करोड़ नाम जप से उसमें भगवदानंद का स्फूरन होने लग जाता है।
मान,अपमान, हानि,लाभ,रोग और शोक जो भी द्वंद हैं उनका प्रभाव अब ऐसे जापक के हिरदय पर नहीं पड़ता।
ऐसे व्यक्ति को “नित्य स्वरूप” का बोध हो जाता है। “प्राणी को नित्य बोध का सुख मिलता भरपूर।कायिक,वाचिक, मानसिक सब दुःख हो जाते दूर।।”
“पांच करोड़ पूर्ण हो जाता जब “जप” का मान।परम शुद्ध होता है तत्क्षण उसका विद्या स्थान।।”
पांच करोड़ नाम जापक के मुख से वेदांत,शास्त्रों में जो लिखा है वह उचित वक्त पर स्वत: ही उसकी वाणी से निकलने लगता है। चाहे कभी अध्ययन किया हो या नहीं।
छह करोड़ नाम जप के पड़ाव पर पहुंचते ही रिपु स्थान के सारे कष्टों से वह बरी हो जाता है..जो छह शत्रु बताए गए है..काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद,मत्सर इन सब पर वह विजय पा लेता है। अब उसे स्वप्न में देव देवांतर,महापुरुषों से ऐसे वार्ता होने लगती है जैसे वे उसके साथ प्रकट में बैठे हों।
सात करोड़ नामों के जप का जब पूर्ण होता विधान।अब उसे भारी से भारी प्रतिकूलता या अनुकूलता कोई भी स्थिति उसे भगवन नाम से विलग नहीं कर सकती।
“आठ करोड़ नाम जप से शुद्ध होता है मृत्यु स्थान। बाधा दूर अकाल मृत्यु की, होती आयु महान।। पूर्ण आयु पाकर साधक हो, साधन में लीन। आत्मराज्य के सिंहासन पर हो जाता आसीन।।”
Note:-
इस पड़ाव पर आते आते साधक की स्थिति लगभग “परमात्म स्वरूप” हो जाती है। जैसे परम संत श्री राधाबाबा,श्री महावीर पौद्दार,श्री भाई जी महाराज, कर्माबाई, नामदेव और हम सबके श्रद्धेय गुरुदेव भगवान श्री प्रेमानंद जी। आज शायद इन पड़ावों से ऊपर हैं।
हालांकि,शास्त्रों में संख्याबल के पड़ाव तेरह करोड़ तक वर्णित हैं। लेकिन आठ करोड़ नाम जप के बाद साधक में “चेतना शक्ति” जाग्रत हो जाने से उसके अंदर किसी तरह का लाभ प्राप्त करने की आकांक्षा पूरी तरह नष्ट हो जाती है।
आगे.. ऐसे साधकों का नाम जप,तो निरंतर ही चलता रहता है। क्योंकि इस पड़ाव तक पहुंचते पहुंचते “जप करना” अब उनका स्वभाव बन जाता है।
वैसे आगे के पड़ाव सिर्फ औपचारिक बतौर ही रह जाते हैं जैसे; नौ करोड़ पर “धर्म स्थान” की शुद्धि हो जाने से साधक के देवताओं के साथ सगुण रूप में साक्षात्कार होने लग जाते हैं।
दस करोड़ पर “कर्म स्थान” की परम शुद्धि हो जाने से व्यक्ति के सारे पूर्व संचित कर्म नष्ट हो जाते हैं। नवीन क्रियमान भस्म हो जाने से साधक में अब अपने प्रारब्ध को भोगने की सामर्थ्य भी आ जाती है।
ऐसा साधक मानो अब परम मोक्ष की ओर चल पड़ा है। यहां आकर भगवत साक्षात्कार तो उसके लिए बहुत सामान्य सी बात हो जाती है। इसलिए वह प्रतिपल बहुत आनंदित रहने लगता है क्योंकि वह जन्म जन्मांतर के सारे झमेलों से दूर हो चुका होता है। साधकों का नाम जप तो सदैव निरंतर चलता रहता है। चाहे वे किसी भी पड़ाव पर क्यों न हों। आगे का.. शेष व्रतांत फिर कभी..धन्यवाद
संत श्री प्रेमानंद जी के मुखारविंद से..
केलि कुंज,वृंदावन