280 – आत्मबोध की यात्रा

उज्जैन नगरी (प्राचीन नाम अवंतिका) के राजा भर्तृहरि अपने समय के अत्यंत वीर,न्यायप्रिय एवं विद्वान शासक थे।

उनके तीन रानियां थीं। दो रानियों की तुलना में राजा अपनी तीसरी रानी पिंगला से अधिक प्रेम करते थे। जाहिर है रानी पिंगला अन्य रानियों से ज्यादा खूबसूरत एवं जवान होंगी। उनके प्रेम की हद ये थी कि राजा भर्तृहरि रानी पिंगला को अपने जीवन का केंद्र मानने लगे थे।

एकबार राजा भर्तृहरि के छोटे भाई वीर विक्रमादित्य, जो बाद में उज्जैन के न्यायप्रिय राजा के रूप में लोकप्रिय हुए, ने एक दिन अपनी भाभी रानी पिंगला को सैनिक अश्वपाल के साथ कुछ संदेहात्मक स्थिति में देखा,तो उन्होंने अपने बड़े भाई भर्तृहरि,जो वर्तमान में वहां के राजा थे।, उन्हें बताना अपना धर्म समझा, सो बता दिया..मगर रानी पिंगला ने त्रिया चरित्र वाले भाव से थोड़ा रुष्टता दिखाते हुए उनसे भी पूर्व राजा भर्तृहरि को उनके खिलाफ ये बोल दिया कि, आपके भाई की नीयत ठीक नहीं है। वे मुझे गंदी नजरों से देखते हैं रानी के प्रेमाशक्त राजा ने पिंगला की बात को सही मानते हुए विक्रमादित्य को कुछ समय के लिए किसी राज काज से.. बाहर भेज दिया।

भर्तृहरि और पिंगला की ये कहानी भारतीय लोककथाओं, इतिहास और आध्यात्मिक परंपरा का एक अद्भुत संगम है। ये कहानी केवल प्रेम और विश्वास की नहीं, बल्कि वैराग्य, मोहभंग और आत्मज्ञान की गहराई को भी दर्शाती है।

🔶 एक दिन एक सिद्ध योगी राजा भर्तृहरि को अमरत्व प्रदान करने वाला अमरफल दे जाते हैं। प्रेम के वशीभूत राजा ने उस फल को अपनी सबसे प्रिय रानी पिंगला को देना उचित समझा, ताकि वह उनके लिए सदा वैसी ही सुंदर और आकर्षक दिखती रहें।

लेकिन यहीं से कथा में एक अप्रत्याशित मोड़ आ जाता है।

पिंगला के देवर और राजा के छोटे भाई विक्रमादित्य की बात सच थी..कुछ समय से रानी का प्रेम राजा पर नहीं चुपके चुपके अश्वपाल पर बरस रहा था। इसलिए रानी ने स्वयं न खा कर वह फल अपने प्रेमी अश्वपाल को से दिया,ताकि हमेशा वह जवान रहे।

जबकि अश्वपाल का प्रेम रानी नहीं महल की एक नर्तकी/वेश्या थी। अतः सैनिक अश्वपाल ने वह अमर फल अपनी प्रेमिका नर्तकी को दे दिया।

नर्तकी ने सोचा.. मैं, दुष्कर्मी अमर होकर क्या करूंगी। उसके राष्ट्र प्रेम ने लोक हित में निर्णय लेते हुए.. अपने वीर और न्यायप्रिय राजा भर्तृहरि को बड़े विनम्र भाव से अमरफल भेंट कर दिया।

जब वही अमरफल राजा ने नर्तकी के द्वारा प्राप्त किया.. तो वह चकित रह गया ..!! नर्तकी से पूछा कि, ये फल तुम्हें, किसने दिया..?? जैसे नर्तकी ने बताया..फिर अश्वपाल ने..एक के बाद एक..फिर तो बस सारी कड़ी जुड़ती चली गईं।

अमरफल के आदान प्रदान का सारा चक्रीयक्रम.. समझ आते ही राजा भर्तृहरि की प्रिय रानी के विश्वासघात ने राजा का ऐसा रूपांतरण किया कि..अब संसार की हर वस्तु से उनका मोहभंग हो चुका था.. अब तो राजा भर्तृहरि के अंतर्मन में पूर्ण वैराग्य भाव जागृत हो गया।

🔶 मोहभंग और वैराग्य: इस घटना ने राजा भर्तृहरि के जीवन को पूरी तरह बदल के रख दिया।

—हालांकि उस पल राजा भर्तृहरि के हिरदय पर जो गुजरी होगी..उसे बयां करना आसान नहीं है।

मगर इस प्रत्याशित घटना ने दिन प्रतिदिन काम विलासिता में डूबते जा रहे एक महान राजा को जीवन की वास्तविक सच्चाई से रूब रू करा दिया। अर्थात एक जीव के लिए दुनियां के प्रपंचों से ऊपर अध्यात्म जगत में आत्मोत्थान का मार्ग खोल दिया।

अब उन्हें संसार के रिश्तों की अस्थिरता का एहसास हो गया था। अतः उन्होंने तत्काल राजपाट, सांसारिक वैभव और सारा भोग-विलास त्याग दिया।

उन्हें ये भी समझ आ गया था कि उस वक्त उनका छोटा भाई विक्रमादित्य सही था वे गलत थे। इसलिए वे अपने ममत्व की नगरी.. उज्जैन नगरी का सारा राजपाट वीर विक्रमादित्य को सौंप कर.. स्वयं एक योगी बन गए.. तब उन्होंने वैराग्य (संन्यास) का मार्ग अपनाकर उज्जैन की गुफाओं में वर्षों तपस्या की।

वही राजा भर्तृहरि बाद में महान संत और कवि बने, जिनके “वैराग्य शतक”, “नीति शतक” और “श्रृंगार शतक” अत्यंत प्रसिद्ध हुए हैं।

🔶 रानी पिंगला का चरित्र:

रानी का चरित्र इस कथा में एक जटिल रूप में सामने आता है— उनका चरित्र केवल विश्वासघात का ही प्रतीक नहीं, बल्कि मानवीय कमजोरी और चंचलता का भी प्रतीक बना हैं।

उनकी भूमिका यह दर्शाती है कि बाहरी सौंदर्य और आकर्षण कभी स्थायी नहीं होते। इसलिए सदैव अपने धर्म पर अडिग रहिए।

🔶 कथा का संदेश (मुख्य बिंदु)

👉 1. संसार की नश्वरता : संसार में कोई भी संबंध स्थायी नहीं है; सब कुछ परिवर्तनशील है।

👉 2. मोह और माया का भ्रम : अत्यधिक आसक्ति अंततः दुख का कारण बनती है।

👉 3. वैराग्य की महत्ता : सच्चा सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मज्ञान में होता है।

👉 4. आत्म-जागरण : कभी-कभी जीवन में घटने वाली कुछ घटनाएँ भी मनुष्य को सही मार्ग दिखा जाती हैं।

🔶 निष्कर्ष राजा भर्तृहरि और रानी पिंगला की कथा केवल एक प्रेम-त्रासदी नहीं, बल्कि ये एक “आत्मबोध की यात्रा” है। जो हमें सिखाती है कि जीवन में मोह और आकर्षण क्षणिक हैं, केवल सत्य और आत्मज्ञान ही स्थायी हैं। अतः विकट परिस्थितियों में धर्म पर बने रहना ही असली परीक्षा है।

भर्तृहरि का राजा से योगी बनना इस बात का प्रतीक है कि जब मनुष्य जीवन की सच्चाई को पहचान लेता है, तो वह बाहरी जगत से ऊपर उठकर.. आध्यात्मिक मार्ग की ओर अग्रसर हो जाता है। यही मनुष्य जीवन का धर्म है।

धन्यवाद

279 Psychic impressions

सभी बंधु बांधवों को ! राधे गोविंद 🙏

देश दुनियां में मनाए जाने वाले होली के पावन पर्व पर भक्त प्रह्लाद की जय जयकार के साथ साथ आप सभी को होलिका माता के दहन की हार्दिक शुभकामनाएँ।

आज हम सब बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक इस पावन अवसर को मना रहे हैं। होलिका दहन हमें उस पौराणिक कथा की याद दिलाता है जिसमें भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति जो उसे “श्री हरि” के प्रगाढ़ “नाम जप” से प्राप्त हुई थी। और सत्य के प्रति उसकी निष्ठा ने अत्याचारी राजा “हिरण्यकश्यप” , जो उसके स्थूल शरीर का पिता भी था, के अहंकार एवं अज्ञान को धरासाई कर दिया था। भगवान विष्णु यानी श्री हरि की कृपा से प्रह्लाद की रक्षा हुई.. और होलिका स्वयं अग्नि में भस्म हो गई। जबकि बताते हैं कि उसके पास एक “फायर प्रूफ चादर” भी थी।

नकारात्मकता यानी अशुभ कर्म हावी रहते हैं,तो वे हमारे सुकृत्यों को भी खा जाते हैं.. ये कथा हमें सिखाती है कि, जीवन में चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी प्रतिकूल क्यों न बन जाए..मगर हमें अपने अंदर सत्य,श्रद्धा और धैर्य को हमेशा बनाए रखना चाहिए.. अपनी मर्यादाओं में रहते हुए.. दुनियां के प्रपंच के सामने..कभी अपने धर्म से न हीं डिगना चाहिए। उस पल एक ही बात ध्यान में रखें.. ये संसार.. मृत्युलोक है.. स्थूल .. में कमाई गई सब चीजें यहीं रह जानी हैं। इस कलि काल (कलयुग) में हमारे द्वारा अन्य जीवात्माओं के साथ की हुई सेवा..आदि से प्राप्त “भलाई” और अपने इष्ट का “नाम जप” ही हमारे सूक्ष्म शरीर के साथ जाने वाला है। और कुछ.. नहीं, जहां तक है कि ये स्थूल शरीर जिसकी साज सज्जा में अपने वेश कीमती वक्त को खपा देते हैं ये भी यहीं रह जाना है।

एक और बात.. होलिका दहन केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर की नकारात्मकता—अहंकार, द्वेष, ईर्ष्या और क्रोध—को अग्नि में समर्पित करने का प्रतीक भी है। इस पावन अग्नि के सामने हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने जीवन से बुराइयों को दूर करके प्रेम, भाई चारे और सद्भाव को अपनाएँगे। यह पर्व हमें समाज में एकता, समानता और सौहार्द का संदेश देता है। जैसे अग्नि की लपटें अंधकार को दूर करती हैं, वैसे ही हमें भी अपने जीवन में सकारात्मकता का प्रकाश फैलाना चाहिए। Saints say, we will have to transform ourselves to meet the God.👍

आइए, इस होलिका दहन पर हम सभी मिलकर यह प्रण लें कि ‘At any cost.. हम सत्य के मार्ग पर ही चलेंगे,एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना रखते हुए.. अपने परिवार, समाज एवं राष्ट्र की उन्नति के साथ साथ अपनी आत्मोन्नती के मार्ग की ओर भी प्रतिपल अग्रसर रहेंगे।

एक बार पुनः आप सभी को होलिका दहन की हार्दिक शुभकामनाएँ।

धन्यवाद!

आपका शुभ चिंतक :

योगेंद्र सिंह पचहरा, मुखिया परिवार नीमगांव से

278 चिंतन..

सोच – विचार के संदर्भ में चिंतन..के माध्यम से हम तथ्य के मूल में जाकर.. विचार तत्व को समझ पाते हैं। क्योंकि,

जब तक हम अपने “अद्वैत बोध” को नहीं जान पाएंगे, तब तक हमारा संतो के प्रति विश्वास..स्थाई हो नहीं पाएगा। बार बार बदलता रहेगा। क्योंकि,

सच्चे संत कभी झूंठी सांत्वना नहीं देते, वे साधक को वैचारिक चिंतन..में जाने को बाध्य करते हैं।

सामान्यतः संत प्रश्नों के उत्तर ऐसे देते हैं फिर..मन में उठने वाले अन्य प्रश्न स्वत: शांत होते चले जाते हैं।

कई बार व्यक्ति संतों द्वारा बताए गए मार्ग पर तो चलता है, लेकिन उस मार्ग का स्वानुभव नहीं कर पाता। अतः उसके मन में प्रश्न उठते रहते हैं, उसके लिए “जीवन” एक पहेली बनके रह जाता है।

गोकुल धाम में जब परमात्मा हम से प्रश्न करेगा, तो उत्तर हमें ही देना होगा हमारे संत और महंतो को नहीं।

परमात्म तत्व हम से यह कभी नहीं पूछेगा, कि हम किसके अनुयायी हैं..जैसे; कृष्ण के, राम के, बुद्ध के या महावीर के। वह यह भी नहीं पूछेगा कि हमने गीता,कुरान,बाइबिल आदि..ग्रंथों में से किसका अध्ययन किया है..??

परमात्म तत्व इन बातों पर बहुत ज़ोर नहीं देता। ईश्वर, तो बस हम से यही पूछेगा क्या हम स्वयं के अनुयायी बन पाए..? अपने अंदर बैठे “आत्म” तत्व जो ईश्वर का ही अंश है। क्या हमने उस अंतर्निहित शक्ति को जाना..?? क्या हम अपने भीतर जल रहे चैतन्य के दीप से अपने सूक्ष्म शरीर को प्रकाशित कर सके ??

यदि नहीं, तो उन प्रश्नों के उत्तर हम कहाँ से लाएंगे..? और जो प्रश्न हम सत्संग या एकांत वार्ता में अपने संतों से पूछते हैं, वे सब हमारे ‘मन’ के प्रश्न हैं।

मन के बारे में कुछ कहें,तो ये भी दो में विभक्त है.. सत और असत.. स्वाभाविक रूप से ‘असत मन’ बहुत चंचल होता है। जो प्रमाद,भ्रांतियों के वशीभूत.. प्रश्न..बहुत करता है।

वास्तव में, ये मन हमसे कभी यह नहीं पूछेगा कि “मैं कौन हूँ।” मन तो केवल यही पूछेगा कि “जीवन क्या है..??”, “ईश्वर क्या है..??” , “दुनिया क्या है..??”

असत मन के सहारे हम कभी उच्च स्तर तक नहीं पहुंच सकते, उच्च स्तर अर्थात जहाँ से इन सभी प्रश्नों के उत्तर भीतर से मिलते हैं। जिस दिन हमने अपने स्व के बोध को जान.. लिया, उस दिन हमारे सारे प्रश्न शून्य..’0′ हो जाएँगे।

विवेकशीलता के समक्ष सांसारिकता से जुड़े प्रश्न मिथ्या लगते हैं।

मानव जीवन में यदि कोई प्रश्न हमें गहराई.. में..चिंतन की स्थिति में ले जाता है,तो केवल एक ही प्रश्न है कि, “मैं कौन हूँ..??” और इस प्रश्न का उत्तर कभी दूसरों के पास नहीं है।

ये प्रश्न, तो प्रत्येक जन को स्वयं से ही पूछना होता है। सांसारिक प्रश्न.. अक्सर दूसरों से पूछे जाते रहे हैं।

जब “मन” तुमसे पूछे कि “दुनिया क्या है..??”, परमात्मा क्या है..??” ,” प्रकृति क्या है..??”

तब आँखें बंद करना.. और अपने भीतर सिर्फ एक ही प्रश्न को दोहराएगा.. “मैं कौन हूँ…??” “मैं कौन हूँ…??” तब हमें अपनी “अद्वैत” प्रतिभा का बोध,तो होगा ही साथ ही स्वयं को भी जान सकेंगे।

क्योंकि संत वही है, जो हमें हमारे भीतर “चिंतन..” करने को बाध्य कर दें।

धन्यवाद..राधे गोविंद.. राधे गोविंद 🙏🏻🙏🏻

277 टैली काउंटर

Do you know..??

about “Tally Counter”

अपने भोले भाले साधकों की सहायतार्थ देश की कंपनियों ने..

नंबर 01 नाम जप करने वाले साधकों के जप की गिनती बढ़ते देखकर..भजन के प्रति भक्तों की आस्था एवं रुचि और बढ़ाने के ध्येय से..

नंबर 02 कामकाजी भक्तों का 108 मनका की माला व थैली.. हर पल साथ रखने और फिर उचित वक्त पा कर कहीं भी जप में लगने के संकोच आदि को समझते हुए.. सभी भक्तजनों के हितार्थ एक विकल्प के रूप में काफी दिन से “टैली काउंटर” नाम का बहुत आसान सा डिवाइस निकाला हुआ है। जो हर शहर के बाजार में बड़ी आसानी से मात्र 20/- रुपए में मिल जाता है।

मुझे ऐसा लगता है कि सब नहीं,तो हम आरंभिक अवस्था वाले नाम जापकों को ये “टैली काउंटर” मंगवा ही लेना चाहिए।

अपने प्रिय इष्ट का हमें जो “नाम” प्रिय हो उसके “जप” का संख्याबल बढ़ने से.. व्यक्ति ‘मानव जीवन’ की सार्थकता की ओर,तो अग्रसर होगा ही..क्या पता..उसके भजन की प्रगाढ़ता उतनी बढ़ जाए, कि उसे “भगवत प्राप्ति” हो जाए।

धन्यवाद राधे राधे 🙏🏻🙏🏻

276 अंत:करण कि अंतरात्मा

कोई एक नहीं,

अंत:करण और अंतरात्मा दोनों।

क्योंकि अंतःकरण और अंतरात्मा के बीच शब्दार्थ में जाओगे, बहुत अंतर है।

जी, बिल्कुल ‘अंतःकरण’ और ‘अंतरात्मा’ में अर्थ के आधार पर विशेष अंतर है।

हालांकि ये दोनों शब्द “आत्मा” और “मन” के गहरे आयामों की ओर संकेत करते हैं: फिर भी..

अंतःकरण’ भारतीय दर्शन में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार – इन चारों का समुच्चय है, जिसे “अंतःकरण चतुष्टय” भी कहते हैं।

यह व्यक्ति के सोचने, निर्णय लेने, स्मृति रखने और ‘मैं’ पन (I-ness) से जुड़ा आंतरिक मनोविज्ञानिक तंत्र है।

इसका मुख्य कार्य किसी क्रिया के सही या गलत होने का विवेकपूर्ण निर्णय करने में मदद करना है,

अर्थात यह व्यक्ति का नैतिक और बौद्धिक विश्लेषण तंत्र भी है।

‘अंतरात्मा’ मूलतः “आत्मा” का सूक्ष्म और सबसे शुद्ध, दिव्य स्वरूप है।

यह ‘परमात्मा’ से जुड़ी हुई उस आत्म-चेतना या गूढ़ आंतरिक शक्ति को दर्शाता है, जो बिना किसी नैतिक उलझाव.. के केवल शुद्ध भाव या चेतना के रूप में अंदर मौजूद है।

विदेश व नैतिक संदर्भ में..

‘अंतरात्मा की आवाज़’ का तात्पर्य वह “सहज बोध” है, जो हर परिस्थिति में सही निर्णय व आंतरिक शांति की भावना को उत्पन्न करता है।

सारांशत:–

अंतःकरण ;- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का समुच्चय; नैतिक निर्णय क्षमता मानसिक कार्य प्रणाली, विवेकपूर्ण विश्लेषण के रूप में परिभाषित किया जाता है। जबकि,

अंतरात्मा:- को आत्मा का शुद्ध, ईश्वर-संलग्न स्वरूप ,आंतरिक परम चेतना, शुद्ध और दिव्य बोध स्वरूप है।

इस प्रकार, ‘अंतःकरण’ अधिक मनोवैज्ञानिक और विश्लेषणात्मक है, जबकि ‘अंतरात्मा’ परम चेतना, शुद्ध बोध और दिव्यता से संबंधित होती है।

साभार..

राधे गोविंद.. राधे गोविंद

275 Control of the Mind

“कंट्रोल ऑफ़ द माइंड” मानव जीवन के धरातल पर क्रियान्वित करने के नज़रिए से शायद दुनियां का सबसे जटिल “सिद्धांत” है। जटिल है मगर कठिन नहीं।

मनुष्य इस सिद्धांत को अपने जीवन में अपनाना चाहे,तो बहुत अच्छे से अपना सकता है। इतना दुर्लभ भी नहीं है। कि मनुष्य की सामर्थ्य से परे हो।

कुछ जटिलताएं अवश्य हैं परंतु सामर्थ्यवान मनुष्य उन्हें दर किनार करते हुए..करना चाहेगा,तो अपने “मन पर नियंत्रण” कर सकता है और इतिहास साक्षी है हमारे देश के अनेक संतों,वैज्ञानिकों और महापुरुषों ने इसे संभव करके दिखाया है।

अध्यात्मवाद या भौतिकवाद दोनों ही नजरिए से “मानव जाति” की सद्गति के दृष्टिकोण से इस सिद्धांत का दैनिक जीवन में अनुपालन होना नितांत आवश्यक है।

मनुष्य यदि आंकलन करे,तो वह समझ सकता है कि, जिस प्रकार “बुद्धि” कुमति और सुमति दो आयामों पर चलती है। ठीक वैसे ही ये “मन” भी दो रूपों में क्रियान्वित होता है।..”सत” और “असत”।

“सत मन” सदैव मनुष्य को अच्छे मार्ग पर चलने को प्रेरित करता है। मगर अपने सौम्य स्वभाव में.. जबकि “असत मन” बहुत आकर्षक तरीके से प्रलोभन देते हुए व्यक्ति को सही मार्ग से हटाने के लिए दबाव बनाने में निपुण है।

इसीलिए संत लोग “असत मन” को सदैव डांट – डपट कर नियंत्रण में रखने की बात कहते आए हैं। भटके हुए “मन को नियंत्रण” में रखने का ये “पहला कदम” है।

एक हिंदी कहावत भी इसी बात की पुष्टि करती है कि “अभ्यास ही आदमी को पूर्ण बनाता है।” निसंदेह “मन की वृत्ति” को समझकर चलने वालों का सही अभ्यास ही हमेशा उन्हें पूर्णता की ओर ले जाने में सफल रहा है।

पदम पुराण के अनुसार.. समस्त चौरासी लाख योनियों में “मनुष्य योनि” केवल ‘चार लाख’ हैं। शेष सब..सूअर,कुत्ता, बंदर, सांप,बिच्छू आदि हैं। एक श्लोक की सहायता से इस तथ्य को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है..

जैसे; “जलज,नव लक्षाणी, स्थावर लक्ष्य विम्शन्ति। क्रम्यो रुद्र संख्यक:, पक्षिणाम दस लक्षणम।

तीस लक्षाणी पशव:, चतुर लक्षाणी मानव:।”

भावार्थ: दुनियां में जलचर अर्थात जल में रहने वाले जीवों की योनियां नौ लाख बताई गईं हैं।,

पेड़,पौधे,जड़ी,बूटी आदि की बात करें,तो इनकी बीस लाख योनियां हैं।,

कीट,पतंगे, मक्खी,मच्छर आदि की यौनी ग्यारह लाख हैं।

दस लाख योनियां पक्षी या उड़ने वाले जीवों की होती हैं।,

तिर्यक जीवों अर्थात चार पैरों पर चलने वाले पशुओं की योनियां तीस लाख हैं।,

समस्त चौरासी लाख योनियों के योग में से..अंत में मात्र ‘ चार लाख ‘ योनियां बचती हैं जो मनुष्य,देव, दानव आदि के लिए हैं।

हम सब मनुष्य योनि में आने से पहले..अन्य अस्सी लाख योनियों में कई कई बार जन्म ले चुके होते हैं। तब कहीं जाकर ये ‘ मानव देह ‘ मिलती है। आज की नई पीढ़ी के पास वेद शास्त्रों को जानने की न रुचि है न समय है।और न वे संत जनों को ही सुनती है। वरना वे लोग अपने जीवन का सार तत्व बहुत ही सरलतम रूप में अपने प्रवचन आदि के जरिए.. समझाते हुए सदैव इस मानव योनि को मोक्ष या मुक्ति का द्वार बताते रहते हैं। वास्तव में मानव देह मिलना बहुत दुर्लभ है। विश्वास कीजिएगा.. हर जन्म में हम मनुष्य नहीं होते।

मृत्युलोक में देव तुल्य हमारे “मातापिता” द्वारा प्रदत्त इस मानव शरीर में अंतर्निहित “मन” को अपनी प्रारंभिक अवस्था में होश संभालने पर ..एक परिवार का बोध होता है..फिर धीरे धीरे और बड़े होने पर नाते रिश्तों का भी अहसास…होने लगता है..इसी तरह एक दिन समाज, देश और दुनियां में प्रचलित परंपराओं एवं समाज में एक सभ्य लॉबी द्वारा निर्धारित कुछ मानकों का जिनके दायरे में संघर्ष करते-कराते “ज़िंदगी” को एक सही आकर देने के लिए.. संतो की वाणी..एवं धार्मिक ग्रंथो द्वारा सामान्य जन को सृष्टि के आरंभ से अक्सर निर्देशित किया जाता रहा है।

अतः मनुष्यात्मा को पूर्वाग्रहों की गिरफ्त से.. दुनियां के प्रपंचों में लिप्त होने से..बचकर..इस “मानव देह” को सजीवता में परिभाषित करने वाली वेशकीमती अपनी एक एक सांस को.. तारण शक्ति सम्पन्न भगवन के किसी भी “नाम” के जप.. जिसमें हमारी गहरी आस्था हो, के ज़रिए..पूर्व में किए गए अपने अशुभ कर्मों को डिलीट करके ऊंचे लोकों में जाने का मार्ग प्रशस्त करना ही मानव जीवन का एक मात्र उद्देश्य होता है। जो “भगवत प्राप्ति” का आधार बनता है।

कलयुग में मनुष्य के लिए सभी कर्मों में इष्ट के नाम का “निरंतर जप” ही श्रेयस्कर बताया गया है।

मगर ऐसा.. कुछ विरले ही कर पाते हैं..?? जिन पर उनके अपने इष्ट यानी “राधे गोविंद” की कृपा होती है। वरना दुनियां की अस्सी फीसदी आबादी की अंतिम सांस एक दिन दुनियां के प्रपंचों में उलझते.. उलझते ही टूट जाती है।

संतों द्वारा दुर्लभ बताई गई “मानव देह” को सद्कर्मों में संलग्न करने की सामर्थ्य सिर्फ और सिर्फ पूज्य स्वामी विवेकानंद जी द्वारा बताए गए.. “Control of the mind” के सिद्धांत में निहित है। दूसरी किसी थ्योरी में वैसी सामर्थ्य मुझे,तो नहीं दिखती। अतः हम सब अपने “मन को नियंत्रित” करने के लिए सदैव प्रयासरत रहें।

ह्रदय की गहराइयों से इन पवित्र भावनाओं के साथ अपने सभी शुभचिंतकों को मैं इस लेख के माध्यम से अनंत शुभकामनाएं..प्रेषित करता हूं..

पढ़ने वाले सभी सुयोग्य पाठकों को बहुत बहुत धन्यवाद ..✍🏻 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏🏻🙏🏻

विचारक; योगेंद्र सिंह पचहरा,

मुखिया परिवार,नीमगांव

274- Grammar’s Family

Do you know..?? The Grammar’s Family..??

Today, I would like to introduce with this fantastic family..

There is a family in London whose surname is “Grammar”.

In this family, there is a couple, Mr Noun & Mrs Verb. The couple has three children.. a son, Pronoun and two daughters Adverb and Adjective.

The son (Pronoun) has to do all the work in the absence of his father.

The two daughters love each other but they are some differenciate by their nature.

As; Adjective loves her father & brother she always keeps praising them.

But Adverb loves her mother more than other members of the family and she always modifies her mother when in her need.

There are two servants in this family. A male & a female..

The Preposition is a female servant. & The Conjunction is a male servant.

In the sense of importance of her role.. Preposition is the chief servant, therefore, we can say she is the official servant of her master.

While Conjunction is the family servant so he looks after every member of the family.

Role of the interjection as in a guest appearance..so he joins the family only when.. in times of joy and sorrow.

In fact, this is a wonderful family.

Note;- Students who read English as a subject..they must not only know members by their names of this family, but also to understand their actions & co-relations each other.

If They go forward, they must be in practical with this splendid family

Thanks

Thinker ; Yug Pachahara,

A member of Pachahara family

273- एक और गांधी

Do you know..??

हमारे देश में एक और गांधी हैं..

हालांकि, तन, मन, धन से वे सदैव शिक्षा जगत में अपनी मेहनत से देश के नौनिहालों को सभ्य नागरिक बनाने में तल्लीन रहे..

और शायद पॉलिटिकल न होने के कारण ये “दूसरा गाँधी कभी लाइम लाइट का हिस्सा नहीं बन सका।

इसलिए देश का आम जन,तो लगभग इस ख़ास व्यक्तित्व से अनजान ही रहा।

ये सैद्धांतिक व्यक्ति अपने काम से काम रखने में कहीं अधिक विश्वास रखने के कारण देश स्तर पर कभी बहुत ज्यादा चर्चित नहीं हुआ।

ये तथ्य सत्य है। तो हमारे देश का प्रिंट और सोशल मीडिया दोनों आपको कठघरे में खड़े नज़र आ रहे होगे।

देश का चौथा स्तम्भ कहा जाने वाला ये मीडिया कहां था..?? वे जब ऐसी प्रेरणादायक सख्शियतों को जनता सामने नहीं ला सकते,तो देश के लिए आखिर उनका फिर..दायित्व क्या..है..??

पूरे देश में पचास हजार से अधिक स्कूल जिस व्यक्ति की प्रेरणा से चल रहे हों, ऐसे महापुरुष को यदि कम लोग जानते हैं, तो फिर “कठघरे वाली” बात में दम है।

विद्याभारती के संस्थापक श्री कृष्णचन्द्र गांधी ही “एक और गांधी” हैं। जो बहुत ही प्रशंसनीय व्यक्तित्व हैं।

वे जीवनभर रिक्शे में इसलिए नही बैठे, कि एक आदमी का बोझ दूसरा आदमी क्यों खींचे..??

ऐसा बताया जाता है कि, कृष्णचंद गांधी पूरे भारत देश में हजारों शिशु मन्दिर और विद्यामन्दिर स्कूलों के मालिक थे फिर भी करीब 10 किलो वजन का अपना बैग स्वयं लेकर चलते थे।

एकबार किसी कार्यक्रम के लिए कोई उनको रिसीव करने आया, तो उसे उनके लिए साईकिल लेकर ही आना पड़ा।

संघ के संस्कारों को करोड़ों बच्चों तक पहुंचाने वाले महामानव को इस शिक्षक दिवस, 2025 पर मेरा शत शत नमन है।

आप नए भारत के ऐसे शिक्षक थे जिन्हें आज के पावन दिन याद किया जाना नितांत आवश्यक है।

जय हिंद जय भारत

धन्यवाद

राधे गोविंद..राधे गोबिंद 🙏

272 ‘आइडिया मेकर्स ‘

निर्देश : छात्र शरारत या “आइडिया मेकिंग” में स्वयं को कितने ही स्मार्ट क्यों न समझें। मगर अपने माता पिता एवं गुरु के सामने कभी भी उन आइडियाज को प्रयोग में न लाएं।

क्योंकि गुरु, आख़िर गुरु, ही होते हैं..उनके सामने शिष्यों द्वारा की जाने वाली कोई भी होशियारी एक पल में धराशाई हो जाती हैं।

मैं,तो ह्यूमैनिटी का छात्र था.. लेकिन मेरे कुछ साथी साइंस वर्ग में थे..

उन मित्रों ने आइडिया मेकिंग में स्वयं को बहुत एक्सपर्ट समझ, एकबार परीक्षा के दौरान उपर्युक्त निर्देश को न मानने की हिमांकत की।

चलो! आज शिक्षक दिवस पर इस सच्ची घटना के माध्यम से एक गुरु के “गुरुत्व की सामर्थ्य” भी जान ले ते हैं।

एक बार आई.आई.टी. मुंबई में स्टडी कर रहे चार छात्र देर रात तक “ताश खेलते” रह गए.. जिससे वे अगले दिन की परीक्षा की तैयारी नहीं कर सके। वे आइडिया मेकर्स तो थे ही सुबह उनको एक आइडिया आया।

वे चारो ग्रीस, धूल और गंदगी से सने हुए कपड़े पहन कर अपने “डीन” ( गुरु ) के पास जाकर बोले… सर! कल रात अचानक एक साथी की तबीयत खराब होने के कारण उसे अस्पताल ले गए थे। और वापस आते समय कार का टायर फट गया, हॉस्टल तक पहुंचने के लिए हमें पूरी रात कार को धक्का लगा.. लगाकर आना पड़ा।

सर! इससे हमारी परीक्षा की तैयारी भी नहीं हो सकी है। इसलिए हम इस हालत में परीक्षा नहीं दे पाएंगे।

डीन साहब को उनकी परेशानी का एहसास हुआ और उन्होंने सहानुभूति व्यक्त की और उन्हें तीन दिन का समय देते हुए परीक्षा को एक्सटेंड न करके कुछ असमर्थ परीक्षार्थियों की स्थिति समझकर विकल्प पत्र भरके देने के लिए बोल दिया…

मात्र उन चार छात्रों ने इस विकल्प को सहर्ष स्वीकार किया। और डीन को इस बात के लिए धन्यवाद भी दिया। वे चारों परीक्षा की तैयारी में जुट गए।

तीसरे दिन वह डीन के सामने उपस्थित हुए डीन ने कहा, चूंकि यह एक _”विशेष स्थिति वाली परीक्षा” है, इसलिए परीक्षा के लिए चारों को अलग-अलग रूम में बैठना होगा। ।

उन्होंने पिछले तीन दिनों में अच्छी तैयारी कर ली थी इसलिए चारों सहमत भी हो गए।

इस परीक्षा में पचास – पचास अंकों के केवल 2 प्रश्न रखे गए..थे।

प्र.नंबर 1. कार का कौन सा टायर फटा था..? (50 अंक) केवल टिक करें।

ए – फ्रंट लेफ्ट

बी – सामने दाएँ

सी – रियर लेफ्ट

डी – पीछे का दाहिना भाग

प्र.नंबर 2. कार में कौन कहाँ बैठा था ? (50 अंक) सामने उत्तर में चारों के नाम मेंशन करें।

ए- ड्राइवर सीट पर:

बी – सामने बाएँ:

सी – पीछे बाएँ:

डी – पीछे दाएं:

विशेष नोट: अंक तभी दिए जाएंगे जब चारों छात्र दोनों प्रश्नों का उत्तर समान रूप से दें सकेंगे।

आई.आई.टी बॉम्बे बैच 1992 की एक सच्ची कहानी।

परिणाम: ऐसी स्थिति में आप भी समझ सकते हैं। कि “चारों का एक जैसा उत्तर,तो कभी हो ही नही सकता था।”

इसीलिए कभी भी अपने गुरु को कम न आंकें शिष्य चाहे कितने भी बड़े “आइडिया मेकर्स” क्यों न हों वे रहेंगे शिष्य ही।

अतः मान लो ! “गुरु सदैव गुरु ही रहेगा”

ब्लॉग पढ़ने वालों को “शिक्षक दिवस,2025” की हार्दिक बधाई.. धन्यवाद 🙏 राधे गोविंद..राधे गोविंद

271- जप का संख्याबल

नाम जप प्रगाढ़ होते जाने से “संख्याबल” का महत्व अवश्य जानें..अच्छा! क्या आपको नहीं लगता.. देखते ही देखते संत श्री प्रेमानंद जी महाराज की ख्याति दिन प्रतिदिन आसमान छू रही है.. आज भी सामान्य जन के लिए “वृंदावन” महज़ एक शहर है।

पूज्य श्री प्रेमानंद जी को इस वृंदावन धाम में आए लगभग तीस वर्ष हो गए.. हैं उनका संकल्प है कि वे अब अपने जीते जी इस “चिदानंद नगरी श्री वृंदावन धाम” से कभी बाहर नहीं जाएंगे। वे लोग जो “नाम जप” की सामर्थ्य से अभी अनजान हैं। ऐसे लोग उनके औरा को नहीं समझ पाए हैं वे इसे किसी चमत्कार के रूप में देख रहे हैं। जबकि ये सब “नाम जप” के संख्याबल की सामर्थ्य है। दूसरी कोई बात नहीं।

“नाम जप” में साधक के लिए “संख्याबल” कितना महत्व रखता है इसे संतों की वाणी एवं शास्त्रों में वर्णित उल्लेख के आधार पर समझने का प्रयास करें,तो काफी सहज है। सनातन धर्म में साधक के लिए अपने इष्ट के निरंतर “नाम जप” के संख्याबल में बड़ी ताकत है।

“कल युग केवल नाम अधारा। सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा।।”

रामचरित मानस के उत्तरकांड की इस चौपाई के माध्यम से संत तुलसीदास जी ने भी “नाम जप” पर बल देते हुए सैकड़ों वर्ष पहले ही कह दिया था.. कि चारों युगों में सतयुग-यज्ञ, त्रेता-तप, द्वापर-योग साधना और कलियुग में “नाम जप” का अपना महत्व रहेगा।

एकबार को कोई समय या अर्थ के अभाव में यदि तीर्थ, विधिवत पूजा अर्चना आदि न भी कर पाए, तो कोई बात नहीं..मानव देह मिलने पर केवल नाम जप ही करता रहे,तो वह अपने शरीर को निष्पाप करके भगवत प्राप्त हो जायेगा।

क्योंकि कलयुग के लोग सिर्फ “नाम जप” द्वारा ही संसार रूपी सागर से पार हो जायेंगे। इसलिए कि “इष्ट के नाम में तारण शक्ति होती है।”

शास्त्रों में, नाम जप के “संख्याबल” को मानव जाति के आत्मिक उत्थान के लिए अलग अलग पड़ाव या फिर उन्नति के लिए कई एक सोपानों का,उल्लेख मिलता है।

दूसरी बात ” केलिकुंज,वृंदावन धाम ” में विराजमान प्रातः स्मरणीय अति लोकप्रिय संत श्री पूज्य प्रेमानंद जी महाराज” वर्तमान में असंख्य लोगों की धार्मिक आस्था के आधार स्वरूप हैं। जो नाम जप की संख्याबल के पुरजोर समर्थक हैं।

आप अपने “सत्संग” एवं “एकांत वार्ता” के माध्यम से कई एक वर्षों से “नाम जप” के लिए अपने सभी श्रोताओं एवं साधकों को बार बार प्रेरित करते रहे हैं। परिणामस्वरूप बहुत से लोगों की दिनचर्या में एक बड़े पैमाने पर परिवर्तन भी देखने को मिल रहा है।

दुनियां बिच जनसंख्या घनत्व तो हमेशा ही रहा है। इसलिए भटके हुए.. लोगों की तादाद भी कम नहीं है। ये स्थिति लगभग हर युग में रहती है। इसलिए ये कोई चिंता का विषय नहीं है।

संत श्री प्रेमानंद जी की जैसी भाव भंगिमा..और चेहरे का तेज है..जटिल से जटिल आध्यात्मिक तथ्यों को समझाने की उनकी स्पष्ट एवं सरल शैली ही लोगों को उनकी ओर आकर्षित करती है। जबकि बताते हैं कि, आपने “केवल नवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की” है। यद्यपि आपके संस्कृत श्लोकों को बोलने का उच्चारण और संस्कृत में आपका धाराप्रवाह बहुत कमाल का है।

जिस कदर लोग आपकी ओर आकर्षित होते चले जा रहे हैं.. और आप हमारे लाल जू श्री कृष्ण जी की ही तरह.. “राधा राधा राधा राधा..नाम ” की रट लगाए हुए हैं वैसे ही रट अब करोड़ों..लोग लगाने लगे हैं। सच में सौभाग्यवश जिन लोगों की दिनचर्या संत श्री की गुरुवाणी के अनुरूप बन गई है.. या बनती जा रही है.. उनका जीवन आनंदमय होता जा रहा है।

गीता का ये श्लोक भी यही संकेत करता है..

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानम सृजाम्यहम परित्रणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामी युगे युगे।”

भावार्थ में ये श्लोक बताता है कि ” संसार में असंतुलन,अधर्म और अन्याय के बढ़ने पर ईश्वर कहीं न कहीं स्वयं अपने रूप को प्रकट करता है। साधुजनों,धर्म की रक्षा और पापियों का नाश करने, तथा संसार में पुनः धर्म की स्थापना करने के लिए..हर युग में ईश्वरीय तत्व के साथ स्वयं या अपने बंदे (संत) नू प्रकट करता रवा है।”

द्वापर युग में जिस प्रकार गोप-गोपियां अपने लाल जू श्री कृष्ण जी की मनोरम छबि को देखने के लिए पल पल लालायत रहा करते थे। ठीक वैसे ही कई वर्षों से महिलाएं, बच्चे,बूढ़े,जवान सब तरह के लोग श्री वृंदावन धाम जी की सड़कों पर रात्रि दो बजे से .. न सिर्फ डेरा डाले पड़े रहते हैं,अपितु बड़े श्रद्धा भाव के साथ पलक पांवड़े बिछाए..हुए श्री प्रेमानंद जी की एक झलक पाने की लालसा उन लोगों के चेहरों पर देखते ही बनती है।

नाम जप के संदर्भ में..संत श्री प्रेमानंद जी बताते हैं, कि “जीवन का चलना भी उसी को कहते हैं जब मनुष्य का मंत्र जप या हर स्वांस के साथ अपने इष्ट का “नाम जप” चल रहा हो।”

यदि ऐसा नहीं हो रहा है..तो प्रेमानंद जी बड़े दुःखी होकर कहते हैं कि

” न जाने क्यों मनुष्य अपने इस दुर्लभ जीवन को यूं ही दुनियां के प्रपंच में नष्ट कर रहे हैं।”

भजन की एक पंक्ति के माध्यम से वे बोलते हैं कि,”दीपक बाड़ा नाम का महल भया उजियार..” अर्थात नाम रूपी दीपक को शरीर रूपी महल में जलाया है,तो वह कभी भी बुझने न पावे।

ये भी जान लीजिएगा कलयुग में इस “मानव देह” को केवल निरंतर नाम जप के द्वारा ही निष्पाप किया जा सकता है। दूसरा कोई उपाय है नहीं।

ये शास्त्रों में वर्णित है कि जब व्यक्ति के नाम जप का संख्याबल एक करोड़ तक पहुंचता है, तो तन स्थान की शुद्धि होकर मनुष्य पूरी तरह निष्पाप हो जाता है।

श्री प्रेमानंद जी एक पद गाते हैं..

“एक कोटि “जप” से होती है.. तन स्थान की शुद्धि। रज,तम होते अस्त.. हस्तगत होती संत विशुद्धि।।

रोगों के सब बीज नष्ट हो जाते हैं तत्काल। और कल्पना के प्रवाह में आती बाढ़ विशाल।।

सपने में सब देव बंधु और संत आप ही आते। आ आ कर दर्शन दे जाते..करते वार्तालाप।।

शेष कहें मन में लेकर ऐसे अनुभव के भाव। आगे आगे साधन पथ पर चलो बढ़ाते पांव।।”

सांसारिक विडंबना देखिए! इस मार्ग पर कोई गृहस्थ,तो हजारों में से एक ही चल पाता है।

ऐसा कहा जाता है कि,अधिकतर के पैर तो शुरू में ही लड़खड़ाकर दुनियां के प्रपंच के आगे धराशाई हो जाते हैं।

विरक्त जन तो जप ही करते हैं यदि कोई गृहस्थ जन भी नाम जप की संख्याबल के मार्ग पर चल पड़े.. तो एक करोड़ नाम जप के प्रथम पड़ाव पर पहुंचते ही..

“शरीर निष्पाप हो जाता है। साथ ही उसके रजो और तमोगुण दोनों का भी नाश हो जाता है। और फिर बचता है सिर्फ “सतोगुण” जो मनुष्य के निरंतर नाम जप में और अधिक सहायक होता है। शरीर में नए रोग आदि के सारे बीज स्वत: ही नष्ट हो जाते हैं।

यदि किसी पूर्व जन्म के कर्म आदि संस्कार के कारण कोई असाध्य रोग हो भी गया हो, तो उसे सहने की सामर्थ्य भी आ जाती है।

एक करोड़ की संख्याबल वाले साधक या नाम जापक को स्वप्न में बड़े बड़े ऋषिमुनी,संत और देवता आदि का सानिध्य मिलने लग जाता है। फिर ऐसा व्यक्ति अपने आपको प्रतिपल उन्हीं शुद्ध आत्माओं के बीच अनुभव करता है। इसलिए वह सदैव आनंदित रहता है।

जब किसी मनुष्य को नाम जप का संख्याबल एक करोड़ पहुंचने पर ऐसे अनुभव होने लगेंगे,तो जाहिर सी बात है उसका निरंतर नाम जप और प्रगाढ़ होने लग जायेगा।

फिर लोग बड़े उत्सुक होकर.. महाराज जी से पूछते हैं कि, दूसरे पड़ाव “दो करोड़ नाम जप..” का संख्याबल होने पर साधक की स्थिति कैसी हो जाती है..?? गुरुदेव..

तब श्री गुरुदेव फिर पद्य के माध्यम से बताते हैं कि,

” दो करोड़ जब हो जाता है..जप का उपसंख्यान। दोष रहित अत्यंत शुद्ध हो जाता,धन का स्थान।।

निर्धनता की पीड़ा से मिल जाता है निस्तांत। साधक के हित हो जाता है,सुखमय सब संसार।।

दैन्य, दुःख से देशांतर में रहते जो अन्यत्र। शीघ्र लौटकर वे निज घर में हो जाते एकत्र।।

सभी उपद्रव हो जाते हैं शांत। होती रहती है कुटुम्ब में सुख की वृद्धि नितांत।।

शेष कहें मन में लेकर ऐसे अनुभव के भाव..। आगे आगे अधिक वेग से चलो बढ़ाते पांव।। “

दो करोड़ नाम जापक या साधक को धन अभाव की पीड़ा अब कभी नहीं सताती। सब कुछ उसके अनुकूल स्वत: ही होने लग जाता है।

दरअसल, इस अवस्था तक आते आते व्यक्ति के अंतर्मन में धन के प्रति कोई चाह रह भी नहीं जाती होगी..इसलिए चाह नहीं,तो फिर अभाव कैसा..??

नाम जापक की दरिद्रता के सारे उपद्रव लगभग नष्ट हो जाते हैं। जीवन के सारे वैभव उसे स्वत: ही घेरने लगते हैं। जिस प्रकार समुद्र की कोई चाह न होते हुए भी सारी नदियां उसमें स्वयं समाती चली जाती हैं। ठीक वैसे ही।

इसी तरह जब नाम जापक के तीन करोड़ नाम जप होने पर .

“पहले जो अप्रतीत होते थे कार्य अतीव असाध्य।

वे सबके सब हो जाते हैं शीघ्र सहज ही साध्य।। “

तीन करोड़ नाम जप करने वाले का हिरदय पवित्र हो जाता है, जो असाध्य काम व मोह को नहीं छोड़ पा रहे थे, वे इस पड़ाव पर पहुंचते ही स्वतः सहजता से छूटने लग जाते हैं।

दरअसल इस संख्याबल से व्यक्ति की सभी चाहतें स्वयं पूरी होने लग जाती हैं। सब लोग उसे ऐसे प्यार करने लग जाते हैं जैसे सगे भाई आपस में करते हैं। तीन करोड़ नाम जप रूपी धन ऐसी विशिष्टता प्रदान करता है।

शेष कहें मन में लेकर ऐसे अनुभव के भाव.. आगे आगे अधिक वेग से चलो बढ़ाते पांव।

सुख स्थान जो व्यक्ति का ह्रदय को माना जाता है अब चार करोड़ नाम जप से उसमें भगवदानंद का स्फूरन होने लग जाता है।

मान,अपमान, हानि,लाभ,रोग और शोक जो भी द्वंद हैं उनका प्रभाव अब ऐसे जापक के हिरदय पर नहीं पड़ता।

ऐसे व्यक्ति को “नित्य स्वरूप” का बोध हो जाता है। “प्राणी को नित्य बोध का सुख मिलता भरपूर।कायिक,वाचिक, मानसिक सब दुःख हो जाते दूर।।”

“पांच करोड़ पूर्ण हो जाता जब “जप” का मान।परम शुद्ध होता है तत्क्षण उसका विद्या स्थान।।”

पांच करोड़ नाम जापक के मुख से वेदांत,शास्त्रों में जो लिखा है वह उचित वक्त पर स्वत: ही उसकी वाणी से निकलने लगता है। चाहे कभी अध्ययन किया हो या नहीं।

छह करोड़ नाम जप के पड़ाव पर पहुंचते ही रिपु स्थान के सारे कष्टों से वह बरी हो जाता है..जो छह शत्रु बताए गए है..काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद,मत्सर इन सब पर वह विजय पा लेता है। अब उसे स्वप्न में देव देवांतर,महापुरुषों से ऐसे वार्ता होने लगती है जैसे वे उसके साथ प्रकट में बैठे हों।

सात करोड़ नामों के जप का जब पूर्ण होता विधान।अब उसे भारी से भारी प्रतिकूलता या अनुकूलता कोई भी स्थिति उसे भगवन नाम से विलग नहीं कर सकती।

“आठ करोड़ नाम जप से शुद्ध होता है मृत्यु स्थान। बाधा दूर अकाल मृत्यु की, होती आयु महान।। पूर्ण आयु पाकर साधक हो, साधन में लीन। आत्मराज्य के सिंहासन पर हो जाता आसीन।।”

Note:-

इस पड़ाव पर आते आते साधक की स्थिति लगभग “परमात्म स्वरूप” हो जाती है। जैसे परम संत श्री राधाबाबा,श्री महावीर पौद्दार,श्री भाई जी महाराज, कर्माबाई, नामदेव और हम सबके श्रद्धेय गुरुदेव भगवान श्री प्रेमानंद जी। आज शायद इन पड़ावों से ऊपर हैं।

हालांकि,शास्त्रों में संख्याबल के पड़ाव तेरह करोड़ तक वर्णित हैं। लेकिन आठ करोड़ नाम जप के बाद साधक में “चेतना शक्ति” जाग्रत हो जाने से उसके अंदर किसी तरह का लाभ प्राप्त करने की आकांक्षा पूरी तरह नष्ट हो जाती है।

आगे.. ऐसे साधकों का नाम जप,तो निरंतर ही चलता रहता है। क्योंकि इस पड़ाव तक पहुंचते पहुंचते “जप करना” अब उनका स्वभाव बन जाता है।

वैसे आगे के पड़ाव सिर्फ औपचारिक बतौर ही रह जाते हैं जैसे; नौ करोड़ पर “धर्म स्थान” की शुद्धि हो जाने से साधक के देवताओं के साथ सगुण रूप में साक्षात्कार होने लग जाते हैं।

दस करोड़ पर “कर्म स्थान” की परम शुद्धि हो जाने से व्यक्ति के सारे पूर्व संचित कर्म नष्ट हो जाते हैं। नवीन क्रियमान भस्म हो जाने से साधक में अब अपने प्रारब्ध को भोगने की सामर्थ्य भी आ जाती है।

ऐसा साधक मानो अब परम मोक्ष की ओर चल पड़ा है। यहां आकर भगवत साक्षात्कार तो उसके लिए बहुत सामान्य सी बात हो जाती है। इसलिए वह प्रतिपल बहुत आनंदित रहने लगता है क्योंकि वह जन्म जन्मांतर के सारे झमेलों से दूर हो चुका होता है। साधकों का नाम जप तो सदैव निरंतर चलता रहता है। चाहे वे किसी भी पड़ाव पर क्यों न हों। आगे का.. शेष व्रतांत फिर कभी..धन्यवाद

संत श्री प्रेमानंद जी के मुखारविंद से..

केलि कुंज,वृंदावन