41- “धर्म-कर्म”

किसी अल्पज्ञ ने कहा धर्म छुट्टी पर है…

जबकि आप भी अच्छी तरह जानते हैं, कि “धर्म” दुनियाँ के लिए वैसा ही अनवरत चलने वाला “कर्म” है जैसा किसी भी “जीवन” के लिए “हिर्दय” का धड़कना। अगर धर्म छुट्टी पर चला जायेगा, तो उसी वक़्त व्यक्ति, समाज, देश और सम्पूर्ण कायनात पूरी तरह खत्म हो जाएगी, ठीक वैसे ही जैसे हिर्दय गति रुकने से किसी भी “जीव” की जीवन लीला समाप्त हो जाती है।

जब अपनी “वैज्ञानिक-उपलब्धियों” पर इतरा कर स्वयं को ब्रह्माण्ड का नीति-नियंता समझने वाले लोग एक नन्हे विषाणु से पराजित हो जाँय, तो “धर्म” किसी कोने में चुपके से मुस्कुराये नहीं तो क्या करे..?
जब भौतिकता की चकाचौंध में मनुष्य के बड़े-बड़े दावों के बाबजूद नाक के नीचे स्थितियां इतनी विकट हो जाँय कि संक्रमण के भय से पिता अपने पुत्र का शव लेने तक को तैयार न हो….(अमेरिका), तो ये विज्ञान के आगे विकट परिस्थिति नहीं है तो क्या है…? ये “धर्म-कर्म ” की ही सामर्थ्य हैं, जो अपनी जान की भी परवाह किये बगैर मेडिकल टीम, पुलिस फोर्स और अन्य इंसानियत के सच्चे-फ़रिश्ते दिन रात अपनी सेवाएं दे कर “धर्म-कर्म” में जुटे है।
वे लोग, जिन्हें लगता है कि पृथ्वी पर विज्ञान पहली बार इतना सशक्त या अशक्त हुआ है, तो मेरा ऐसा मानना है कि वे अभी भावुक हैं तार्किक नहीं। इतिहास से पूछिये अरबों वर्ष पुरानी पृथ्वी पर मानव-सभ्यता का इतिहास लाखों वर्ष पुराना है। इन लाखों वर्षों में ऐसे मंज़र कई बार आंखों के सामने से गुजरे.. होंगे। असँख्य बार सभ्यताएँ उपजीं और विकास के चरम पर पहुँची हैं, विज्ञान ने कई बार अंतिम ऊंचाई को स्पर्श किया है, और फिर सभ्यताएँ समाप्त भी हुई हैं।आप ये क्यों भुल जाते हैं कि “परिवर्तन” दुनियाँ का नियम है। चाहे व्यक्ति, परिवार, समाज, देश या फिर दुनियाँ इनमें कोई भी क्यों न हो..सदैव से “हर उत्थान का अंतिम पड़ाव पतन होता है”,(यदि समय रहते स्थितियों को न सम्भाला जाये, तो..) और पुनः हर पतन का अगला पड़ाव फिर उत्थान भी होता है….यही ‘जीवन चक्र’ है।”
वैज्ञानिक-उत्थान के मद में चूर हो कर अपने मानव-धर्म को भूल चुकी सभ्यताएँ जब प्रकृति के साथ अत्याचार करती हैं, तो उनका विकास ही उन्हें मार डालता है। फिर वही “धर्म-कर्म ” इन अल्पज्ञों को पुनर्जन्म देकर एक और अवसर देता है। नई आशाएं जगाता है। व्यक्ति हो या कोई सभ्यता, पराजय के बाद उसे सदैव धर्म की गोद में ही शरण मिली है और आगे भी मिलती रहेगी। ये ही शाश्वत है।
असल दिक्कत यह है कि हमने अल्पज्ञता के कारण सम्प्रदायों को ही धर्म मानना शुरू कर दिया। आपस में दीवारें खड़ी कर ली। अपनी तसल्ली के लिए …
बहुत पीछे नहीं, सिर्फ। पाँच हजार वर्ष पुराने इतिहास के पन्नों को उलटिये, “सिन्धु से लेकर नील तक”, “दजला-फ़रात से लेकर दक्षिणी समुद्र तक”, हर सभ्यता का अपना एक धर्म था। उस वक्त सब प्रकृति की ओर निहारते थे, और प्रकृति को ही पूजते थे। ऊर्जा देने वाले सूर्य, जल देने वाले वरुण, वायु के देवता पवन, अलग अलग नामों से जरूर थे, मग़र सभी लोग इनके शुक्रगुज़ार रहते थे। क्योंकि ये दाता हैं, प्रकृति रूपी “भगवान” में सबका विश्वास था। लोग हर पल प्रकृति की गोद में रहते थे। आज के इंसान की तरह उससे दूर… नहीं भागते थे।
फिर मनुष्य शक्तिशाली हुआ, और उसने व्यवस्था के ‘केंद्र’ में से “प्रकृति” को हटा कर “स्वयं” को स्थापित करने की नाकाम कोशिश की। बुद्ध आये, महाबीर आये, जीजस आये, दुनियाँ में कई एक मतावलमवियों का प्रादुर्भाव हुआ.. सबने अपनी-अपनी व्याख्याएं दी, सिद्धान्त प्रतिपादित किये। जिससे लोगों के वर्ताव में भी कुछ फ़र्क आया इसी बीच.. भौतिकता ने भी अपने पांव पसारने शुरू कर दिए, समय को पहचानते हुए व्यवस्था के केंद्र से “प्रकृति” नियति की मनसा समझ ख़ुद-व-ख़ुद धीरे-धीरे सिमटती चली गई… अब मौका पाते ही “व्यक्ति-विशेष” तुरन्त प्रभुत्व में आ गया। अपनी ही पूजा कराने की एक होड़ सी मच गई और असली भटकाव तो तब हुआ जब लोगों ने व्यक्तियों द्वारा अपनी सुविधानुसार चलाये गए सम्प्रदाय को ही “धर्म” कहना शुरू कर दिया। फिर भटके हुए लोगों ने अपनी प्रतिष्ठाए दांव पर लगी समझ.. “किसके बाड़े में कितनी भेड़” वाली मानसिकता से एक दूसरे धर्म/सम्प्रदायों को छोटा बड़ा कहना शुरू कर दिया..सीदे-सादे नागरिकों को अपनी -ओर खींचने की प्रथा शुरू हुई जिसे धर्मान्तरण का नाम दिया गया जो आज वर्तमान में खूब ज़ोरों पर है। स्थिति दिन प्रतिदिन परिस्थिति बनती गयी..ये सब देख कर वास्तव में जो शाश्वत “धर्म-कर्म” है। जो पूर्ण प्राकृतिक है, वह किसी कोने में चुपके से फिर मुस्कुराता रहा है।

क्योंकि उसे पता है। कि अंत में सबको अपनी “सनातन-संस्कृति” जहां से धर्म की पैदाइस है, निःसन्देह देर-सबेर सबको उसी के पास लौटना है।
फिर भी अन्य देशों की तुलना में भारत इस मामले में तनिक अलग है। सनातन-संस्कृति की गोद से भले ही असंख्य धर्म/ सम्प्रदाय निकले हैं, वरन उनका प्राकृतिक-धर्म से नाता नहीं टूटा है। क्योंकि यहां अभी भौतिक एवं आध्यात्मिक के बीच का संश्लेषण सन्तुलन में है, अच्छा है.., ख़ुशी की बात है। प्रकृति से अभी बहुत दूरी नहीं बनी है। क्योंकि “सनातन” सारे सम्प्रदायों को अपनी गोद में रख कर सदैव प्रकृति का हाथ पकड़े रहा है….
धर्म कभी कहीं नहीं गया। धर्म नहीं होता तो चिकित्सक अपने प्राणों को संकट में डाल कर रोगियों का उपचार नहीं कर रहे होते। पुलिस कर्मी यों अपनी जान जोख़िम मौत के जमात में घुस कर रोगियों को होस्पिटल तक नहीं पहुंचा रहे होते, धर्म नहीं होता तो भारत के हजारों लाखों समाज सेवी स्वयं आगे बढ़ कर रोज़ाना लाखों अपने भूखे भाई-बहनों के लिए यूं लंगर नहीं चला रहे होते। आप ही बताओ क्या वो धर्म/जाति पूछ कर सेवा दे रहें है..? धर्म अपने बजूद में है, तभी मनुष्य “कोरोना” (Covid-19) जैसी माहमारी से लड़ पा रहा है।
और जब “धर्म” ड्यूटी कर रहा है, तो अधर्म कितना भी राह में रोड़ा अटकाए, “धर्म” कोरोना को पराजित कर के ही दम लेगा। हमारी चेतना पर प्रकृति द्वारा जड़ दिए गए तालों में ही एक दिन जीवन मुस्कुराएगा, धर्म मुस्कुराएगा। क्योंकि अंत में जीत…..
सत्य_की ही होती है जो सत्य है वहीं सनातन है एवं शाश्वत है। “Stay-Home & be Safe” धन्यवाद

विचारक ; युग पचहरा
जन्मभूमि ; श्री साहब सिंह सदन,नीमगाँव,राया,मथुरा।,

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