44- “दायित्व-बोध”…

सामान्य तौर पर “दायित्व-बोध” की समझ थोड़ा बहुत तो दुनियाँ के हर जीव को होती ही है। और होनी भी चाहिए।

मग़र एक शिक्षक होने के नाते, इस विषय में मेरी अपनी कुछ अलग मान्यतायें हैं,क्योंकि, भारत में जो “दायित्व” एक शिक्षक का है, मेरे ख्याल से अन्य की तुलना में वो सर्वोपरि है। या ऐसे समझो कि प्रत्येक जीवधारी की “जीविका” को सुव्यवस्थित करने का “श्रीगणेश” प्रथम गुरु कही जाने वाली “माँ” के “दायित्व” से आरंभ होता हुआ, स्कूली शिक्षक और फिर सद्गुरु तक का लम्बा सफर तय करता है। इसीलिए “एक-शिक्षक” ही है। जो देश के लिए बलिष्ठ एवं सुयोग्य “नागरिक” तैयार करता है।

प्राचीन काल में शिक्षकों को हर-पल अपने “दायित्व” के प्रति पूर्ण समर्पित देख ..समाज की कुछ पारखी नज़रों ने निष्पक्ष भाव से उसकी अपने कर्त्तव्य के प्रति पूर्णनिष्ठा को परिभाषित करते हुए हौसला-अफ़जाई में “राष्ट्र-निर्माता” या “नेशन-बिल्डर” कह कर पुकारा गया। जो आज तक प्रचलन में हैं। मांफ कीजियेगा जबकि दिन प्रतिदिन सरकार द्वारा शिक्षा का व्यवसायीकरण करने से आज शिक्षको को महज़ एक टीचर वाली मानसिकता से ट्रीट किया जाने लगा है।उसकी “शिक्षण-कला” को सिर्फ एक “कार्य” के रूप में देखा जा रहा है। जैसे मजदूर को मनमर्जी जिस जगह लगा देते हैं वैसे ही उसे भी कहीं भी किसी भी कुछ भी करने के लिए लगा दिया जा रहा है। जो सरासर ग़लत है मग़र कई दशकों से हो रहा है। सरकारी तंत्र के लिए “शिक्षक सर्फ एक नौकर बनके रह गया है। ऐसी मानसिकता राष्ट्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।

शिक्षक को अपने विद्यार्थी के प्रति विश्वास रखना, उसके प्रति आदर-भाव रखना, विशेषतः अपने विद्यार्थी के ह्रदय में जगह बना के शिक्षा देना, प्रतिक्षण उसके सर्वांगीण विकास के बारे में सोचना ही विद्यार्थी के “जीवन में मिली सफलता ” को सार्थक सिद्ध करता है।
किसी भी राष्ट्र का …
1-आर्थिक,
2-सामाजिक,
और

3-सांस्कृतिक विकास
उस देश की शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है। यूं तो शिक्षा के अनेकों आयाम हैं जो देश के विकास में शिक्षा के महत्व को दर्शाते हैं,
मग़र वास्तव में शिक्षा का अर्थ है… “ज्ञान”अर्जित करके उसे अपने जीवन में क्रियान्वित करना। अर्थात नॉलेज को विजडम में तब्दील होने तक।

क्योंकि इतिहास साक्षी है कि, संस्कार रहित “ज्ञान का भंडार” भी किसी काम का नहीं होता। वो व्यक्ति को कभी भी पथभृष्ट कर सकता है।
विद्यार्थी ज्ञान का आकांक्षी है,
और उसे इस ज्ञान को संस्कारों सहित उपलब्ध कराने का “दायित्व” है, एक “शिक्षक” का। वशर्ते उसे शिक्षक के चोला में रहने दिया जाय,तो…
ध्यान दीजिए ये तीन महत्वपूर्ण इकाई हैं;–
1- विद्यार्थी,
2- शिक्षक एवं
3- प्रबंधक।
ये तीनो एक दूसरे पर निर्भर हैं एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं। पिछले कुछ दशकों से यहां शिक्षा व्यवस्था को संचालित करने वाली “प्रबंधन-इकाई” को राज्य या केंद्र स्तरीय “प्रशासन” के हस्तक्षेप ने उपर्युक्त वर्णित इन तीनों के विशुद्ध संश्लेषण को आज लगभग “प्रभाव-हीन” ही कर दिया है। जिससे “शिक्षा” का व्यवसायीकरण निरन्तर होता ही चला जा रहा है।
इसीलिए “शिक्षक” एवं “गुरु” शब्द में स्वतः ही भिन्नता आ गयी है, एक और अहम बात आज अधिकतर संस्थानों में “जिम्मेदार-पदों” पर आसीन व्यक्ति अपने पद के प्रति गम्भीर नज़र नहीं आते।
मैं, अक्सर देखता हूँ कि उनका खुद का “होम-वर्क” पद के अनुरूप कभी भी पूरा नहीं होता…, हर तरफ “शोइंग ऑफ नेचर” पत्रकारों के जैसी सबूत जुटाते रहने की सी फ़ितरत ,अपने अधीनस्थों के साथ धमकी भरी भाषा में बात करने का तरीका ये सब उनका पद के “अनुरूप-गरिमा” न होने को ही दर्शाता है। जिससे संस्था में अनुशासन या अन्य व्यवस्थाएं भी दिन प्रतिदिन ध्वस्त होती चली जा रहीं है। जो किसी भी संस्था की रीढ़ होती हैं। और फिर दुहाई दें पूर्व में स्थापित किये गए आदर्शो व मानकों आदि की तो उसका क्या औचित्य है। वो व्यवस्थापक अलग थे। (शिक्षा सहकर्मी/ लिपिक/शिक्षक/प्रधानाचार्य/प्रबन्ध-तंत्र) इसलिए उनके परिणाम भी अलग थे।
दूसरी अहम बात यदि जिम्मेदार व्यक्ति किंकर्तव्यविमूढ़ होकर प्रमुख से इतर कई अन्यों में जिम्मेदारी को बाँटने की भूल करता है , तो स्थिति और भी भयावय होती चली जाती है। इसे मैं श्रेष्ठ कवि रहीमदास जी के एक दोहा के माध्यम से स्पष्ट करना चाहूंगा।

“एकै सादे सब सदे, सब सादे सब जाई।
रहिमन मूलहिं सींचिये,फूलहिं फ़लहिं अघाहि।

किसी कुपोषण के शिकार वृक्ष के मूल (जड़) पर हम ध्यान न देकर उसकी शाखाओं का वाह्य ट्रीटमेन्ट करते रहेंगे और फिर मीठे फलों की आशा करेंगे, तो दोष उस वृक्ष का है या ट्रीटमेन्ट निर्णायक का…?
ये बात अपनी जगह सही है कि, राष्ट्रीय “शिक्षा-नीति” को लेकर देश में समय समय पर बहस होती रही हैं। परिणाम सदैव वही “ढाक के तीन पात” ही रहता है। क्योंकि हम तुष्टीकरण की नीति के चलते अभी तक 1847 की अंग्रेजों वाली शिक्षा-प्रणाली को ही ढो रहे हैं, जो पूर्ण भौतिकवाद सिखाती है, स्वामी विवेकानंद जी ने तो अपने एक लेख में “भारतीय शिक्षा प्रणाली” के सन्दर्भ में कहा था, ” इंडियन एजुकेशन सिस्टम इज कम्प्लीटली-रोंग” फिर बच्चों से ये कहते हो भाई! जीवन में अध्यात्म से चलो। मग़र चलें..भी तो कैसे.. ? देश का युवा भारतीय “शिक्षा-प्रणाली” व “असल-जीवन” के बीच इस “अन्तरभेद” में हिचकोले खा रहा है। भारत में बच्चे को शुरू से ही ऐसा वातावरण दिया जाता है कि वह स्कूल में एक “रट्टू-तोता” और आगे कॉलेज व विश्वविद्यालय में आते-आते घर परिवार के लिए महज़ एक कमाऊ मशीन बनना ही उसके जीवन का धेय बनके रह जाता है। और फिर स्ट्रेस,टेंशन और डिप्रेसन आदि के बाद उनके वर्ताव में चिड़चिड़ापन नहीं होगा तो क्या होगा..?
दूसरी तरफ कुछ जो इस मिथक को समझ कर अपनी संवेदनाओं,अपने पैशन आदि को तरज़ीह देते हुए इस बहुमूल्य जीवन को कायदे से जी…ना चाहते हैं, तो घर-परिवार , समाज व देश में उनके अनुकूल वातावरण ही उपलब्ध नहीं। जो उन्हें उनके “कार्य-क्षेत्र” में आगे बढ़ने के अवसर प्रदान कर सके। ये उन युवाओं में दोष है या देश की व्यवस्थाओं में..? इस पर विचार न करते हुए..अधिकतर माता-पिता उनमें छिपी प्रतिभा को इंगित कर प्रोत्साहित करने के बजाय उन्हें कोषना शुरू कर देते हैं जो एकदम ग़लत है।
जनाव, देश में लागू.. “रोंग-एजुकेशन-सिस्टम” में वो अपने आपको फिट नहीं कर सके..तो दोष उनमें नहीं हमारी व्यवस्था में है। भटकाव युवाओं में नहीं देश के शीर्षस्थ नीति-निर्धारकों में है। बहुत बड़े स्तर पर है। देश में आज नहीं पिछले छह-सात दशकों से “शिक्षा एवं खेल-जगत” के क्षेत्र में अमूल-चूल परिवर्तन की महती आवश्यकता महसूस की जाती रही है।मग़र…
शिक्षा समिति ने कभी किसी पाठ्यक्रम में से दो पुस्तक घटा दी या चार बढ़ा दीं या फिर कोई एक/ दो अध्याय जोड़ दिया या कम कर दिया। बस ..सत्ता में बैठे मौका परस्तों ने सदैव से भारतीय “शिक्षा-प्रणाली” के साथ सिर्फ यही खेला है। कितनी सरकारें आयी.. और गयीं…अफ़सोस शिक्षा-प्रणाली को गम्भीरता से कभी किसी ने लिया ही नहीं। प्रतिवर्ष पुस्तकों में अदला-बदली करके उल्टे छात्रों के माता-पिता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ और बढ़ाते रहे हैं। आपको याद होगा,पहले पुरानी पुस्तकों से एक परिवार के लगभग सभी बच्चे पढ़ लिया करते थे। विदेशों में ये व्यवस्था आज भी है।
एक बात और अन्य देशों में तो पुरानी पुस्तकों के मूल्य में 20℅ कम करके वापस ले लेते हैं। और अगली कक्षा की न्यू बुक्स दे देते हैं। मग़र मै फिर वही दुहराऊंगा कि भारत में तो व्यवसायिकता की आंच ने मनुष्य की मानवीय संवेदनाओं को बुरी तरह ध्वस्त कर दिया है।
औऱ विडम्बना तो देखिए ..अनादिकाल से कहा जाने वाला हमारा भाग्य-विधाता “शिक्षक” भारतीय समाज में व्याप्त इस भयावह स्थिति को निरीह और असहाय प्राणी की तरह मूकदर्शक की भांति देखने को विवश है। हाँ कभी-कभी अपने मन का गुवार कुछ इस तरह बयां करता है कि,
“दर्द सहने की इस कदर आदत सी हो गयी है, दर्द होता..है, मग़र हो…ता नहीं है।”
दुर्भाग्य से भारत देश में सर्वाधिक प्रतिष्ठित और आदर प्राप्त “शिक्षक” की हालत “शिक्षा में प्रशासनिक हस्तक्षेप” होने से अत्यधिक दयनीय और जर्जर हो गयी है।
अधिकतर शिक्षक से उसका शिक्षण कार्य छुड़वाकर अन्य ऐसी गतिविधियों में लगा दिया जाता है, जिसे थोड़े कम पढे-लिखे व्यक्ति या किसी मजदूर से भी कराया जा सकता है। अगर उस वक़्त शिक्षक के अंदर का “शिक्षकत्व” (उसका-ज़मीर) उसे ऐसा करने से रोकता भी है, अपने विद्यार्थियों से सम्बंधित “दायित्व” निर्वहन की बात रखता है, तो ऐसी प्रतिक्रियाओ को प्रधानाचार्य व प्रबंधतंत्र या सरकारी तंत्र द्वारा स्वयं का विरोध समझ लिया जाता है।
यहां मैं एक बात और स्पष्ट कर देता हूँ।जो आंकड़े कहते हैं कि देश में शिक्षक दो प्रकार के ही है ;
1-एक तो वे जो शिक्षण-कार्य को बड़ी तल्लीनता से करते हैं। जो बाई-चॉइस शिक्षक हैं। ये वो हैं जो हर दशा में शिक्षा के प्रति पूर्ण समर्पित रहते हैं।
2-दूसरे वे जो शिक्षण-कार्य के लिए बने ही नहीं, उन्हें करना तो कुछ और ही था, लेकिन शिक्षा विभाग में भ्र्ष्टाचार का बोलबाला होने से चेक/जैक के खेल ने “बाई-चांस” उन्हें एक सरकारी नौकर बना कर छात्रों के जीवन के साथ खिलवाड़ करने को तैनात कर दिया है। जिसका खामियाजा छात्र, उसका परिवार, समाज और फिर समूचा राष्ट्र भुगतता है। जो सभी के लिए
चिंता का विषय हैं।

अतः गेट न.2 से एंट्री पाने वाले सभी विभागों के सैलरी-पेड लोगों को मेरी व्यक्तिगत सलाह है कि नौकरी आपने चाहे जिस रास्ते से पाई हो मगर कम से कम अब आपको अपना कार्य पूर्ण-निष्ठा से ही करना चाहिए। ये “दायित्व-बोध” हर स्तर के व्यक्ति को अवश्य होना ही चाहिये। तो निश्चित है समस्याएं काफ़ी हद तक लगभग खत्म हो जाएंगी। धन्यवाद।
; युग पचहरा (नीमगाँव, मथुरा)
के.एल.जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस
8006943731

2 thoughts on “44- “दायित्व-बोध”…”

  1. Be powerful not to others but to conquer yourself..

    Aaj Kal haar gaar mai dekha jaye too .
    Sahbii Kai mata pita or anya pariwar
    Janoo koo shirf aek student Koo
    Ok Kai mark Kai oper judge Kiya
    Jata hai par yai sachaii nhii
    Education kaa matal hai
    Knowledge , increase mind power
    Or eak chij par concentrate Kar
    Naaa ..
    Yhaa sabsai bada reason haii
    Kii bhii country safal bana
    Kaaaa ..
    Very very thanku .

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