45- “अहंकार” की कोई कीमत नहीं होती…”

वाक़ई “अहंकार” की कोई कीमत नहीं होती…। आइए, इसे एक ऐतिहासिक कहानी के जरिये जानने का प्रयास करते है..
गांव में एक भिक्षु आया करता था। एक दिन अशोक उठा.. और उस भिक्षु के चरणों में सिर रख दिया। सम्राट अशोक के राज्य का जो वरिष्ठ वजीर था, उसे सम्राट का ये वर्ताव विल्कुल भी अच्छा नहीं लगा।
“अशोक जैसा सम्राट गांव में भीख मांगते किसी भिखारी के पैरों पर सिर रखे,”
महल लौटते ही उसने कहा कि नहीं सम्राट, यह मुझे ठीक नहीं लगा। आप जैसा सम्राट, जिसकी कीर्ति शायद सम्पूर्ण जगत में कभी कोई सम्राट नहीं छू सकेगा फिर, वह एक साधारण से भिखारी के चरणों पर सिर रखे !ये कौन सा तरीका है।

अशोक हंसा और चुप रह गया। दो महीने बीत जाने पर उसने बड़े वजीर को बुलाया और कहा कि चलो एक काम करते है। एक प्रयोग करके देखते हैं, तुम ये कुछ सामान ले जाओ और गांव में बेच कर आ जाओ। सामान बड़ा अजीब था।
उसमें बकरी का सिर था, गाय का सिर था, आदमी का सिर था, कई जानवरों के सिर थे।

वह वजीर बेचने गया। गाय का सिर भी बिक गया और घोड़े का सिर भी बिक गया, यानि धीरे-धीरे सारे सिर बिक गये, सिवाय आदमी के। मनुष्य का सिर कोई लेने को तैयार नहीं हुआ। लोग कहने लगे इस गंदगी को लेकर कोई क्या करेगा? इसका क्या औचित्य..?आखिर वह वापस लौट आया और कहने लगा कि महाराज! बड़े आश्चर्य की बात है, सब सिर बिक गए हैं, सिर्फ आदमी का सिर नहीं बिक सका। इसे तो कोई लेने को तैयार ही नहीं है।

सम्राट ने कहा कि मुफ्त में दे आओ। वह वजीर वापस गया और कई लोगों के घर जा जा कर पुनः आग्रह किया कि चलो मुफ्त में दे रहे हैं इसे , आप रख लें। उन्होंने कहा पागल हो गए हो! अभी फिंकवाने की मेहनत कौन करेगा? आप ले जाइए। वह वजीर वापस लौट आया और सम्राट से कहने लगा कि नहीं, कोई मुफ्त में भी नहीं लेता।

अशोक ने कहा कि अब मैं तुमसे यह पूछता हूं कि अगर मैं मर जाऊं और तुम मेरे सिर को बाजार में बेचने जाओ तो कोई फर्क पड़ेगा क्या ? वह वजीर थोड़ा डरा और उसने कहा कि, मैं कैसे कहूं महाराज…हाँ, क्षमा करें तो कहूं। हाँ कहो भई ..
गुस्ताख़ी मांफ हुजूर, आपके सिर को भी कोई नहीं लेगा। क्योंकि सिर तो सिर है, उसमें महाराज या सामान्य नागरिक के सिर से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। लेकिन है तो वो “मनुष्य का” ही। आज मुझे पहली दफा पता चला कि आदमी के सिर की कोई कीमत नहीं होती।

सम्राट अशोक ने कहा, ना.. ना असल बात ये है कि वह इंसान का सिर ही है जो अहंकार युक्त होता है। इसलिए इसकी की कोई कीमत नहीं होती। बताओ ! फिर इस बिना कीमत के सिर को अगर मैंने एक भिखारी के पैरों में रख दिया था तो क्यों तुम इतने परेशान हो गए थे,

आदमी के “सिर” की कीमत नहीं, अर्थात आदमी के अहंकार की कोई भी कीमत नहीं होती। आदमी में अगर भलाई ,सद्गुण सदाचार आदि हैं तो लोगों के जहन में उसकी बहुत इज्जत ,सम्मान है।
मग़र आदमी का सिर तो एक प्रतीक है आदमी के अहंकार का, ईगो का। और अहंकार की सारी चेष्टाएं सब कुछ अपने भीतर लाने की रहती हैं। जबकि भीतर कुछ भी नहीं जाता—न धन जाता है, न त्याग जाता है, न ज्ञान जाता है। कुछ भी भीतर नहीं जाता। सवाल बाहर से भीतर ले जाने का नहीं है…? बाहर से भीतर ले जाने की सारी चेष्टाएं खुद की आत्महत्या करने जैसी ही हैं क्योंकि “जीवन-धारा” सदा भीतर से बाहर की ओर बहती है।
सत्य तो ये है कि छोटा या बड़ा प्रत्येक जीव समान हैं। इसलिए मानव को भी सबके प्रति एकरूपता अर्थात समान भाव रखना चाहिए। जब कण-कण में ईश्वरीय तत्व होता है, तो फिर ऊंच-नीच का भाव क्यों..? धन्यवाद

; युग पचहरा नीमगाँव, मथुरा
जो प्राप्त है दरअसल वही “पर्याप्त” है!!”
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