ये मंज़र उस दौर का है जब कस्बा सासनी के प्रतिष्ठित शिक्षण-संस्थान “के.एल.जैन इंटर कॉलेज” में विदेशी भाषा “अंग्रेजी” पढ़ाने के लिए एक सरकारी शिक्षक के रूप में मेरी नियुक्ति हुई।
सत्र के अंत में सैलरी के रूप में पूरे वर्ष की “आय का विवरण” कॉलेज के ऑफिस से वार्षिक रूटीन के अंतर्गत सभी शिक्षक-साथियों के साथ-साथ मुझे भी मिला ..सच बता रहा हूँ ये सुनकर न जाने क्यों मुझे बहुत अटपटा लगा कि, अपनी कुल आमदनी पर “कर”..देना होता है ? मेरे अन्तर्मन ने कहा,
क्यों भई ‘कर’ तो हमारे ‘खर्चों’ पर होने चाहिए ताकि लोग अपने जीवन में फ़िजूल खर्ची न करें थोड़ा कैलकुलेशन से चलें।
मग़र ये देश में काफ़ी पुरानी चली आ रही परिपाटी है। तो मैं कौन होता हूँ , टैक्स न देने वाला..? बहुत पहले से तय सुदा माहौल व्यक्ति को सोचने का वक्त ही कहाँ देता है विल्कुल वैसे ही मै भी “लकीर के फकीर” वाले वातावरण में देश के अन्य नागरिकों की तरह समय से “आई.टी.आर”.दाखिल करने को अपना नौकरी-धर्म समझ कर भरने लगा। लेकिन मन में ये सवाल बार-बार कौंध रहा था।..
सवाल- आख़िर आमदनी पर “टैक्स” क्यों…?
परन्तु देश के प्रत्येक नागरिक को देश की नीतियों को फ़ॉलो करना ही होता है चाहे वो उचित हों या अनुचित..?
एक सामान्य सी बात है जब व्यक्ति का बस नहीं चलता है, तो या तो वो इतिहास में झांकता है या किसी अनुभवी व अपने वरिष्ठ लोगों से उस सम्बन्ध में डिसकस करता है। मेरा तो बचपन से स्वभाव भी कुछ ऐसा ही रहा है…
तो मैंने वही किया अपने “मन” की संतुष्टि के लिए वक़्त मिलते ही अपने कॉलेज की विशाल एवं शानदार लाइब्रेरी में गया, वहां इतिहास की पुस्तकों में “टैक्स-सम्बन्धी” प्राचीन पुस्तकों को खंगालना शुरू किया..
उन प्राचीन पुस्तकों में स्पष्ट लिखा था कि, राजा महाराजाओं के समय में ‘कर’ तो अवश्य लगाए जाते रहे थे, मग़र “आमदनी” पर एक भी राजा ने कभी कोई “कर” नहीं लगाया था। ये पढ़कर मेरे अन्तर्मन में एक बहुत ही सुखद अनुभूति हुई। मैने खाली पीरियड में लगातार कई दिन लाइब्रेरी में उन पुस्तकों का गहन अध्ययन करते वक़्त पाया कि मेरी ही विचारधारा से मिली-जुली सोच उस समय के व्यापारी-वर्ग के बारे में कई एक राजाओं की भी थी। इतिहास साक्षी है उन पुस्तकों में उस समय के नीति-नियंता ने भी ऐसे तर्क प्रस्तुत किये हैं, कि “कर” लोगों के असीमित ख़र्च करने की फ़ितरत पर हो, न कि उनकी कमाने की तरक्की पसन्द अच्छी आदत पर। कमाऊ नागरिक तो राष्ट्र के निर्माण में सदैव सहायक ही होते हैं.. उन पर “Tax” क्यों..?
आप ने चाणक्य का नाम तो अवश्य सुना ही होगा। एक समय संयोग से चाणक्य देश के प्रधानमंत्री बन गए। जैसे ही वो प्रधानमंत्री नियुक्त हुए…उन्होंने घोषणा की कि मेरे राज्य में “जनता-जनार्दन” पर कोई किसी भी प्रकार का टैक्स नहीं होगा। सारे टैक्स खत्म करने के
पीछे उनका तर्क था कि राजा पर “कर” के रूप में जब अधिक धन आता है तो उसमें “धन-लालसा” बढ़ती चली जाती है, जिससे वह देश का नेतृत्व करने वाले “निश्वार्थ सेवा भाव” जो उसका कर्तव्य होता है उसे भूल कर वह उसे अपना अधिकार, मान प्रतिष्ठा आदि से जोड़कर देखता है, जिससे वह “पथ-भ्रष्ट” होता चला जाता है। इसीलिये पद का दुरुपयोग होने लगता है।
चाणक्य ने ही जनता को कायदे से “जनता-जनार्दन” का दर्जा दिया। जिसके कि वो सदैव हकदार हैं। उसी के परिणामस्वरूप जनता की कमाई जनता पर रहने से उस समय देश में लोग सुखी होने के साथ-साथ धन धान्य से पूर्ण सम्पन्न रहते थे। और जरूरत मंदों ओर दान-पुण्य करके अपने कर्मों को सुधारते थे।ये वही वक्त था तब भारत को विदेशी लोग “सोने की चिड़िया” कह कर पुकारते थे। बाद में चाणक्य के रास्ते पर और भी कई अन्य राजा चले, जैसे; चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, चन्द्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त और हर्षवर्धन.. ऐसे लगभग बीसियों राजा थे। जिन्होंने चाणक्य की फिलोसोफी को अपनाते हुए जनता पर किसी भी प्रकार का “कर” नहीं लगाया था।
मांफ कीजियेगा लेख थोड़ा बढ़ा हो जाएगा वरना ऐतिहासिक परतें, तो और भी खोली जा सकती हैं ..
प्रश्न न01- भारतीयों की आमदनी पर टैक्स क्यों लगा..?
प्रश्न न0 2- भारतीयों पर ये टैक्स कब से लगाया गया है…?
ये दोनों ही सवाल एक दूसरे के पूरक हैं।
दरअसल “इंडियन इनकम टैक्स” अधिनियम 1960, जब ब्रिटिश संसद में पारित हुआ, तो इस पर अंग्रेज लीडर्स के बीच उस वक्त एक बड़ी बहस हुई। जिसका निष्कर्ष तो काफ़ी विस्तृत है मग़र संक्षिप्त में कहूँ, तो उनकी नीयत में खोट क्यों आया इसे आप एक छोटे से उदाहरण से समझिए.. भारत में उम्दा क्वालिटी की “मल-मल” (एक “प्रकार का मुलायम कपड़ा) तैयार की जाती थी। ऐसी कि एक मीटर “मलमल” को आप तह करके माचिस की डिब्बी में रख सकते थे। जिसकी दूसरे देशों में न केवल अच्छी खासी मांग थी , वल्कि वो तोल के भाव सेल होती थी। अर्थात कपड़े के बदले सोना एवं चाँदी। मिलता था। जिससे देश में भारी मात्रा में सोना-चाँदी न01 की कमाई के रूप में आया करता था। जब ये अंग्रेजों की जानकारी में आया, तो उनकी आँखें चौंदिया गयीं,
हालांकि अब चाणक्य के समय से जनता पर कोई टैक्स तो नहीं लगता था। लेकिन ये आपने भी किस्से कहानियों में सुना होगा कि हमारे देश के सम्पन्न लोग जिन्हें सम्मान से सेठ बोलते थे वे स्वतः अपनी इच्छा से गरीब जनता के लिए परोपकार की भावना से कुंआ,बाबरी,(तालाब) प्याऊ,धर्मशाला एवं निर्धनों की बेटियों की शादी आदि भले कार्य अपने अपने क्षेत्र में अक्सर कराते रहा करते थे। जिससे जनता में आपसी प्रेम एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण बना रहता था। आज की तरह कोई किसी की तरक्की से कुढ़ता नहीं था। उस वक्त के राजा ऐसे लोगों को मान-सम्मान दिया करते थे। यानि जनता में सम्पन्न वर्ग आज की तरह “और… और ” धन अर्जन की अंधी दौड़ में न पड़के वह अपनी आय का कुछ अंश स्वेच्छा से लोक-कल्याण के कार्यों अर्थात “देश-निर्माण” में सहायता करते थे।
मग़र देश में ये सुदृढ़ व्यवस्था फिरंगियों को नहीं भायी। उन्होंने भारत को कमजोर करने के उद्देश्य से 1960 से टैक्स की आड़ में लूटना शुरू कर दिया और लगभग 100 वर्ष में सोने की चिड़िया कहा जाने वाला देश भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया।
अंग्रेजों के मकड़ जाल से भारत को आजादी दिलाने वाले उन तमाम जांबाजों को योगेन्द्र सिंह पचहरा का कोटि कोटि नमन…है।
मग़र भाग्य की विडंबना आपके सामने आज भी है। जिसे हम सभी देशवासी पिछले “सत्तर-बहत्तर” वर्षों से लगातार देख रहे हैं कि हमारे अपने काले अंग्रेज कई मामलों में उनसे कहीं अधिक दुष्ट एवं भ्रष्ट साबित हो रहे हैं।
आज़ादी से पूर्व अंग्रेजों द्वारा जनता पर ..एक्साइज ड्यूटी,सेल्स टैक्स, ऑक्ट्रियो टैक्स (माल की एक जगह से दूसरी जगह लेजा कर बेचने पर) , इनकम टैक्स यानि लगभग 23 टैक्स लगते थे।
लेकिन आज़ादी के बाद आज भारत की जनता पचासों तरह के टैक्स भरकर भी सरकार के खौप के साये में जीती है। ये भी दिख रहा है कि टैक्स का पैसा नेता मनमाने तरीके से खर्च करते हैं।
अंग्रेज भारत से अपनी टैक्स नामक लूट के द्वारा सत्तर(70) हजार करोड़ रु. ब्रिटिश की बैंकों में यहां से ले जाकर प्रति वर्ष भरा करते थे। ये आंकड़े मेरे नहीं ब्रिटिश पार्लियामेंट के हैं।
15 अगस्त,1947 के बाद देश की सत्ता काले अंग्रेजों के हाथ में आ गयी। सोचा था टैक्स खत्म हो जाएंगे मग़र जनता से आज भी पचासों प्रकार के टैक्स मनमाने तरीके से वसूले जा रहे है। क्या ये व्यवस्था आपको लूटतंत्र के अतिरिक्त किसी भी एंगल से लोकतंत्र नज़र आती है..?
1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था, कि मैं जब दिल्ली से “गरीब” के लिए “एक रुपया” पास करके भेजता हूँ, तो ये मैं भी अच्छी तरह जानता हूँ कि, उसमें से गरीब तक केवल “15 पैसे” ही पहुँच पाते हैं। वाकी के 85 पैसे तो सम्बन्धित नेता, अधिकारी अर्थात बिचौलिए खा जाते हैं। अब आया कुछ समझ में ..
जो भ्र्ष्टाचार 1984 में 85 % था। वो आज बढ़कर 95% हो गया है, क्योंकि आज एक रुपये में से मुश्किल से 05 पैसे ही गरीब तक पहुँच पा रहे हैं। वो भी किसी किसी तक हर गरीब तक तो वो भी नहीं।
किसी चर्चा के दौरान जब आप किसी से
ये पुछ लो कि पिछले 70-72 वर्षों से देश में गरीबों के लिए इतनी योजनाएं चलाई जाती रही हैं, फिर भी ये गरीबी क्यों नहीं मिटती..?
तो लोग वही नेताओं वाला आसान सा जबाब दे ते हैं कि देश में कई गुना आबादी बढ़ने के कारण ….
चलो मान लेते हैं ये बात भी ठीक है मग़र एक हद तक।
मान लो गरीबों की आबादी सात गुना बढ़ गयी तो उनकी “गरीबी” भी तो सात गुना ही बढ़नी चाहिए..वो फिर 25 गुना कैसे बढ़ जाती है। साथियो हक़ीक़त तो ये है कि, आजादी के बाद देश में टैक्स और योजनाओं के नाम पर देश के नेताओं द्वारा अपने ऐशो-आराम के लिए लूट 25 गुना बढ़ गयी है इसलिए गरीबी की दर बढ़ी हुई है।
प्रबुद्ध वर्ग के लिए न केवल ये चिन्तनीय है,वल्कि बहुत ही विचारणीय प्रश्न है। धन्यवाद।
विचारक : युग,पचहरा,
88A वसुन्धरापुरम,हाथरस