39-“सनातन” एक संस्कृति है,धर्म नहीं।

“सनातन” क्या है…?

जो करोड़ो वर्षो से है और आने वाले अरबो वर्षों में भी अपने उसी शाश्वत रूप में रहेगा वो है “सनातन” क्योंकि ये तो सम्पूर्ण मानव-जाति के लिए एक “शाश्वत-संस्कृति” है, किसी वर्ग विशेष के लिये नही।

“धर्म” क्या है..?

इस धरा पर मौजूद सम्पूर्ण ‘प्राणी’ जगत के कल्याण सम्बन्धी बातें जो प्रत्येक जीव के अंतःकरण में स्वतः विद्यमान हैं उन्हें सदैव श्रद्धापूर्वक धारण किये रहना, और उस के अनुरूप ही अपने दैनिक जीवन में बर्ताव करना ही “धर्म” है।

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी, फिरि जहाज पै आवै॥
कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै।
परम गंग को छाँड़ि पियासो, दुरमति कूप खनावै॥
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल भावै।
‘सूरदास’ प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै॥”
एक महामानव की दूरदृष्टि देखिए… ये सभी दोहा सूरदास जी ने, आज से करीब 450 वर्ष पहले लिख दिए थे।
सूरदास जी कहते हैं कि “सनातन-धर्म” को छोड़कर विभिन्न शाखाओं में और मतों में जाने की आपको क्या आवश्यकता है..? परमसुख आपको कहीं अन्यत्र नहीं मिलेगा।
जैसे गंगा जी में स्नान करने वाले को नदी नालों में और कुए पर नहाकर चैन नहीं मिलता।
इसी तरह जहाज पर बीच समुद्र में बैठने वाला..और फिर अपनी मस्ती में उड़ने वाला पक्षी कितना भी इधर-उधर उड़ान क्यों न भर ले, उसको आराम के लिए जहाज पर ही पुनः वापस आना पड़ता है। और जैसे कामधेनु गाय को रखने वाला या उस दूध का सेवन करने वाला कभी बकरी के दूध से संतृप्त नहीं हो सकता ।
इसी तरह चारो तरफ भटकने के बाद, मनुष्य अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति,अर्थात पुन: सनातन-संस्कृति में ही लौटता है। क्योंकि उसके दैनिक क्रिया-कलाप “सनातन-व्यवस्थाओं” में ही रचे-बसे हैं।
आज राधास्वामी, शिर्डी के साईं बाबा,सत्संगी, और बहुत सारे नए-नए मतों में लोग भटक रहे हैं इसके पीछे कई एक कारण है ..
1-एक तो आजकल अधिकतर परिवारों में जहां संयुक्त-व्यवस्था हुआ करती थी उसकी जगह आज एकल-परिवारों ने लेली है।
2-दूसरे पति-पत्नी दोनों ही कामकाजी हो गए है , दरअसल आत्माभिमानी की जगह (Soul-conscious) आज का इंसान देहाभिमानी (Body-conscious) हो गया है। ठीक है मैं भी मानता हूँ जीवन में भौतिकता भी आवश्यक है। मग़र एक सीमा तक। विद्वानों का मत है कि जीवन की खुशहाली के लिए भौतिकता एवं आध्यात्मिकता के बीच एक बेहतर तालमेल होना बहुत आवश्यक है। लेकिन लोग हैं ऐसी अंधी दौड़ भर रहे हैं ,बच्चों को संस्कार परिवार से ही मिलते हैं परन्तु वहां तो लोग धन-सम्पत्ति अर्जित करने में ऐसे मशगूल हो जाते हैं, कि संस्कार तो बहुत दूर.. बेचारे बच्चों को अपने सारे काम ख़ुद या फिर ‘आया’ के सहयोग से करने होते हैं। अब आप ही बताइये जिन्हें “स्वधर्म” न सिखाया गया हो वो “सनातन-धर्म” को क्या जानें।
3- तीसरा और अहम कारण ये कि, हमारे कुछ सनातनी तथाकथित समाज के ठेकेदार जिन्होंने सारा वातावरण दूषित कर रखा है। ये सर्वविदित है कि समाज को समुन्नत बनाने के लिए पूर्वजों ने जो वर्ण-व्यवस्था बनाई थी , उसे न केवल जाति वल्कि कुछ मनगढ़ंत उप-जातियाँ इज़ाद करके कुछ लोग बीच से बीच उसे अपने ही तरीके से ले उड़े हैं …बे सिर पैर की बातें गढ़ते रहते हैं, ये बहुत गन्दा सामाजिक-प्रदूषण है। जिससे “वैमनष्यता” की ऊँची-ऊँची दीवारें लोगों के बीच खड़ी कर दी गयीं हैं। सनातनियों के बिखराव की असली जड़ तो ये है।
सभी भारतीय सनातनी हैं मग़र ऐसे ही सामाजिक प्रदूषण से बचने के लिए लोगों ने मज़बूरन अपने आप को अलग-अलग सम्प्रदायों से जोड़ लिया है।
4- चौथा कारण रही सही कसर इस “वॉलीवुड” के कुछ डिज़ाइनर, इनटोलरेंस वाली मानसिकता रखने वाले लोगों ,जैसे,स्क्रिप्ट राइटर्स निर्माता-निर्देशक,अभिनेता लोग और उन्ही से पूरी तरह मिलीभगत किये हुए “सेंसर बोर्ड” भी एक लम्बे अर्से से पूरी तरह धर्मक्षेत्र के कठघरे में खड़ा है, उस पर असंख्य प्रश्न-चिन्ह लगे हुए हैं। क्योंकि उसने आंखों पर पट्टी बांधकर हर तरह की फिल्मों को पास करता रहा है। उसने इतिहास से छेड़छाड़ करके ‘भारतीय-संस्कृति’ और सभ्यता की वो धज्जियां उड़ाई हुई हैं… वो मनगढ़ंत पाश्चात्य-सभ्यता परोसी है.. जिसके लिए जितना कहा…जाय कम ही होगा। मग़र अफ़सोस हमारे देश के नीति-नियंता जाने कहां सोए हुए हैं..?
5-पांचवां कारण अपनी युवा-पीढ़ी की बेपरवाही किसी भी बात की गम्भीरता को न समझना,
बहरहाल मै इसमें उनका कोई दोष नहीं मानता। क्योंकि ये तो पहले कारण का प्रतिफल है..उनके प्रति हमारी भी तो वो “बेपरवाही” ही थी। जो “आया” के द्वारा परवरिश दिलवायी। तो भुगतो अब। मानसिक स्तर पर सनातन-धर्म की आज ऐसी हालत हो गयी है कि..
“दर्द सहने की इस क़दर आदत सी हो गयी है, दर्द होता है मग़र हो…ता… नहीं है।”
अर्थात जब दर्द की पराकाष्ठा हो जाती है, तो दर्द महसूस कराने वाले ‘सेंस-ऑर्गन्स’ भी ब्रेन को वो “अनुभूति-सन्देश” नहीं भेज पाते। तब दुर्भाग्य बस वैसी ही हालत होती है जो आज “सनातन” की दिख रही है। कष्ट तो बहुत होता है मग़र ..करें भी तो क्या..
एक विचारक के पास तो कलम की ही ताक़त है जिससे वो ..सोए हुए सनातनियों को जगाने का एक प्रयास ही कर सकता है।
मानसिक स्तर पर आधुनिक होना तो नितांत आवश्यक है लेकिन आज लोगों में आधुनिकता का बुखार फैंसी-ड्रेसिज व हेयर-स्टाइल , लक्सरी गाड़ी व बंगला तक ही सिमेट कर रह गया है। मग़र विचारों में वही रूढ़िवादिता भाषा में भद्दी-भद्दी गालियाँ सदैव अपनी ही ढिगें बघारने के अलावा कुछ भी नहीं है। मेरा सभी लोगों से पुनः आग्रह है, आज हमें आत्माव्लोकन की महती आवश्यकता है। कृपया इस विषय पर गम्भीरता पूर्वक विचार कीजियेगा…सभी धर्मों का आधार
“सनातन-संस्कृति” ही है। जय “सनातन” धन्यवाद
विचारक.: योगेन्द्र,पचहरा
नीमगाँव,राया,मथुरा
281204

38-‘A Re-Search’ report on “Toppers”

सभी बन्धुओं को युग,पचहरा का नमस्कार !
आपकी कुशलता जानने के लिए, इसबार मैने ब्लॉग कम एक पत्र लिखा है, मुझे आशा है, आप स्वस्थ होंगे और परिवार में भी सभी स्वस्थ होंगे, मग़र मुझे लगा कि कुशलता जानना, मेरे कर्तव्य की परिधि में आता है, इसलिए कृपया आप अपना और अपने परिवार का ध्यान रखे और देश के हालातों को समझते हुए कुछ समय के लिए सार्वजनिक रूप से मिलने से बचे! क्योंकि आप न केवल अपने परिवार अपितु इस समाज की भी एक अमूल्य धरोहर है, और मै चाहता हूँ, कि मेरा प्रत्येक आत्मीय, प्रेमी जन, मेरे समस्त प्रबुद्ध-पाठक और उनका परिवार स्वास्थ्य के साथ-साथ हर तरफ से महफ़ूज़ रहें। कोई किसी भी तरह की दिक्कत न हो और यदि हों भी तो तुरन्त शेयर करें…

आप उस दौर में हैं जब आपके पास सोशल-मीडिया जैसी सुविधा है, कुछ ही पलों में सूचना कहीं से कही..अर्थात पूरी दुनियाँ में पहुँच जाती है।

इसी से याद आया एक बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी शेयर कर लूँ कि, “हारवर्ड यूनिवर्सिटी” में काफ़ी दिन से क्या… लगभग पिछले सत्तर (70) वर्षों से एक बहुत ही अहम विषय पर काम हो रहा है…अर्थात एक “रि-सर्च’ अभी भी चल रही है। उस शोध के अंतर्गत “हारवर्ड यूनिवर्सिटी’ के जो टॉप ग्रेजुएट्स थे, उनको उन शोधकर्ताओं ने longitude में फॉलो किया तो पता चला कि उनमें बहुत से लोग तो ऐसे निकले जो अमेरिका में काफ़ी ऊंचे पदों पर पहुँचे। जैसे: उनमें से दो-तीन लोग तो अमेरिका के प्रेसिडेंट तक बने, अन्तरिक्ष यात्री बने ,कुछ साइंटिस्ट बने, आर्टिस्ट बने और कुछ ने तो अपने अच्छे कार्य या किसी नए सिद्धांत का प्रतिपादन करके “नॉवेल प्राइज” तक भी हासिल किया हुआ है।

दूसरी तरफ उनमें से कुछ जीवन की वास्तविक डगर से ऐसे भटके जो अपराध की तरफ बढ़ते गए और जेलों में भी रहे। कुछ ने तो सुसाइड तक अटेम्प्ट किये।

दरअसल, शोधकर्ताओं का असल मक़सद टॉपर्स की “लाइफ-स्टाइल” को स्टडी करके ये जानना था कि, उनमें से वास्तव मे “ख़ुश” कौन था..?

क्योंकि हम सब का धेय आखिरकार निजी-जीवन में “प्रसन्नता” ही तो है ?

अब इसके नतीजे देख कर आप हैरान रह जाएंगे,उस सारी स्टडी के निष्कर्ष में “सेंस ऑफ वेल-बीइंग (Sense of well-being ) और Happiness के साथ-साथ एक “सिस्टेमेटिक-लाइफ”और होती है। जब लोगों को उस कसौटी पर कस कर देखा गया, तो उनमें एक चीज कॉमन थी मग़र वो कॉमन चीज़ “धन” नहीं था, कोई अहोदा, पद-प्रतिष्ठा नहीं थी, कोई डिग्री नहीं थी , कोई तालीम नहीं थी , और कोई उनके बच्चों की सफलता भी नहीं थी।

बल्कि वो चीज़ थी कि जिन-जिन लोगों ने अपने रिश्तों को तरज़ीह दी, रिश्ते निभाये… और जिनमें “रिलेशनशिप-डिवलप” करने की योग्यता थी।

‘समाज’ जिसे व्यक्ति का आइना कहा गया है उसमें अपनी ख़ुद की छबि को सुदृढ़ रख पाए, वे लोग अपने दैनिक जीवन में खुश रहे। अगर रिश्तों के सिलसिले में प्रारब्ध बस कभी कोई गतिरोध आ भी गया, तो उसे धैर्यपूर्वक, शिददत के साथ बर्दास्त किया, एक सही सूझ-बूझ से उसे दुरुस्त करने का भरपूर प्रयास किया। न कभी अपनी जिम्मेदारियों से भागे, अर्थात अपने आपको संभालते हुए आचरण की पवित्रता को बनाये रखा ताकि खुद की अंतरआत्मा पर किसी अनैतिक कार्य में सम्मिलित होने का बोझ तक न पड़े। लेकिन ये तभी सम्भव होता है , जब मदद करने वाले के साथ-साथ “मदद पाने वाले की भी नीयत स्वच्छ छवि की होती है। अर्थात उसमें पात्रता होती है।

इतिहास साक्षी है.. ऐसे महामानव,महापुरुष सदैव भीड़ से अलग होते हैं जो स्वयं अपने आपको आदर्श की सीमा-रेखाओं के अंदर रखते हुए अपने जीवन को बहुत ही इत्मिनान से, जी…ते हैं न कि जीवन को ढोते हैं।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च टीम अपनी रिपोर्ट में ऐसे त्याग पूर्ण भाव में जी.. ने वाले सुपात्र चरित्र के लोगों को शत शत नमन करती है।

इस लोकडाउन के दौरान “समय” का ठीक से सदुपयोग कर अपने खुद का आत्मावलोकन अवश्य करें जिससे आचरण की पवित्रता बनी रहे.., इस प्रतिकूल कालचक्र से विधाता अवश्य एवं शीघ्र ही मुक्ति दिलाएंगे। सभी के लिए मेरी परम् पिता परमात्मा से प्रार्थना है ….
” लोका समस्ता सुखिनो:
भवन्तु”🙏
आपका शुभचिंतक

YUG पचहरा
88A,पचहरा-हाउस,वसुन्धरापुरम,हाथरस

37-“ज़िन्दगी में सदा मुस्कुराते रहो..”

ज़िन्दगी में… “सदा मुस्कराते रहो …..” क्योंकि जीवन का आनन्द मुस्कराने में ही है। रिसर्च के अनुसार एक बच्चा दिन में लगभग 400 बार मुस्कुराता है। मगर इंसान जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है। न जाने क्यों उसकी प्रसन्नता कम होती चली जाती है।दिन-प्रति दिन उसका चेहरा लटकता ही चला जाता है। क्यों=? ..

क्योंकि
अक्सर देखा गया है कि, होस सम्भालते ही व्यक्ति सांसारिक-व्यवस्था के अंतर्गत ईश्वर से प्राप्त “स्वतंत्र-इच्छा” के हाथों मज़बूर ….जीवन में शॉर्ट-कट अपनाते-अपनाते… असल-ज़िन्दगी की राह से भटकर एक दिन अपनी सामर्थ्य से भी परे… चला जाता है। तो चिंताएं उसे घेर लेती हैं। सांसारिक सोच है। कि “परिस्थितियां” पराई हैं। और “स्थितियां” मेरी अपनी हैं।
महोदय, अगर “जीवन-जीना” है।, तो दिखावटी नहीं उसी “सहज-मुस्कुराहट”.. में वापस आना होगा, और ये दोहरी सोच बदलनी होगी .?

युगों के मुताविक आत्मा की चार अवस्थाएं होती हैं …
No.1 Golden Age
No.2 Silver Age
No.3 Copper Age
No.4 Iron Age
अब हम जिस दौर में हैं ये “आयरन ऐज” है। इसलिए भी संसार में समस्याएं अधिक हैं मगर समस्याओं के बीच “मुस्कराना” ही तो असली “आर्ट ऑफ लिविंग” है। मग़र सब कुछ जानने के बावजूद भी
जीवन को ढोना है। तो बात फिर अलग है।..जीवन में “परीक्षा” माने “प्रभु इच्छा”.. अर्थात ईश्वर मनुष्यों को परीक्षाओं से गुज़ार कर दृढ़-निश्चयी और योग्य-सुयोग्य बनाना चाहता है। मनुष्यों का आत्म-विश्वास बढ़ाना चाहता हैं।इतिहास साक्षी है।जितनी बड़ी “परिस्थिति” उतनी बड़ी “उपलब्धि”। महापुरुषों को पढ लो…
किसी कवि ने इस सुंदर रचना द्वारा इस मंज़र को बड़े अच्छे ढंग से अभिव्यक्त किया है …
” वो पथ क्या, पथिक सफलता क्या….?
जिस पथ पर बिखरे शूल न हों।
नाविक की धैर्य कुशलता क्या…?,
जब धाराएं प्रतिकूल न हों। ”

मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। जब प्रतिकूल को आप अपने अथक- प्रयासों, ईश्वरीय कृपा,बड़ों के आशीर्वाद एवं छोटों की दुआओं से अनुकूल बना लेते हैं।, उसके बाद चेहरे पर आने वाली मुस्कराहट की आंतरिक प्रसन्नता को आप शब्दों में बयां अवश्य नहीं कर सकते मग़र लोग आपके “आनंदित भाव” को अच्छी तरह समझ जरूर लेते हैं।

अतः मैं अक्सर कहता हूँ कि, “मुस्कराहट के बिना “मुख” खिलता नहीं, सच्चे-ज्ञान के बिना जीवन में सुख मिलता नहीं।” इसीलिए तो मेरे भाई..! “चेहरे” की सच्ची सुंदरता “मेक-अप” में नहीं “मुस्कराहट” में छुपी है। अतएव

“ज़िन्दगी.. में सदा..मुस्कुराते.. रहो…”
धन्यवाद

युग पचहरा,
रेजिडेंस ; पचहरा-हाउस , 88A वसुंन्धरापुरम, निकट बाई-पास, हाथरस

36- “भगवान” या फिर “विज्ञान”….?

ये “आस्था एवं विश्वास” का विषय है। तर्क द्वारा न तो अभी तक कोई “ईश्वर”(पॉवर ऑफ गॉड) को जान सका है न कभी जान ही पायेगा….जैसे,

द्रौपदी के स्वयंवर में जाते समय श्री कृष्ण, अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि, हे पार्थ ! तराजू पर पैर संभलकर रखियेगा….
अर्थात संतुलन बनाये रखना..
लक्ष्य मछली की “आंख” पर ही केंद्रित हो..इस बात का विशेष खयाल रहे।
तब अर्जुन ने कहा, “हे प्रभु ” सब कुछ अगर मुझे ही करना है, तो फिर आप क्या करोगे…?
वासुदेव कृष्ण हंसते हुए बोले, हे पार्थ जो आप से नहीं होगा वह मैं करुंगा।
अर्जुन ने कहा प्रभु ऐसा क्या है,जो मैं नहीं कर सकता.. ? ज़रा उसे बता तो दो..

तब वासुदेव ने मुस्कुराते हुए कहा – जिस अस्थिर, विचलित, हिलते हुए पानी में तुम मछली का निशाना साधोगे , उस विचलित “पानी” को क्या तुम स्थिर कर सकोगे उसे तो “मैं” ही स्थिर कर पाऊंगा… !!

कहने का तात्पर्य यह है कि आप चाहे कितने ही निपुण क्यूँ ना हो जाओ,
कितने ही बुद्धिमान क्यूँ ना हो जाओ , कितने ही महान एवं विवेकपूर्ण क्यूँ ना हो…,
लेकिन आप स्वंय हर एक परिस्थिति के ऊपर पूर्ण नियंत्रण नहीं रख सकते ..दुनियाँ की समस्त चीज़ों को यथा स्थिति साधना ही तो सच्ची “साधना” है।
आप सिर्फ अपना प्रयास ही तो कर सकते हो..
लेकिन उसकी भी एक सीमा है और जो उस सीमा से आगे की बागडोर संभालता है…कायदे से वही परब्रह्म है। उसी शक्ति..
का दूसरा नाम..”भक्तों” के लिए “भगवान” है, तो “तथ्य-विश्लेषकों” के लिए वही उनका “विज्ञान” है।

Now do you believe in the “POWER” of “GOD” Thanks to all

🙏🏻युग पचहरा,
From : श्री साहब सिंह सदन, नीमगाँव
राया, मथुरा, उत्तर-प्रदेश

35-“मति-भ्रम”

पहली बात:

हनुमान जी जब संजीवनी बूटी का पर्वत लेकर लौटते है तो भगवान से कहते है:-

_”प्रभु आपने मुझे संजीवनी बूटी लेने नहीं भेजा था, बल्कि मेरा भ्रम दूर करने के लिए भेजा था, और आज मेरा ये “मति-भ्रम” टूट गया कि “राम” नाम का जप करने वाला मैं ही सबसे बड़ा भक्त हूँ”।

भगवान बोले:- हनुमान ! वो कैसे …?

हनुमान बोले:- _वास्तव में मुझसे भी बड़े भक्त तो भरत जी है। मैं जब संजीवनी-बूटी लेकर लौट रहा था, तब मुझे भरत जी ने विशालकाय दैत्य समझकर मुझ में बाण मारा और मैं गिरा, तो चोटिल हो गया,मग़र भरत जी ने, न तो संजीवनी मांगी, न वैध बुलाया। उन्हें कितना… भरोसा है आपके “नाम” पर, तुरन्त कहा कि यदि मन, वचन और शरीर से “श्रीराम” जी के चरण कमलों में मेरा निष्कपट प्रेम है, और यदि रघुनाथ जी मेरी भक्ति से पूर्ण प्रसन्न हों…, तो यह वानर तुरन्त थकावट और पीड़ा से रहित होकर स्वस्थ हो जाए।_

उनके इतना कहने मात्र से ही मैं एकदम स्वस्थ होकर उठ बैठा। सच ! कितना भरोसा है, भरत जी को आपके “नाम” पर।

शिक्षा :-
_ “हम भगवान का नाम तो लेते है पर भरोसा नही करते, भरोसा करते भी है तो अपने पुत्रो एवं धन सम्पत्ति पर, कि बुढ़ापे में बेटा और ये ताम-झाम जो पूरा जीवन खपा कर इकट्ठी की है उससे सेवा होगी, अर्थात धन ही साथ देगा। उस समय हम भूल जाते है कि जिस भगवान का नाम हम जप रहे हैं वही है सच्चा साथी पर हम अंदर से भरोसा नहीं करते।बेटा सेवा करे न करे पर भरोसा हम उसी पर करते है।” कैसी..! विडंबना है इस जीवन की…

दूसरी बात प्रभु….!

बाण लगते ही “मैं” गिरा, “पर्वत” नहीं। क्योंकि पर्वत को तो आपने जो उठा रखा था, और “मति-भ्रम” हो जाने के कारण मै अभिमान कर रहा था कि, इसे मैं उठाये हुए हूँ। प्रभु ! मेरा ये अभिमान भी टूट गया।
हम में से अधिकतर की भी सोच कुछ ऐसी.. ही है कि, अपनी “घर-गृहस्थी” का बोझ हम उठाये हुए हैं।”मति-भ्रष्ट” हो जाने से इस बात का बढ़ा ही गुमान करते हैं। जबकि सत्य हम सब के सामने है। जिस समाज में रहते हो वहीं ज़रा नज़र उठा के देख लें,तो ऐसे कई एक उदाहरण मौजूद हैं कि, परिवार हमारे न रहने के बाद भी चलते हैं। वो बात अलग है परिवार के सदस्यों का संघर्ष कुछ और बढ़ जाय, मग़र परिवार तब भी चलते हैं।और कई बार तो और भी अच्छे चलते हैं।
जीवन के प्रति जिस व्यक्ति की कम से कम शिकायत होती हैं, अर्थात सामंजस्य-स्वभाव का व्यक्ति दूसरों की तुलना में न केवल कर्मशील अपितु , कहीं अधिक सुखी भी होता है।
अंत में हनुमान बोले : सियाराम चंद्र की जय, श्री लक्ष्मण यती की जय…
यह “राम” नाम रूपी मंत्र बहुत ही सरल, सरस्, मधुर एवं अति मन-भावन है।
महोदय, ये ही है.. वो “ईश्वर-कृपा” जो सम्पूर्ण सृष्टि को सादे हुए है, जिसे अध्यात्म में “ब्रह्म” कहा गया है। ये ईश्वर में पूर्ण विश्वास एवं अच्छे कर्मों के प्रतिफल रूप में ही सम्भव है। जिसे जीवन-बीमा करने वाले, अक्सर सब लोगों को जगाने के लिए एक विज्ञापन रूप में बार-बार याद भी दिलाते रहते हैं…कि, “जीवन के साथ भी जीवन के बाद भी।”

निष्कर्ष स्वरूप जीवन के साथ भी और बाद भी..से मतलव केवल अपने इष्ट में सच्ची ” आस्था और विश्वास” ही है। व्यक्ति एवं धन तो मौजूदगी में किसी के नहीं हुए बाद में तो होंगे ही क्या…?

धन्यवाद
; युग पचहरा
फ्रॉम; श्री साहब सिंह सदन, नीमगाँव,राया,मथुरा
Pin.281204

34- “आत्म-मंथन”

✍ कसाई के पीछे घिसटती जा रही बकरी 🐐 ने सामने से आ रहे संन्यासी को देखा तो उसकी उम्मीद बढ़ी, मौत आंखों में लिए वह फरियाद करने लगी – *महाराज* 🙏 मेरे छोटे-छोटे मेमने हैं, आप इस कसाई से मेरी प्राण-रक्षा करें !

मैं जब तक जियूंगी, अपने बच्चों के हिस्से का दूध आपको पिलाती रहूंगी ! बकरी की करुण पुकार का संन्यासी पर कोई असर न पड़ा ! 😏

वह निर्लिप्त भाव से बोला – ‘मूर्ख, बकरी क्या तू नहीं जानती कि *मैं एक संन्यासी हूं !*

जीवन-मृत्यु, हर्ष-शोक, मोह-माया से परे हर प्राणी को एक न एक दिन तो मरना ही है।

समझ ले कि तेरी मौत इस कसाई के हाथों लिखी है, यदि यह पाप करेगा तो ईश्वर इसे भी दंडित करेगा !

मेरे बिना मेरे मेमने जीते-जी मर जाएंगे… 😭 बकरी रोने लगी !

‘नादान, रोने से अच्छा है कि तू परमात्मा का नाम ले, याद रख, मृत्यु नए जीवन का द्वार है।

सांसारिक रिश्ते-नाते प्राणी के मोह का परिणाम हैं, मोह माया से उपजता है, माया विकारों की जननी है, विकार आत्मा को भरमाए रखते हैं !

बकरी निराश हो गई। 😔

संन्यासी के पीछे आ रहे 🐶 कुत्ते से रहा न गया !

उसने पूछा – ‘संन्यासी महाराज, क्या आप मोह-माया से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं ?

*लपककर संन्यासी ने जवाब दिया -* ‘बिलकुल, भरा-पूरा परिवार था मेरा, सुंदर पत्नी, सुशील भाई-बहन, माता-पिता, चाचा-ताऊ, बेटा-बेटी, बेशुमार जमीन-जायदाद… मैं एक ही झटके में सब कुछ छोड़कर परमात्मा की शरण में चला आ आया !

सांसारिक प्रलोभनों से बहुत ऊपर… सब कुछ छोड़ आया हूं।

मोह-माया का यह निरर्थक संसार छोड़ आया हूं।

जैसे कीचड़ में कमल… संन्यासी डींग मारने लगा ! 🤨

कुत्ते ने समझाया – आप चाहें तो बकरी की प्राणरक्षा कर सकते हैं। कसाई आपकी बात नहीं टालेगा, एक जीव की रक्षा हो जाए तो *कितना उत्तम हो !*

संन्यासी ने कुत्ते को जीवन का सार समझाना शुरू कर दिया – मौत तो निश्चित ही है, आज नहीं तो कल, हर प्राणी को मरना है। इसकी चिंता में व्यर्थ स्वयं को कष्ट देता है जीव 😜 संन्यासी को लग रहा था कि वह उसे संसार के मोह-माया से मुक्त कर रहा है !

अभी संन्यासी अपना ज्ञान बघार ही रहा था कि तभी सामने एक काला भुजंग 🐍 नाग फन फैलाए दिखाई पड़ा। वह संन्यासी पर न जाने क्यों कुपित था। मानों ठान रखा हो कि आज तो *तूझे डंसूगा ही !*

सांप को देखकर संन्यासी के 🥶 पसीने छूटने लगे, मोह-मुक्ति का प्रवचन देने वाले संन्यासी ने कुत्ते की ओर मदद 👏🏻 के लिए देखा।

*कुत्ते की हंसी छूट गई !* 😂

संन्यासी महोदय मृत्यु तो नए जीवन का द्वार है। उसको एक न एक दिन तो आना ही है, फिर *चिंता क्या ?* कुत्ते ने संन्यासी के वचन दोहरा दिए !

इस नाग से मुझे बचाओ 🥵 अपना ही उपदेश भूलकर संन्यासी गिड़गिड़ाने लगा, मगर कुत्ते ने उसकी ओर ध्यान न दिया !

*कुत्ते ने चुटकी ली -* आप अभी यमराज से बातें करें, जीना तो बकरी चाहती है। इससे पहले कि कसाई उसको लेकर दूर निकल जाए, मुझे अपना कर्तव्य पूरा करना है ! 🙏

इतना कहते हुए कुत्ता छलांग लगाकर नाग के दूसरी ओर पहुंच गया, फिर दौड़ते हुए कसाई के पास पहुंचा और उस पर टूट पड़ा !

आकस्मिक हमले से कसाई संभल नहीं पाया और घबराकर इधर-उधर भागने लगा। बकरी की पकड़ ढीली हुई तो वह जंगल में गायब हो गई

कसाई से निपटने के बाद कुत्ते ने संन्यासी की ओर देखा 🧐 संन्यासी अभी भी ‘मौत’ के आगे कांप 🥵 रहा था !

कुत्ते का मन हुआ कि संन्यासी को उसके हाल पर छोड़कर आगे बढ़ जाए लेकिन *मन नहीं माना* वह दौड़कर विषधर के पीछे पहुंचा और पूंछ पकड़ कर झाड़ियों की ओर उछाल दिया !

संन्यासी की जान में जान आई 🥴 वह आभार से भरे नेत्रों से कुत्ते को देखने लगा !

*कुत्ता बोला – महाराज, जहां तक मैं समझता हूं, मौत से वही ज्यादा डरते हैं, जो केवल अपने लिए जीते हैं !*

जीवन का समय-समय पर आत्म मूल्यांकन बहुत जरूरी है।

हम संसार से छल कर सकते हैं, छुपा सकते हैं स्वयं से नहीं,

इसलिए अपने हर कार्य को अपने अंतर्मन की कसौटी पर कसते रहना चाहिए !

जो नियमित रूप से ऐसा करते रहते हैं उनमें उनके अंदर का ईश्वर जाग्रत रहता है।

*जिस दिन हम स्वयं से मुंह फेरने लगते हैं उस दिन से पतन का आरंभ हो जाता है !*

जो सिर्फ अपनी चिंता करें वैसे इंसान और पशु में क्या फर्क रहा। पशु भी दूसरों की चिंता कर लेते हैं !

👉 “गेरुआ पहनकर निकल जाने या कंठी माला डालकर प्रभु नाम जपने से कोई प्रभु का प्रिय नहीं हो जाता। जिसके मन में दया और करूणा नहीं उसे तो ईश्वर भी नहीं पूछते”
धन्यवाद

; युग पचहरा,नीमगाँव,राया,मथुरा
रेजिडेंस : 88A, वसुंन्धरापुरम,निकट बाई-पास, हाथरस

33-“भूमिकाओं” के साथ न्याय-संगत हों…

(प्रबुद्ध-साथियो ! ये मेरे ही ब्लॉग No -30 Be just with “Roles” का हिन्दी वरजन है..No 33-“भूमिकाओं” के साथ न्याय-संगत हों।)

दक्षिण भारत के महाकवि श्री कम्ब द्वारा रचित तमिल भाषा में एक राम-कथा है, “रामवतारम” जिसमें एक बहुत ही “विचित्र-प्रसंग” है, जो महर्षि वाल्मीकि व श्रीतुलसी-कृत राम-कथाओं (रामायण) में ऐसा नहीं मिलता है। मुझे तो लगता है..ये कविवर “कम्ब” की अपनी लेखनी का सही सन्तुलन है। इसीलिए ‘राम-रावण’ की चरित्र लीलाओं का वर्णन करने में दोनों के गुण-दोषों के बीच एक सही संश्लेषण बनाते हुए लिखा है।

वैसे ये सही यूं भी है क्योंकि सभी ग्रँथ आने वाली पीढियों के लिए एक “आदर्श-पुस्तक” के रूप में तो होते ही हैं। अनावश्यक बड़ा-चढ़ा कर उसे पूरी तरह अधर्म के मार्ग पर चलने वाले “फ़िल्मी खलनायक” जैसा पेश करने से कहानी में रोचकता (ट्विस्ट) तो बढ़ जाती है, जो दर्शक व स्रोताओं की भीड़ भी जुटाने में भी सहायक होती है। मगर देखा जाए,तो एक चरित्र-कलाकार के साथ अन्याय हो जाता है।

और दूसरी बात ये भी है कि, लेखक उसे फिर कितना भी विद्वान व प्रकांड क्यों न बताये, लोगों के दिलों में उस पात्र को वो जगह मिल नहीं सकती, जिसका वो हकदार होता है।

किसी भी पात्र के गुण-दोषों का असंतुलन सदैव “लेखक व रचनाकार” को जनता की अदालत में सवालों के घेरे में, तो ला कर खड़ा कर ही देता है।

मग़र कम्ब जी ने अपनी रचना “रामअवतारम” में रावण के माध्यम से व्यक्ति को अपने जीवन में जीने वाली विभिन्न “भूमिकाओं” के प्रति पूर्ण ईमानदार होने का एक बहुत सुंदर पाठ पढ़ाने का प्रयास तो किया ही है।

मेरे विचार से आज के दौर में न केवल ये प्रसंग प्रेरणादायक है अपितु अनुकरणीय भी है।
ये सभी को पता है, श्री राम ने समुद्र पर पुल (रामसेतु) बनाने से पूर्व “लंका पर विजय” पाने के लिए समुद्र तट पर एक यज्ञ का आयोजन करके “शिव-लिंग” की स्थापना की थी।

तो ज़ाहिर सी बात है, जब श्री राम जी के कर कमलों से “इष्ट की स्थापना’ हुई, तभी तो वे “श्रीरामेश्वरम-ज्योतिर्लिंग” कहलाये, जो आज भी जनसामान्य के लिए विद्यमान हैं।

वही “रामेश्वरम” जिसकी पवित्र मिट्टी ने हमें…श्री ए.पी.जे.अब्दुल कलाम जैसे महान राष्ट्रपति दिए हैं।

चलो, अब उस “विचित्र एवं अनुकरणीय-प्रसंग” की ओर बढ़ते हैं , तो हुआ यूं कि श्री राम को इस महान कार्य के लिए एक सुयोग्य आचार्य चाहिए थे। जब उन्होंने वहां वनवास में मौजूद अपने सभी संगी साथियों से पूछा तो श्री जामवंत जी ने काफ़ी सोच विचार करके “आचार्य-रावण” का नाम सुझाया, हालांकि वह आज आपके प्रबल शत्रु हैं। लेकिन प्रभु ये आप भी जानते हैं कि ये बात भी अपने आप में सोलह-आना सही है। कि रावण के बराबर विद्वान आचार्य इस क्षेत्र में आज कोई दूसरा है नहीं।

प्रभु श्री राम ने कहा, ठीक है, तो जामवंत जी आप उन्हें बुलाने का प्रयास करके देखिए..

सम्बन्धो के लिहाज़ से , जामवंत जी के दादा जी और श्री पुलस्त ऋषि आपस में अच्छे मित्र थे, आचार्य-रावण पुलस्त ऋषि का पोता था। इस सम्बन्ध से वे पहले से ही एक दूसरे के सम्पर्क में थे। इस बावत जामवंत जब लंका पहुँचे,तो “लंकेश्वर” ने उनका अच्छे से स्वागत किया , और कुशलता पूछी…,तो उसी के साथ जामवंत जी ने निःसंकोच अपना आने का प्रयोजन भी बता दिया। इस पर काफ़ी विचार-विमर्श करके “लंकेश-रावण” ने कहा, वही दशरथनंदन राम जिसने बहन सूर्पनखा की नाक काटी थी, उस “राम” से तो लंकेश्वर की ठनी हुई है।

मैं शास्त्रों का ज्ञाता हूँ इस लिए इंसान के अंदर विभिन्न भूमिकाओं का गणित न केवल ठीक से जानता हूँ ,अपितु उचित तरीके से हर रिश्ते की गरिमा को भी समझता हूँ। चलो, वह जो भी है वो “लंकेश्वर” की अपनी समस्या है। ..यहां प्रश्न आचार्य रावण से है न कि किसी लंकेश्वर से..??

मग़र वन में एक वनवासी इस वन्य-क्षेत्र से अनभिज्ञ हैं, परेशान है… इसलिए शास्त्र व घर्म-नीति ये कहती है। कि एक आचार्य होने के नाते उनके अनुष्ठान में जो हमसे बन पड़े मदद कर देनी चाहिए।

बताइए ! “आचार्य-रावण” का तो उनसे कोई वैर है नहीं..??

दूसरे यज्ञ-संस्कार आदि कराना तो हम ब्राह्मण-आचार्यों का ही कर्म है। इसलिए इस दौरान एक तपस्वी-राम जो वनवासी है वह आपका यजमान है।

जामवंत जी के इस वृतांत ने ‘ लंकेश्वर ‘ को तत्काल ‘ आचार्य रावण ‘ में रुपांतरित होने को बाध्य कर दिया,तब आचार्य रावण बोले! ठीक है जामवंत जी चलो, “आचार्य-रावण’ को आपका प्रस्ताव स्वीकार है। वह ये संस्कार अवश्य करायेगा।
उस वक्त “लंकेश-रावण” का रूपांतरण “आचार्य-रावण”के रूप में होते हुए साक्षत जामवंत जी ने ही देखा होगा। मग़र तमिल भाषा के मशहूर कवि “कम्ब” (कम्बन-ऋषि ) द्वारा ये सौभाग्य आप और हम को भी मिल गया..इसके लिए कविवर को सभी भक्तों का कोटि-कोटि नमन है। यही इस ‘प्रसंग’ या मेरे इस ‘blog’ की विचित्रता है। जो हमें असल जीवन में अपनी सभी भूमिकाओं के साथ “न्याय-संगत” होने का सन्देश दे रही है।

घर-परिवार के सदस्यों के बीच एक ही छत के नीचे एक ही समय में रिश्तों के प्रति “एक-संवेदनशील-व्यक्ति” अनेक भूमिकाओं के ताने-बाने में बंधा हुआ होता है..
जैसे; माता-पिता के लिए “एक-पुत्र”, अपने अन्य भाई-बहन के लिए “एक-भाई” और यदि शादी-सुदा है, तो पत्नी के लिए “एक-पति” और अपने बच्चों का “एक जिम्मेदार-पिता” होता है। अर्थात रिश्तों के नज़रिये से एक ही व्यक्ति एक ही समय विभिन्न भूमिकाओं में होता है।

यहां आते-आते असल प्रसंग से भटक मत जाइयेगा, भूमिकाएं चाहे जितनी क्यों न हों..?
असल सवाल, तो उस चुनौती का है..?? कि “हर भूमिका में व्यक्ति को ‘न्याय-संगत’ होना चाहिए..? ” अर्थात व्यवहार में ऐसा संतुलन हो जो अपने प्रत्येक रिश्ते की गरिमा एवं पवित्रता बनाये रखे।

“आचार्य-रावण”, जो तीन लोकों का विजेता था, उसने ये साबित कर दिया कि “प्रत्येक भूमिका” की अपनी एक अंतर्निहित माँग होती है, उसके साथ न्यायोचित व्यवहार करने का निर्णय ही रिश्ते की पवित्रता है।।

प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए, अब जामवंत ने सुयोग्य आचार्य से पूछा यज्ञ हेतु क्या-क्या आवश्यक सामिग्री जुटानी होंगी..? क्योंकि हम और आपके यजमान तो वनवासी हैं, ये व्यवस्थाएं कैसे और कहाँ से कर पाएंगे, आचार्य ने कहा, कभी-कभी ऐसे यजमानों के साथ इस तरह की अपरिहार्य स्थिति के लिए शास्त्रों में उल्लेख है कि सिर्फ बहुत आवश्यक चीज़ों से काम चला लेना ही श्रेयष्कर होता है।

क्योंकि आचार्य की “पूर्ण-प्रबन्ध” करने की हठ से कभी-कभी यजमान का भाव कुभाव में बदल जाता है। ऐसी स्थिति से बचाने के लिए ये सारी “प्रबन्ध-व्यवस्था” आचार्य की ज़िम्मेदारी हो जाती है। अब आप बेफ़िक्र होकर जाइये, “आचार्य-रावण” सब कर लेंगे।

अब आप सुयोग्य-आचार्य-रावण की दूरदृष्टि देखिएगा, वह इसके बाद सीधा अशोक-वाटिका पहुँचा, और देवी सीता को बताया कि समुद्र के उस पार मेरे एक “तपस्वी-यजमान”, जो आपके पति भी हैं, एक यज्ञ का आयोजन कराना चाह रहे हैं, इसलिए “आचार्य-रावण’ को अपने ब्राह्मण कर्म के अनुरूप उनका ये संस्कार कराना होगा। शास्त्रों के अनुसार उसे सम्पन्न कराने के लिए वहां आपको भी मौजूद होना चाहिए इसलिए आप से मैं “आचार्य-रावण” चलने का आग्रह करता हूँ। मग़र स्मरण रहे केवल हवन,यज्ञ-संस्कार हेतु। उसके उपरांत आप इस आचार्य के साथ बापस वाटिका में ही लौटेंगी। क्योंकि “राम-सीता” का पुनर्मिलन तो “लंकेश-रावण” से जीतने के बाद ही सम्भव होगा।

देवी सीता ने रावण की भूमिकाओं के इस अंतरभेदिय रूपांतरण को समझते हुए, उस दिन रावण से आचार्य -प्रणाम कहकर सम्बोधन किया। और एक दृढ़ विश्वास के साथ पुष्पक-विमान से रामादल के समीप पहुंच गए।
जैसे ही आचार्य को राम-लक्ष्मण दोनों भाइयों ने देखा, उन्होंने भी आचार्य-प्रणाम बोला फिर पुनः श्री राम ने कहा, आचार्य ! दसरथ नंदन श्री राम का प्रणाम स्वीकार कीजियेगा…

आचार्य रावण ने अपने यजमान को “सदैव कल्याण हो।” का आशीर्वाद भी दिया। तब बोला, जामवंत ! चलो,तपस्वी-यजमान जोड़े मे अपने संकल्प के साथ पूजा की वेदी पर मेरे समक्ष आकर बैठें, देर न करें ताकि शुभ मुहूर्त में पूजा-अर्चना का कार्य शुरू हो सके।

इस पर जामवंत ने विनती करते हुए आचार्य महोदय से कहा, पत्नी की अनुपस्थिति पर यज्ञ सम्पन्न करने का कोई और उपाय…है क्या..?
आचार्य ने कहा, हाँ है न ! तीन परिस्थितियों में .. यजमान अकेला भी करा सकता है…
पहला – यदि वह कुंवारा है,तो
दूसरा – यदि उसकी पत्नी इस संसार में ही नहीं है, तो
और तीसरा – यदि वह उसकी पत्नी ने त्याग दिया है, तो।

ये सुनने के बाद “तपस्वी-यजमान” राम ने अपने “आचार्य-रावण” से विनम्र स्वर में कहा महोदय, ये तीनों ही परिस्थितियां न होते हुए भी कैसी विडम्बना है कि हम पति-पत्नी एक दूसरे से दूर हैं। तब जामवंत ने कहा, आचार्य महोदय, अब जो भी स्थिति-परिस्थिति है वह आपके सामने है यज्ञ सम्पन्न कराने का कोई उपाय निकालिये…

आचार्य ने तुरन्त लक्ष्मण और विभीषण को आवाज़ दी, और कहा, देवी सीता पुष्पक-विमान में हैं आप शीघ्र आदर सहित लेकर आओ..लेकिन ध्यान रहे! ये प्रबन्ध सिर्फ यज्ञ व शिव-लिंग स्थापना हेतु एक आचार्य की तरफ से है। इसके उपरान्त उसी आदर-सम्मान के साथ देवी सीता को पुष्पक-विमान में ही बैठा दीजियेगा।

तपस्वी-यजमान (राम) ने अपने आचार्य-रावण को पूर्ण आस्वस्त किया, जी विल्कुल ऐसा ही होगा। तब इत्मिनान से धार्मिक-संस्कार सम्पन्न हुआ..और आचार्य-रावण अपने पुष्पक विमान में सवार हो कर देवी सीता को वहीं अशोक-वाटिका में पहुँचाते हुए लंका में अपने महल को चले गए।

ये होतीं हैं रिश्तों की पवित्रता!!

ऋषि कम्ब ने “रामअवतारम” में स्पष्ट लिखा है कि सभी मनुष्यों को अपनी अलग-अलग भूमिकाओं के साथ न्यायोचित व्यवहार करने की सीख , सुयोग्य-आचार्य ( प्रकांड-पंडित) रावण से लेनी चाहिए। उस वक्त वह तो स्वयं बख़ूबी जानता ही था। लेकिन आज ये हम सब की भी समझ के दायरे में है , कि रावण कोई मूर्ख नहीं था एक हिंदी कहावत के अनुसार “लंकेश्वर-रावण” के दोनों हाथों में लडडू थे।
एक लडडू तो ये कि यदि राम एक साधारण व्यक्ति हैं, तो मैं अपनी अपार सैन्य बल एवं शक्तियों के दम पर अपने मंसूबों में सफल हो जाऊंगा। स्वाभाविक है प्रभुता पाने पर इस तरह की ख़ुश-फहमी हर किसी को हो ही जाती है। ये मनुष्य,देव और दानव योनि में सामान्य सी घटना है।

आज भी ऐसे राक्षस रूपी रावण देश-दुनियाँ में मौजूद हैं। वो तो फिर भी तीन लोकों का विजेता प्रकांड-पंडित “रावण” था।

दूसरा लडडू ये कि यदि वो वास्तव में “त्रिलोकीनाथ भगवन श्री राम” ही हैं, तो पूर्व जन्म के अभिशाप के मुताविक मेरे सम्पूर्ण राक्षस कुल का उनके हाथों उद्धार भी हो जाएगा। …तो

हक़ीक़त में ये एक लीला ही थी।
मग़र भारतीय समाज के लिए इन ग्रन्थों ने सदैव आदर्श स्थापित किये हैं। इसलिए रामायण का एक एक प्रसंग गूढ़ रहस्यों से भरा हुआ है। इसकी प्रत्येक बात में मान्यता के आधार वैज्ञानिक तथ्य ही हैं।

बस आवश्यकता है प्रभु के प्रेम में सराबोर होकर न केवल डुबकी लगाते रहने की,अपितु इन आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात करने की।

धन्यवाद
योगेंद्र सिंह पचहरा, पौत्र श्री साहब सिंह
मुखिया जी, नीमगाँव,राया,मथुरा

32- “स्वाध्याय” एक संकल्प

बन्धुवर, नमस्कार ! 🙏 ये तो आप देख ही रहे होगे कि आज ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में गूगल (Net) से पल भर में लगभग हर क्षेत्र की पर्याप्त जानकारी मिल जाती है। इस दृष्टि से हम बहुत सौभाग्यशाली हैं। जो इस दौर में पैदा हुए हैं जब से अपनी वेबसाइट के थ्रू मैं ऑन-लाइन हुआ हूँ, तब से थोड़े से पंख तो मुझे भी लग गए हैं। नेट पर बहुत कुछ लिखता-पढ़ता रहने से वक्त की कमी…ही महसूस होती है। मग़र कभी ऐसा भाव नहीं आता, जैसे सामान्य तौर पर लोग बोलते रहते हैं कि “क्या करें समय ही पास नहीं होता।” वैसे भी “वक्त” ने अब तक संसार से हम जैसे कितने गुज़ार (पास कर) दिए, गुज़ार रहा है और इसी तरह गुजारता रहेगा भी……….ये संसार की एक अनवरत प्रक्रिया है। इसलिए सदैव कर्मशील बने रहना ही उचित है। कुछ लोगों ने नेट के प्रति बड़ी गलत धारणाएं पाल रखीं हैं। यूं तो फिर प्लस/माइनस हर चीज़ में होते है। नेट-कम्युनिकेशन में “समझदारी” प्लस है, वहीं “ना-समझी” बहुत बड़ा माइनस भी है। क्योंकि इस संचार व्यवस्था ने दुनियाँ की प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति, देश अर्थात कायनात में मौजूद हर उस चीज़ को, जिसकी आपको आवश्यकता हो सकती है। सब आपके पास लाकर रख दिया हैं। अर्थात दुरियाँ तो लगभग मिटा ही दीं हैं। वो भी बहुत ऊँचे दामों में नहीं, विल्कुल आपकी सामर्थ्य में। ” आप मानते हो ये है न प्रकृति का एक नायाब तौफा!”

जब, आप रात्रि में पढ़ने बैठते हैं, तो सिम्पली “स्विच-ओन” कर देते हो और लाइट जल जाती है। ठीक वैसे ही चलकर लाइब्रेरी जाने के बजाय “इंटरनेट-ऑन’ करके लाइब्रेरी या किसी विचारक, लेखक, कवि,आदि किसी भी व्यक्ति विशेष की “वेबसाइट” पर जाकर बड़े इत्मिनान से “स्वाध्याय” का आनंद ले लेते हो। मग़र कभी पूरी दुनियाँ को ये सब प्रोवाइड करने वाले सच्चे कर्मयोगियों के लिए आपके अन्तर्मन से शुभाशीष या दुआएं निकली, या कभी मन में उन महनुभावों को धन्यवाद ही देने का विचार आया हो…?

शायद “नहीं” क्योंकि अधिकतर की आदत में ही नहीं है, होनी चाहिए ऐसा आपका मन कह रहा है। तो फिर ठीक है, आदत बना लीजियेगा।

इसी से रिलेटेड कुछ अच्छे विचारक, लेखक, वैज्ञानिक एवं नामचीन कविवर! आदि की ऑन-लाइन उपलब्धता हमारे अकेलेपन को भी भरने में बहुत कारगर सिद्ध हुई है। ख़ास कर इस लॉकडाउन के दौरान। गूगल के पास अथाह-ज्ञान का भंडार है ,इससे जानकारियाँ लेना भी काफ़ी सुलभ हैं।

मग़र दूसरा पहलू ये भी कहीं तक देखने में आ रहा है, कि आजकल लोगों में न जाने क्यों..? दिन प्रतिदिन संस्कार हीनता घर करती जा रही है। जो चिन्ता का विषय है। एक विचारणीय प्रश्न है..? देश और दुनियाँ के स्तर पर अपनी लोकप्रियता का परचम लहराने वाले अनेकों ख्याति प्राप्त वैज्ञानिकों व महापुरुषों को समझने के लिए मैने कई बायोग्राफी का गहन-अध्ययन किया हुआ है। अतएव मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, कि वे न केवल स्वाध्याय के लिए ही दृढ़-संकल्पित थे , अपितु जानने के बाद “थोता” को उड़ाने में और “सार-सार” को अपने आचरण में ग्रहण करने में भी पूर्ण ईमानदार थे। और यही वो बात है,आज के व्यक्ति पर सवालिया निशान (?) लगाती है।

आजकल लोगों में किसी भी तरह के साहित्य या फिर कुछ भी पढ़ने-लिखने एवं चिंतन…आदि के प्रति रुचि कम हीं दिखती। मेरे ख्याल से इसलिए “स्वाध्याय” को एक संकल्प के रूप में लेने की आज महती आवश्यकता महसूस की जा रही है।..

लोगों के आस-पास के वातावरण की बात करूं तो, किसी भी समाज से मेरा आशय शहरी व ग्रामीण अंचल से है,

मैं देखता हूँ ,आज लोगों में तीन प्रकार की “सोच” व्याप्त है। अर्थात आप ग़ौर करें,तो आप अपने इर्द-गिर्द तीन तरह के ही लोग पाएंगे….
प्रथम/1- “सामान्य-सोच” वाले व्यक्ति जो सिर्फ “लोगों” की ही बात करने तक सीमित रहते हैं।
दूसरे/2- “औसत-सोच” वाले व्यक्ति देश-दुनियाँ में हो रही “घटनाओं” की बात कर लेते हैं
जबकि…
तीसरे/3- “महान-सोच” का स्तर सदैव देश-दुनियाँ के वैज्ञानिकों,विद्वानों व महापुरुषों की “उच्च-सोच” व उनके “सिद्धान्तों/विचारों” को आधार मानते हुए हमेशां “न्याय-संगत” बात करने में विश्वास रखते हैं। चाहे लोगों को उनकी बात अटपटी ही क्यों न लगे। क्योंकि आज लोगों में बढ़ती हुई “स्वार्थ-परता” और वैचारिक स्तर के लगातार गिरने से… भले ही ऐसी बातों को आज कहने और सुनने का माहौल नहीं रहा….. इसीलिए कई बार ऐसे व्यक्ति अपनी सोच के स्तर पर परिवार, समाज और विभाग आदि में अकेले ही खड़े नज़र आते हैं। मग़र वे सैद्धान्तिक हैं, इस बात को भली-भांति जानने के कारण उन पर इस तरह “अकेले होने” का कोई फ़र्क नहीं पड़ता। जिसे लोग अक्सर एक “मीचुअल- अंडरस्टैंडिंग-गैप” के रूप में जरूर देखते होंगें। मग़र उनका आंकलन ठीक नहीं है।
पिछले वर्ष 30 सितम्बर, 2019 से “https;//infopac.data.blog/” के नाम से मैंने भी अपनी एक वेबसाइट बना रखी है। अर्थात ऐसा समझो कि..

मेरे अपने मौलिक-विचारों का जामा पहने हुए “लेखों का एक संग्रह” दुनियाँ के प्लेटफ़ॉर्म पर “स्वाध्याय प्रेमी” अर्थात प्रबुद्ध-वर्ग के लिए उपलब्ध है। अपने ब्लॉग के थ्रू इस तरह का वृतान्त मेरे अन्तर्मन में थोड़ा संकोच जरूर पैदा कर रहा है…मग़र मेरा विश्वास है कि..
आपको ये जानकर ख़ुशी ही होगी, कि अभी लगभग छह महीने की अवधि पूरी करते-करते 15 मार्च,2020 के करीब मेरे “लेखों’ की संख्या जैसे ही 25+ हुई ही होगी…तभी अपने देश व दुनियाँ के अन्य कई देशों में हजारों की संख्या में जो लोग मेरे लेखों को नियमित पढ़ रहे हैं, शायद उन्हें कुछ वैचारिक लाभ मिल रहा होगा, जो भी हो वे जानें। उन्होंने अपने संचार माध्यमों के ज़रिए मेरे लेखों की… “सिल्वर-जुबली” कह कर एक विचारक के रूप में मुझे बेसुमार बधाइयां दीं, वाक़ई वो पल सदैव के लिए मेरी “स्वीट-मैमोरी” में स्वतः स्टोर हो गये हैं। इस सब के लिए मैं अपने सभी प्रबुद्ध पाठकों का “ता-उम्र” दिल की गहराईयों से शुक्र-गुज़ार रहूँगा। जो एक विचारक का हौसला बढ़ाने के लिए पर्याप्त है। असल में एक क्रिएटिव इंसान के लिए काम की सराहना ही उसकी सच्ची पूँजी होती है।
ईश्वर का दिया हुआ “सन्तोष” मुझ पर है। तो समझो “सब-कुछ” है। माँ शारदे की कृपा एवं आप सब का आशीर्वाद व दुआएँ यूं ही बनी रहैं… और इस छोटी सी ज़िन्दगी में एक विचारक को क्या चाहिये.. ?

इस “शरीर” का क्या ! ये तो क्षणभंगुर है। मेरा ऐसा मानना है कि..यदि आपका “विचार” सच्चे मानक मूल्यों के धरातल पर आधारित हो, तो इतिहास साक्षी है, उस “विचार” की उम्र हमेशा व्यक्ति से अधिक होती है, अर्थात इग्लिश के एक फेमस पोइट मि.जोन-मिल्टन के शब्दों में कहूँ तो, “विचार” सदैव अमर है, “व्यक्ति” कभी नहीं। लोगों को समझाते हुए उन्होंने ये भी कहा था, मैं इस “स्थूल-शरीर” से आपके बीच रहूँ न रहूँ…मग़र मेरा “विचार-प्रभाव” जिसे आध्यात्म में ‘तीसरा-शरीर’ कहा गया है वो आपके बीच सदैव रहेंगा। ये बात आज हम समझ भी रहे हैं…
पुनः आप सभी से मेरा यही आग्रह है, कि जब वक़्त मिले और जिन-जिन चीजों में आपकी रुचि हो… लेख, कविताएं, कहानियां आदि जो भी चीज आपको पसंद हों उसी से रिलेटेड website पर जाइये..मग़र स्वाध्याय आवश्य करिएगा…ये संकल्प ही आपको उन बुलंदियों पर ले जायेगा जिसके लिए आप बने हैं… धन्यवाद 🙏

विचारक ;युग पचहरा, 88A, वसुन्धरापुरम, हाथरस।
Contact No.8006943731

31-“सकारात्मक-सोच” के प्रभाव…

.धैर्य रख सको, तो आज का दुःख कल का सौभाग्य भी हो सकता है..
महाराजा दशरथ की कुण्डली में सन्तान का योग नहीं था..मग़र उन्हें श्रवण के पिता का श्राप था कि “हे राजन! तुम एक दिन हमारी तरह पुत्र वियोग में तड़फ तडफ़ के मरोगे” इस से उन्हें हौसला मिलता था। कि ये श्राफ एक दिन पुत्र प्राप्ति का सौभाग्य बनकर अवश्य आएगा। (कालिदास के रघुवंशम में इसका वर्णन दिया हुआ है।)
ऐसी ही एक घटना 1872 के करीब अमेरिका में एडिसन के साथ घटी..
जब उसकी अध्यापिका ने अपनी ख़ुद की अयोग्यता को छुपाने के लिए एक जिज्ञासु विद्यार्थी एडिसन को महज़ इसलिए स्कूल से एक “आरोप-पत्र” देकर निकाल दिया था। क्योंकि वो किसी बात को समझ न पाने तक अक्सर प्रश्न पूछा करता था। जो एक अच्छे विद्यार्थी होने का संकेत है। अपने इसी स्वभाव में एडिसन ने अपनी माँ से भी पूछ ही लिया कि इस पत्र में क्या लिखा है..? तो माँ ने कह दिया कि बेटे इसमें लिखा है कि “आपका बेटा बहुत होशियार है।इसलिए इसे कल से स्कूल में आने की आवश्यकता नहीं है। ये तो घर पर ही सब कुछ सीख जाएगा।”

और आपको बता दूं उन दिनों स्कूल काफ़ी दूर-दूर भी हुआ करते थे। एडिसन के माता-पिता तो वैसे भी आर्थिक रूप से काफ़ी निर्धन थे। बच्चे के लिए एक माँ के द्वारा इस तरह का “झूठ” बोलना…यहाँ मेरा ऐसा मानना है वो “झूठ” की परिभाषा में नहीं आता.. I mean, it was her proper handling a soft hearted child at that time..एक माँ के लिए उस समय मज़बूरी से कहीं अधिक एक बच्चे को सही तरासने के लिहाज़ से “वक़्त” की मांग भी थी। लेकिन अब प्रभु की लीला एवं “सकारात्मक सोच के प्रभाव” का चमत्कार देखिए.. जो बच्चा स्कूल में महज़ चौथी कक्षा के मध्य तक ही पढ़ सका हो। उसने वो कर.. दिखाया जो उसके स्तर से बहुत ऊपर.. की बात है। क्योंकि हम सब जानते हैं कि हर बच्चे की प्रथम गुरु माँ होती है। इसलिए उसने सब कुछ घर पर रह कर मां के द्वारा बताये हुए “आरोप-पत्र” की बातों में पूर्ण आस्था एवं उत्साह रखते हुए उसने सब कुछ अपनी माँ के सहयोग से सीखा। उस वक्त एडिसन की माँ का नज़रिया यदि “सकारात्मक” न रहा होता तो क्या एडिसन एक वैज्ञानिक बन पाता..? तो फिर क्या बल्ब एवं ग्रामोफ़ोन जैसे बड़े-बड़े आविष्कार हो पाते..?
ज़ाहिर है विल्कुल नहीं।
मगर कुछ वर्ष बाद जब एडिसन की माँ दुनियाँ में नहीं रहीं.. तो एक दिन घर की साफ-सफ़ाई करते-करते वही “आरोप-पत्र” एडिसन के हाथ लग गया। तब एडिसन ने उसे स्वयं पढ़ा तो दंग रह गया..उसमें लिखा था कि “आपका बेटा न केवल शैतान है वल्कि हद से ज़्यादा मूर्ख भी है इसलिए पढ़ाई तो दूर की बात है..ये अपने जीवन में कुछ भी नहीं कर सकेगा। इसलिये हम इससे सदैव के लिए छुटकारा पाना चाहते हैं आप तत्काल इसे ले जाइये।” ये पत्र पढ़ने के बाद एडिसन को अपनी माँ की “सकारात्मक-सोच” का प्रभाव अपने ऊपर जो दिख रहा था। उसके लिए एडिसन का ह्रदय भावुक होते-होते मन ही मन अपनी देवी समान माँ को धन्यवाद दे रहा था। क्योंकि ये तो आप और हम भी समझ सकते हैं। यदि एडिसन के साथ उसकी माँ का रवैया सदैव “धैर्यपूर्ण एवं सकारात्मक” की जगह वही रहा होता जो अमूमन माताओं का होता है..I mean उनके न चाहते हुए भी मजबूरन अपनी घरेलू परिस्थितियों के सामने वे अपना धैर्य खो बैठती हैं, और अक्सर स्थिति बेकाबू होती चली जातीं हैं। यहां एक बात स्पष्ट है। कि माँ का “धैर्यवान” होना भी बहुत आवश्यक है।
इसी लिए किसी ने बहुत सुंदर लिखा है; कि
” अनुकूलता भोजन है,
प्रतिकूलता विटामिन है, उसी प्रकार चुनौतियाँ वरदान है। और जो उनके अनुरूप व्यवहार करें..वही सच्चे “पुरूषार्थी” हैं।
जब हम सुख मिलने पर खुश रहते हैं, तो उसी प्रकार कभी कोई दुःख, विपदा, अड़चन आ जाये..तो घबराना नहीं चाहिए। क्योंकि क्या पता वो अगले किसी सुख की दस्तक हो। इसलिए सदैव न केवल सकारात्मक अपितु धैर्यवान भी रहें..!!
बस इस आपत्ति काल में धैर्य और संयम के साथ Lockdown का पालन पूर्ण ईमानदारी से करें, अगर जिम्मेदारी निर्वहन हेतु बाहर जाने की विवशता या सेवा का सौभाग्य बने तो पूरी सतर्कता रहें।
धन्यवाद।
युग पचहरा, नीमगाँव, राया, मथुरा।(जन्मभूमि)

के.एल.जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस (कर्मभूमि)

30- Be Just with “Roles”….

We should transform into the “roles” according to the demand of “Time & Situation” because Place to Place & Person to Person a “Role” is called various names in the diffrent situation of relationship mainly in real life not reel life.
As;-
when a person is in his family. he is a Son of his parents, he is a brother of his other bro. & Sisters etc…
there is an example at the same-time & the same-place.
Therefore, I think purticularly, he must justice in his different “Roles”…Its today’s demand of human & moral values both.
Therefore, it is mind-over matter So we should take it seriously, it is just like a challenge to all.
Now I would like to prove this fact on the solid base of the South Indian popular Ramayan which is called “Ramavataram” who composed by a great saint Kamba (कम्बन) he was also the south Indian great poet. But remember “this flaky reference” (विचित्र-प्रसंग) is not available in Tulsi & Valmiki”s Ramayan. So it’s more significant.
When during the exile Sri Ram was in search of His wife Sita, He reached on seaside where is ‘Rameshvaram’ Today sri Ram expressed His desire to arrange a sacrificial-work (यज्ञ), and to establish the Shiva-Linga for the purpose to win “The Lanka” . So He said to Jamvant & His other companions to arrange a Profound-scholar / प्रकांड-पंडित (suyogya-Acharaya)..
Jamvant said I know about an expert Acharya but at the time he is your enemy..
Sri Ram replied, “Who is that..? ” Jamvant told Him that he is the Lankesh “Ravan” yet sri Ram said again, if you know that he is the best to host Holy-Rituals..As a Profound-scholar (Acharya). , please Once you should try to make him understood…” Perhaps he may accept to do this great arrangement..
Immediately, Jamvant went to Lanka and met with Ravan and told about in details . Lankesh Ravan also respected to Jamvant..and he began to think about this proposal seriously.
After sometime he thought deeply Acharya (Ravan) agreed to host this Holy Ritual (Havan)
Now, we should pay attention about Lankesh Ravan’s transforming personality in different “Roles” In a moment “Ravan gave importance “The Different roles’ theory” knowing the significant his another duty (Role) transformed himself into the frame of a real “Acharya.” Then he asked to Jamvant What is the purpose of this “Holy-Ritual”..? Jamvant also told him frankly.. “to win the Lanka”.
we can understand the inner-soul of Lankesh-Ravan would be shocked its but natural.

According to the reference of “Ramavtaram” hearing it there was no any effect on a “Acharya”. This is the transforming personality in different Roles of Sri Lankesh Ravan, really it’s praiseworthy.

This is the main attraction of this article too.
Now, Jamvant asked What material-aids would manage..? For the holy-rituals. Because our Host (यजमान) is a forest dweller (वनवासी). He is in exile for many years…So He couldn’t arrange any material-aids.
Acharya (Ravan) told to Jamvant.. Don’t worry, in this situation according to Shashtra…

Every Acharya , himself has to arrange every essential thing..
Then Acharya (Ravan) went to Ashok-Vatika where Sita dwelt, and he told everything to Devi-Sita.and said to Her, I am going to host a holy-Ritual (हवन) of my Yajaman (Sri Ram) so my foresight advises me You also will have to come, to join a holy-Rituals across the sea with me where my Yajaman (Sri Ram) stayed on at

But it’s my warning ! You will be in my custody..and after completing the Rituals & establishment of Shiva-Ling. (Rameshvaram) You will have to return with me as it is.

Once Devi Sita could not understand before to hear it, but later knowing Ravan’s body-language She understood about the Roles differentiation. She accepted , therefore, Devi Sita spoke to Ravan “Pranam Acharya”…And sat into the Pushpak-Viman to join the Holy-Rituals of sri Ram with
Acharya (Ravan). They reached to accross the sea where “the group of Ramadal” stayed. Both the brothers said to Ravan ‘Acharya Pranam’..And Ram again addressed himself before Acharya (Ravan) Please accept “Pranam” of Dashrath Nandan “Ram”
Acharya wished Ram & Laxman also and began to say Jamvant & others.. You must not be late beyond the proper limit of worship time.(Shubh-Muhurt) so he called his Yajaman come and sit here with his wife.
Hearing it, Sri Ram requested to Acharya(Ravan)…
Can this Holy-Ritual not be completed without wife..?
Acharya said Why not..? It may be… but there are Only in three conditions …In case.
1- Yajaman is widower,
2- he is bachelor now, and
3- he was discarded the wife.
Sri Ram cofessed before His Acharya.. these three conditions, you have told now, are not apply here but at this time physically my wife is not with me.
meanwhile Jamvant frankly spoke before the Acharya, His wife Devi Sita has been stolen by Lankesh Ravan. So now Acharya !
Have you another idea to complete this ritual..?
In fact, in this situation here, we will have to accept, At that time Ravan was not only profound-scholar but also he was really genious…
Acharya repeated his own words..Once again “According to Shashtra Acharya should manage every essential thing , I had known with my foresight therefore, I had managed it before.

Acharya (Ravan) told Laxman ! Devi Sita has been sat in the Pushpak-Viman by me so please called Her soon. But Remember ! Sita is yours only for Yagya. Otherwise..She would be in my custody,until you won her from me by the battle.
Everything had been done properly in time by profound scholar/ Acharya (Ravan) Shiva-Linga had been established by Ram so he had given that name “Rameshvaram.” Later a city developed in this place which name is also “Rameshvaram” there is “twelfth Jyotirling” today..we all go to worship there.
This special reference you can find in only southern Ramayan “Ramavtaram”which is composed by a very popular poet Kamba.. (लोकप्रिय महाकवि-कम्बन).
Educational:
(we should be in practical with our place to place different Roles’.)
By this amazing reference based on “Ramavtaram” seeing the seriousness about his both Roles as Lankesh “Ravan” & a Profound-scholar “Acharya” very contradictory situation… Awesome…! Wah ! it is not only inspiring but the Roles diffrentiation are also very appreciating matter.
we should go into depth of the Roles in real life so that we may justice with co-relatives…

It is sure..”Place to place, Time to time and Person to Person the Roles’ demand are quite different always.” But doing.. as;. It is sure our Moral & Human Values level can lift very high all over the world.
I thought it may be beneficial to all.. as you know it is mind-over matter so take it serious
Thanks ..Not only for reading but also following it in daily behavioral-life.
; YUG पचहरा,
88 A वसुन्धरापुरम,हाथरस।
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