100-“गौत्र-दान”

दरअसल, भारत में शादी-विवाह के दौरान जिसे लोग “कन्यादान”बोल दे रहे हैं वास्तविकता में तो वो ‘रश्म’ ‘गोत्रदान’ है।

पता नहीं कब से ये, शब्द प्रचलन में आ गया है। इसलिए शादी-विवाहों में होने वाली इस ‘रश्म’ की वास्तविकता को हमें जानना चाहिए;-

मैं कई एक वर्षों से देख रहा हूँ.. कि, “कन्यादान” शब्द पर समाज के अधिकतर लोगों में एक बहुत बड़ी गलतफहमी पैदा होती जा रही है।

मेरी समझ से आजकल विवाह सम्पन्न कराने वाले दोनों पक्षों के पूज्य ब्राह्मणों को स्वयं ही इस शब्द को पहले अपने संज्ञान में लेते हुए लोगों के जहन से न केवल इस “कन्या” के दान करने की भ्रांति” को निकाल देना चाहिए वल्कि शादी की रश्म करते वक़्त लोगों को स्पष्ट रूप से समझाते हुए इस शब्द की जगह रश्म का सही और उचित नाम “गौत्र-दान” वाली बात लोगों को बताते हुए इस वास्तविक तथ्य की गम्भीरता को समझने के बाद एक संशोधन के तहत इसे भारतीय “पाणिग्रहण-संस्कार” शब्दावली में शामिल कर लेना ही उचित है।

क्योंकि समाज को यह समझने की जरूरत है कि बेटी वाला न तो संपत्ति दान करता है। और… न ही ” अपनी-लड़की ” का दान। तो फिर इसे ‘कन्यादान’ किसने बोल दिया ..

इस रश्म” का वास्तविक मतलब “गोत्र-दान”…(सर नेम डोनेशन) से है। क्योंकि इस “विवाह-रश्म” के हम सभी साक्षी हैं कि, कन्या अपने “पिता” का गोत्र छोड़कर “वर” के गोत्र को धारण करके उसके घर में प्रवेश करती है, पिता कन्या को अपने गोत्र से विदा देता है..न कि अपने ‘जीवन’ से..और फिर बेटी के नाम के साथ लगे (पिता) अपने गोत्र को अग्नि देव को दान करके …तब उसी वक़्त सभी के सामने “वर” इस रश्म के माध्यम से अग्नि देव को साक्षी मानकर कन्या को अपना गोत्र अवधारण करने का विनम्र भाव से ‘आग्रह’ करता है, न कि ‘मजबूर’..

ये रश्म “वर” एवं “कन्या” की सहमति से होती है। फिर कन्या उस वर गोत्र को स्वीकार करती है। तब से उसके नाम के आगे ‘वर’ का गोत्र लिखा जाने लगता है।

मग़र इसे लोगों ने न जाने कैसे और कब..? ‘कन्यादान’ कहना शुरू कर दिया..

मेरे ख़्याल से लगता है, भूलवश ये शब्द प्रचलन में चला आ रहा है.. जो एकदम ग़लत है। मेरा इस ब्लॉग के माध्यम से सभी से करबद्ध विनम्र निवेदन है कि, कृपया ये जानकारी अपने लोगों के साथ न केवल साझा करें वल्कि सही शब्द का प्रयोग प्रचलन में लाने का भी अवश्य प्रयास करें।

ऐसा करके भारत में “भारतीय-संस्कृति” व “धार्मिक-परम्पराओं” को लेकर जो भ्रांति समाज में व्याप्त हैं उन्हें दूर करने में सदैव अपना योगदान दें,

भारतीय संस्कृति की रक्षा हेतु निरंतर वर्तमान व भावी पीढ़ी को जागरूक करते रहें.. “देश की संस्कृति जीवित रहेगी। तभी देश का विकास सम्भव है।”

धन्यवाद युग, पचहरा, के.एल.जैन इंटर कॉलेज, सासनी,हाथरस।

99-“पॉजिटिविटी”

हज़ारो प्रयोग असफल होने के बावजूद भी सफलता का एक नया सपना देखने वाले ‘हौसले’ का नाम है..

“थॉमस एल्वा एडिसन”

एक ऐसा महामानव..

जिसने अपनी ‘मेहनत’, ‘लगन’ और माँ की “सकारात्मक-सोच” से ग्रामोफ़ोन और बल्व जैसे बड़े-बड़े अविष्कार करके पूरी दुनियाँ को अपने “पुरुषार्थ” से न केवल ‘रौशन’ कर दिया..अपितु लोगों के जीवन को संगीत की फुलझड़ियों से ‘खुशहाल’ भी कर दिया,

जबकि एक अध्यापिका का उदासीन व नकारात्मक रवैया, इनकी माँ को इनके खिलाफ़ एक “आरोप-पत्र” थमाकर कि, “आपका बेटा न सिर्फ शरारती है वल्कि एकदम मूर्ख है ये अपने जीवन में कुछ भी नहीं कर सकेगा, इसे आप यहाँ से ले जाइये।”, के कारण स्कूल से निकाल दिया जाता है।

क्योंकि उन दिनों स्कूल बहुत दूर-दूर हुआ करते थे। दूसरे उनके पिता अधिक साधन-सम्पन्न भी नहीं थे। इसलिए बालक ‘एडिसन’ पढ़ाई के क्षेत्र में महज़ चौथी फेल ही रह गया..

मग़र एक माँ का “पॉजिटिविटी” रवैया देखिये जो हम सबके लिए प्रेरणा स्रोत बन सकता है..कि उसने वो पत्र न तो अपने पति को दिखाया और न हीं बेटे को। और न ही अपने जीवन में उस घटना पर कभी कोई चर्चा की।

वल्कि एडिसन के पूछे जाने पर बड़े सहज भाव से बोल दिया कि, “बेटा ! आप सामान्य बच्चों से कुछ अलग (अधिक तेज ) हो, और स्कूल का अध्यापक-मंडल आपके सवालों के जवाब देने में अपने आपको असहज समझता है। इसीलिए अब आपकी पढ़ाई-लिखाई घर पर ही होगी।

मेरे ख्याल से शायद कुछ था..भी ऐसा ही.. क्यों..?

उनकी माँ ने वो पत्र अपनी अलमारी में छुपा कर रख दिया। अब एडिसन धीरे-धीरे प्रतिदिन अपनी मां की ममता के सानिध्य एवं पिता की क्षमताओं की परिधि में रह कर शिक्षित होने लगा।

ये सर्वविदित है कि एकदिन उन तमाम लोगों के लिए “एडिसन” एक प्रेरणास्रोत बनकर सामने आया। जो किन्हीं परिस्थितियों वश कागज़ी रूप से डिग्रियां नहीं ले पाते.. मग़र चीजों की समझ के साथ-साथ वे अपने कार्यानुभव से जानकारियों के भंडार होते हैं..मेरे ख़्याल से कायदे में असल-शिक्षित, तो वे ही होते हैं।

इससे हम सबको एक सीख मिलती है कि “इरादे बुलंद हों, धैर्यपूर्वक एवं स्टेपवाईज जीवन में आगे बढ़ा जाय, तो क्या नहीं हो सकता..!

मग़र जब माँ के गुज़र जाने के कुछ दिन बाद अलमारी से कोई सामान निकालते वक़्त वो ‘आरोप-पत्र” एकदिन एडिसन के हाथ लग गया, तब एडिसन को पत्र की हक़ीकत समझ आयी, और साथ ही समझ आयी एक देवी स्वरूपा माँ की “पॉजिटिविटी” (सकारात्मकता)

जिसने एडिसन के जीवन को ‘अंधेरी-गलियों’ में भटकने के बजाय ‘सफलता की बुलन्दियों’ पर ला कर रख दिया था।

ऐसे लोक-कल्याणकारी “सकारात्मक-विचार” को मैं, युग, पचहरा शत शत नमन करता हूँ…

धन्यवाद 👍 एवं

सभी को नमस्कार 🙏🏼

98-“छवि”

एक विचार:

‘सूर्योदय’ एवं ‘सूर्यास्त’

दरअसल

‘सूर्योदय व सूर्यास्त’ पूरी दुनियाँ के लिए ईश्वर के वो सन्देश हैं जो प्रतिदिन हमें बताते है कि,

इस धरा पर व्यक्ति का 1-“विचार” और उस वैचारिक-धरातल पर व्यक्ति द्वारा किया हुआ 2-“कृतित्व” (कर्म)

That is the “Persona” in a Family, Society & the World..Of a person.

अर्थात वैचारिक-आचरण से परिवार,समाज व दुनियाँ के बीच एक व्यक्ति की वो “छवि” ही, तो है, जो एक पहचान होती है।

‘कर्म’ ही समाज में आपकी “छवि” को परिभाषित करते हैं। उसके अतिरिक्त दुनियाँ में कुछ भी “स्थाई” नहीं है। जो भी आप देख रहे हैं वह सब टेम्परेरी है।अस्थाई है।

यहां मैं, ऐसा मानता है कि, दुनियाँ में सब कुछ सूर्योदय की तरह एक नियत समय पर शुरू होता है और सूर्यास्त की तरह एक निश्चित समय-सीमा के तहत एक दिन समाप्त हो जाता है। ये सब व्यक्ति की ‘कर्म-गति’ के आधार पर पूर्व-निर्धारित होता है।

हाँ, लोगों के ज़हन में रह जाती है.. तो, बस आपकी एक “छवि” इमेज जो आपके स्वभाव, व्यवहार एवं आचरण का प्रतिबिम्ब होती हैं।

हमारे विचार व्यक्ति के स्थूल शरीर के न रहने के बाद भी समाज के बीच सूक्ष्म-शरीर के रूप में अपनी “वैचारिक-आभा” के रूप में मौजूद रहते हैं।

इसका भी अपना एक समय है जो व्यक्ति के “वैचारिक एवं व्यवहारिक-स्तर” पर निर्भर करता है।

जिसकी चर्चा-परिचर्चा कर्म-संस्कारवश समय-समय पर लोगों द्वारा कहीं न कहीं अवश्य होती है।

तो क्यों न..?

इस “जीवन-यात्रा” का भरपूर आनंद लेते हुए हम सब देश-दुनियाँ, समाज व परिवार को अपनी एक साफ-स्वच्छ “छवि” देने का प्रयास करें …जो आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय भी हो..

धन्यवाद👍

आभार एवं नमस्कार

; युग,पचहरा,

नीमगाँव,राया, मथुरा।

97- “महानायक”

क्या आप इस बात से सहमत हैं..?

कि ‘पटनायक’ ही वास्तव में सच्चे “महानायक” थे।

जी हां! “बीजू पटनायक” आपने ठीक समझा, मैं उन्हीं की बात कर रहा हूं।जो भारत के एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं। जिनके निधन पर उनके शरीर को तीन देशों के राष्ट्रीय-ध्वजों में लपेटे जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। वाह! मेरे देश के गौरव! वाह! तुझको मेरा शत शत नमन ! ✈️✈️✈️ ……✈️✈️✈️

भारत,रूस और इंडोनेशिया….. यहां मैं स्पष्ट कर दूं..

दरअसल 5 मार्च, 1916 उड़ीसा के ‘कटक’ में जन्मे श्री विजयानंद पटनायक ही बाद में “बीजू पटनायक” के नाम से लोकप्रिय हुए। वे न केवल देश के एक बेहतरीन पायलेट थे, वल्कि उन्होंने देश को “एयर ट्रांसपोर्ट कमांड” के मुखिया के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं।

विश्व के करेंट अफेयर्स पर नजर रखने वालों को अवश्य ही पता होगा..जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ संकट में घिर गया था तब पटनायक जी ने लड़ाकू विमान ‘डकोटा’ उड़ा कर हिटलर की सेनाओं पर काफी बमबारी की थी। जिससे हिटलर पीछे हटने को मजबूर हो गया था। उनकी इस बहादुरी पर उन्हें सोवियत संघ का सर्वोच्च पुरस्कार देने के साथ साथ सोवियत संघ ने उन्हें अपने देश की नागरिकता भी प्रदान की थी…..

कश्मीर पर जब कावालियों ने आक्रमण किया था, तब बीजू पटनायक ही थे। जिन्होंने प्लेन उड़ा कर दिन में कई चक्कर दिल्ली से श्रीनगर के लगाए थे। और सैनिकों को सुरक्षित श्रीनगर पहुंचाया था…..

इंडोनेशिया कभी ‘डच’ यानी हालैंड का उपनिवेश था। आपको मालूम होगा. डच लोगों ने इंडोनेशिया के काफी बड़े इलाके पर कब्जा किया हुआ था और इन डच सैनिकों ने इंडोनेशिया के आसपास के सारे समुद्र तट को अपने कंट्रोल में ले रखा था। और वह किसी भी इंडोनेशियन नागरिक को बाहर नहीं जाने देते थे।

उस वक्त इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री ‘सजाहिर्र’ को एक कांफ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए भारत आना था। लेकिन डचों ने उन्हें इसकी भी इजाजत नहीं दी थी। इसके लिए इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति ‘सुकर्णो’ ने भारत से मदद मांगी। और उसी दौरान इंडोनेशिया के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने विशेष रूप से बीजू पटनायक से मदद मांगी।

बीजू पटनायक और उनकी पत्नी ने अपनी जान की परवाह किए बिना एक ‘डकोटा-प्लेन’ लेकर डच के कंट्रोल एरिया के ऊपर से उड़ान भरते हुए उनकी धरती पर उतरे और बेहद बहादुरी का परिचय देकर इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री को सिंगापुर होते हुए सुरक्षित भारत ले आए।

इससे न केवल इंडोनेशिया के लोगों में असीम ऊर्जा का संचार हुआ,वल्कि उन्हें हिम्मत भी मिली। जिसके बाद उन्होंने एक मजबूत रणनीति के तहत ‘डच- सैनिकों’ पर धावा बोला। तब कहीं जाकर इंडोनेशिया “एक पूर्ण आजाद मुल्क बना।”

बाद में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो के घर बेटी पैदा हुई तब उन्होंने उसका नामकरण करने के लिए बीजू पटनायक और उनकी पत्नी को आदरपूर्वक दावत पर बुलाया। तब बीजू पटनायक और उनकी पत्नी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति की बेटी का नाम “मेघवती” रखा था।

उसी वक़्त इंडोनेशिया ने बीजू पटनायक और उनकी पत्नी को अपने देश की “आनरेरी-सिटीजनशिप” प्रदान की थी।

यह भी आप सब जानते होंगे कि उड़ीसा में “बीजू-जनता दल” एक राजनीतिक पार्टी है। और “बीजू पटनायक” न केवल इस दल के मुखिया थे, वल्कि वे दो बार (1961-63 व 1990-95 तक ) उड़ीसा के मुख्यमंत्री बने।

बीजू पटनायक के बेटे नवीन पटनायक मार्च 2000 से अभी भी पांचवीं बार उड़ीसा के मुख्यमंत्री बने हुए हैं। “बीजू जनता दल” की कमान भी नवीन पटनायक के ही हाथों में है।

बीजू पटनायक जैसे “महानायक” की मृत्यु 17 अप्रैल,1997 में दिल्ली में “हिर्दय व सांस” की बीमारी के कारण हुई थी।

इनके निधन पर इंडोनेशिया में सात दिनों का राजकीय शोक मनाया गया था।

रूस में एक दिन के लिए राजकीय शोक रखा गया था। उस वक्त उन्होंने भी अपना राष्ट्रीय झंडा झुकाके रखा था।

अपने देश के ऐसे महान शख्स के बारे में पता चलने पर अगर आपको गर्व की अनुभूति हुई हो तो अपनी इस प्रसन्नता को आप अपने साथियों में भी शेयर कर सकते हो।

धन्यवाद 😊😊 योगेन्द्र सिंह पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा।

96-“जीवन्त”

दुनियाँ की भागमभाग में चाहे कभी आपको ऐसा क्यों न लगे कि, आपकी भलाई को लोग नजऱ अंदाज कर रहे हैं।

और हाँ, बेशक, आपकी अच्छाई सामाजिक-वातायन में अदृश्य दिखे..!

मग़र फिर भी आप ताउम्र अपनी अच्छाइयों पर क़ायम रहें.. क्योंकि ईश्वर का सी.सी. कैमरा बहुत ही “हाईएस्ट-विज़न” वाला है, जो अंधेरे में भी हर पल आपकी एक-एक हरक़त रिकॉर्ड करता रहता है। उसकी फ़ुटेज आपके प्रारब्ध का आधार है।

आपकी अच्छाइयों से समाज व लोगों के जहन में बनीं आपकी “छबि” लोगों के दिलों-दिमांग पर सदैव अपनी एक अमिट छाप अवश्य छोड़ती है। जो आपके सम्पर्क में आये इंसानों के द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित हो..लोगों के हिर्दय में स्थान रखती है वशर्ते..”विचार” में दम हो..!

यहाँ, मैं, ऐसा सोचता हूँ.. कि, समय-समय पर लोगों को आपका स्मरण दिलाने के लिए पर्याप्त है..

क्योंकि ऐसे इंसान शरीर से भले ही एक दिन हमारे बीच न रहें.. मग़र फेमस इंग्लिश-पोइट मि.जॉन मिल्टन को आधार बना कर कहूँ, तो “विचार”और उस वैचारिक धरातल पर किया हुआ “कृतित्व” सिर्फ ये ही ‘दो-चीज’ हैं जो दुनियाँ में ‘स्थायी’ होती हैं। वरना, जो भी आप देख रहे हैं.. सांसारिक दृष्टि से वो सब क्षणभंगुर है।

“विचार” की उम्र सदैव व्यक्ति से अधिक होती है। इसलिए महापुरुष दुनियाँ भर में अपनी “वैचारिक-छवि” से सदैव लोगों के दिलों में ‘जीवन्त’ रहते हैं.. जैसे; भगवान महावीर, भगवान बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, गुरु गोविन्द सिंह, मदर टेरेसा एडिशन मौहम्मद हमीद.. जैसे अनेकों महामानव हैं जो लोगों की स्मृति में “जीवन्त” हैं।

🙏 सभी का आभार..

एवं अभिनन्दन 🙏

युग,पचहरा,

नीमगाँव,राया, मथुरा।

95-“कर्म-बीज”

ये तो स्वाभाविक है कि,मन का भाव रूपी ‘कमल’ तो सदैव अभाव (कमी) की दुर्गम पहाड़ियों पर ही खिला है और खिलेगा भी।

ईश्वरीय कृपा से ‘लक्ष्य’ की प्राप्ति भी भक्त या शिक्षार्थी द्वारा की गयी भक्ति एवं लगन की कठिन परीक्षा के बाद ही होती है।

हाँ, ये भी ज़ाहिर सी बात है ‘वस्तु व उद्देश्य’ जितना महत्वपूर्ण होगा, उसकी प्राप्ति में उतना ही धैर्य, समय व परिश्रम भी लगता है।

प्रत्येक ‘जीव’ को उसका ‘कर्म-फल’ दिया, तो सदैव ईश्वर के ही हाथों,जाता है।

मग़र निराकरण, उसके अपने संचित-कर्म/संस्कारों को आधार मानते हुए उसके “प्रारब्ध” की क्षमताओं को देखकर..होता है।

‘मनुष्य’ की निर्मलता, मन, कर्म और सोच की पवित्रता भक्त को ईश्वर का एवं शिक्षार्थी को शिक्षक का कृपा पात्र बनाती है।

लेकिन मन की चालाकी, वैचारिक अपवित्रता और दूसरों के प्रति षडयंत्रों का मकड़-जाल (खुराफ़ात) बुनने वाले मनुष्यों के ‘जीवन की राह’ में आने वाले अवरोधों का मूल कारण उनके ‘कर्म’ ही होते हैं। कुछ और नहीं।

इसीलिए नकारात्मक “कर्म-बीज” बोने से हमेशा बचें।

मनुष्य के पास आज जो उसका ‘वर्तमान’ मौजूद है, दरअसल, वही तो अतीत में किये गए उसके ‘कर्मों’ की “पूँजी” है। जिसे बड़े बुजुर्ग “प्रारब्ध” कहकर समझाते आये हैं।

आज अभी जो वह कर रहा है, वे “कर्म-संस्कार” चाहे नेगेटिव हों या पॉजिटिव वही संचित होकर मनुष्य के प्रारब्ध से जुड़ते रहते हैं। और वे ही मनुष्य के ‘भविष्य’ की “पूँजी” बनते हैं।

ये पॉइंट थोड़ा जटिल है, चलो, इसे एक छोटी सी कहानी के द्वारा समझने का प्रयास करते हैं..

मानलें, कि किसी व्यक्ति ने अपने किसी नज़दीकी रिश्तेदार के बच्चे को उसके जन्मदिन पर कोई तौफा (गिफ़्ट) दिया, तो उस गिफ़्ट को देते समय उसके मन में क्या “भाव” रहे..

न.1 अहंकार के, (कि मेरा गिफ़्ट सबसे बेहतर है-प्रशंसा की आकांक्षा वाले ..)

न.2 दिखावे के, (ताकि उसकी लोकप्रियता बढ़े )

न.3 दया के, (अहसान करके मान सम्मान पाने के)

न.4 सर्वोत्तम-भाव “नेकी कर दरिया में डाल..” वाला होता है अर्थात (Do good & Forget)

क्योंकि यहां मेरा ऐसा मानना है कि, ‘खिलौना’ या ‘गिफ़्ट’ जो भी दिया वो तो नश्वर ( Ephemeral) है। मेरा मतलव भौतिक है। मग़र उसको आधार बना कर हमारे मन रूपी तालाब में भावनाओं के जो “कमल” खिले, मेरा असली सवाल तो उस कर्म-प्रभाव पर है..?

I think,”Feelings are true earning of ‘KARMA’..”

क्योंकि सांसारिक जुबान में ‘कर्म’ के एवज़ में मिलने वाली आर्थिक कमाई (सैलरी) अस्थायी है। लेकिन ‘कर्म’ के दौरान मन में जो “भावनाएँ” बनीं हैं वो ‘कर्ता’ से यूं ही जुदा नहीं हो जातीं..?

स्थूल शरीर तो यहीं छूट जाता है.. संस्कार या पूर्व-संस्कार ही वे ‘कर्म’ हैं जो प्रारब्धवश जन्मजन्मांतर हमारी आत्मा के साथ चलते हैं।

मनुष्य ‘चेतन्य-अवस्था’ में रहते हुए अपने कर्म, सोच व वाणी में संयम रखे, तो दुनियाँ की “पूर्व-निर्धारण” व्यवस्था में निश्चय ही उसके “जीवन की दिशा” का निर्धारण उचित होगा।

परिणामस्वरूप, मन, कर्म और वाणी से मनुष्य अपने जीवन रूपी “खेत” में जैसे “कर्म-बीज” वोता है, वैसी ही फ़सल वो काटता है। इतिहास साक्षी है और ये ही जीवन का “कटु-सत्य” है।

जीवन के इस गणित को जो समझ जाता है, वास्तव में, वही जीवन को आनंद के साथ “जी..ता” है।

वरना दुनियाँ में जीवन को ढो..ने वालों की कोई.. कमी नहीं है।

धन्यवाद

“एक विचार”

;युग,पचहरा,

94-“ह्यूमन-ऑर्किटेक्ट”

जी हाँ,

देखिए..’शिल्पकारी’ एक कला है। इसमें कोई दोराय नहीं है।

लेकिन क्या आप मेरी इस बात से इत्तिफ़ाक़ रखते हैं,कि ‘शिक्षक’ बनकर देश की सेवा के लिए किसी विद्यालय में तैनाती मिलना भी कोई हल्का-फुल्का दायित्व नहीं है। ये भी एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। बशर्ते कि “अमुक व्यक्ति” इस पद के साथ न्याय कर पाए !!

क्योंकि मेरी नज़र से दुनियाँ में शिक्षक ही एक “ह्यूमन-आर्किटेक्ट” है।

चलो, इसे एक छोटी सी कहानी के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं..

एक बार एक शिल्पकार लंबी यात्रा के बाद थका-मांदा किसी छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिए बैठ जाता है। थकान दूर होते ही शिल्पकार की नज़र अचानक अपने सामने पड़े एक पत्थर के टुकड़े पर पड़ी। वह उस सुंदर पत्थर के टुकड़े को उठा लेता है। अपने सामने रखता है और औजारों के थैले से छेनी-हथौड़ी निकालकर उसे तराशने के लिए तैयार हो जाता है..

जैसे ही पहली चोट मारी… पत्थर जोर से चिल्ला पड़ा, “उफ! मुझे मत मारो।” फिर वह रोने लगा, “प्लीज मत मारो मुझे, मुझ पर प्रहार न करो… बहुत दर्द होता है।

शिल्पकार ने उस पहले पत्थर को, तो छोड़ दिया, मग़र अपनी पसंद का एक और पत्थर उठाया फिर उसे हथौड़ी से तराशने लगा। वह टुकड़ा चुपचाप उसकी छैनी का वार सहता गया और देखते ही देखते उसमें से एक सुंदर “वंशी बजाती” हुई भगवान “श्रीकृष्ण” की मूर्ति उभर आई।

मूर्ति को वहीं पेड़ के नीचे रख, वह शिल्पकार (ऑर्किटेक्ट) अपनी राह पकड़ कर आगे बढ़ गया..

कुछ वर्षों बाद उस शिल्पकार का फिर से उसी पुराने रास्ते से गुजरना हुआ, जहाँ पिछली बार विश्राम किया था, तो..

जैसे ही वह शिल्पकार उस स्थान पर पहुँचा, तो उसने देखा कि, उसके द्वारा बनी हुई उस”पत्थर की मूर्ति” को लोगों ने एक भव्य मंदिर में स्थापित कर दिया है, जहां लोगों की भीड़ उस मूर्ति की पूजा-अर्चना करने में लगी हुई है।

अब आनंदित शिल्पकार को ऐसा लग रहा है कि, उस मूर्ति में विराजमान “श्री कृष्ण” वाकई चैन की मधुर वंशी बजा रहे हों..

जब दर्शन का समय आया, तो दर्शन करते वक़्त शिल्पकार को एक सुखद अनुभव के साथ-साथ एक ख़्याल भी आया कि, देखो ! मेरी बनाई हुई मूर्ति का आज कितना “आदर-सत्कार” हो रहा है!

मग़र पत्थर का वह पहला टुकड़ा जो शिल्पकार की छैनी की चोट नहीं सहन कर सकने के कारण, पत्थर के रोने-चिल्लाने पर शिल्पकार ने छोड़ दिया था…संयोग देखिये..

वह आज वहीं एक ओर पड़ा है और लोग उसके सिर पर नारियल फोड़-फोड़ कर उसी मूर्ति पर चढ़ा रहे हैं।

मंदिर में ईश्वरीय प्रभाव से शिल्पकार के मन में एक विचार आया कि, जिस प्रकार मैं पत्थरों को तराशकर सुन्दर मूर्ति में तब्दील कर देता हूँ…

ठीक वैसे ही एक “शिक्षक” “मानव-शिशुओं” को तराशकर देश के लिए सच्चे और अच्छे नागरिक तैयार करने का काम करता हैं।

जो अपने आप में बहुत ही दुर्गम-कार्य है। क्योंकि वह मेरी तरह निर्जीव पत्थर को नहीं वल्कि एक हरकत करते ‘जीव’ के हिर्दय की गहराई बढ़ाकर दुनियाँ के लिये उसे “जीवन्त” करता है..

जिससे वह आत्मसम्मान के साथ जीने की कला में पारंगत होकर अपने जीवन में कुछ बनने के लिए एक ‘सच्चे विद्यार्थी’ के रूप में अपने शिक्षक को समझकर उसकी डांट को सहन कर अपने शिक्षक द्वारा दी गयी नसीहत को स्वीकार करते हुए बहुत कुछ कष्ट झेल लेने के बाद उसका वह ‘विद्यार्थी-जीवन’ आगे चलकर ज़िन्दगी का वो आकार लेता है, कि लोग उसे भी एक शिल्पकार की मूर्ति की तरह पूजते हैं अर्थात “आदर-सम्मान” देते हैं। जिससे वो “श्री कृष्ण” की तरह अपने जीवन में ताउम्र चैन की वंशी बजाते हुए दुनियाँ का भरपूर आनन्द लेता है।

और अपने अच्छे कार्यों के आधार पर न केवल अपने परिवार,समाज व देश दुनियां बल्कि एक दिन समूचे विश्व में भरपूर “आदर-सम्मान” पाता है।

ध्यान रहे! इंसान के “अच्छे-कार्यों” की उम्र व्यक्ति से कहीं अधिक होती है।

लेकिन उस पत्थर के पहले टुकड़े की तरह कुछ कमज़ोर-विद्यार्थी, जो विद्या-अध्ययन से डर जाते हैं और ‘प्रारम्भिक-शिक्षा’ के दौरान ही तमाम शिकवा-शिकायत करते-कराते.. दुर्भाग्यवश वे अपने जीवन में कुछ बेहतर सीखने से वंचित रह जाते हैं,

ऐसे शिक्षार्थी ” विल्कुल उस पहले पत्थर की तरह ही होते हैं जिस पर नारियल तोड़े जा रहे हैं। व्यक्ति की अज्ञानता व कमज़ोरी ताउम्र उनका पीछा करती है। दुनियाँ के लोग अक्सर अपनी गलतियों का ठीकरा उनके ही सिर पर फोड़ते रहते हैं। और ऐसे लोग हर जगह शिकवा शिकायत करते हुए अक्सर मिल जाते हैं।

अर्थात वे अशिक्षित होने के कारण किसी भी क्षेत्र में अपने आपको स्थापित न कर पाने से जीवन भर कष्ट में रहते हैं।

क्योंकि “आदर-सत्कार की जगह “दुत्कार, फटकार एवं तिरस्कार” सहन करना उनकी नियति बन जाता है।

अब फ़ैसला आपके हाथ में है, कि आप अपने जीवन में क्या चुनते हैं..?

धन्यवाद👍 एवं नमस्कार

आपकी नज़र एक विचार.. ; युग, पचहरा,

( जैन कॉलेज,सासनी,हाथरस। )

93-“बधाई हो बधाई..”

Congratulation to all of us..

Our national anthem “Jana Gana Mana… ” is declared as the “BEST ANTHEM OF THE WORLD” by UNESCO.

👍Just 23rd January, 2021 (Yesterday)

So Kindly share this. Very proud to be an INDIAN. 👏👏👏👏👏🇮🇳

Meaning of our National Anthem … 🇮🇳 Please try to understand the meaning and pronounce it clearly. Word by word.. meaning.. Before you..

Jana = People Gana = Group Mana = Mind Adhinayaka= Leader Jaya He = Victory Bharata = India Bhagya = Destiny Vidhata = Disposer Punjaba = Punjab Sindhu = Indus Gujarata = Gujarat Maratha = Marathi Maharashtra

Dravida = South

Utkala = Orissa Banga = Bengal Vindhya =Vindhyas Himachal =Himalay Yamuna = Yamuna Ganga = Ganges Uchchhala = Moving Jaladhi = Ocean Taranga = Waves Tava = Your Shubh =Auspicious

Naame = name

Jage = Awaken

Tava = Your

Shubha = Auspicious Aashisha = Blessings Maage = Ask

Gaahe = Sing

Jaya = Victory

Gatha = Song

Jana = People

Gana = Group Mangala = Fortune Dayaka = Giver

Jay He = Got Victory Bharata = India Bhagya = Destiny Vidhata = Dispenser

💐Jay He, Jay He, Jay He, Jay Jay Jay Jay He = Victory, Victory, Victory, Victory Forever…

As an Indian citizen You must share it..& Let all people know the Exact meaning of OUR NATIONAL ANTHEM …

Jay Hind, Vande Matram

92-“आत्मविश्वास”

“आत्मविश्वास” हो तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसा..

ये मंजर उस दौर का है, जब नेताजी हिटलर को पहली बार मिलने जर्मनी गए, तो हिटलर के आदमियों ने उन्हें बाहर प्रतीक्षा हॉल में बैठा दिया।

जैसी, कि नेताजी की आदत थी वे वहाँ बैठे-बैठे किताब पढ़ने लगे।

थोड़ी देर बाद एक आदमी आया (जो कि हिटलर का हमशक्ल था।) और नेताजी के साथ बात कर के चला गया। नेता जी ने कोई भाव व्यक्त नहीं किया।

थोड़ी देर के बाद दूसरे आदमी ने हिटलर के वेश में आकर नेताजी से हिटलर बन कर बात की। नेताजी ने उसे भी कोई भाव नहीं दिया…

इस तरह एक के बाद एक, कई बार हिटलर के वेशधारी और हमशक्ल उनके पास आकर खुद को हिटलर बता-बताकर बात करते रहे.. लेकिन, नेताजी अपने स्वाध्याय में तल्लीन रहे…

(जबकि,वहाँ आम तौर पर दूसरे लोग हिटलर के हमशक्ल को मिलते ही, खुद हिटलर को मिलके आए हैं। ऐसे भ्रम में वापस लौट जाया करते थे।)

आखिर में, खुद हिटलर ही आया और आते ही हिटलर ने नेताजी के कंधे पर हाथ रखा, नेताजी तुरंत बोल उठे, “हिटलर”….!!!! हिटलर भी आश्चर्य में पड़ गया और नेताजी से पूछ ही लिया कि, “इतने सारे मेरे हमशक्ल आए फिर भी आप मुझे कैसे पहचान गए..? जब कि मेरी और आपकी ये पहली मुलाकात है…”

तब नेताजी ने जवाब देते हुए कहा,अरे हिटलर! जिसकी आवाज़ से ग्रेट ब्रिटेन का प्रधानमंत्री तक कांपता हो। उस “सुभाष चंद्र” बोस के कंधे पर हाथ रखने की गुस्ताखी दुनिया में सिर्फ हिटलर ही कर सकता है, क्या दूसरे किसी की मज़ाल है..?

“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” का नारा बुलंद करने वाले भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महानायक, आजाद हिन्द फौज के संस्थापक भारत रत्न, देश प्रेमियों के प्रेरणास्रोत “नेताजी सुभाषचंद्र बोस” जी की जनशक्ति पर उन्हें सादर नमन करते हुए, मेरा ऐसा भाव है, कि मां भारती की आजादी में उनके संघर्ष व बलिदान का देश सदैव ऋणी रहेगा..

🇮🇳जय हिंद वंदे मातरम🇮🇳

युग,पचहरा,

88A वसुन्धरापुरम, हाथरस

91-“हैल्थ इज वैल्थ”

!! Health is Wealth !!

जी हाँ, “स्वास्थ्य ही धन” है।

सौभाग्यवश यदि आप इसे पढ़कर रोजमर्रा के अपने जीवन में उतार पाए, तो मेरा दावा है कि, इससे न केवल आपका ‘जीवन’ सुधर जाएगा, वल्कि आप एक “खुशहाल-जीवन” भरपूर आनन्द के साथ जी..ओगे। 🙏

1-आमाशय उस समय शिकायत दर्ज कराता है, जब आप प्रातः काल अल्पाहार की जगह पूर्णाहार ले ले ते हैं।

2-किडनी उस समय असहज फील करती है, जब आप 24 घण्टे में भी 10 गिलास पानी नहीं ले पाते।

3-पित्ताशय की परेशानी का सबब होता है,ये कि जब आप रात्रि 11 बजे तक भी नहीं सो पाते, और सूर्योदय से पूर्व उठ नहीं पाते।

4-छोटी आंत घायल होती है तब, जब आप उसे ठंडा और बासी भोजन देते हैं।

5-बड़ी आंत घायल होती है उस वक्त,जब आप उसे बहुत तला, भुना और मसालेदार भोजन दे ते हैं।

6-फेफड़े परेशान होते हैं,तब जब आप सिगरेट,और धुयें आदि से प्रदूषित वातावरण में उन्हें सांस लेने को कहते हैं।

7-लिवर उस वक्त परेशान होता है जब आप हद से ज्यादा एल्कोहल लेते हैं या बहुत भारी जंक, फ़ास्ट फ़ूड खाते रहते हैं।

8-हृदय ब्रेन को उस वक्त परेशानी दर्ज कराता है, जब आप अपने भोजन में अधिक नमक और घी तेल खाते हैं।

9-अग्नाशय उस वक्त बहुत कुपित होता है, जब आप मीठी चीजें अधिक खाते हैं क्योंकि वो स्वादिष्ट के साथ-साथ सहज उपलब्ध है।

10-आंखे उस वक्त परेशानी महसूस करती हैं,जब आप कम प्रकाश में मोबाईल और कम्प्यूटर स्क्रीन पर अधिकतर काम करते रहते हैं।

11-मस्तिष्क उस स्थिति में परेशान होने लग जाता है, जब आप नकारात्मक सोचने लगते हैं।

12-आत्मा उस समय घायल होती है,जब आप नैतिकता के विरुद्ध कार्य करते हैं।

चेतावनी ;- ध्यान रहे कि, ये सभी चीजें बाजार में उपलब्ध नही हैं। इसीलिए खुद की अच्छी तरह से इनकी देखभाल रखते हुए..किसी भी तरह अपने शरीर एवं मन-मस्तिष्क को स्वस्थ बनाये रखियेगा।

धन्यवाद एवं सभी को नमस्कार 🙏🙏🙏

विचारक ; युग,पचहरा, (नीमगाँव,राया,मथुरा)