94-“ह्यूमन-ऑर्किटेक्ट”

जी हाँ,

देखिए..’शिल्पकारी’ एक कला है। इसमें कोई दोराय नहीं है।

लेकिन क्या आप मेरी इस बात से इत्तिफ़ाक़ रखते हैं,कि ‘शिक्षक’ बनकर देश की सेवा के लिए किसी विद्यालय में तैनाती मिलना भी कोई हल्का-फुल्का दायित्व नहीं है। ये भी एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। बशर्ते कि “अमुक व्यक्ति” इस पद के साथ न्याय कर पाए !!

क्योंकि मेरी नज़र से दुनियाँ में शिक्षक ही एक “ह्यूमन-आर्किटेक्ट” है।

चलो, इसे एक छोटी सी कहानी के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं..

एक बार एक शिल्पकार लंबी यात्रा के बाद थका-मांदा किसी छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिए बैठ जाता है। थकान दूर होते ही शिल्पकार की नज़र अचानक अपने सामने पड़े एक पत्थर के टुकड़े पर पड़ी। वह उस सुंदर पत्थर के टुकड़े को उठा लेता है। अपने सामने रखता है और औजारों के थैले से छेनी-हथौड़ी निकालकर उसे तराशने के लिए तैयार हो जाता है..

जैसे ही पहली चोट मारी… पत्थर जोर से चिल्ला पड़ा, “उफ! मुझे मत मारो।” फिर वह रोने लगा, “प्लीज मत मारो मुझे, मुझ पर प्रहार न करो… बहुत दर्द होता है।

शिल्पकार ने उस पहले पत्थर को, तो छोड़ दिया, मग़र अपनी पसंद का एक और पत्थर उठाया फिर उसे हथौड़ी से तराशने लगा। वह टुकड़ा चुपचाप उसकी छैनी का वार सहता गया और देखते ही देखते उसमें से एक सुंदर “वंशी बजाती” हुई भगवान “श्रीकृष्ण” की मूर्ति उभर आई।

मूर्ति को वहीं पेड़ के नीचे रख, वह शिल्पकार (ऑर्किटेक्ट) अपनी राह पकड़ कर आगे बढ़ गया..

कुछ वर्षों बाद उस शिल्पकार का फिर से उसी पुराने रास्ते से गुजरना हुआ, जहाँ पिछली बार विश्राम किया था, तो..

जैसे ही वह शिल्पकार उस स्थान पर पहुँचा, तो उसने देखा कि, उसके द्वारा बनी हुई उस”पत्थर की मूर्ति” को लोगों ने एक भव्य मंदिर में स्थापित कर दिया है, जहां लोगों की भीड़ उस मूर्ति की पूजा-अर्चना करने में लगी हुई है।

अब आनंदित शिल्पकार को ऐसा लग रहा है कि, उस मूर्ति में विराजमान “श्री कृष्ण” वाकई चैन की मधुर वंशी बजा रहे हों..

जब दर्शन का समय आया, तो दर्शन करते वक़्त शिल्पकार को एक सुखद अनुभव के साथ-साथ एक ख़्याल भी आया कि, देखो ! मेरी बनाई हुई मूर्ति का आज कितना “आदर-सत्कार” हो रहा है!

मग़र पत्थर का वह पहला टुकड़ा जो शिल्पकार की छैनी की चोट नहीं सहन कर सकने के कारण, पत्थर के रोने-चिल्लाने पर शिल्पकार ने छोड़ दिया था…संयोग देखिये..

वह आज वहीं एक ओर पड़ा है और लोग उसके सिर पर नारियल फोड़-फोड़ कर उसी मूर्ति पर चढ़ा रहे हैं।

मंदिर में ईश्वरीय प्रभाव से शिल्पकार के मन में एक विचार आया कि, जिस प्रकार मैं पत्थरों को तराशकर सुन्दर मूर्ति में तब्दील कर देता हूँ…

ठीक वैसे ही एक “शिक्षक” “मानव-शिशुओं” को तराशकर देश के लिए सच्चे और अच्छे नागरिक तैयार करने का काम करता हैं।

जो अपने आप में बहुत ही दुर्गम-कार्य है। क्योंकि वह मेरी तरह निर्जीव पत्थर को नहीं वल्कि एक हरकत करते ‘जीव’ के हिर्दय की गहराई बढ़ाकर दुनियाँ के लिये उसे “जीवन्त” करता है..

जिससे वह आत्मसम्मान के साथ जीने की कला में पारंगत होकर अपने जीवन में कुछ बनने के लिए एक ‘सच्चे विद्यार्थी’ के रूप में अपने शिक्षक को समझकर उसकी डांट को सहन कर अपने शिक्षक द्वारा दी गयी नसीहत को स्वीकार करते हुए बहुत कुछ कष्ट झेल लेने के बाद उसका वह ‘विद्यार्थी-जीवन’ आगे चलकर ज़िन्दगी का वो आकार लेता है, कि लोग उसे भी एक शिल्पकार की मूर्ति की तरह पूजते हैं अर्थात “आदर-सम्मान” देते हैं। जिससे वो “श्री कृष्ण” की तरह अपने जीवन में ताउम्र चैन की वंशी बजाते हुए दुनियाँ का भरपूर आनन्द लेता है।

और अपने अच्छे कार्यों के आधार पर न केवल अपने परिवार,समाज व देश दुनियां बल्कि एक दिन समूचे विश्व में भरपूर “आदर-सम्मान” पाता है।

ध्यान रहे! इंसान के “अच्छे-कार्यों” की उम्र व्यक्ति से कहीं अधिक होती है।

लेकिन उस पत्थर के पहले टुकड़े की तरह कुछ कमज़ोर-विद्यार्थी, जो विद्या-अध्ययन से डर जाते हैं और ‘प्रारम्भिक-शिक्षा’ के दौरान ही तमाम शिकवा-शिकायत करते-कराते.. दुर्भाग्यवश वे अपने जीवन में कुछ बेहतर सीखने से वंचित रह जाते हैं,

ऐसे शिक्षार्थी ” विल्कुल उस पहले पत्थर की तरह ही होते हैं जिस पर नारियल तोड़े जा रहे हैं। व्यक्ति की अज्ञानता व कमज़ोरी ताउम्र उनका पीछा करती है। दुनियाँ के लोग अक्सर अपनी गलतियों का ठीकरा उनके ही सिर पर फोड़ते रहते हैं। और ऐसे लोग हर जगह शिकवा शिकायत करते हुए अक्सर मिल जाते हैं।

अर्थात वे अशिक्षित होने के कारण किसी भी क्षेत्र में अपने आपको स्थापित न कर पाने से जीवन भर कष्ट में रहते हैं।

क्योंकि “आदर-सत्कार की जगह “दुत्कार, फटकार एवं तिरस्कार” सहन करना उनकी नियति बन जाता है।

अब फ़ैसला आपके हाथ में है, कि आप अपने जीवन में क्या चुनते हैं..?

धन्यवाद👍 एवं नमस्कार

आपकी नज़र एक विचार.. ; युग, पचहरा,

( जैन कॉलेज,सासनी,हाथरस। )

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