100-“गौत्र-दान”

दरअसल, भारत में शादी-विवाह के दौरान जिसे लोग “कन्यादान”बोल दे रहे हैं वास्तविकता में तो वो ‘रश्म’ ‘गोत्रदान’ है।

पता नहीं कब से ये, शब्द प्रचलन में आ गया है। इसलिए शादी-विवाहों में होने वाली इस ‘रश्म’ की वास्तविकता को हमें जानना चाहिए;-

मैं कई एक वर्षों से देख रहा हूँ.. कि, “कन्यादान” शब्द पर समाज के अधिकतर लोगों में एक बहुत बड़ी गलतफहमी पैदा होती जा रही है।

मेरी समझ से आजकल विवाह सम्पन्न कराने वाले दोनों पक्षों के पूज्य ब्राह्मणों को स्वयं ही इस शब्द को पहले अपने संज्ञान में लेते हुए लोगों के जहन से न केवल इस “कन्या” के दान करने की भ्रांति” को निकाल देना चाहिए वल्कि शादी की रश्म करते वक़्त लोगों को स्पष्ट रूप से समझाते हुए इस शब्द की जगह रश्म का सही और उचित नाम “गौत्र-दान” वाली बात लोगों को बताते हुए इस वास्तविक तथ्य की गम्भीरता को समझने के बाद एक संशोधन के तहत इसे भारतीय “पाणिग्रहण-संस्कार” शब्दावली में शामिल कर लेना ही उचित है।

क्योंकि समाज को यह समझने की जरूरत है कि बेटी वाला न तो संपत्ति दान करता है। और… न ही ” अपनी-लड़की ” का दान। तो फिर इसे ‘कन्यादान’ किसने बोल दिया ..

इस रश्म” का वास्तविक मतलब “गोत्र-दान”…(सर नेम डोनेशन) से है। क्योंकि इस “विवाह-रश्म” के हम सभी साक्षी हैं कि, कन्या अपने “पिता” का गोत्र छोड़कर “वर” के गोत्र को धारण करके उसके घर में प्रवेश करती है, पिता कन्या को अपने गोत्र से विदा देता है..न कि अपने ‘जीवन’ से..और फिर बेटी के नाम के साथ लगे (पिता) अपने गोत्र को अग्नि देव को दान करके …तब उसी वक़्त सभी के सामने “वर” इस रश्म के माध्यम से अग्नि देव को साक्षी मानकर कन्या को अपना गोत्र अवधारण करने का विनम्र भाव से ‘आग्रह’ करता है, न कि ‘मजबूर’..

ये रश्म “वर” एवं “कन्या” की सहमति से होती है। फिर कन्या उस वर गोत्र को स्वीकार करती है। तब से उसके नाम के आगे ‘वर’ का गोत्र लिखा जाने लगता है।

मग़र इसे लोगों ने न जाने कैसे और कब..? ‘कन्यादान’ कहना शुरू कर दिया..

मेरे ख़्याल से लगता है, भूलवश ये शब्द प्रचलन में चला आ रहा है.. जो एकदम ग़लत है। मेरा इस ब्लॉग के माध्यम से सभी से करबद्ध विनम्र निवेदन है कि, कृपया ये जानकारी अपने लोगों के साथ न केवल साझा करें वल्कि सही शब्द का प्रयोग प्रचलन में लाने का भी अवश्य प्रयास करें।

ऐसा करके भारत में “भारतीय-संस्कृति” व “धार्मिक-परम्पराओं” को लेकर जो भ्रांति समाज में व्याप्त हैं उन्हें दूर करने में सदैव अपना योगदान दें,

भारतीय संस्कृति की रक्षा हेतु निरंतर वर्तमान व भावी पीढ़ी को जागरूक करते रहें.. “देश की संस्कृति जीवित रहेगी। तभी देश का विकास सम्भव है।”

धन्यवाद युग, पचहरा, के.एल.जैन इंटर कॉलेज, सासनी,हाथरस।

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