98-“छवि”

एक विचार:

‘सूर्योदय’ एवं ‘सूर्यास्त’

दरअसल

‘सूर्योदय व सूर्यास्त’ पूरी दुनियाँ के लिए ईश्वर के वो सन्देश हैं जो प्रतिदिन हमें बताते है कि,

इस धरा पर व्यक्ति का 1-“विचार” और उस वैचारिक-धरातल पर व्यक्ति द्वारा किया हुआ 2-“कृतित्व” (कर्म)

That is the “Persona” in a Family, Society & the World..Of a person.

अर्थात वैचारिक-आचरण से परिवार,समाज व दुनियाँ के बीच एक व्यक्ति की वो “छवि” ही, तो है, जो एक पहचान होती है।

‘कर्म’ ही समाज में आपकी “छवि” को परिभाषित करते हैं। उसके अतिरिक्त दुनियाँ में कुछ भी “स्थाई” नहीं है। जो भी आप देख रहे हैं वह सब टेम्परेरी है।अस्थाई है।

यहां मैं, ऐसा मानता है कि, दुनियाँ में सब कुछ सूर्योदय की तरह एक नियत समय पर शुरू होता है और सूर्यास्त की तरह एक निश्चित समय-सीमा के तहत एक दिन समाप्त हो जाता है। ये सब व्यक्ति की ‘कर्म-गति’ के आधार पर पूर्व-निर्धारित होता है।

हाँ, लोगों के ज़हन में रह जाती है.. तो, बस आपकी एक “छवि” इमेज जो आपके स्वभाव, व्यवहार एवं आचरण का प्रतिबिम्ब होती हैं।

हमारे विचार व्यक्ति के स्थूल शरीर के न रहने के बाद भी समाज के बीच सूक्ष्म-शरीर के रूप में अपनी “वैचारिक-आभा” के रूप में मौजूद रहते हैं।

इसका भी अपना एक समय है जो व्यक्ति के “वैचारिक एवं व्यवहारिक-स्तर” पर निर्भर करता है।

जिसकी चर्चा-परिचर्चा कर्म-संस्कारवश समय-समय पर लोगों द्वारा कहीं न कहीं अवश्य होती है।

तो क्यों न..?

इस “जीवन-यात्रा” का भरपूर आनंद लेते हुए हम सब देश-दुनियाँ, समाज व परिवार को अपनी एक साफ-स्वच्छ “छवि” देने का प्रयास करें …जो आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय भी हो..

धन्यवाद👍

आभार एवं नमस्कार

; युग,पचहरा,

नीमगाँव,राया, मथुरा।

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