110-“इज्ज़त / बेइज्जत”

यदि मनुष्य स्वयं को ईश्वर प्रदत्त सच्चे एवं सरल स्वभाव..वाले ‘स्वरूप’ में रख पाता है, अर्थात ‘मनुष्यता’ के दायरे में रहता है, तो

मेरा ऐसा मानना है कि,उसके लिए, दुनियाँ में फिर “इज्ज़त-बेइज्जत” नाम की कोई चीज़ नहीं रह जाती। फिर वो एकदम ‘सरल’ हो जाता है।

मग़र बुजुर्ग सदैव कहते आये हैं.. ‘सरल’ होना कठिन है।

दरअसल, दुनियाँ भर के लोग जिसे ‘इनसल्ट’ कहते आये हैं वह असल में इंसान का ख़ुद का ही “ईगो-स्वरूप” (Ego-Form) है।और कुछ नहीं।

विचार कीजियेगा.. ये बात ज़रा नाज़ुक है! ‘ईगो’ शब्द ऐसा है, दुनियाँ में जितने लोग इसकी उतनी ही परिभाषाएं हो जाएंगी..

मग़र ‘ईगो’ को मैंने, जितना जाना या समझा है.. मेरे ख्याल से ये है..”Considering yourself what you are not, and then trying you are hard to protect ‘the thing’ ” that’s ‘Ego.’

जैसे; “अस्सी जट मैं! मैं,हूँ अस्सी जट ! ,अस्सी साड्डा ए..!, बोल कें..कीता..? “

ये वाला जो रुआब है, दरअसल यही ‘ईगो-स्वरूप’ है।

मेरा सभी ब्लॉग-रीडर्स से विनम्र निवेदन है.. कि, कोई भी इसे व्यक्तिगत न ले.. बस एक उदाहरण के तौर पर मेरा ‘फ़िकरा’ (View) समझने का प्रयास कीजियेगा..

जैसे; मैं नौकरीशुदा ! मैं अध्यक्ष ! , मैं संस्था-प्रधान!, मैं सचिव! वग़ैरह वग़ैरह… ये जो “मैं” है, बस यही ‘ईगो’ है।

ऐसी बातें इंसान सदैव ‘ईगो’ के वशीभूत ही बोलता है। वरना, ऐसे अनर्गल-प्रलाप की आवश्यकता ही क्या..है! और फिर उसी के अनुरूप अपना मनगढ़ंत “इज्ज़त / बे-इज्ज़त का एक पैरामीटर सैट कर लेता है। जो एक निम्न ‘सोच’ का द्योतक है।

अन्यथा ‘सरल-स्वभाव’ वाले बन्दे, तो हमेशा ऐसा विचारते हैं कि, योग्यता+कार्यानुभव+पूर्व कर्मों के संस्कारों द्वारा निर्मित प्रारब्ध से जो भी दायित्व हमें मिलें हैं, वो एक निश्चित वक़्त के लिए ही तो हैं। उन्हें बख़ूबी निभाएं.. क्योंकि एक निश्चित समय-सीमा के बाद वही दायित्व किसी और को मिल जाने हैं, आख़िर अमुक-ओह्दे की पहचान तो एक अच्छे या बुरे ‘बन्दे’ के रूप में ही होनी है। जैसा उसका “वर्क ऑफ नेचर” रहेगा। फिर क्यों अपनी पीढ़ियों को ख़राब करते हो….

मुझे तो ये ‘संसार की चक्रीय-क्रम’ व्यवस्था के अंतर्गत एक “कार्य-हस्तांतरण” जैसा खेल लगता है। परन्तु इसे लोगों ने अज्ञानतावश ‘ईगो’ के वशीभूत अपनी इज्ज़त / ‘बेईज्जती’ से जोड़ लिया है जो एकदम निराधार है ग़लत है।

असल ‘सवाल’ तो इस बात का है कि, जिस भी बन्दे को कोई छोटी या बड़ी अमुक जिम्मेदारी मिली.. उसने वह “निभाई कैसी..?” वह “उसके-साथ” न्याय कर सका या नहीं..?

यदि नहीं.., तो लोक-प्रचलित दो ‘सैद्धांतिक-कहावतें’, “सत्ता पाहि काहि मद नाहिं”, एवं “राजेस्वरी सो नरकेस्वरी” ये दूध का दूध और पानी का पानी करने में पूर्ण सक्षम हैं।

इसमें कोई दोराय नहीं है। ये कहावतें किसी भी जिम्मेदारी के सन्दर्भ में बंदों पर यदि चरितार्थ होतीं हैं, तो ये जग ज़ाहिर है।

अपनी सन्तुष्टि के लिए आप इतिहास में भी झांक सकते हैं।

कर्मयोग में स्पष्ट लिखा है, न सिर्फ पद के ‘मदान्ध बंदों’ को वल्कि उनकी आने वाली सन्ततियों को भी इस ईगो लिप्त एक-एक “क्रिया-कलाप” का भुगतान करना होता है। दुनियाँ में कोई भी कर्म खाली नहीं जाता! अच्छे को अच्छा और बुरे की बुरा भोगना ही होता है।..That solve..

धन्यवाद

109-“अपोलो-13”

आज ‘अपोलो-13’ अधिकतर के लिए मात्र एक ‘हॉलीवुड मूवी’ है..

जबकि वास्तविकता ये है कि यह एक सच्ची घटना है जो बहुत ही प्रेरणादायक है। इसे जन-जन तक पहुंचाने के लिए इस पर मूवी प्लान की गयी.. निर्देशक के साथ-साथ अन्य सभी में ‘टीम-स्प्रिट’ को देखकर आप कह सकते हैं..कि ये फ़िल्म हम सबके लिए आज ‘सही निर्देशन’ की एक बेहतरीन मिसाल है।

ये मंज़र उस दौर का है जब,अमेरिका के फ़ेल्ड.. मून मिशन पर जाने वाले “अपोलो-13” चंद्रमा के बिल्कुल नजदीक पहुँचते-पहुँचते अंतरिक्ष यान के लगभग फेल हो जाने की स्थिति में..

उसकी हालत ये हो गयी थी कि उसमें पॉवर विल्कुल न के बराबर बची थी। ‘न’ के बराबर से मेरा मतलव है कि, प्रेसर इतना कम हो गया था कि, अंतरिक्ष यान तो क्या..उतने कम प्रेसर पर, किसी घर का वैक्यूम क्लीनर भी नहीं चल सकता!!

उन परिस्थितियों में अंतरिक्ष यान चंद्रमा से धरती पर वापस आएगा.. ये कहना तो एकदम असम्भव ही था!

मग़र उन कर्मयोगी ‘फरिश्तों’ ने पूरी दुनियां को एक ‘सकारात्मक-सोच’ के जादू से असम्भव को सम्भव करके दिखाया!!

एकबार को लग रहा था कि कुछ भी सम्भव नहीं है। अधिकतर लोग हताश होने लगे थे, हर कोई मान चुका था कि अंतरिक्ष यात्रियों में से दुर्भाग्यवश वहाँ अब एक भी जीवित नहीं बच पाऐगा..😢

यहाँ तारीफ़ करनी होगी..मिशन के डायरेक्टर ‘जीन क्रेंज’ की। क्योंकि उन हालातों में मिशन के मुखिया ने एक ऐसा डायलॉग बोला, जो ‘मील का पत्थर’ साबित हुआ..।

“Failure is not an option.”

अर्थात ‘असफलता तो विकल्प ही नहीं है।’

उसी वक़्त यह ‘डायलॉग’ इतिहास के पन्नों पर सदैव के लिए दर्ज हो गया। आप, कभी ‘नासा-ह्यूस्टन’ जाइएगा, तो इस डायलॉग को वहाँ की दीवारों पर लिखा पाएंगे।

इस डायलॉग के ज़रिये ‘जीन’ ने अंतरिक्ष-यात्रियों का हौसला बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें ये भी बोला..कि

“America has never lost any person in any moon mission and ‘Most certainly America will not loose anyone in my leadership.”

अर्थात् ग़ौरतलब है अमेरिका ने किसी भी ‘चंद्रमा मिशन’ पर आजतक कोई भी यात्री नहीं खोया, और ..

जीन क्रेंज़ ने तुरन्त कहा! ये तय है कि मैं अपने नेत्रत्व में ऐसा कलंक अपने ऊपर कभी नहीं लगने दुंगा..?

ये ही है वो “हौसला”..! जिसने न केवल इतिहास रचा..अपितु पूरी दुनियां के लिए एक प्रेरणादायक प्रकरण बनकर सामने आया..आगे हम और आप जानते ही हैं उन सबकी हिम्मत और मेहनत से सभी अंतरिक्ष यात्री पुनः धरती पर सकुशल वापस आए।

यह कहानी है उस “हौसले”.. की। जो ये ज़ाहिर करता है, कि ‘नेत्रत्व वही मज़बूत है, जो वक़्त की नज़ाकत समझते हुए विकट परिस्थितियों में भी सही फ़ैसले लेने की सामर्थ्य रखता हो।’👍

यहाँ हमें ये मानना पड़ेगा कि, मनुष्य वाक़ई “शक्तिमान” है। उसकी ‘कल्पना-शक्ति’ में बेजोड़ ताक़त है जिसे शब्दों में कभी अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता।

बशर्ते कि, वह ‘अपनी-पर’ आ.. जाय !

तो आप ख़ुद सोचिए.. वह क्या..? नहीं कर सकता..मेरा मतलव..’वह सबकुछ कर सकता है।’

मनुष्य के समक्ष सदैव दो बाह्य शक्तियाँ जो पूर्ण प्राकृतिक हैं और सात ‘आंतरिक-शक्तियाँ’ जो उसके ख़ुद के अंदर मौजूद रहतीं हैं..सम्पूर्ण जगत में इन ‘नौ’ शक्तियों के अतिरिक्त कोई अन्य शक्ति होती नहीं। यदि कोई इनका आपस में सही संयोजन बना पाय, तो मनुष्य में वाक़ई ‘अकूत’ ताकत है! फिर कभी किसी अन्य लेख में उन सभी नौ शक्तियों की चर्चा अवश्य करेंगे।

आप यदि किसी ‘पूर्वाग्रह’ से ग्रसित न हों, तो मैं एक बात कहूँ..ध्यान कीजियेगा.. लगभग एक वर्ष पूर्व देश में बेहद अनिश्चय का माहौल था।

सवाल “Covid-19 महामारी से कैसे बचा जाए..?”

उस वक़्त ये ‘सवाल’ भी ‘अपोलो-13’ की कहानी से कम जटिल नहीं था। अंतरिक्ष-यात्रियों की ही तरह उस वक़्त कोई कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था..?

लॉकडाउन..के दौरान मैंने हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी को बड़े गौर से पढ़ा.. सच कह रहा हूँ.. मैं शॉक्ड रह गया.. उसमें हमारे देश के प्रति बहुत अच्छे संकेत नहीं थे। मग़र अन्य देशों की तुलना में आज लगभग एक वर्ष बाद देश में जो भी स्थिति है। मैं इतना तो जरूर कहने की हालत में हूँ कि, वह हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट से कहीं बेहतर है।

इसका श्रेय देश के वैज्ञानिकों, मेडिकल स्टाफ़ की दिन रात की कड़ी मेहनत, देश की फोर्स आदि के साथ-साथ देश के नागरिकों की बेहतर प्रतिरोधक क्षमता और समय से वैक्सीन तैयार कराने…और फिर उसके मुफ़्त टीकाकरण की समुचित व्यवस्था कराने आदि सब के पीछे एक व्यक्तित्व ऐसा भी है..

जो ‘अपोलो-13’ के डायरेक्टर मिस्टर ‘जीन क्रेज’ की तरह इस भयंकर महामारी की गिरफ्त से बचाव के अपने ‘अप्रत्याशित-प्रयासों’ से देश को क़रीब-क़रीब निकालकर ही ले आया है। तो इसका बहुत कुछ श्रेय देश की “बुलन्द हौसले & फैसले लेने वाली” वर्तमान लीडरशिप को क्यों नहीं जाना चाहिए..?

मग़र सबकुछ साफ दिखने के बावजूद भी ये सच्चाई बहुतों के गले नहीं उतरेगी.. लेकिन सच तो आख़िर सच ही रहता है..इतिहास गवाह है..झूँठ के बादल सच के सूरज को कभी भी बहुत देर तक ढक के नहीं रख पाए हैं। वह आख़िर निकल कर आ ही जाता हैं। धन्यवाद।

आपका युग

108-“षड्यंत्र”

Do You Know About this conspiracy..?

वाक़ई बहुत बड़ा षड्यंत्र है!!

आप के हिर्दय के किसी कोने में अगर थोड़ा बहुत भी देश-प्रेम होगा, तो मेरा विश्वास है,कि आप ऐसे आस्तीन के सांपों के झांसे में बार-बार तो नहीं आएंगे..?

आप ही देखिये…

पाकिस्तान बना…. कांग्रेस शासन में. बांग्लादेश बना…. कांग्रेस शासन में. न केवल 370 लागू हुआ….वल्कि एक षड़यंत्र के तहत लम्बे समय तक लागू रखा..गया कांग्रेस की गलत नीति के कारण। अल्पसंख्यक बिल आया… कांग्रेस शासन में. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बना…. कांग्रेस शासन में….😳👇🤭

अल्पसंख्यक मंत्रालय बना…. कांग्रेस शासन में. अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय भी बना …. कांग्रेस शासन में..

ये सभी काम “कांग्रेस” ने अपनी तुष्टीकरण की नीति के तहत “मुसलमानो” को सिर्फ ‘वोट-बैंक’ के रूप में स्तेमाल करने के लिए” किये..

विडम्बना देखिये.. वो भी उस वक़्त जब देश का “बंटवारा” ‘धार्मिक’ आधार पर हुआ हो !

तो क्या ये कांग्रेस की तैयारी समस्त देश के नागरिकों को “गजवा-ए-हिन्द” में झोंकने वाली नही दिखती… ???

ये कांग्रेस की देश को- धीरे-धीरे “इस्लामिक देश” बनाने की सोची-समझी रणनीति थी, वो तो इनके घोटालों के खुलने की एक सिरीज़ सी चल पड़ी.. जिससे चारों तरफ कांग्रेस की लुटिया डूबती ही चली गयी।

उसने “हिन्दुओं” के लिए “आरक्षण” नहीं वो अपने आकाओं की सलाह पर ‘कास्ट-कार्ड’ नाम का एक गेम खेला गया, ताकि “हिन्दू- समाज” सदा आपस में लड़ता रहे और बंटा भी रहे।

जिससे वे कभी कांग्रेस के “गजवा-ए-हिन्द” नाम के षड्यंत्र की ओर ध्यान भी न कर पाएं…. अब तो सत्ता में आने वाली हर पार्टी इसी फॉर्मूला को बढ़ावा दे रही है।

पूर्व प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई ने अपनी किताब “मेरा जीवन वृतांत” में पृष्ठ संख्या 456 पर स्पष्ट लिखा है कि :- पता नही क्यों ? नेहरु को – “हिन्दू धर्म” के प्रति – एक “पूर्वाग्रह” था ??

उस वक़्त नेहरु ने – हिन्दुओं को दोयम नागरिक बनाने के लिए – “हिन्दू कोड बिल” लाने की कोशिश तो बहुत की थी, लेकिन

“सरदार बल्लभभाई पटेल” ने नेहरु को चेतावनी देते हुए साफ-साफ कह दिया था कि – यदि मेरे जीते जी आपने “हिन्दू कोड बिल” के बारे में सोचा भी.. तो मैं, “कांग्रेस” से न केवल उसी वक्त “इस्तीफ़ा” दे दूंगा,

वल्कि इस बिल के “खिलाफ” सड़कों पर “हिन्दुओं” को लेकर उतर जाऊँगा,

फिर पटेल की धमकी के सामने नेहरू की क्या विसात थी..? नेहरु उस वक्त तो “डर” गये.., मग़र सरदार पटेल के “देहांत” के बाद – नेहरू ने अपनी प्लांनिंग के तहत “हिन्दू कोड बिल” संसद में न केवल पेश किया वल्कि पास भी करा लिया..

इतिहास गवाह है, इस बिल पर चर्चा के दौरान.. आचार्य ‘जे.बी. कृपलानी’ ने – “नेहरु” को खरी-खरी सुनाते हुए “कौमवादी” और “मुस्लिम परस्त” तक कहा था। मग़र कांग्रेसियों की चमड़ी कितनी मोटी है, ये आज देश का हर नागरिक अच्छी तरह जानता है, और पहचानता भी है..

श्री कृपलानी ने ये भी कहा था कि आप सिर्फ “हिन्दुओं को धोखा” देने के लिए “जनेऊ” पहनते हो, वरना आपमें इस्लामियत कूट-कूट कर भरी हुई है। आप में हिंदुओं वाली बात, तो कहीं है ही नहीं !

यदि आप सच में “धर्म निरपेक्ष” होते ….? तो – “हिन्दू कोड बिल” के बजाय – सभी धर्मो के लिए “सर्व धर्म-कोड बिल” लाते.. ! ध्यान रहे..

मेरा ‘दलगत-राजनीति’ से कभी भी कोई सरोकार नहीं रहा है।

मग़र, देश हित में ‘वैचारिक- धरातल’ पर मैं ‘अपना-विचार’ सदैव से रखता आया हूँ..

इसमें कोई बात नहीं, मेरे किसी भी विचार को लोग कभी भी अन्यथा न लें.. क्योंकि चीजों को समझने का ‘पर्सन टू पर्सन’ अपना एक नज़रिया होता है।

ऐसी जानकारी तो मैं देश-हित में अपना नैतिक-दायित्व समझते हुए “Do You know.? सिरीज़ के तहत सिर्फ ये सोच कर शेयर कर लेता हूँ कि –

बहरहाल, आप जानते ही हैं मेरा हर ब्लॉग ‘न्यूट्रल-थॉट’ बेस्ड है।

मैं इस लिहाज़ से लिख देता हूँ कि, “सही तथ्यों को जानेगा इंडिया” तभी तो “ग़द्दारों” की छाती पे चढेगा इंडिया।

धन्यवाद👍

जय हो! “वसुधैवकुटुम्बकम” !!

नमस्कार 🙏

; युग, पचहरा, ( शिक्षक,जैन कॉलेज,सासनी,हाथरस।)

107- “सार्थकता”

प्रिय साथियो!  नमस्कार

जीवन में प्रत्येक व्यक्ति ख़ुद को एक न एक दिन ज़िन्दगी के ऐसे मोड़ पर खड़ा पाता है..।

जहाँ टिक-टिक कर चलने वाला ये “वक़्त” भी कुछ पल के लिए ठहरा, हुआ सा लगता है।

  जीवन के बहुमूल्य समय को खपा कर कमाई हुई ये ‘विलासिता’ भी हमें दैनिक जीवन में ‘उत्कृष्टता’ का अहसास तक कराने में मददगार नहीं हो पाती।

ऐसी स्थिति में..केवल हमारी शारीरिक व मानसिक स्वस्थता, और परिवार, समाज या देश-दुनियाँ के स्तर पर की हुई थोड़ी सी भी ‘भलाई’ तब भी एक बार को हमारे अन्तःकरण में आनन्द की अनुभूति करा जाती है। वरना, सब कुछ समय,ऊर्जा एवं जीवन की बर्वादी जैसा ही लगता है। 

मेरे ख़्याल से.. जीवन की “सार्थकता” भी इसी अनुभूति में  है..?

इसीलिए..

सभी के साथ-साथ मेरा ख़ुद से भी यही आग्रह है..कि समय रहते, जैसे भी सम्भव हो सके,

हमें, “आध्यात्मिकता, योग-साधना एवं सदाचार” जैसी अच्छाइयों को अपने दैनिक जीवन में जगह अवश्य देनी चाहिए.. 

ताकि ताउम्र अर्थात जीवन के अंतिम पड़ाव में भी हम स्वस्थ, हर्षित एवं खुशहाल रह सकें..! ‬👍   ‪

जय हो! वसुधैवकुटुम्बकम!‬

; युग,पचहरा नीमगाँव,राया,मथुरा।

106-“कर्ता या दृष्टा “

यदि इंसान की “मनःस्थिति” सुधरे तो फिर सब सुधर सकता है।

“मन” में विचारों की एक श्रंखला होती है। अर्थात हर पल कुछ न कुछ घटता ही रहता है।

लेकिन समस्या तब आती है, जब विचारों के साथ-साथ कई बार हम ख़ुद भी उठते और गिरते रहते हैं तथा जीवन में पैदा होने वाली तमाम असमानताओं का स्वयं कारण बनते हैं।

मग़र दोष सदैव परिस्थितियों और संबंधियों को या फिर सामाजिक व पारिवारिक हालातों को ही देते हैं।

निगेटिविटी के कारण अपने अंदर तमाम शारीरिक व मानसिक रोगों को पाल लेते हैं।

इससे बचने के लिए हम को “स्टॉप ट्रैवलिंग विद आवर अनवांटेड थॉट्स” अर्थात हमें अपने आप को कर्ता मानना बंद करना होगा। ये आपको थोड़ा सा विरोधाभाषी लगेगा मग़र सत्य है।

अगर आध्यात्मिक नज़रिए से देखें तो दुनियाँ में ‘कर्ता’ सिर्फ ईश्वर है, दूसरा कोई नहीं।

आप कभी भी विचार-प्रवाह के ‘थपेड़ों’ के हवाले मत हो जायेगा..

तो फिर..

क्या करें..?

“स्टार्ट ट्रेवललिंग विद योर ब्रीदिंग”

अर्थात अपनी सांसों के साथ यात्रा कीजिये।

लगातार अभ्यास से आप ऐसा कर सकोगे, “ये मेरा अपना अनुभव है। जब ऐसा होने लगता है, हम “कर्ता से दृष्टा” बन जाते हैं।

तब हम विचार रूपी प्रवाह के थपेड़ों से मुक्त होकर दूर से उनको उमड़ते घुमड़ते देखने लगते हैं..

और मानलो! कभी यदि हम किसी परिस्थिति में होते भी हैं, तो इस नज़रिए से परिस्थिति के उद्गम तक पहुंच जाते हैं और फिर तनाव की जगह सुधार के बाद हम नए रूप में रूपान्तरित हो जाते हैं।

ये भी एक विडम्बना है कि, सभी समस्याओं और तनावों के मूल में इंसान खुद ही होता है मग़र न जाने क्यों..? समाधान बाहर ढूंढता है..?

जो कि कभी भी संभव नहीं है। पहले हम “आत्मिक-स्तर” पर स्वयं से जुड़ें, खुद को जानें, फिर चाहे संसार की भौतिक उपलब्धियां हो, सामाजिक मान प्रतिष्ठा हो या आध्यात्मिक उपलब्धियां, जो भी हो..

ये सभी अभ्यास या कोई भी कार्य.. निरंतर होते रहना चाहिए .. रुकना, तो कतई नहीं चाहिए।

क्योंकि ‘एक कहावत के अनुरूप “जीवन चलने का नाम-चलते रहो सुबह-शाम” वाले सिद्धांत से और प्रकृति के नियमों से हमें जीवन बड़े संयम के साथ अच्छे से जीना चाहिए।

धन्यवाद ,जय हो! वसुधैवकुटुम्बकम!!

युग,पचहरा,नीमगाँव,राया, मथुरा।

105-कमज़ोर नायक

मेरा सभी किसान व मजदूर भाइयों को.. नमस्कार !

मैंने, वर्तमान सरकार (बी.जे.पी.) की ‘किसान विरोधी’ नीतियों से दुःखी होकर..जब अपने देश के ‘इतिहास’ के पन्नो को उलट कर देखा, तो तत्कालीन भारत के एक जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति के एक ग़लत निर्णय से देश के गुलाम होने के मूल कारण पर आकर मेरा दिमांग एकदम ठहर सा गया..  

ये मंज़र सत्रह वीं सदी के उस दौर का है, जब ‘हेक्टर’ नामक जहाज़ कुछ अंग्रेज व्यापरियों को लेकर भारत आया था। जिसके कप्तान हॉकिन्स ने सबसे पहले उस वक़्त के शासक बादशाह जहांगीर के दरबार में बड़े अदब से न केवल घुटनों के बल झुककर भारत की मातृभूमि को चूमा वल्कि बादशाह के प्रति अपना आदर भाव भी प्रकट किया। जो “नबन नींच की अति दुःख दायी” वाली कहावत को चरितार्थ करता है।

फिर एक बहुत ही क़ीमती भेंट प्रस्तुत करते हुए अपने देश इंग्लैंड के राजा जैक्स का पत्र  जहांगीर को दिया…जिसको पढ़ने के पश्चात जहांगीर ने अंग्रेजों को देश में व्यापार करने की इजाज़त दे दी। 

मानो, तभी से भारत का दुर्भाग्य शुरू हो गया…धीरे-धीरे अंग्रेजों ने न केवल अपना व्यापार फैलाया वल्कि भारत में अपनी जड़ें मज़बूत भी करने लगे..

देखते ही देखते भारत में अंग्रेजों का साम्राज्य स्थापित होने लगा..

    1755 में अंग्रेजों ने हमारे देश वासियों की कमजोरियों का लाभ उठाते हूए.. अपनी ‘फ़ूट डालो और शासन करो’ (Divid & Rule ) वाली नीति से..

1760 में भारत के चार राज्यों ;  बंगाल,बिहार,उड़ीसा और गुजरात को चूस कर न सिर्फ कंगाल कर दिया अपितु तबाही, भुखमरी जैसे हालात पैदा कर दिए जिससे वहाँ चारो तरफ ‘मौत ही मौत’ नज़र आने लगीं।       

इसके बाद 1772 में इंग्लैंड से लॉर्ड हेस्टिंग्ज एक नए जनरल के रूप में आया..

उसका मक़सद था भारत के अधिक से अधिक सोने-चाँदी को इंग्लैंड पहुंचाना। उसने वही किया।  

उसने एक एक्ट पास किया, जिससे भारतीय उद्योग धंधों को नष्ट करके गुजरात के सूरत में जुलाहों पर अत्याचार करके,  रेशम के कपड़ा बुनकरों का उत्पीड़न करके उनका दस रुपये का कपड़ा एक रुपये में बेचने को मजबूर करने का खेल खेला गया।

    इससे परेशान बेचारे कुछ देशभक्त जुलाहों ने अपने अंगूठे तक काट लिए थे

..    बाद में लार्ड विलियम वेंटिक ने देश वासियों को अपनी संस्कृति से दूर करने के लिए और उन पर अपनी अंग्रेजियत हावी करने के लिए अंग्रेजी भाषा अनिवार्य रूप से लागू करदी..   

मग़र ये कदम उनका ग़लत साबित  हुआ, इससे भारत के कुछ सच्चे देशभक्तों ने इसे सीखने के बाद उनकी नीतियों को समझकर उनकी ही काट की। ये पॉइंट भी भारत को आज़ाद कराने में काफी कारगर साबित हुआ।  

  निष्कर्ष ये है कि, दुर्भाग्यवश किसी देश का नायक, संस्था-प्रमुख, भारतीय समाज के आधार पर चेयरमैन, ग्राम-प्रधान व परिवार का मुखिया अर्थात किसी भी स्तर पर जिम्मेदार व्यक्ति अगर पद के प्रति ईमानदार व गम्भीर न हो, और अन्य जिम्मेदार लोग मूक-दर्शक बने रहें समय रहते वाजिव हस्तक्षेप करके उचित निर्णय न लें अर्थात सम्भालें.. तो हालात दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होते ही चले जाते हैं.. 👍

 : मुख्य विचारक  

; मुकेश ‘कालिया’  नीमगाँव,राया,मथुरा।

नोट- मुकेश जी ने ये विचार मुझे एक पेज पर लिखकर भेजे थे मुझे ठीक लगे तो ब्लॉग के रूप में publish कर दिए..👍

104-“शख़्सियत”

जनाव!

कितना ही अच्छा हो..! कि,

हम अपने समाज में सिर्फ एक ‘शख्स’ बनकर ही नहीं, वल्कि एक सरल-स्वभाव वाली “शख़्सियत” बनकर उभरें..और जीवन के हर-पल को जिएं….

क्योंकि ‘शख्स’ तो क्रिकेट के खेल की तरह ‘सांस’ रूपी अपने निश्चित ‘ओवर्स’ की समाप्ति पर (जो “प्रारब्ध” की ‘पूर्व-निर्धारण’ व्यवस्था है।) उसके अन्तर्गत एक नियत ‘समय’ के बाद दुनियाँ से विदा हो जाना है….

मग़र ये “शख़्सियत” की सरलता हमारे ‘स्थूल-शरीर’ के दुनियाँ छोड़ जाने के बाद भी..

परिवार, समाज, देश व दुनियाँ जिस भी मुक़ाम पर हम होंगे उसी वातावरण में…

आपकी भलाई-बुराई ‘सूक्ष्म-शरीर’ के रूप में काफी वक़्त तक लोगों के जहन में एक यादगार बन कर मौजूद रहती है।

इसीलिए हमें कठिन नहीं एक सरल-स्वभाव वाली “शख़्सियत” अख़्तियार करनी चाहिए।      

धन्यवाद       

आपका दिन शुभ हो            🙏नमस्कार🙏   

विचारक:  युग,पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा।

103-“टैक्स”

मेरे ख्याल से करोड़ो-अरबों वर्षों से……अगर मैं गलत नहीं हूँ, तो

जब से ये दुनियाँ अस्तित्व में आयी है तब से, यहाँ ‘कर’ या टैक्स निर्धारण के सदैव से अपने कुछ मानक रहे हैं,   जैसे ;     देश के महान ग्रंथ ‘रामायण’  में भरत द्वारा वनवास के दौरान ‘कर-व्यवस्था’  के बारे में पूछे जाने पर प्रभु श्रीराम ने कहा था,

कि भइया भरत! अन्य राजाओं की तो मैं नहीं कह सकता, मग़र हम लोग सूर्यवंशी हैं इसलिए हमें अपनी प्रजा से  ‘कर’ सदैव सूरज की तरह ही वशूल चाहिए।

सूरज, बड़ी-बड़ी झीलों से, बड़े-बड़े नदी-नालों से और समुद्र आदि से उनकी सामर्थ्य के अनुसार वाष्प के रूप में जल लेता है और फिर ‘बादल’ बनाकर कम दबाव वाले क्षेत्रों में उसे वारिस के रूप में पुनः धरती को ही लौटा देता है जिससे धरती हर्षित होने के साथ-साथ पूरा वातावरण में शीतलता एवं मिट्टी में नमी सन्तुलन बन जाता है।      विल्कुल इसी प्रकार किसी देश व रियासत के राजा को भी ‘कर’ ऐसे ही लेना चाहिए।       

  हिंदी के महाकवि तुलसीदास ने भी कुछ इसी ओर इशारा किया हैं;   

“बरसत-हरषत सब लखें।     ‘कर’ सत लखे न कोइ।।     तुलसी प्रजा सौभाग्य से।भूप भानु सम होई।।”

अर्थात बर्षा हो तो सभी हर्षित हों,  ‘कर’ ऐसा हो कि ‘कर’ देते समय कोई भी दुखी न हो।     

तुलसीदास कहते हैं कि, प्रजा के सौभाग्य से ‘राजा’ का स्वभाव सूरज जैसा हो। जैसे; कि,      टैक्स-निर्धारण का मानक न केवल उचित हो अपितु सामर्थ्य के मुताविक भी हो..     

मग़र देश की वर्तमान सरकार की तरह  मनमाना न हो..?      “टैक्स” तो आटे में नमक की तरह होना चाहिए कि जनता कर’ दे भी दे और उसे पता भी न चले..   

परन्तु सरकार उस टैक्स को पूर्ण-पारदर्शिता के साथ समाज के ‘विकास कार्यों’ में ही लगाए, जो सबको दिखें..

जैसे; स्कूल-कॉलेज ,हॉस्पिटल्स,हाई-वे बिजली-पानी की समुचित व्यवस्था आदि सब करे।    

यहां मेरा भी वही सुझाव है जो  काफ़ी वर्ष पूर्व अपनी रचना के माध्यम से महाकवि तुलसीदास ने कहा था,

जैसे; “मणि, माणिक महँगे किये,       सहजे तृण, जल, नाज।।      तुलसी सोई जानिए,    राम ग़रीब नवाज़।।”         

ज़रूरत मंदों का हित जानते हुये एकबार को मणि, माणिक भले ही महँगे हो जायँ  मग़र आम इंसान के आवश्यकता की वस्तुएं जैसे; तृण ‘तिनके’ यानी भूसा-चारा, जल एवं अनाज आदि गरीब के लिए अवश्य सहेज कर रख लेने चाहिए।..      

काश! हमारी सरकारें भी इसी पध्दति पर चलें, जैसे; शराब, सिगरेट यानी नशीले पदार्थों को महंगा करें, विमानों में ऐयरशिप्स, बी.एम.डबल्यू. जैसी गाड़ियों का महंगा होंना, रेल यात्रा में फर्स्ट क्लास,बिज़नेस क्लास आदि के टिकट महंगे हो जाय, तो        आम जनता को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। दूसरे हाई-क्लास लोग तो सक्षम होते ही हैं। तो फिर बजट से क्यों शिकायत होगी..? फिर देशवासी क्यों दुःखी होगे..? 

गरीबों के लिए तो सरकार को सामान्य बोगी,गरीबरथ आदि की संख्या बढ़ा देंनी चाहिए। किराया कम कर देना चाहिए।

इस पर किसी कवि की एक रचना बड़ी सटीक बैठ रही है..

“बलि मिस देखें देवता। ‘कर’ मिस मानव देव।। मोई मारिस विचार हत। स्वारथ साधन एव।।”

अर्थात आज के नेता संगी साथियों जैसे अडानी,अंबानी आदि कैपिटलिस्ट के हितों को साधने में लगे हुए हैं इस चक्कर में आम आदमी के पेट काटने की योजनाएं बनाई जाती रहती हैं। और वे अनन-फानन में तानाशाही वाले रौब से भोली-भाली जनता पर लागू भी होती जा रही हैं।

ये कारण है सामान्य लोगों के दुःख का। सिर्फ जुबान से राम राज्य की दुहाई देने से कुछ नहीं होगा। जमीन पर उतर कर करना होगा।

मुझे तो ऐसा लगता है कि ‘नेता- लोग’ सत्ता के नशे में ये तो ये, वे अपना परलोक भी बिगाड़ ले रहे हैं..क्योंकि,

“जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। तो नृप अवश्य नरक अधिकारी।”

धन्यवाद युग,पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा।

102-“बेवाक-विचार”

मांफ कीजियेगा..”दो-टूक” श्रृंखला में ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ वाले दृष्टिकोण से  “विचार” हमेशा बेवाकी से ही रखे जाते हैं।

इसलिए दोनों पक्षों के लिए थोड़ा असहनीय अवश्य होता है मग़र वही “सच” होता है। 

काश! ऐसा हो सकता.. कि किसान कुछ दिन केवल अपनी आवश्यकता और..थोड़ा बहुत सामाजिक स्तर पर अपने मजदूर साथियो की जरूरतों के लिए ही खेती करता..?, तो मात्र एक वर्ष में देश के ‘सेवक से बने सभी असंवैधानिक हुक्मरानों’ अर्थात तथाकथित नेताओं की अक्ल ठिकाने आ जाती..! 

और यदि मशहूर हिन्दी फ़िल्म “शोले” के ठाकुर वाले अंदाज़ में देश का अन्नदाता सरकार के इन नुमाइंदों से बोल पाता..

कि, “कह दो उस सरकार से जो जनता के टैक्स पर उसी की मालिक बनी बैठी है..उन अहसान-फ़रामोशों को अब ‘फल, सब्जी,दूध एवं रोटी.. डालना किसान ने बंद कर दिया है।” 

तो कम दाम में अच्छी-अच्छी चीजें  खाने वाले देश के सभी गद्दारों की सारी हेकड़ी निकल जाती..!

मत भूलिए, किसान के ही ऊपर सबके जीवन का गणित टिका होता है।

पूरी दुनियाँ में भारत ही वो देश है जिसके पास बेहतर ‘एग्रीकल्चर-लैंड’ के साथ-साथ उपयुक्त प्राकृतिक-जलवायु, सिंचाई आदि के समुचित साधन आदि उपलब्ध हैं। इसलिए उसे अन्य देशों की “कृषि-पॉलिसी” की राह पर ले जाने की भूल विल्कुल मत कीजियेगा।

जो लोग अपने बच्चों को लगभग ढाई लाख की मोटर साइकल, पचासों हजार के मोबाइल-सेट..   महंगे-महंगे सामान खरीद कर देते समय एक बार भी नहीं बोलते कि महँगा है..

  ऐसे लोग आज किसानों की ‘जायज माँग’ पर ये बहस कर रहे है कि ऐसा किया,तो दूध और गेहूँ अब महँगा हो जाएगा..?

अरे ज़रा शर्म करो..!  एमेजोन व माॅल्स से ख़रीददारी में अंधाधुंध पैसा उड़ाने वाले गेंहूँ की कीमत बढ़ जाने से डर रहे हो!!   तीन सौ रुपये किलो के भाव से ‘मल्टीप्लैक्स सिनेमा हॉल के इंटरवल में’ पॉपकॉर्न खरीदने वाले आज मक्का के भाव किसान को तीन रुपये किलो से अधिक न मिलें इस पर बे सिर पैर की बहस कर रहे हैं।

क्यों भई क्यों..?

  कोई एक बार भी कभी नहीं बोलता कि मैगी, पास्ता,पिज्जा,बर्गर व कॉर्नफ़्लैक्स के दाम बहुत ऊंचे हैं।

  1970 के महंगाई आंकड़े पर भी एक नज़र डाल लीजियेगा..तो     किसान के साथ आज़ादी के बाद से एक योजनाबद्ध तरीके से लगातार होता चला आ रहा “अन्याय” सबकी समझ में बड़ी आसानी से आ जाएगा..

    जी हाँ, 1970 में किसान एक तौला सोना अपने तीन कुन्तल गेंहूँ बेचकर खरीद लिया करता था। अगर सरकार महँगाई वृद्धि उसी अनुपात में किसान के गेहूँ के मूल्य में करती रही होती..? तो आज किसान को ‘आंदोलन’  करने की क्या पड़ी थी..?   

जनाव, 1970 में     गेंहू  का मूल्य लगभग 76 रु कुन्तल, था। उस वक़्त सोना लगभग 228 व 230 रु का एक तौला था। यानी..     तीन कुन्तल गेंहूँ = बराबर एक तौला सोना। 

   आज सोना लगभग 60,000/-रु तौला है।     जबकि गेंहूँ  मात्र 1900/- रु प्रति कुन्तल  पर ही आ सका है।     उसी दर से आज 1900×3=5700/-रु का एक तौला सोने का दाम कर दीजिये।     या फिर किसान के गेंहूँ का दाम 20,000/- रु प्रति कुन्तल कर दीजिये! ताकि वो तीन कुन्तल गेहूँ 20,000×3=60,000 की कीमत में एक तौला सोना ख़रीद कर अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर सके..!    

किसान को किसी की खैरात की जरूरत न कभी थी न आज है। उसे तो अपनी मेहनत के अनुसार अपना “हक़” चाहिए।

एक बात और आपको बताकर चलूं जो शायद आपको ध्यान भी नहीं रही होगी…   कि  काँग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री श्री पी.वी.नरसिंमहा राव को जब भारतीय किसान यूनियन के प्रणेता श्री महेंद्र सिंह टिकैत ने दिल्ली में ‘बोट-क्लव’ पर अपनी “किसान-शक्ति” के दम पर न केवल घेरा था। वल्कि अपने साथ ख़ुद पी.एम. को वार्ता करने को मजबूर कर दिया था। उसी दौरान  प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हा राव वार्तालाव के दौरान फ्लो-फ्लो में..उनकी टिकेत साहब के व्यक्तिगत सत्यता वाले “ऊर्जा क्षेत्र” के प्रभाव के आवेश में यकायक ये स्वीकार कर गए थे, कि “हाँ किसानों के साथ ‘अन्याय’ है।”

मग़र जैसे ही श्री महेंद्र सिंह टिकैत साहब ने कहा,कि “इस वक़्त आप देश के एक जिम्मेदार पद पर हो ,तो क्यों न किसानों के साथ होते चले आ रहे इस “अन्याय” को खत्म कर एक साफ- सुथरी व्यवस्था बना दो” परन्तु वो समय-अभाव व फिर कभी..पर टाल कर व कार्य की व्यस्तता आदि जताते हुए वार्ता से चले गए.. और तब से देश में कितने पी.एम.सी.एम. नए-पुराने हो गये लेकिन आज तक स्थिति..

‘जस की तस’ है..    

पिछले कई महीनों से इन ‘कृषि-बिलों’ पर कड़कड़ाती ठण्ड में अपना घर-बार छोड़कर..      “करो या मरो” वाली स्थिति में देश का किसान उसी “अन्याय” के ख़िलाफ़ देश की सरहदों पर पड़ा है..मग़र कुछ डिजाइनर लोग तो इसे ‘किसान-आंदोलन’ ही मानने को राजी नहीं हैं,

कुछ खालिस्तानियों का जमावड़ा, आतंकवादी या विपक्षी नेताओं की वर्गलाहट का हुज्जुम और तो और ‘आंदोलन-जीवी’ तक करार दे रहे हैं..

      कहने को तो ‘सत्ता-मदान्ध’ कुछ भी कहते  रहें..उनकी अपनी धृष्टता है..? मग़र सच क्या है..?  ये देश का बच्चा-बच्चा अच्छी समझ रहा है..      

क्योंकि मेरा ऐसा मानना है कि “अहम और झूठ के बादल सच के सूरज को ज्यादा देर तक छुपा कर नहीं रख सकते।” 

      वो “सत्यार्थ-प्रकाश” न केवल देश अपितु पूरी दुनियाँ के सामने एक दिन आ कर ही रहता है।        

इसलिए “धैर्य एवं संयम” से चलें।

      अच्छा, आप एक बात और बताइये! यदि किसान को खाद,बीज दवाइयाँ उचित रेट पर उपलब्ध हो जाएं और न्यूनतम समर्थन मूल्य की गैरेंटी-कानून के साथ उसकी हर फ़सल का उचित दाम मिल जाया करे, तो फिर किसान “आंदोलन” करेगा..ही क्यों..?

अगर सरकार देश की हर व्यवस्था जो उसका मूल कर्तव्य भी है उन सबके बीच एक सही सन्तुलन बनाये रखना चाहती है, तो कम से कम किसानों पर से अपने “कृषि-क़ानून” में हुई ख़ामियों को न केवल हटाये,वल्कि उनकी जगह कृषि-हित में नई व्यवस्थाएं अनुभवी किसानों को साथ बैठाकर बनाये, और ये बात देश के किसान भाइयों को भी अपनी ज़िद छोड़कर मान्य कर लेनी चाहिए…      

हम सबको किसान की थोड़ी सी “क़र्ज़- माफ़ी” बड़ी जल्दी नज़र आ जाती है। मग़र फ़र्ज़ी घाटा दिखा कर या दोस्ताना अंदाज में करोड़ो के लोन माँफ करा लेने वाले इंडस्ट्रीयलिस्ट किसी को कभी भी नहीं दिखते..? 

बेचारा किसान, किसी आपदा, जो कि सबको दिखती है, के कारण जायज तरीके से क़र्ज़ की माफी की माँग कर भी दे, तो कहने लगते हैं कि किसान बहुत नाजायज़ माँग कर रहा है।     दरअसल आज़ादी के बाद से अबतक.. किसानों के साथ सरकारों की ये ही  वो ‘दोहरी-नीति’ या ‘सौतेला-रवैया’ रहा है। जिससे ‘भारतीय-किसान’ की आर्थिक स्थिति जानबूझ कर एक योजना के तहत कमज़ोर की जाती रही है।

क्योंकि आज गेंहू सरकारी आँकड़ों में 1900 रुपये प्रति क्विंटल जरूर है। मग़र एम.एस.पी. की गारण्टी न होने की बजह से ज़मीनी हकीकत में किसान को बमुश्किल पंद्रह सौ रु प्रति कुंतल ही मिल पाते हैं।

चलो इसे भी छोड़िए..  देश में महँगाई की मार झेलते हुए आज गेंहूँ का दाम सरकारी आंकड़ों में 1900 है, तो =100×19 यानि लगभग 50 साल के में मात्र ‘उन्नीस गुना’ ही बढ़ा है।

जबकि उसकी तुलना में सोना आज लगभग साठ हज़ार रुपये प्रति दस ग्राम है

मतलब सोने की कीमतों में लगभग 226 गुना की दर से वृद्धि हुई है। मग़र किसान के लिए उसे 19 गुना ही रखा गया है.. क्यों ..?

ये कैसी जोर ज़बरदस्ती है ..? इस पर तर्क ये देते हो कि खाद्यान्न महँगे होने से आम आदमी को दिक्कतें आ जाएंगी इसलिए.. कम रखा है।

एक और तथ्य पर गौर फरमाइयेगा.. 1975 में एक सरकारी अधिकारी को 500/- रुपये वेतन मिलता था, जो आज एक राक्षसी वृद्धि से बढ़कर दो सौ पच्चीस गुना (लगभग सवा लाख रु महीने ) हो गया है। मैं ये नही कहता कि उनको इतना वेतन क्यों..? मग़र सबको किसान के खाद्यान्नों की मूल्य वृद्धि से ही क्यों आपत्ति है। क्या वो देश का नागरिक नहीं है..?

ये सब नेताओं की सोची समझी ‘कुटिल-नीति’ नहीं  है, तो क्या है..?

किसान इतना भोला है कि उस बेचारे को तो पता ही नहीं है कि उसे असल में आज़ादी के बाद से एक योजनाबद्ध तरीके से लगातार ठगा जा रहा है..

दरअसल बात ये है कि, सरकार को ‘एग्रीकल्चर-लैंड’ कम करके  किसान को शहरों में “दिहाड़ी-मजदूर” बनने को मजबूर जो करना है..  ?

इसीलिए किसी भी सत्ता-दल की मंशा ‘किसान-हितैसी’ हो, ये उनकी दशा और दिशा को देखते हुए सम्भव नहीं लगता..?

छोटे से लेकर बड़े-बड़े पदों पर आसीन देश के समस्त जिम्मेदार नागरिकों से मेरी अपील है कि, वर्तमान में किसानों के साथ हो रहे अन्यायों की पराकाष्ठा देश के समस्त पीड़ित नागरिकों को एक प्लेट-फॉर्म पर आने को मजबूर न कर दे, फिर कहीं ऐसा न हो कि देश के असंवेदनशील नेताओं की सारी “नेताही” धरी की धरी रह जाय..? क्योंकि वर्तमान-सत्ता का भी जनता को आज वही राक्षसी रूप दिख रहा है। जो 2014 से पूर्व कांग्रेसियों का हो गया था।

  ये बात सर्व विदित है कि “इतिहास लोगों को प्रेरणा देता आया है, और सदैव देता रहेगा भी।

इसलिए जनता आपको भी सिरे से ख़ारिज न कर दे।  ये देश की सरकार व जिम्मेदार पदों पर आसीन पदाधिकारियों को वक़्त रहते समझना होगा..?

किसी को भी आप एक लम्बे समय तक मूर्ख बनाके नहीं रख सकते। एक वक़्त तो आता ही है उसके जगने का। 

ध्यान रहे.. बरसों तक किया जाता रहा शोषण अंततः हिंसा को ही जन्म देता है। जैसे; आदिवासियों पर हुए अत्याचार ने “नक्सल-आंदोलन” को जन्म दिया था और अब देश के दुर्भाग्यवश किसान को भी आपने लगभग पिछले सात महीने से उसी जगह पर ला कर खड़ा कर दिया है..?

आप चाहते क्या हैं..?  कि समर्थन मूल्य के झाँसे में फँसे किसान के खून में सनी रोटियाँ अपने आलीशान डाईनिंग हॉल में सजी इटैलियन मार्बल वाली ‘डाइनिंग-टेबल’ पर ऐसे ही खाते रहेंगे..और अन्नदाता सरहद पर पड़ा रहेगा..?  

आख़िर कब तक..?

और जब आज किसान को सारा खेल समझ में आ गया है, तो वह  अपनी बात भी न रखे..?    वाह ! भई, वाह ! अच्छी तानाशाही है। 

  किसान भाइयों ! क्या आपको पता है कि आपके क्षेत्र का सांसद व विधायक आपका सेवक होने की आड़ में एक साल में चार-चार लाख की बिजली मुफ़्त फूँक देता है। और ये सब आपके गलत रवैये के कारण ही आपके ऊपर ‘अधिकारी’ बने बैठे रहते हैं।  

  जबकि कि “लोकतंत्र” की आड़ में नेताओं द्वारा आम जनता के लिए इन्हें “प्रत्यक्ष-प्रतिनिधि” (जन-सेवक) के रूप में परिभाषित किया जाता रहा है।

क्या वास्तव में वे होते हैं..? 

  ये हम सभी अच्छी तरह जानते हैं।  आपके ये प्रतिनिधि जो आपकी बात संसद और विधान सभा तक न केवल पहुंचाने के लिए होते हैं,वल्कि अपने क्षेत्र की ज्यादा से ज्यादा समस्याओं के निराकरण हेतु ही निर्वाचित किए जाते हैं। जिसके एवज़ में ये अच्छी-खासी तनख्वाह व महंगाई-भत्ते व पेंशन आदि डकारते हैं।  लेकिन चुने जाने के बाद वो आपके ही गलत रवैये से ख़ुद को बहुत उच्च स्तर का मानने लग जाते हैं…और आपको निम्न।

भाइयो, ये देश के समस्त नागरिकों, के सचेत हो जाने का समय है। आप ख़ुद कहिए, कि  साठ से अस्सी रुपये लीटर दूध और कम से कम साठ रुपये किलो गेंहू खरीदने के लिए हम सभी नागरिक तैयार हैं, तो ही बात बनेगी। मग़र कहें कैसे..?  लोगों के स्वार्थ आड़े आ जाता है…? 

  अरे क्या हुआ.. कुछ कटौती अपने ऐश-ओ- आराम में कर लीजिएगा। नहीं तो आने वाले वक़्त में जब अन्नदाता ये चीजें उगाएगा ही नहीं  तो फिर आपको बहुराष्ट्रीय कंपनियों से उस दाम पर भी खरीदनी होंगी जो आपकी सामर्थ्य से भी परे होंगी..?   

सोचो.. विचारों.. वक़्त बहुत कम है।

वर्तमान स्थिति को एक किसान के नजरिये से देखने का प्रयास..कीजियेगा.

कृपया किसानों एवं हिंदुस्तान के हित में इसे न केवल स्वयं पढ़े यदि उचित लगे, तो अपनों को शेयर भी कर दीजियेगा।

👍 जय जवान ,जय किसान।

101-जीवन एक “क्रिकेट” है।

मनुष्य का जीवन एक “क्रिकेट” के खेल जैसा ही है।

क्योंकि ‘शरीर’ रूपी स्टेडियम में ‘धरती’ के विराट पिच पर हर पल ‘समय’ पूरी मुस्तैदी के साथ बॉलिंग कर रहा है।

‘धर्मराज’ एम्पायर बनकर खड़े है। और ‘बीमारियां’ व्यक्ति के इर्द-गिर्द फील्डिंग लगाए हुए हैं।

जहाँ पर एक विकेट-कीपर की भूमिका में ‘यमराज’ ख़ुद है, जो मनुष्य के जन्म के तुरन्त बाद से कीपिंग के द्वारा उसके ‘प्राण’ रूपी विकेटों को लपकने की फ़िराक में रहते हैं।

जिस प्रकार क्रिकेट-मैच में एक आक्रामक बल्लेबाज़ या तो चल जाता है या ऑउट होकर पवेलियन बापस हो लेता है।

ठीक वैसे ही ‘सांस’ रूपी गिल्लियाँ उड़ जाने पर ‘मनुष्य’ भी ‘क्रिकेट-पिच पर खेलते हुए उस बल्लेबाज की तरह’ संसार से चला जाता है..

आजकल ये ‘हार्ट-अटैक’भी आम हो गया है. मनुष्य’ के लिए किसी बैट्समैन के खेलते-खेलते अचानक ‘रन-आउट’ हो जाने’ जैसी अनुभूति है।

देश की सीमाओं पर घात लगाए बैठे कुछ घुसपैठिओं के हाथों एक सच्चे सिपाही का ‘शहीद’ हो जाना भी क्रिकेट में बैट्समैन के अच्छे प्रदर्शन के दौरान अचानक ‘कैच-आउट’ हो जाने जैसी क्षति है।

परन्तु ‘डे & नाईट’ अर्थात लगातार होने वाले ‘जीवन’ के इस खेल में हमें अपना ‘कर्म रूपी’ प्रदर्शन हर हाल में बेहतर रखना होगा।

इसलिए हे मानव! पल पल चलती इन सांसों को संम्भाल!!, क्योंकि..तुझे! इन ‘सांसों’ के सीमित ओवरों में ही अपने जीवन की इस पारी में न केवल वाँछनीय .. कीर्तिमान स्थापित करने हैं वल्कि आने वाली तमाम पीढ़ियों के लिए गौरवपूर्ण प्रदर्शन भी करके दिखाने हैं, ताकि बाई द वे किसी दिन ये सांस रूपी गिल्लियां उड़ भी जाएं, तो भी एक अच्छे खिलाड़ी की तरह अपने बेहतर प्रदर्शन व अच्छे विचारों की मधुर आभा के रूप में लोगों के जहन में रह सको..!!

हाँ, इसमें भी ‘पर्सन टू पर्सन’ सबका अपना-अपना ‘रन-रेट’ है। जो सदैव विचारणीय रहता है…👍 क्या आपको भी लगता है..? कि, जीवन एक “क्रिकेट” है।

धन्यवाद👍

; पचहरा, युग, नीमगाँव, राया,मथुरा।