92-“आत्मविश्वास”

“आत्मविश्वास” हो तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसा..

ये मंजर उस दौर का है, जब नेताजी हिटलर को पहली बार मिलने जर्मनी गए, तो हिटलर के आदमियों ने उन्हें बाहर प्रतीक्षा हॉल में बैठा दिया।

जैसी, कि नेताजी की आदत थी वे वहाँ बैठे-बैठे किताब पढ़ने लगे।

थोड़ी देर बाद एक आदमी आया (जो कि हिटलर का हमशक्ल था।) और नेताजी के साथ बात कर के चला गया। नेता जी ने कोई भाव व्यक्त नहीं किया।

थोड़ी देर के बाद दूसरे आदमी ने हिटलर के वेश में आकर नेताजी से हिटलर बन कर बात की। नेताजी ने उसे भी कोई भाव नहीं दिया…

इस तरह एक के बाद एक, कई बार हिटलर के वेशधारी और हमशक्ल उनके पास आकर खुद को हिटलर बता-बताकर बात करते रहे.. लेकिन, नेताजी अपने स्वाध्याय में तल्लीन रहे…

(जबकि,वहाँ आम तौर पर दूसरे लोग हिटलर के हमशक्ल को मिलते ही, खुद हिटलर को मिलके आए हैं। ऐसे भ्रम में वापस लौट जाया करते थे।)

आखिर में, खुद हिटलर ही आया और आते ही हिटलर ने नेताजी के कंधे पर हाथ रखा, नेताजी तुरंत बोल उठे, “हिटलर”….!!!! हिटलर भी आश्चर्य में पड़ गया और नेताजी से पूछ ही लिया कि, “इतने सारे मेरे हमशक्ल आए फिर भी आप मुझे कैसे पहचान गए..? जब कि मेरी और आपकी ये पहली मुलाकात है…”

तब नेताजी ने जवाब देते हुए कहा,अरे हिटलर! जिसकी आवाज़ से ग्रेट ब्रिटेन का प्रधानमंत्री तक कांपता हो। उस “सुभाष चंद्र” बोस के कंधे पर हाथ रखने की गुस्ताखी दुनिया में सिर्फ हिटलर ही कर सकता है, क्या दूसरे किसी की मज़ाल है..?

“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” का नारा बुलंद करने वाले भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के महानायक, आजाद हिन्द फौज के संस्थापक भारत रत्न, देश प्रेमियों के प्रेरणास्रोत “नेताजी सुभाषचंद्र बोस” जी की जनशक्ति पर उन्हें सादर नमन करते हुए, मेरा ऐसा भाव है, कि मां भारती की आजादी में उनके संघर्ष व बलिदान का देश सदैव ऋणी रहेगा..

🇮🇳जय हिंद वंदे मातरम🇮🇳

युग,पचहरा,

88A वसुन्धरापुरम, हाथरस

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