ये तो स्वाभाविक है कि,मन का भाव रूपी ‘कमल’ तो सदैव अभाव (कमी) की दुर्गम पहाड़ियों पर ही खिला है और खिलेगा भी।
ईश्वरीय कृपा से ‘लक्ष्य’ की प्राप्ति भी भक्त या शिक्षार्थी द्वारा की गयी भक्ति एवं लगन की कठिन परीक्षा के बाद ही होती है।
हाँ, ये भी ज़ाहिर सी बात है ‘वस्तु व उद्देश्य’ जितना महत्वपूर्ण होगा, उसकी प्राप्ति में उतना ही धैर्य, समय व परिश्रम भी लगता है।
प्रत्येक ‘जीव’ को उसका ‘कर्म-फल’ दिया, तो सदैव ईश्वर के ही हाथों,जाता है।
मग़र निराकरण, उसके अपने संचित-कर्म/संस्कारों को आधार मानते हुए उसके “प्रारब्ध” की क्षमताओं को देखकर..होता है।
‘मनुष्य’ की निर्मलता, मन, कर्म और सोच की पवित्रता भक्त को ईश्वर का एवं शिक्षार्थी को शिक्षक का कृपा पात्र बनाती है।
लेकिन मन की चालाकी, वैचारिक अपवित्रता और दूसरों के प्रति षडयंत्रों का मकड़-जाल (खुराफ़ात) बुनने वाले मनुष्यों के ‘जीवन की राह’ में आने वाले अवरोधों का मूल कारण उनके ‘कर्म’ ही होते हैं। कुछ और नहीं।
इसीलिए नकारात्मक “कर्म-बीज” बोने से हमेशा बचें।
मनुष्य के पास आज जो उसका ‘वर्तमान’ मौजूद है, दरअसल, वही तो अतीत में किये गए उसके ‘कर्मों’ की “पूँजी” है। जिसे बड़े बुजुर्ग “प्रारब्ध” कहकर समझाते आये हैं।
आज अभी जो वह कर रहा है, वे “कर्म-संस्कार” चाहे नेगेटिव हों या पॉजिटिव वही संचित होकर मनुष्य के प्रारब्ध से जुड़ते रहते हैं। और वे ही मनुष्य के ‘भविष्य’ की “पूँजी” बनते हैं।
ये पॉइंट थोड़ा जटिल है, चलो, इसे एक छोटी सी कहानी के द्वारा समझने का प्रयास करते हैं..
मानलें, कि किसी व्यक्ति ने अपने किसी नज़दीकी रिश्तेदार के बच्चे को उसके जन्मदिन पर कोई तौफा (गिफ़्ट) दिया, तो उस गिफ़्ट को देते समय उसके मन में क्या “भाव” रहे..
न.1 अहंकार के, (कि मेरा गिफ़्ट सबसे बेहतर है-प्रशंसा की आकांक्षा वाले ..)
न.2 दिखावे के, (ताकि उसकी लोकप्रियता बढ़े )
न.3 दया के, (अहसान करके मान सम्मान पाने के)
न.4 सर्वोत्तम-भाव “नेकी कर दरिया में डाल..” वाला होता है अर्थात (Do good & Forget)
क्योंकि यहां मेरा ऐसा मानना है कि, ‘खिलौना’ या ‘गिफ़्ट’ जो भी दिया वो तो नश्वर ( Ephemeral) है। मेरा मतलव भौतिक है। मग़र उसको आधार बना कर हमारे मन रूपी तालाब में भावनाओं के जो “कमल” खिले, मेरा असली सवाल तो उस कर्म-प्रभाव पर है..?
I think,”Feelings are true earning of ‘KARMA’..”
क्योंकि सांसारिक जुबान में ‘कर्म’ के एवज़ में मिलने वाली आर्थिक कमाई (सैलरी) अस्थायी है। लेकिन ‘कर्म’ के दौरान मन में जो “भावनाएँ” बनीं हैं वो ‘कर्ता’ से यूं ही जुदा नहीं हो जातीं..?
स्थूल शरीर तो यहीं छूट जाता है.. संस्कार या पूर्व-संस्कार ही वे ‘कर्म’ हैं जो प्रारब्धवश जन्मजन्मांतर हमारी आत्मा के साथ चलते हैं।
मनुष्य ‘चेतन्य-अवस्था’ में रहते हुए अपने कर्म, सोच व वाणी में संयम रखे, तो दुनियाँ की “पूर्व-निर्धारण” व्यवस्था में निश्चय ही उसके “जीवन की दिशा” का निर्धारण उचित होगा।
परिणामस्वरूप, मन, कर्म और वाणी से मनुष्य अपने जीवन रूपी “खेत” में जैसे “कर्म-बीज” वोता है, वैसी ही फ़सल वो काटता है। इतिहास साक्षी है और ये ही जीवन का “कटु-सत्य” है।
जीवन के इस गणित को जो समझ जाता है, वास्तव में, वही जीवन को आनंद के साथ “जी..ता” है।
वरना दुनियाँ में जीवन को ढो..ने वालों की कोई.. कमी नहीं है।
धन्यवाद
“एक विचार”
;युग,पचहरा,