99-“पॉजिटिविटी”

हज़ारो प्रयोग असफल होने के बावजूद भी सफलता का एक नया सपना देखने वाले ‘हौसले’ का नाम है..

“थॉमस एल्वा एडिसन”

एक ऐसा महामानव..

जिसने अपनी ‘मेहनत’, ‘लगन’ और माँ की “सकारात्मक-सोच” से ग्रामोफ़ोन और बल्व जैसे बड़े-बड़े अविष्कार करके पूरी दुनियाँ को अपने “पुरुषार्थ” से न केवल ‘रौशन’ कर दिया..अपितु लोगों के जीवन को संगीत की फुलझड़ियों से ‘खुशहाल’ भी कर दिया,

जबकि एक अध्यापिका का उदासीन व नकारात्मक रवैया, इनकी माँ को इनके खिलाफ़ एक “आरोप-पत्र” थमाकर कि, “आपका बेटा न सिर्फ शरारती है वल्कि एकदम मूर्ख है ये अपने जीवन में कुछ भी नहीं कर सकेगा, इसे आप यहाँ से ले जाइये।”, के कारण स्कूल से निकाल दिया जाता है।

क्योंकि उन दिनों स्कूल बहुत दूर-दूर हुआ करते थे। दूसरे उनके पिता अधिक साधन-सम्पन्न भी नहीं थे। इसलिए बालक ‘एडिसन’ पढ़ाई के क्षेत्र में महज़ चौथी फेल ही रह गया..

मग़र एक माँ का “पॉजिटिविटी” रवैया देखिये जो हम सबके लिए प्रेरणा स्रोत बन सकता है..कि उसने वो पत्र न तो अपने पति को दिखाया और न हीं बेटे को। और न ही अपने जीवन में उस घटना पर कभी कोई चर्चा की।

वल्कि एडिसन के पूछे जाने पर बड़े सहज भाव से बोल दिया कि, “बेटा ! आप सामान्य बच्चों से कुछ अलग (अधिक तेज ) हो, और स्कूल का अध्यापक-मंडल आपके सवालों के जवाब देने में अपने आपको असहज समझता है। इसीलिए अब आपकी पढ़ाई-लिखाई घर पर ही होगी।

मेरे ख्याल से शायद कुछ था..भी ऐसा ही.. क्यों..?

उनकी माँ ने वो पत्र अपनी अलमारी में छुपा कर रख दिया। अब एडिसन धीरे-धीरे प्रतिदिन अपनी मां की ममता के सानिध्य एवं पिता की क्षमताओं की परिधि में रह कर शिक्षित होने लगा।

ये सर्वविदित है कि एकदिन उन तमाम लोगों के लिए “एडिसन” एक प्रेरणास्रोत बनकर सामने आया। जो किन्हीं परिस्थितियों वश कागज़ी रूप से डिग्रियां नहीं ले पाते.. मग़र चीजों की समझ के साथ-साथ वे अपने कार्यानुभव से जानकारियों के भंडार होते हैं..मेरे ख़्याल से कायदे में असल-शिक्षित, तो वे ही होते हैं।

इससे हम सबको एक सीख मिलती है कि “इरादे बुलंद हों, धैर्यपूर्वक एवं स्टेपवाईज जीवन में आगे बढ़ा जाय, तो क्या नहीं हो सकता..!

मग़र जब माँ के गुज़र जाने के कुछ दिन बाद अलमारी से कोई सामान निकालते वक़्त वो ‘आरोप-पत्र” एकदिन एडिसन के हाथ लग गया, तब एडिसन को पत्र की हक़ीकत समझ आयी, और साथ ही समझ आयी एक देवी स्वरूपा माँ की “पॉजिटिविटी” (सकारात्मकता)

जिसने एडिसन के जीवन को ‘अंधेरी-गलियों’ में भटकने के बजाय ‘सफलता की बुलन्दियों’ पर ला कर रख दिया था।

ऐसे लोक-कल्याणकारी “सकारात्मक-विचार” को मैं, युग, पचहरा शत शत नमन करता हूँ…

धन्यवाद 👍 एवं

सभी को नमस्कार 🙏🏼

Leave a comment