97- “महानायक”

क्या आप इस बात से सहमत हैं..?

कि ‘पटनायक’ ही वास्तव में सच्चे “महानायक” थे।

जी हां! “बीजू पटनायक” आपने ठीक समझा, मैं उन्हीं की बात कर रहा हूं।जो भारत के एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं। जिनके निधन पर उनके शरीर को तीन देशों के राष्ट्रीय-ध्वजों में लपेटे जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। वाह! मेरे देश के गौरव! वाह! तुझको मेरा शत शत नमन ! ✈️✈️✈️ ……✈️✈️✈️

भारत,रूस और इंडोनेशिया….. यहां मैं स्पष्ट कर दूं..

दरअसल 5 मार्च, 1916 उड़ीसा के ‘कटक’ में जन्मे श्री विजयानंद पटनायक ही बाद में “बीजू पटनायक” के नाम से लोकप्रिय हुए। वे न केवल देश के एक बेहतरीन पायलेट थे, वल्कि उन्होंने देश को “एयर ट्रांसपोर्ट कमांड” के मुखिया के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं।

विश्व के करेंट अफेयर्स पर नजर रखने वालों को अवश्य ही पता होगा..जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ संकट में घिर गया था तब पटनायक जी ने लड़ाकू विमान ‘डकोटा’ उड़ा कर हिटलर की सेनाओं पर काफी बमबारी की थी। जिससे हिटलर पीछे हटने को मजबूर हो गया था। उनकी इस बहादुरी पर उन्हें सोवियत संघ का सर्वोच्च पुरस्कार देने के साथ साथ सोवियत संघ ने उन्हें अपने देश की नागरिकता भी प्रदान की थी…..

कश्मीर पर जब कावालियों ने आक्रमण किया था, तब बीजू पटनायक ही थे। जिन्होंने प्लेन उड़ा कर दिन में कई चक्कर दिल्ली से श्रीनगर के लगाए थे। और सैनिकों को सुरक्षित श्रीनगर पहुंचाया था…..

इंडोनेशिया कभी ‘डच’ यानी हालैंड का उपनिवेश था। आपको मालूम होगा. डच लोगों ने इंडोनेशिया के काफी बड़े इलाके पर कब्जा किया हुआ था और इन डच सैनिकों ने इंडोनेशिया के आसपास के सारे समुद्र तट को अपने कंट्रोल में ले रखा था। और वह किसी भी इंडोनेशियन नागरिक को बाहर नहीं जाने देते थे।

उस वक्त इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री ‘सजाहिर्र’ को एक कांफ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए भारत आना था। लेकिन डचों ने उन्हें इसकी भी इजाजत नहीं दी थी। इसके लिए इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति ‘सुकर्णो’ ने भारत से मदद मांगी। और उसी दौरान इंडोनेशिया के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने विशेष रूप से बीजू पटनायक से मदद मांगी।

बीजू पटनायक और उनकी पत्नी ने अपनी जान की परवाह किए बिना एक ‘डकोटा-प्लेन’ लेकर डच के कंट्रोल एरिया के ऊपर से उड़ान भरते हुए उनकी धरती पर उतरे और बेहद बहादुरी का परिचय देकर इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री को सिंगापुर होते हुए सुरक्षित भारत ले आए।

इससे न केवल इंडोनेशिया के लोगों में असीम ऊर्जा का संचार हुआ,वल्कि उन्हें हिम्मत भी मिली। जिसके बाद उन्होंने एक मजबूत रणनीति के तहत ‘डच- सैनिकों’ पर धावा बोला। तब कहीं जाकर इंडोनेशिया “एक पूर्ण आजाद मुल्क बना।”

बाद में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो के घर बेटी पैदा हुई तब उन्होंने उसका नामकरण करने के लिए बीजू पटनायक और उनकी पत्नी को आदरपूर्वक दावत पर बुलाया। तब बीजू पटनायक और उनकी पत्नी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति की बेटी का नाम “मेघवती” रखा था।

उसी वक़्त इंडोनेशिया ने बीजू पटनायक और उनकी पत्नी को अपने देश की “आनरेरी-सिटीजनशिप” प्रदान की थी।

यह भी आप सब जानते होंगे कि उड़ीसा में “बीजू-जनता दल” एक राजनीतिक पार्टी है। और “बीजू पटनायक” न केवल इस दल के मुखिया थे, वल्कि वे दो बार (1961-63 व 1990-95 तक ) उड़ीसा के मुख्यमंत्री बने।

बीजू पटनायक के बेटे नवीन पटनायक मार्च 2000 से अभी भी पांचवीं बार उड़ीसा के मुख्यमंत्री बने हुए हैं। “बीजू जनता दल” की कमान भी नवीन पटनायक के ही हाथों में है।

बीजू पटनायक जैसे “महानायक” की मृत्यु 17 अप्रैल,1997 में दिल्ली में “हिर्दय व सांस” की बीमारी के कारण हुई थी।

इनके निधन पर इंडोनेशिया में सात दिनों का राजकीय शोक मनाया गया था।

रूस में एक दिन के लिए राजकीय शोक रखा गया था। उस वक्त उन्होंने भी अपना राष्ट्रीय झंडा झुकाके रखा था।

अपने देश के ऐसे महान शख्स के बारे में पता चलने पर अगर आपको गर्व की अनुभूति हुई हो तो अपनी इस प्रसन्नता को आप अपने साथियों में भी शेयर कर सकते हो।

धन्यवाद 😊😊 योगेन्द्र सिंह पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा।

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