90- “ह्यूमन-वैल्यूज”

अभी कुछ ही दिन पूर्व मैंने एक मन्दिर में लगभग आठ वर्ष का एक मासूम सा बच्चा देखा, जो अपनी छोटी बहन को लेकर मंदिर के एक तरफ कोने में बैठा हाथ जोडकर ईश्वर से कुछ मांग रहा था.. उसके कपड़े मैले जरूर थे। मगर चेहरे पर बहुत तेज़ था।

वह ईश्वर से प्रार्थना करते-करते इतना भाव-विभोर हो गया कि,उसके नन्हे नन्हे से गाल आँसूओं से भीग गए । वहाँ मौजूद बहुत से लोग उसकी तरफ आकर्षित हो रहे थे,

मग़र उस वक्त वह दुनियां से बिल्कुल अनजान ईश्वर के साथ अपनी अर्जी लगाने में तल्लीन था । जैसे ही वह उठा तो मैंने उसके पास जाते हुए पूछा : -कहो, “बेटा! कैसे हो..? अभी आपने भगवान से क्या मांगा..?”

उसने कहा : – “मेरे पापा जो आज इस दुनियाँ में नहीं हैं। उनके लिए “स्वर्ग”,

मेरी माँ हर पल रोती रहती है उनके लिए “सब्र”,

और ये जो मेरी प्यारी सी बहन है इसके लिए अच्छे-अच्छे कपडे, कुछ खिलौने और थोड़े से पैसे, जो ये रोजाना माँ से मांगती रहती है।

बेटा! क्या तुम स्कूल जाते हो”..? ये मेरा स्वाभाविक सा सवाल था । लड़के ने कहा, जी,हाँ! स्कूल जाता हूँ।”

मैंने पूछा, कौन सी क्लास में पढ़ते हो ? उसने कहा, नहीं अंकल पढ़ने नहीं जाता, मां मुझे कुछ चने बनाकर दे देती है। मैं,तो उन्हें स्कूली बच्चों को बेचने चला जाता हूँ। और बहुत सारे बच्चे मुझसे चने खरीदते हैं, जिससे हमारे घर की रोजी-रोटी का जुगाड़ हो जाता है। बच्चे का एक-एक शब्द मेरी रूह में उतर रहा था ।

मैंने पूछा, “तुम्हारा कोई रिश्तेदार है क्या..?”

लड़के ने कहा, “पता नहीं, माँ ऐसा कहती है कि, बेटा! गरीब का कोई रिश्तेदार नहीं होता..! और मेरी माँ ज्यादातर झूठ नहीं बोलती। परन्तु अंकल, मुझे लगता है मेरी माँ कभी-कभी अपने लिए, तो झूठ बोलती है, जिस वक़्त हम खाना खाते हैं,तो वो हमें देखती रहती है । जब मैं कहता हूँ..कि, माँ तुम भी खाओ, तो कहती है मैने अभी-अभी खा लिया, जबकि अधिकतर माँ बच्चों को खिलाने के बाद ही खाती हैं। उस समय तो मुझे जरूर लगता है कि वह हमारे लिए ही सही मग़र “झूठ बोलती,तो है।”

बेटा अगर तुम्हारे घर का खर्च मिल जाय तो पढाई करोगे ? “बिल्कुल नहीं” “क्यों,भई क्यों….? अंकल! वो इसलिए नहीं! क्योंकि मैंने देखा है कि, “पढ़े-लिखे इंसानों में “मानवीय संवेदनाएं” नहीं होती। उनके नैतिक एवं मानव मूल्य दोनों ही अपने स्तर पर नहीं होते ।..और वह गरीबों से नफरत करते हैं।”

आपके अतिरिक्त आज तक हमें किसी पढ़े हुए बन्दे ने कभी नहीं पूछा,

कि बेटा तुम कैसे हो..? पास से बस यूं ही गुज़र जाते हैं ।

ये सुनकर मैं हैरान! कम शर्मिंदा कहीं अधिक था। फिर उसने कहा, “हर दिन मैं, इसी मंदिर आता हूँ। यहाँ कभी किसी ने नहीं पूछा – जबकि यहाँ पर आने वाले ज्यादातर लोग मेरे पिताजी को अच्छी तरह जानते थे – मगर अब हमें.. कोई नहीं जानता..? ये कहते-कहते बच्चे, का गला भर आया और वह जोर-जोर से रोने लगा। उसने कहा, अंकल ! जब किसी बच्चे का बाप मर जाता है, तो जान-पहचान वाले सब उन बच्चों के साथ अजनबियों जैसा बर्ताब क्यों हो करते हैं.. ?

वाक़ई मेरे पास भी इसका कोई ठोस जवाब नही था…क्योंकि कई एक रिश्तों को लेकर धर्मक्षेत्र की अदालत में, उस वक़्त मैं, अपने आपको भी कठघरे में खड़ा हुआ महसूस कर रहा था।

हमारे ही आस-पास ऐसे कितने मासूम होंगे जो हसरतों से घायल हैं..?

बस, एक कोशिश कीजिये और न केवल मानव जाति को वल्कि सभी जीवों को जो हमारे आसपास बेचारे हालात के मारे यतीम व बेसहारा हैं। उनको जितना सम्भव हो सके, हमें उनकी मदद करनी ही चाहिए। मेरे ख्याल से दुनियाँ में इससे बड़ा कोई..’धर्म-कर्म’ हो ही नहीं सकता।

अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो पिछले कई दशकों से हम सभी भटके हुए तो हैं मग़र अंदाज नया है।

अब अधिकतर न केवल गांव-गांव, कस्बा या शहर अर्थात हर जगह कॉलोनी या मुहल्लों में कई कई मंदिरों के निर्माण कार्य जो “धर्म-कर्म” की आड़ में कुछ एक आलीशान लिविंग-रूम,बेड-रूम,किचिन आदि बनवाने की एक मुहिम सी छिड़ी हुई है। जो उस क्षेत्र के किसान, मजदूर और नौकरी-पेशा आदि को “धर्म-कर्म” का पाठ पढ़ाकर ईश्वरीय आस्था के नाम पर समाज के बीच एक छोटे-बड़े की प्रतिष्ठा का सा वातावरण तैयार करके.. ईंट, पत्थर, सीमेंट, अनाज व नगदी वसूल कर उसी दान-दाता समाज के बीच अपने लिए एक “एसो-आराम” से रहने की न केवल उम्दा जगह बना लेते हैं। वल्कि वहां बैठकर कुछ निठल्ले लोग समाज “मेहनत- कस” लोगों से धन ऐंठने की नई-नई योजनाएं बनाते रहते हैं।जो निंदनीय और चिंतनीय दोनों है।

यदि आपको ‘धर्म-कर्म’ (दान-पुण्य) की सही समझ हो, तो आप अपने आस-पास निर्धन व जरूरतमंद लोगों एवं असहाय जीवों को पहले वरीयता दें।

क्योंकि आपके सहयोग की भरे पेट वालों से “उन्हें” कहीं ज्यादा जरूरत हो सकती है.. 👍 राधे-गोविंद🙏🙏

विचारक; युग पचहरा,

नीमगाँव, राया, मथुरा।

89-“सुख-दुःख”

बन्धुवर ! इस बात का कितनों को अहसास है..? कि, संसार में मूलतः “सुख-दुःख” पांच तरह के हैं।

1-धन , 2-तन , 3-मन , 4-बुद्धि और 5-आध्यात्म का सुख।

जैसे; आपने मिठाई खरीदी तो “धन” का सुख,

उसे खाया तो “तन” का सुख,

फिर अपने बच्चों को खिलाया, तो “मन” का सुख,

किसी के द्वारा आपकी योग्यता को सराहा.. गया, तो “बुद्धि” का सुख।

परंतु परमात्म-स्मरण “आध्यात्मिक-सुख” के क्षेत्र में आता है।

जिस प्रकार ये पाँच सुख है। ज़रा अपने दिमाग के घोड़ों को और दौड़ाइएगा तो आप अवश्य पाएंगे कि जीवन में पांच तरह के “दु:ख” भी हैं। जो शायद “जिंदगी” का दूसरा पहलू है। जैसे; आपके हजार रुपए खो गए, तो “धन का दु:ख”,

किन्हीं कारणवश शरीर के किसी अंग का खराब हो जाना.. “तन का दु:ख”,

छोटी उम्र में अपने किसी नज़दीकी व्यक्ति का अचानक गुज़र जाना, “मन का दु:ख”,

और किसी पारिवारिक व्यक्ति का दिमांगी-सन्तुलन बिगड़ जाना, “बुद्धि का दु:ख”,

परंतु विडम्बना देखिये! दुनियाँ का जो सबसे बड़ा दु:ख है, उसकी तो “अनुभूति” भी बहुत कम लोगों को हो पाती है, वह है.. “अध्यात्म का दु:ख”।

दरअसल दुनियाँ में आने के बाद “अपने आपको” न जान पाना “अध्यात्म-दुःख” है। “सामान्य-जन” का ख़ुद के जीवन को आध्यात्मिक नज़र से न देख पाना ही मेरे ख़्याल से सारे दुःखों की जननी है।

और इसके अभाव में जीवन जीने वालों की हालत इस तरह की हो जाती है..कि वे अक्सर अपनी भटकी हुई जुबान में ही सही मग़र कहते सही हैं कि, यारो! “दुःख सहने की इस क़दर आदत सी हो गयी है.. कि दर्द होता, तो है, मग़र हो..ता नहीं है।”

अर्थात उनकी अनभिज्ञता में उन्हें शायद अपने जीवन में इस “आध्यात्मिक-दु:ख” की कमी का अहसास भी नहीं हो पाता।

क्या जो मैं देख पा रहा हूं आप भी ऐसा ही देख पा रहे हैं ..?

धन्यवाद

सभी को नमस्कार

विचारक ; युग पचहरा नीमगाँव, राया, मथुरा।

88-“दोहरा-मानदंड”

जरा आप ही बताइये कि ये “भारत-सरकार” के “दोहरे-मानदण्ड”/ डबल-स्टैण्डर्ड का द्योतक नहीं है,तो क्या है..?

सन 2016 में देश में A.A.L.L. अर्थात “अडानी. एग्रो. लॉजिस्टिक. लिमिटेड.” कम्पनी का प्रादुर्भाव हुआ। मैं ख़ुद उनके ही ‘स्टॉक एक्सचेंज’ के प्रिजेंटेशन का हवाला देते हुए बात कर रहा हूँ.. कोई मनगढ़ंत नहीं..

देखिये! स्टॉक एक्सचेंज के प्रजेंटेशन में ‘अडानी एग्रो..कम्पनी का आंकलन करते हुए बड़े स्पष्ट तरीके से कहा गया है कि, हमें बहुत बड़े-बड़े कॉन्ट्रैक्ट मिलने वाले हैं.., तो इसके लिए क्यों न हमें कोई ठोस स्ट्रेटेजी बनानी चाहिए..? और अपनी ख़ुद की ‘पोटेंशियल साइट’ भी आइडेंटिफाई कर देनी चाहिए। ताकि हमारा “लॉजिस्टिक बिजिनिस” ठीक से आगे बढ़ सके..

यहां इनकी क्रोनोलॉजी भी समझते चलिए..2016 में अडानी S.E.Z. पोर्ट कम्पनी..A.A.L.L.Company को रिव्यु करती है। और कहती है कि, आने वाले वक़्त में तुम्हारा भविष्य सुनहरा है। क्योंकि सारे अच्छे-अच्छे कॉन्ट्रैक्ट्स एवं ट्रैक्स हमें ही मिलने वाले हैं। और इसी इरादे से वे अपने लॉजिस्टिक बिजिनेस को स्ट्रीमलाइन करने के प्रोसेस में लग गए।

2017-18, 2018-19 में उन्हें देश के कई एक राज्यों से अच्छे ठेके भी मिल गए..

मेरा “मूल-मन्तव्य” इस टॉपिक के माध्यम से भारत सरकार के “दोहरे-मानदण्ड” वाली मानसिकता से पर्दा उठाना है।

आज भारत सरकार में जो लीडरशिप है उसे देश की जनता ने बड़े मन से सत्ता सौंपी थी। सत्यता जो भी हो मग़र अफ़सोस! वो स्वच्छ छवि वाली “लीडरशिप” भी देश के आमजन की नज़र में कई एक मुद्दों पर कॉरपोरेट की कठपुतली जैसी ही लगने लगी है।

हिंदी की ये बहुत ही प्रचिलित कहावत “सत्ता पाई काहि मधु नाँहि” इतिहास साक्षी है,अपने देश की “लीडरशिप” में अक्सर चरितार्थ हो ही जाती है.. चाहे कोई भी पार्टी सत्तासीन क्यों न हो जाय..

भारत सरकार ‘अडानी एग्रो लॉजिस्टिक लिमिटेड’ कम्पनी को प्रति टन के हिसाब से स्टोरेज की गैरंटी करती है। और बड़ा स्पष्ट रूप से कहती है कि, हम प्रति टन के हिसाब से इतना रुपया तो आपको देंगे ही। ये कोई साल-दो साल,या चार साल के लिए नहीं, पूरे तीन दशक अर्थात तीस साल तक न केवल गारण्टी करते हैं वल्कि ये वादा भी करते हैं कि, गारण्टी का पैसा प्रति वर्ष मुद्रा-स्फीति के साथ-साथ बढ़ता भी जाएगा।

अब आप ही जानिए कैसी बड़ी विडम्बना है कि, एक तरफ तो किसान-आंदोलन के उन्तालीस वें दिन भी भारतीय किसान एम.एस.पी.जिसका मतलव ही “न्यूनतम समर्थन मूल्य” है। उसकी “लीगल गारण्टी” के लिए 57 लोगों से ज्यादा शहीद हो गए और शर्म की बात ये कि किसानों के समर्थन में और तीन लोगों ने अपना शरीर त्याग दिया।

मग़र अभी तक उन्हें गारण्टी नहीं है..?

गारंटी मिलती है.. A.A.L.L.अर्थात अडानी एग्रो लॉजिस्टिक लिमिटेड कम्पनी को।

आदरणीय भारत सरकार! श्री नरेंद्र मोदी जी, कृषि मंत्री श्री नरेंद्र तोमर जी! “क्या इस तरह का ‘गारण्टेड कॉट्रेक्ट’ भारतीय किसान के साथ नहीं हो सकता..?”

परामर्श;- समय रहते भारतीय अन्नदाता के साथ-साथ देश के आमजन की भी भावनाएं समझ जाइए..देश के सभ्रांत नागरिकों की राष्ट्रीय भावना को उनकी कमज़ोरी मत समझिए..

धन्यवाद👍 ; कलम मेरी जरूर है मग़र विचार जन सैलाब का है.. जो कुछ.. भी कर सकता है..

87-“इच्छा-शक्ति”

न-1 किसी देश की -शीर्षस्थ लीडरशिप,

न-2 किसी सामाजिक सिविल-सोसिएटी या संस्था की लीडरशिप,

न-3 किसी परिवार के “हैड ऑफ द फैमिली” (मुखिया) की नेक-नीयत व दृढ़-इच्छा-शक्ति से देश,समाज,संस्था या परिवार में कुछ अच्छा कर दिखाने के स्वच्छ इरादे होते हैं,तो न केवल मेरा ऐसा मानना है बल्कि इतिहास भी साक्षी है वहाँ सदैव “उरुग्वे” जैसे ही चमत्कारिक परिणाम देखने को मिलते हैं।

जी हाँ, दुनिया के नक़्शे पर एक “उरुग्वे” नाम का देश है, जिसने अपनी सकारात्मक “विल-पॉवर” से अपने देश की धरती को स्वर्ग के मांफिक बना दिया है।

जिसने अपनी “इच्छा-शक्ति” के दम पर अपने आपको इतने सिस्टेमेटिक तरीके से व्यवस्थित किया हुआ है कि, .. उसने पूरी दुनियां को “पृथ्वी पर स्वर्ग” जैसा स्थापित करके दिखा दिया है।

वहाँ औसतन प्रत्येक परिवार कम से कम “चार गऊएं पालता है… और वर्तमान में पूरे विश्व में ये देश खेती के मामले में नम्बर वन की पोजीशन पर है … ये सिर्फ तेंतीस लाख लोगों का देश है, जबकि इसमें गायें एक करोड़ बीस लाख हैं …!!! हर एक गाय के कान पर इलेक्ट्रॉनिक 📼 चिप भी लगी है … जिससे कौन सी 🐂 गाय कब-कहाँ पर है , आराम से उसकी निगरानी की जा सकती हैं …

एक किसान मशीन के अन्दर बैठा , फसल कटाई कर रहा है , तो दूसरा उसे स्क्रीन पर जोड़ता है , कि फसल का डाटा क्या है … ??? इकठ्ठा किये हुये डाटा के जरिए , किसान प्रति वर्ग मीटर की पैदावार का विश्लेषण भी ख़ुद ही कर लेते हैं …

यदि मैं आँकड़ों के आधार पर कहूँ, तो 2005 में तेंतीस लाख की आबादी वाला छोटा सा ये देश , नब्बे लाख लोगों के लिए अनाज पैदा करता था … और … आज की तारीख में तो वह पूरे “दो करोड़ अस्सी लाख” लोगों के लिये अनाज पैदा कर रहा है … “उरुग्वे” के इस सफल प्रदर्शन के पीछे देश के किसानों और पशुपालकों का दशीयों- वर्ष का बहुत ही गंभीर अध्ययन शामिल है।

पूरी खेती को देखने के लिए 500 कृषि इंजीनियर लगाए जाते हैं और वे लोग ड्रोन और सैटेलाइट से किसानों पर नजर रखते हैं , ताकि किसान खेती का वही तरीका अपनाएँ जो विशेषज्ञों द्वारा निर्धारित किया गया है … यानि ” दूध , दही , घी , मक्खन ” के साथ आबादी से कई गुना ज्यादा अनाज उत्पादन होता है।

“सभी अनाज , दूध , दही , घी , मक्खन, दूसरे देशों में आराम से निर्यात भी होते हैं। जिससे हर किसान लाखों में कमाता है … ” एक आदमी की महीने की कम से कम आय 1,25,000/- रुपये है, यानि उरुग्वे के हिसाब से लगभग 19,000 डॉलर सालाना।

“इस देश का राष्ट्रीय चिन्ह सूर्य 🌞 व राष्ट्रीय प्रगति चिन्ह गाय 🐂 और घोड़ा 🐎 हैं।” “उरूग्वे में गाय की हत्या पर कानूनन “तत्काल-फाँसी” का प्रावधान है।

“मैं (योगेन्द्र सिंह) ऐसे कर्मशील व गौ-प्रेमी राष्ट्र को सादुवाद के साथ-साथ बार-बार नमन करता हूँ।

इस गौ-प्रेमी देश “उरुग्वे” की … एक और तारीफ की बात ये है , ” कि इसमें सभी गौ-धन भारतीय हैं … ” जिनका परिचय वहाँ “इण्डियन-काउ” के तौर पर होता है … ” विडम्बना देखिए, कि भारत में गौ-हत्याएं होती हैं और वहाँ “उरुग्वे” में गौ-हत्या पर मृत्युदण्ड का प्रावधान है।

” “क्या हम इस “कृषक राष्ट्र उरुग्वे” से कुछ सीख ले पाएंगे … ??? ” ;

विचारक; युग पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा, (भारत वर्ष)

86-“शिक्षक”

महोदय, मत पूछिए कि शिक्षक क्या है..? आपके प्रश्न का सटीक उत्तर तो सदैव मौन…. है।

मग़र भाव समझ सको तो “शिक्षक” न पद है, न पेशा है, न व्यवसाय है और ना ही गृहस्थी चलाने वाली कोई “इनकम”।

अगर कोई इस पद का निर्वाह कर सके तो “शिक्षक” सभी धर्मों से ऊंचा एक धर्म है। गीता में उपदेशित..

“मा फलेषु कदाचन” वाला “निश्छल-कर्म” है।

शिक्षक तो एक प्रवाह है। मंज़िल भी नहीं वह महज़ एक राह.. है।

शिक्षक वही, जो मर्यादा में है, फिर वह पवित्र क्या!! चारों दिशाओं में महक फैलाने वाला एक इत्र है।

शिक्षक स्वयं एक जिज्ञासा..है। खुद ही जल श्रोत है फिर भी ‘वह’ सदैव प्यासा है। तभी,तो वह “एक शिक्षक” है।

क्योंकि उसमें चांद, सितारों तक को तुम्हारी झोली में डालने की एक अभिलाषा है..

“शिक्षक” सदैव अपने सामने मौजूद व्यक्ति के स्तर को समझते हुए.. उसी जुबान में बोलता है, जिससे कि, बेहतर तरीके से उसे समझा सके। वह अपने शिष्य के सिर पर कभी मित्र, कभी मां तो, कभी पिता के जैसा वर्ध हस्त है। क्योंकि नज़दीक न होते हुए भी, अपने विचारों से ताउम्र..अपने शिक्षार्थी के साथ है।

बच्चों को वह नायक, खलनायक, तो कभी विदूषक लगता है। शायद इतने सारे मुखौटे वह उन बच्चों के लिए ही बदलता है। परन्तु इतने सारे मुखौटों के बावजूद भी, वह समरूप है, समभाव है, क्योंकि यही उसका, “सहज-स्वभाव” है।

ऊँचाई मांपोगे तो, शिक्षक मीरा के गोविंद सा.., बहुत ऊंचा है।

अच्छा, आप ही बताओ ! उसके स्तर तक भला अभी तक कोई अन्य पहुंचा है..?? प्राकृतिक रूप से वह न तो वृक्ष है, न पत्तियां, और ना ही फल है।

मेरे विचार में तो, वह केवल हरी “खाद” है।

शिक्षक खाद बनकर, हजारों को पनपाता है। मोमबत्ती की तरह खुद के स्थूल-शरीर को खपा कर,अपनी शुद्ध-वैचारिक आभा से सब के जीवन में ज्ञान रूपी प्रकाश बन, सदैव के लिए अमर हो जाता है..

क्योंकि “शिक्षक” कोई व्यक्ति नहीं, एक विचार है.. आइना है, सु-संस्कार है।

“शिक्षक” न दीपक है, न बाती है, और ना ही वह रॉशनी है। वह तो महज़ एक तेल है।

क्योंकि उस पर ही तो “दीपक” का सारा खेल है।

“शिक्षक” तुम ख़ुद ही हो, शिक्षक तुम्हारे भीतर की प्रत्येक “अभिव्यक्ति” है।

अब आप ही बताओ! कैसे कह सकते हो..? कि शिक्षक केवल एक “व्यक्ति” है।

इतिहास उठाकर देख लो!! शिक्षक चाणक्य, सान्दिपनी तो कभी विश्वामित्र है। गुरु और शिष्य की प्रवाही परंपरा का एक बेहतरीन चित्र है।

दरअसल, शिक्षक भाषा का मर्म है। अपने शिष्यों के लिए वह धर्म है। साक्षी और साक्ष्य है। चिर अन्वेषित लक्ष्य है। “शिक्षक” एक अनुभूत सत्य है। जो स्वयं में एक तथ्य है।

देश के अन्नदाता की तरह “शिक्षक” में ऊसर को उर्वरा करने की एक “अकूत-हिम्मत” है।

वह एक ऐसा इंद्रधनुष है, जिसमें सभी रंग है। कभी सागर है, तो कभी तरंग है।

वह रोज़ छोटे-छोटे सपनों से मिलता है। मानो उनके बहाने स्वयं पुष्प की तरह खिलता है!

उसके हिर्दय की गहराई तो समझिए वह देश के सर्वोच्च “राष्ट्रपति” पद पर आसीन होकर भी, अपने आपको “शिक्षक” कहलवाने में ही गौरवान्वित होता है।

शिक्षक,पुष्प का बाह्य सौंदर्य नहीं, कभी न मिटने वाली एक सुगंध है। और इस बदलते परिवेश की आंधियों में, अपनी उड़ानों को जिंदा रखने वाली एक पतंग है।

अनगिनत और बिखरे विचारों के दौर में, मात्राओं के दायरे में लय बद्ध, भावों को अभिव्यक्त करने वाला एक छंद है।

मग़र जब से सरकार ने “शिक्षा” का व्यवसायीकरण किया है, यदि तब से ढूंढोगे, तो जरूर उसमें सैकड़ों कमियां नजर आ जाएंगी। क्योंकि “शिक्षण” जो एक “कला” है उसे एक “काम” समझ लिया गया है..?

तुम्हारे आसपास कोई ऐसी ही सूरत नजर आएगी.. लेकिन मेरा यकीन मानो, कभी ज़ीरो-ग्राउंड (कक्षा में) पर आकर देखो, जिस वक़्त “शिक्षक अपनी भूमिका में होता है। तब वह जमीन पर होकर भी, आसमान.. सा होता है।”

अगर चाहते हो उसे जानना। और ठीक-ठीक पहचानना। तो अपने सारे पूर्वाग्रहों.. को मिट्टी में गाड़ दो। और अपनी आस्तीन पे लगी, अहम् की सारी रेत झाड़ दो। फाड़ दो वे पन्ने जिन में, शिक्षक के प्रति नियोजित तरीके से बेतुकी शिकायतें गढ़ी गयी हैं। उखाड़ दो वे जड़े, जिनमें निजी फायदे छुपे हैं। फिर देखो.. “शिक्षक” आपको धीरे-धीरे स्वतः ही समझ में आने लगेगा अपने “सत्य-स्वरूप” के साथ, तुम्हीं में वह खुद व खुद समाने लगेगा.. 👍

धन्यवाद शिक्षा जगत से जुड़े सभी साथियों को सादर समर्पित .. 🙏

मां सरस्वती के मंदिर..”के.एल.जैन इंटर कॉलेज,सासनी,” का है एक छोटा सा पुजारी (शिक्षक)

85-“हार्मोन्स”

मनुष्य अपने जीवन में कितना प्रसन्न है ये उसके निजी कर्मों के साथ-साथ उसको अपनी “ज़िन्दगी की कितनी समझ” है। इस बात पर कहीं अधिक निर्भर करता है।

आपने अक्सर देखा होगा जिन लोगों की मासूमियत एक लम्बे समय तक या फिर ताउम्र जिंदा रहती है। वे लोग, प्राकृतिक रूप से शुद्ध होते हैं। मग़र अधिकतर ऐसे चरित्र के लोगों का वर्तमान सामाजिक वातावरण में सामंजस्य नहीं बैठ पाता है..?

और मैं ऐसा मानता हूँ कि ऐसा इसलिए हो पाता है कि, वे एक सामान्य जन की तरह दुनियाँदारी के ‘ भटकावपूर्ण-वातावरण’ या ‘अति-भौतिकवाद’ की एक वेबजह की रेस जो चल रही है वे उस में शामिल नहीं होते। अर्थात वे अपनी आत्मा पर “सांसारिक कार्मिक-लेयर” को जमने नहीं देते,

इसीलिए वे अंदर से कुदरती तौर पर शरीर में मौजूद ईश्वर प्रदत्त”हार्मोन्स” के ज़रिये अपने आपको न केवल खुश रखते हैं, वल्कि विकट परिस्थितियों में भी वे हमेशा ख़ुश-मिज़ाज़ ही बने रहते हैं। मानव-शरीर में इस प्रकार के चार हार्मोन्स स्वतः ही इन बिल्ट हैं ;–

न.01- सेरोटॉनिन;- यह हार्मोन मूड को बेहतर बनाता है। और इंसान को डिप्रेशन से बाहर निकालने में मदद करता है।

न.02- डोपामिन;- इस हार्मोन का उत्पादन मनुष्य के ब्रेन में कुदरती तौर पर होता है।जो मनुष्य को खुशी की अनुभूति कराता है।

न.03- ऑक्सीटोसिन;- इस हार्मोन को “हैप्पी-हार्मोन” के नाम से भी जाना जाता है। ये ही वो हार्मोन है जो इंसानों को आपस में “प्यार के बंधन” में बाँधे रखने में सहायक होता है।

न.04- एंडोर्फिन;- ये हार्मोन तो एक तरह से कुदरती “दर्द-निवारक” है। जो इंसान को दिनभर ख़ुशनुमा व तरो-ताज़ा बनाये रखता है।

मग़र ये हार्मोन्स तभी सही कार्य करते हैं जब मनुष्य अपने जीवन में संयम-नियम से चलता है।

ये बात एकदम सत्य है कि, दूसरों पर पैसे ख़र्चने पर ख़ुशी होती है। ठीक वैसे ही अपनी सामर्थ्य के मुताविक ज़रूरत मन्द एवं असहाय प्राणियों के लिए कुछ भी करते रहने से मन को कहीं ज़्यादा ख़ुशी व तस्सली मिलती है।

ये भी कहीं तक सत्य ही है कि, इंसान अपने दुःखों का कारण भी कहीं न कहीं ख़ुद ही होता है।

क्योंकि वह छोटी-छोटी खुशियों को नजरअंदाज करके असीमित इच्छाओं को मन में पालता चला जाता है। जिससे एक दिन इस “खूबसूरत ज़िन्दगी” को दुःख के झंझावातों से घिरा हुआ पाता है।

दूसरे जिनकी इच्छाएं सीमित होतीं हैं,वे जीवन में उतने ही ख़ुशहाल भी होते हैं। मेरा अनुभव कहता है कि, यदि इंसान की “संगति” ठीक रही हो, तो सच्चे “दोस्तों” का साथ पाकर अक्सर ज़िन्दगी महक जाया करती है।

क्योंकि “अच्छी-संगति” हमें सकारात्मक ऊर्जा देती है,जिससे हम “स्टेप-वाइज” आगे बढ़ते हुए समय से अपने धेय को प्राप्त कर जाते हैं। 👍

विचारक ;

युग पचहरा नीमगाँव,राया,मथुरा।

84- “प्रोपगेंडा”

कांग्रेस को बहुत पहले यह पता लग गया था कि, यदि 2012 का विधानसभा चुनाव नरेंद्र मोदी जीत गए तब वह प्रधानमंत्री पद के तगड़े दावेदार बन जाएंगे फिर राहुल गांधी का प्रधानमंत्री बनने का सपना अधूरा ही रह जाएगा उसके बाद कांग्रेस ने एक ऑपरेशन नरेंद्र मोदी अभियान चलाया जिसकी पूरी कमान अहमद पटेल के हाथों में थी। अहमद पटेल ने एक साथ लगभग 8 मोर्चे पर काम किया पहला मोर्चा था नरेंद्र मोदी का चरित्र हनन करना उनके चरित्र पर कीचड़ उछालना… उसके लिए अहमद पटेल ने प्रदीप शर्मा नामक आईएएस ऑफिसर को मोहरा बनाकर एक फर्जी कहानी मीडिया में प्लांट करवायी कि, नरेंद्र मोदी एक लड़की को बार-बार फोन करते हैं चलो उसकी जासूसी करवाते हैं दूसरा मोर्चा था 2012 विधानसभा चुनाव में गुजरात की मीडिया को खरीद कर नरेंद्र मोदी के खिलाफ माहौल बनाना और उसके लिए अहमद पटेल ने न्यूजप्रिंट कागज को मोहरा बनाया दरअसल मान्यता प्राप्त अखबारों को भारत सरकार न्यूज़ प्रिंट कागज पर सब्सिडी देती है यह पेपर कनाडा से आता है और यदि सरकार सब्सिडी ना दे तो अखबार इतना महंगा हो जाएगा कि कोई अखबार खरीदेगा ही नहीं इसीलिए भारत सरकार हर एक न्यूज़पेपर हाउस को न्यूज़ प्रिंट कोटा देती है जिसमें उन्हें भारी भरकम सब्सिडी मिलती है अहमद पटेल ने गुजरात के 3 बड़े अखबार दिव्य भास्कर गुजरात समाचार और संदेश से कहा मैं तुम्हारा सब्सिडी कोटा बढ़ा दूंगा बल्कि तुम बैक डोर से भी हर महीने तीन-चार कंटेनर सब्सिडी लेकर इम्पोर्ट करो उसकी सब्सिडी भी लो और उसे खुले बाजार में मार्केट रेट पर बेचकर पैसे कमाओ लेकिन शर्त यही है कि तुम्हें मोदी के खिलाफ गुजरात सरकार के खिलाफ खबरें खूब छापनी है इतना ही नहीं गुजरात समाचार के मालिक शांतिलाल शाह को पद्म विभूषण भी दिया गया संदेश अखबार के मालिकों ने मालिकों को रियल एस्टेट बिजनेस के लिए बहुत बड़ी जमीन जो एनजीटी के अंतर्गत थी उसे केंद्र की मनमोहन सरकार ने क्लियर करवा दिया और संदेश ग्रुप में रिंग रोड पर विशाल टाउनशिप बनाई इन तीनों अखबारों ने खतरनाक मोदी विरोध का बवंडर चला दिया था मुझे याद है उस वक्त मैं नरेंद्र मोदी से मिला था और मैंने यह सवाल किया था कि सर स्टार न्यूज़ एनडीटीवी से लेकर गुजराती मीडिया भी आप के खिलाफ इतना कुछ लिख रही है तो मोदी जी ने मुस्कुराते हुए कहा था कि जेपी मेरी सबसे बड़ी ताकत सोशल मीडिया है तुम जैसे लोग हो जो इनके झूठ का अगले ही पल खुलासा कर देते हो और वह तेजी से वायरल भी होता है अहमद पटेल ने तीसरा मोर्चा नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों में फंसाने के लिए रचा और उसके लिए उसने संजीव भट्ट को अपना मोहरा बनाया संजीव भट्ट की बेटी का दाखिला महाराष्ट्र के d.y. पाटील मेडिकल कॉलेज में मुख्यमंत्री कोटे से करवा दिया गया उसकी वाइफ को राज्यसभा में भेजने का लालच दिया गया और संजीव भट्ट मीडिया में झूठी बातें प्रचारित करने लगा उसकी सारी बातें सुप्रीम कोर्ट में झूठ साबित हुई खैर गुजरात सरकार ने भी संजीव भट्ट को उसकी औकात बता दी उसकी सारी पुरानी फाइल खोलकर उसे सलाखों में डाल दिया आज उसकी पत्नी कहती है कि हमें कांग्रेस ने बलि का बकरा बना दिया चौथा मोर्चा अहमद पटेल ने नरेंद्र मोदी को फर्जी एनकाउंटर केस में खोला गुजरात में जितने भी आतंकवादियों का इनकाउंटर हुआ केंद्र में मनमोहन सरकार थी कई एनजीओ को खुद पैसे दिए गए उसमें शबनम हाशमी तीस्ता सीतलवाड़ मुकुल सिन्हा जैसे लोग थे यह लोग किसी भी तरह से यह चाहते थे कि फर्जी एनकाउंटर केस में नरेंद्र मोदी फंसे उनको जेल हो यहां तक कि इन्होंने अमित शाह को गिरफ्तार कर लिया था लेकिन नरेंद्र मोदी जी के ऊपर बाबा महाकाल की कृपा थी लाख कोशिश करने के बाद भी यह नरेंद्र मोदी पर हाथ नहीं डाल सके इतना ही नहीं इन्होंने पार्टी के भीतर भी बहुत गहरी साजिश रची केशुभाई पटेल को बगावत के लिए अहमद पटेल ने ही उकसाया था पांचवा मोर्चा अहमद पटेल ने सरदार सरोवर नर्मदा परियोजना की फाइल रुकवा कर कर दिया ताकि गुजरात में अकाल पड़ता रहे गुजरात सरकार बदनाम हो मोदी जी ने मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भी 5 दिनों तक आमरण अनशन किया मनमोहन सरकार बैकफुट पर आई और उसने बांध की ऊंचाई बढ़ाने की परमिशन दिया छठा मोर्चा अहमद पटेल ने सीबीआई और ईडी को लेकर किया तमाम बीजेपी नेताओं के घर पर छापे पड़ते थे चाहे वह नितिन गडकरी हो चाहे वह दूसरे नेता हो.. गुजरात में सीबीआई बहुत से नेताओं को परेशान करती रही खैर जिसके ऊपर बाबा महाकाल की कृपा हो अहमद पटेल तो क्या कायनात की कोई ताकत कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकती आपके समक्ष ;एक विचार 👍

83-“व्यवहार”

मेरा ऐसा मानना है कि, इस धरा पर मनुष्य का “व्यवहार” ही “अमूल्य-धन” है। इससे बढ़कर दुनियाँ में कोई और धन मुझे तो कहीं नज़र आया नहीं। क्योंकि जो “पैसा रूपी धन” पूरे विश्व में व्याप्त है वही हर जगह भौतिकता का पर्याय बना हुआ है, वो आवश्यक है, मग़र उन कीमतों पर नहीं जिन पर हम उसे हासिल करने की फिराक में रहते हैं। फिर भी वक़्त के मुताविक पैसा एक “ज़रिया” तो है। ध्यान रहे ये पैसा आता है..और चला जाता है..मग़र अंकित रह जातीं हैं, हिर्दय पर अच्छे व बुरे व्यवहार से बनी कुछ लकीरें जो समय समय पर सुख और दुख की अनुभुति कराती हैं। इसीलिए मैं, स्वयं भी सदैव इसी प्रयास में जीता हूँ। और अपने सभी, शुभ-चिंतकों से भी आग्रह करता हूँ कि, चाहे आपके सामने कभी कितनी ही परिस्थितियां क्यों न हों..? लेकिन अपनी एवं अपने परिवार, समाज, संस्था व देश जिससे हमारा बजूद है। उसकी “छबि” को किसी भी कीमत पर धूमिल न होने दीजियेगा। 👍धन्यवाद।

; युग पचहरा

81-“जीवन-संगिनी”

.🙋🏻‍♀ There is a knowledgeful Dialogue delivery Between Husband-Wife 🙋🏻‍♂ by the title “Jeevan Sangini” इसका हिंदी रूपांतरण पढ़िएगा..

फरबरी,दो हजार पंद्रह में जब से बेटी की शादी..होकर वह अपने पति देव के घर गयी, और 2017 में बेटे ने ट्रायल दिया,तो उसका Delhi Cant फ़ुटबॉल क्लब में सलेक्शन हो गया। तब से अर्थात पिछले चार या पांच वर्षों से अक्सर हम दोनों (पति+पत्नी) ही घर पर अकेले होते हैं..

ये भी एक कॉमन बात है कि, शाम को फुर्सत के पलों में चिर-परिचित लोगों के विचारों का अक्सर समीक्षात्मक विश्लेषण..हर घर में होता ही है।

दूसरी बात.. सौभाग्य से हमारे घर पर हम दोनों की पसंद की कुछ पुस्तकों व पत्रिकाओं का एक अच्छा संग्रह भी है जिसे मिनी लाइब्रेरी कह दिया जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

अतः हम, अपनी-अपनी रुचि के मुताबिक रोज़ाना कुछ न कुछ पढ़ते-पढ़ाते या डिस्कस करते रहते हैं। और आपस के इस डिसकशन के अतिरिक्त मैं, तो सेप्टेंबर,2019 से अपने विचार ब्लॉग के थ्रू आप जैसे गुणी शुभचिंतकों के साथ शेयर भी करने लगा हूँ।

शाम को खाने के वक़्त लगभग नब्बे फीसदी घरों में भोजन के दौरान डायनिंग-हॉल में पारिवारिक सदस्यों के बीच किसी न किसी पॉइंट पर “टेबल-टॉक” होता ही है।

वैसे ही एक दिन मैंने अपनी “जीवन-संगिनी” (एक्सपर्ट इन रिलेशनशिप & होम मैनेजमेंट) देवी नीरज जी से पूछा, कि, देवी जी! आपको कभी बुरा नहीं लगता, जब मैं बार-बार तुम्हें निर्देशित भाषा में, ऐसा करो, वैसा मत करो, करता रहता हूं। और तुम अपने गम्भीर स्वभाव पर अडिग..ख़ुद को इतना संयमित कैसे रख लेती हो.. ?

मैं, ह्यूमैनिटी का विद्यार्थी रहा हूँ। और देवी जी विज्ञान-वर्ग की। शायद इसीलिए उनकी रुचि और उत्सुकता जन-मानस के लिए विज्ञान द्वारा बनाये गए उत्पादों व संसाधनों, की सुविधाओं आदि में कहीं अधिक रही है।

देवी जी आध्यात्मिक-सोच में भी आगे है,

मैंने चीजों को पढ़ा अवश्य है, मग़र “Know exactly what you know.” वाला सिद्धांत नीरज जी पर जितना चरितार्थ होता है। उतना मुझ पर नहीं।

उनमें शुरू से एक ख़ास गुण है कि, वे अपनी जानकारी के साथ सदैव कन्फर्म होती हैं। कन्फ्यूज, नहीं। मेरे ख़्याल से इसीलिए उनके डिसीजन मेरे से अधिक बोल्ड होते हैं। उनके इस गुण के लिए मैं उनका तहे दिल से न सिर्फ सम्मान करता हूं,अपितु किसी भी नए कार्य में उनकी राय को हमेशा वरीयता देता हूं।

शुरू में तो, मेरे प्रश्न पर, वे जरा सी मुस्कराईं, और बोली! कि, ऐसा है किसी भी परिवार में जब पिता अपनी सही भूमिका में होता है, तो स्वाभाविक है बच्चे पिता का अनुसरण करते हैं। यहां “मैं, ऐसा मानती हूँ कि, शादी से पूर्व बेटियों के लिए पिता एक आदर्श स्वरूप होता है। ठीक वैसे ही शादी के बाद लडक़ी जब ससुराल में आती है.. तब उसे सौभाग्य से पति मर्यादित व अच्छे आचरण वाला मिल जाता है, तो स्वाभाविक सी बात है। फिर उसके आदर्श फिगर में पति आ जाता है।”

अब आप भी मुझे एक बात बताइए.., बेटा या बेटी जब अपनी माँ के आज्ञाकारी होते हैं, तो.. उन्हें लोग “मातृ-भक्त” कह कर पुकारते हैं। ठीक है👍

मग़र माँ अपने बच्चों की कितने ही अच्छे तरीके से परवरिश क्यों न करें..उनके लिए हर पल समर्पित होकर रहे..तो,भी उसे “पुत्र या पुत्री-भक्त” या संतान-प्रेमी क्यों नहीं कहते..??

उस वक़्त, मैं सोच रहा था, कि अब देवीजी का लेक्चर शुरू हो गया.. जानबूझ कर उनकी बात का जवाब न देते हुए..

तभी मैंने समानता को लेकर.. उनके सामने एक और विचार रखा!!…वह तो तुम भी जानते हो..मग़र ये बताओ ….

सृष्टि के आरंभ में जब दुनियाँ में जीवन शुरू हुआ होगा, तब तो पुरुष और स्त्री समान ही रहे होंगे.. तो

फिर ये पुरुष, बड़ा कब से हो गया..? जबकि मैने कई जगह पढ़ा है कि, स्त्री सदैव साक्षात “शक्ति स्वरूपा” होती है।

फिर मुस्काते हुए अपने चिर-परिचित अंदाज में वे बोलीं..

महोदय, आपको थोड़ा बहुत विज्ञान भी पढ़ लेना चाहिए था !

तब मैं थोड़ा झेंप गया.. उन्होंने अपने विवेकपूर्ण विचारों को अभिव्यक्त करते हुए बताया..

श्रीमान जी! मत भूलिए! दुनिया का प्रादुर्भाव मात्र दो वस्तुओं से हुआ है …

पहला “ऊर्जा” और दूसरा है “पदार्थ”। पुरुष –> ऊर्जा का प्रतीक है, जबकि स्त्री –> पदार्थ की प्रतीक है।

ध्यान ये भी रहे! पदार्थ को जब विकसित होना होता है, तो पदार्थ स्वयं ऊर्जा का आधान करता है। ना की ऊर्जा पदार्थ का।

ठीक इसी प्रकार … जब एक स्त्री पुरुष का आधान करती है, तो वह ‘शक्ति-स्वरूपा’ हो जाती है, और

शायद इसीलिए आने वाली पीढ़ियों अर्थात् अपनी संतानों के लिए वह प्रथम पूज्या होती है।

क्योंकि, स्त्री पदार्थ और ऊर्जा दोनों की स्वामिनी होती है, जबकि पुरुष सिर्फ ऊर्जा का एक ‘अंश’ मात्र है।

ये सुनकर मैंने चुष्की लेते हुए कहा, फिर तो तुम मेरी भी पूज्य हो गई .. क्यों..?

तुम तो ऊर्जा और पदार्थ दोनों की स्वामिनी हो.. न ?

इस पर उन्होंने थोड़ा सा सहमते हुए कहा !

मुझे थोड़ा आरोपित करते हुए कहा, आप कभी हेल्दी डिस्क्सन नहीं कर पाते हो! अक्सर “जोश में होश” खो जाते हो। ये बात ठीक है, पुरुष के सानिध्य में आकर ऊर्जा का अंश स्त्री ने ग्रहण किया है, और वह पहले से शक्तिशाली भी हुई है, तो क्या स्त्री उस शक्ति का प्रयोग

अपने पति पर ही कर दे ? ये एक अहसान-फरामोशी की बात नहीं हो जाएगी!!

मैंने बीच में उनकी बात काटते हुए कहा, क्यों मैं तो तुम को कई बार अनावश्यक बातें भी बोल जाया करता हूँ। फिर तुम क्यों नहीं.. ? आप अक्सर व्यक्तिगत हो जाते हो.. ये रवैया ठीक नहीं है डिसकशन के दौरान हमें सदैव मुद्दे पर रहना चाहिए।

यहाँ, उनका उत्तर सुनकर,तो… मैं वाक़ई उनके मर्यादित आचरण का मुरीद हो गया। उन्होंने फिर कहा, “पुरुष के संसर्ग मात्र से स्त्री जीवन उत्पन्न करने की क्षमता के साथ-साथ “माँ” बनकर दुनियाँ में ईश्वर तुल्य पद प्राप्त करती है। फिर भी नारी के लिए पुरुष सदैव पूज्य है। क्योंकि इस सब का आधार भी तो पुरुष ही है।

अब आप ही बताइये, जब उनका विचार इतना प्रखर एवं सकारात्मक है, तो मेरा उनके साथ मत भिन्न कभी हो.. कैसे सकता है..? मुझे इस बात पर सदैव गर्व रहेगा कि हम दोनो “मतैक्य” हैं ।

शायद मेरे कमेंट आदि से प्रभावित होकर.. फिर उन्होंने भी थोड़ा व्यक्तिगत होते हुए मुझे छेड़ा और कहा !

ईश्वर न करें हमारे जीवन में कभी कोई ऐसी परिस्थिति बने, और आपसे मुझे कभी कुछ कहने की नहोबत आये!!! फिर भी

मैं,तो नहीं कहूँगी..? मैं हमारी सन्तान जो आपके सानिध्य से “दो अनमोल रत्न” प्राप्त हुए हैं। वे माता “सीता” जी के “लव कुश” की तरह आपसे सारा..हिसाब कर लेंगे।

🙏 इसी के साथ-साथ दुनियां की समस्त मातृ शक्तियों को जिन्होंने अपने प्रेम और मर्यादा में सारी सृष्टि को बाँध रखा है। मैं उन्हें तहे दिल से नमन करता हूं..ये कहता हुआ मैं, ड्राइंग रूम की ओर चल दिया..और ” सुलझी हुई “जीवन संगिनी” के साथ उस दिन का डिस्कशन समाप्त हुआ।👍

धन्यवाद🙏🏾

80-“कुछ सवाल..?”

प्रश्न 1:- भारत में गरीबी कब शुरू हुई ?

उत्तर :- 26 मई 2014 से इससे पहले, गरीब महंगी कारों में घूम रहे थे और ठंडी कॉफी पी रहे थे क्यों..?

प्रश्न २ :- अंबानी और अडानी कब अमीर बन गए?

उत्तर :- 26 मई 2014 को इससे पहले, वे मुंबई सड़कों पर भीख मांग रहे थे क्यों..?

प्रश्न 3 :- कश्मीर मुद्दे कब शुरू हुए ? उत्तर :- 26 मई 2014 से उसके पहले सभी आतंकवादी शांति के दूत थे। वे घाटी में बच्चों को चॉकलेट बाँटते थे और वहाँ की स्त्रियों को अपनी माँ- बहन मानते थे।

प्रश्न 4 :- चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के मुद्दे कब शुरू हुये ? उत्तर :- 26 मई 2014 से इससे पहले पाकिस्तान और चीन ने भारतीयों को बहुत प्यार करते थे। उन्हें देखते ही गले लगा लेते थे क्यों..?

प्रश्न 5 :- भारत मे किसानों की आत्महत्या कब शुरू हुई

उत्तर :- 26 मई 2014 से । पहले किसान बहुत सम्पन्न एवं ओडी , टोयटा जैसी कार मे घूमते थे क्यों..? युरिया की तो होम डिलीवरी होती थी वह भी फ्री मे , 24 घंटे बिजली , पानी । फसल तो बोने के तुरंतबाद सौदे हो जाते थे, व्यापारी एडवांस जमा कराने को तरसते थे ।

प्रश्न 6 :- हवाईजहाज से उड़कर विदेशी यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधान मंत्री कौन थे?

उत्तर :- नरेंद्र मोदी इससे पहले, भारतीय प्रधान मंत्री सपनों में उड़ कर विदेश जाते थे क्या..?

अब क्या हुआ एक समय था कि अफगानिस्तान में बौद्ध मंदिरों को तोपों से उड़ा दिया गया था और आज वहां के राष्ट्रपति हमारे मुल्क देश पे आतंकवादी हमला हुआ तो उन्होंने दक्षेस सम्मलेन में पाक जाने से मना कर दिया। एक समय था जब ईरान हमारी एक नहीं सुनता था,

आज उन्होंने भारत को चाबहार बंदरगाह बनाने और ईरान में अपनी फौजें रखने की इज़ाज़त दे दी।

एक समय था कि नार्थ ईस्ट में terrorists हमला करके म्यांमार भाग जाते थे। आज वहां की सरकार के सहयोग से इंडियन आर्मी ने वहीँ जा के उनके terrorist camps तबाह कर दिए।

एक समय था जब खाड़ी देश पाक का साथ देते थे। दाऊद बरसों तक दुबई में शरण लिए रहा। आज सऊदी अरब ने दाऊद की संपत्ति ही जब्त कर ली। एक समय था जब खाड़ी देश भारत को कमजोर और गरीब समझते थे,

आज अचानक क्या हुआ जो उन्हीने भारत के PM के आगमन पे अपने यहाँ पहला हिन्दू मंदिर बनाने के लिए जमीन दे दी।

आज अचानक क्या हुआ जो बुर्ज खलीफा तिरंगे में रंगा दिखने लगा। आज अचानक क्या हुआ जो हमारी 26 जनवरी की परेड में UAE का फौजी दस्ता शामिल हुआ।

आज अचानक क्या हुआ जो भारत में इतनी हिम्मत आ गयी कि चीन के अरुणांचल के बॉर्डर में सड़कें बना ली, हवाई पट्टी बना ली, 100 मिसाइल भी तैनात कर दिए और टैंक की डिवीजन पोस्ट कर दी।

आज अचानक क्या हुआ जो USA के नवनिर्वाचित प्रेजिडेंट ने सबसे पहले भारत के PM को फोन करके आभार व्यक्त किया ।

आज अचानक क्या हुआ जो ऑस्ट्रेलिया, इंडिया को यूरेनियम देने को राजी हो गया। आज अचानक जापान ने इंडिया के साथ युद्धाभ्यास किया । 👇🏿👇🏿👇🏿👇🏿👇🏿👇🏿👇🏿👇🏿👇🏿 “तब काफी आत्ममंथन के बाद मन ने जवाब दिया कि, चाहे कोई माने न मानें.. मग़र ये सब परिवर्तन आये तो पिछले छ: वर्ष में हीं हैं।

नरेंद्र मोदी के आगमन के साथ..?

प्रश्न- क्या भारत में नरेंद्र मोदी के अलावा वर्तमान नेताओं..

जैसे;- कि

लालू, मुलायम, अखिलेश, मायावती सोनिया, राहुल, ममता, आदि में कोई नेता है..? इस कैलिबर का.. ? जो इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व का रुख अपनी ओर कर सके !!

इसीलिए बंधुओं, अब विचार आपको करना है कि घर में आपस में ही लड़ मरना है या फिर घर-द्वार त्याग कर पूरी तरह मातृभूमि को समर्पित एक ओजस्वी लीडर! के साथ अपने देश का विश्व जगत में सिर ऊँचा रखने में संग रहना है ! आप ख़ुद समझदार हैं। हर बात लाऊडस्पीकर से नहीं बताई जा सकती।

इन तथ्यों पर हर शिक्षित नागरिक को थोड़ा बहुत आत्ममंथन ख़ुद भी कर लेना चाहिए…क्यों..?

;☝एक विचार