19-“बड़ा-कौन=?”…

ये हिंदुओं के महान ग्रंथ”श्री रामायण जी” का ही एक बड़ा रोचक एवं प्रेरणा दायक वृत्तान्त है। आशा करता हूँ आपको जरूर पसन्द आएगा…
महोदय, ये मंज़र उस वक्त का है। जब महाराज दशरथ, अपने चारों पुत्रों को लेकर राजा जनक के दरवाजे पर पहुँचते हैं।…
तब राजा जनक अयोध्या से आने वाली बारात की तैयारियों में व्यस्त थे।मग़र जैसे ही उन्हें,बारात के अगमन की सूचना मिली,तो वे बेहद खुशी से बारात के समीप पहुंचे।और बहुत ही सम्मानजनक तरीके से सम्पूर्ण बारात का स्वागत किया। उसी बीच अचानक राजा दशरथ ने पूर्ण श्रद्धा-भाव से आगे बढ़कर जनक जी के चरण छू लिए। जनक जी एकदम से सहम गए। और उन्होंने दशरथ जी को थामते हुए कहा,..महाराज!आप हर रीति से बड़े हैं। दूसरे आप “वरपक्ष” वाले हैं। ये उल्टी गंगा क्यों बहा रहे हैं=?
इस पर दशरथ जी ने जनक जी के साथ-साथ वहाँ पर उपस्थित सारे समाज को.. (और दरअसल देखा जाए..तो आज उनके इस वृतान्त ने हम सब को भी एक सीख देने का काम किया है।) .. कहा।
महाराज जनक ! एवं यहाँ उपस्थित समाज ! मुझे बताए कि…
जब सदैव से “वरपक्ष” याचक की भूमिका में है।,तो फिर बड़ा कैसे हो सकता है..?
जबकि आप और हम देखते चले आ रहे हैं कि ” कन्यांपक्ष ” सदैव से “दाता” है।
अब सवाल ये है कि ‘याचक’ और ‘दाता’ में “बड़ा-कौन” =?
दशरथ जी ने कहा.. जनक जी “उल्टी गंगा… मै, नहीं ये आपका भटका हुआ समाज न जाने कब से इस “गंगा को उल्टी बहाता हुआ..” चला आ रहा है। सौभाग्य बस आज ही तो मेरे पास ये मौका है इस ग़लत परम्परा सीधी करने का..।
यहां पर अब मुख्य बात ये है कि जब “वर-पक्ष” आपकी “कन्या” को सहर्ष पसन्द कर लेता है। उसके बाद ही ससम्मान शादी करके ले जाता है। वो भी इस वादे के साथ कि ….

“आज के बाद आपकी बेटी की सारी जिम्मेदारियां..सुख-दुःख, हारी-बीमारी, इज्जत-सम्मान सब की रक्षा आदि..सभी बातें.. “वर-पक्ष” के परिवार..और विशेष कर उस वर को निर्वहन करनी हैं।जिस के लिये वो विवाह हो के आयी है।”
” कन्यां-पक्ष ” जिस श्रद्धा-भाव से अपनी बेटी को पाल-पोशकर,पढ़ा-लिखाकर उसकी इज्जत-सम्मान आदि की रक्षा करते हुए शादी-योग्य करके अपने “कलेजे के टुकड़े”, को सृष्टि को आगे बढ़ाने की परम्परा निभाते हुए..न केवल सम्पूर्ण समाज एवं ईश्वर को हाज़िर -नाज़िर मानकर अपितु मनुष्य-जीवन का एक आवश्यक संस्कार होने के नाते.. वह “वर-पक्ष” को ससम्मान, सौंप देता है। कन्या के माता-पिता के लिए क्या.. ये कम बड़ी बात है=? जो समाज के लोग ग़लत परम्परा को बढ़ावा देकर…सदैव से उसे हर मौके पर “छोटा”(तुच्छ) होने का अहसास कराते रहे हैं। कम से कम प्रबुद्ध-वर्ग को तो इस “कृत्य” पर अवश्य ही शर्म.. आनी चाहिए।
यहाँ पर मेरा ख़ुद का ऐसा मानना है। कि..प्रत्येक बेटी के भाग्य में “पिता” तो अवश्य होता है। मग़र ये जरूरी नहीं..कि हर पिता को “बेटी” नसीब हो। लेकिन प्रबुद्ध-वर्ग के लिए इस लेख में एक सन्देश जरूर छुपा है… कि “बेटियों” के मामले में कभी भी अपना पराया न देखें ,चाहे बेटी किसी की भी हो .. स्वयं तो सदैव उसे सम्मान और इज्ज़त दें.. ही। अगर आपको उनके साथ कोई अनहोनी होने की दस्तक महसूस भी हो.. तो ईश्वर को हाज़िर-नाज़िर मानकर तत्काल एक “धर्म-पिता” की भूमिका में दुरबुद्धियों से उनकी इज़्जत और सम्मान की रक्षा करने में अपने मन में विल्कुल भी संकोच न लाएं।
इस वृत्तान्त को पढ़ने एवं समझने के बाद “दाता और याचक” में कौन बड़ा है =?
तब दशरथ जी ने कहा, अब जनक जी बताईये मैं आपके चरण क्यों न छुऊँ..?
इस सुखद मंज़र में अपने होने वाले सम्बन्धी श्री दशरथ जी के ऐसे शुद्ध एवं क्रांतिकारी विचारों को सुनकर.. जनक जी के नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली..
इस पर मैं तो यही कहूँगा कि ..
“भाग्यशाली हैं वो.. जिनके घर कम से कम एक बेटी अवश्य होती है।और सौभाग्यशाली हैं वो..जिन्हें श्री दशरथ जी जैसे निःस्वार्थ विचार वाले “वरपक्ष” के पिता अपने ‘बड़े भाई के रूप’ में मिलते हैं।
धन्यवाद।
विचारक:

युग,पचहरा
जन्मभूमि ; नीमगाँव,राया,मथुरा 8006943731

18- “औलाद”

(Update & upgrade with this Modern-Thought : YUG,Pachahara)
पारिवारिक उन्नति के लिए प्रत्येक माता-पिता के घर में कम से कम एक “सुसंतान” औलाद का होना लाज़मी है। ये कॉमन सा कथन सामान्य लोगों के जहन में एक सवाल को जगह देता है।..
औलाद : बेटा या बेटी..?

“यूनिक फैमिली” तो ‘एक बेटा और एक बेटी’ वाले परिवार को ही कहा गया है। जिसमें न केवल परिवार अपितु सृष्टि भी सन्तुलित रहती है। दूसरे परिवार से एक बेटा दामाद के रूप में लेते हैं और उन्हें पुत्र बधू के रूप में एक बेटी देते हैं। ठीक वैसे ही अपने बेटे के लिये एक लडक़ी.. पुत्रबधू के रूप में अन्य परिवार से लेते हैं।
लेकिन इतिहास साक्षी है..प्राचीन समाज में अधिकतर लोगों के मन में “पुरुष-प्रधानता” घर किये हुई थी। जिस के कारण मानसिक-स्तर से अति-पिछड़े ,दकियानूसी विचार-धारा वाले लोग भारतीय समाज में एक-आद किसी कोने में अभी भी मिल जाते हैं। हालांकि पहले की तुलना में आज नई पीढ़ी में जो “माँ-बाप” बन रहे हैं वे आधुनिक विचारों से काफी अपडेटेड हैं।…
इसलिए सन्तान या औलाद में Male-Female doesn’t matter. क्योंकि सृष्टि को आगे बढ़ाने में दोनों का विल्कुल बराबर का हाथ होता है। तो बेटे-बेटी को यूं अलग-अलग तराजू में तोलना बन्द करें। बहुत हो चुका..अर्थात दोहरी-मानसिकता रखने वालों के दिन अब लद गए… मैं तो उन्हें यही परामर्श करूंगा.. कि अपना बुढ़ापा खराब नहीं करना हो,तो वे समय रहते सम्भल जाएं।
“सन्तान” कोई भी हो ‘बेटा या बेटी’ मैं देख रहा हूँ आज के ‘युवा-दम्पतियों’ पर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। हाँ पुराने विचार की बुजुर्ग पीढ़ी के कुछ लोग जरूर मौका पाते ही अभी भी घर के अच्छे भले वातावरण में जहर घोलने से बाज नहीं आ रहे..।

मग़र असल सवाल तो बच्चे के पालन-पोषण का होता है। कि उसे “परवरिश” कैसी..दी गयी है=?
ये “परवरिश” ही वो चीज़ है। जो एक सामान्य से बच्चे को भी… “सुपात्र-सन्तान” (सु-सन्तान) का आकार दे-पाती है।

अध्यात्म की दृष्टि से “नियति” के अनुसार माता-पिता एवं संतान दोनों ही एक-दूसरे को सौभाग्य एवं संस्कारों के अच्छे संश्लेषण से मिलते हैं। लापरवाही से पैदा किये हुए सौ “कुपात्र-बच्चों” से… एक “सुपात्र-सन्तान” हमेशा अच्छी होती है।

ये सर्व-विदित है कि अकेला चाँद पूरी दुनिया का अंधेरा मिटा देता है। जबकि हमारी आंखों के ही सामने “उसी-अंधेरे” को असंख्य तारे नहीं मिटा पाते।
माँ-बाप के ‘कलेजे’ को सुपात्र-सन्तान के “अच्छे-कर्मों ” से जितनी ‘ठंडक’ पहुंचती है। दुनियां की दूसरी कोई चीज़ उतना सुकुन नहीं पहुँचा पाती।

इसलिए यहां “नव-दम्पत्तियों” को एक सीख लेना नितांत आवश्यक है। कि उनके घर में सन्तान पैदा होते ही उनमें “सन्तान-धर्म-पालन” का उत्तर-दायित्व स्वतः ही आजाना चाहिए।
एक और बात, कुपात्र-बच्चे परिवार का ही नहीं,सम्पूर्ण समाज व राष्ट्र के लिए भी कष्टदायी होते हैं।
दूसरे , उनके ग़लत क्रिया-कलापों को जानने और समझने के बाद भी मां-बाप की तरफ से उन्हें सपोर्ट या आश्रय मिलते रहना…मेरी नज़र से इसे परिवार-द्रोह, समाज-द्रोह या राष्ट्र-द्रोह भी कह दिया जाय.. तो भी कोई ग़लत नहीं होगा। क्योंकि भारत में जन्म लेते ही कानूनन हर व्यक्ति देश का नागरिक होता है। इसलिए भारत-भूमि पर जन्मे प्रत्येक “बच्चे” की पहली जिम्मेदारी अपने परिवार के साथ-साथ देश के लिए एक अच्छा नागरिक बन के तैयार होने की भी है। और जिस भू खंड का खाते हैं उसके लिए सदैव सच्चे-भाव रखने की भी।

जबकि कुछ ही अच्छे सुसंस्कृत एवं संस्कारयुक्त नागरिक होते हैं। जोअपने वंश के साथ-साथ देश का परचम पूरी दुनियाँ में लहराते हैं।
किसी भी महिला के लिए “स्त्री-धर्म” की सफलता.. अच्छी सन्तान की “माँ” कहलाने में है। न कि कई बच्चों की सिर्फ जननी बनने में..?
सपूत या फिर सपूतनी जैसे; लक्ष्मीबाई, मदर-टेरिसा एवं मीराबाई आदि ये वो “सु-संतान” हैं। जो पूरी दुनियाँ पर अपना लोहा मनवा चुकी हैं। ऐसे चरित्रों की हमारे इतिहास में भरमार है। जो न सिर्फ अनुकरणीय हैं,अपितु हमारे लिए वंदनीय भी हैं।
इसलिए आज के दौर की महती आवश्यकता है। कि सम्पूर्ण परिवार,समाज और फिर देश न केवल अपने मानसिक-स्तर को उठाएं अपितु उसमें मानव-मूल्यों एवं नैतिक-मूल्यों को जगह दें। ऐसा करने से केवल पारिवारिक स्वर्ग ही नहीं सम्पूर्ण कायनात में स्वर्ग स्थापित हो जायेगा।

जय हिन्द! जय भारत!
धन्यवाद।

विचारक; युग पचहरा

Contact No. 7830743731

17- “मृत-प्राय” (A Legendary Dialogue with Y.S.पचहरा)

हमारे महा ग्रंथ “रामायण ” में वर्णित “रावण-अंगद” संवाद के आधार पर 14 दुर्गुणों में से एक भी यदि किसी में है, तो वह जान ले.. जीते-जी मृत्यु के समान है।
राम-रावण युद्ध के दौरान जब वाली-पुत्र अंगद, रावण को समझाने लंका में पहुँचे.. तो वहां अंगद ने रावण से कहा, मैं तुझे “मरे हुए को क्या मारूं=?” क्योंकि तू ! तो अपने विकर्मों के कारण जीते-जी “मृत-प्राय” है।
तब रावण क्रोधित होकर बोला रे ! मूर्ख मैं तेरे सामने जीवित खड़ा हूँ। क्या… “मृत-प्राय,मृत-प्राय” रट रहा है।
उस वक्त वाली-पुत्र अंगद ने “मृत-प्राय” वाले तथ्य के प्रति अहंकार के कारण अनभिज्ञ रावण को पुनः स्मृत कराते हुए कहा.. हे राजन! सिर्फ “सांस लेने” को ही जीवित समझ लेने की भूल मत करियेगा… ऐसे तो सांस फिर लुहार का ‘भाता’ भी खूब लेता है। फिर तो वो भी ख़ुद को जीवित समझने लगेगा। अघ्यात्म के नज़रिए से इन “चौदह-दुर्गुणों” के बारे में यदि मैं अपना पक्ष रखूँ तो बात एकदम सीधी सी है।कि किसी मनुष्य के अंदर इन दुर्गुणों में से एक भी है।तो वाक़ई वह जीते- जी “मृत्यु के समान” ही है।
वो “चौदह-दुर्गुण हैं;–
1- अति काम-वासना ;
अत्यंत कामी,भोगी अर्थात जो संयम-नियम से नहीं चलते हैं।वे जीते जी मरे हुए के समान ही हैं।
2- वाम-मार्गी ;
बिना विचार करे हर बात का विरोध करने वाले लोग। “पूर्वाग्रह के मरीज” सदैव जीते जी मृत समान होते हैं।
3- कंजूस ;
किसी भी कार्य में समय की महत्ता समझने के बजाय पैसे को वरीयता देने वाले लोग..
4- अति-दरिद्रता ;
बेहद दरिद्र होंना भी एक श्राप है। पूर्व जन्मों के विकर्मों के कारण नियति ने जीवन तो उन्हें दिया है। मग़र सिर्फ नाम का, वे दुखों में इस प्रकार उलझे हैं।लगता है।कोई सज़ा पूरी कर रहे हों। अतः ये अवस्था भी मृत्यु के ही समान होती है।
5- विमूढ़ ; विवेक-शून्य
किसी जिम्मेदार पद पर आरूढ़ होने के बावजूद भी अपने विवेक से निर्णय लेने के बजाय बात-बात पर दूसरों पर आश्रित रहे वाला भी जीते जी मृत्यु के समान ही होता है।
6-आजसि ; कुख्यात
बुरे कार्यों में लिप्त बदनाम व्यक्ति भी मृत्यु प्राय ही होते हैं।
7-अति-रोगी ;
अधिकतर बीमार रहने वाला भी किसी काम का न होने के कारण दूसरों पर बोझ होने से मृत्यु समान ही हो जाता है।
8- अति-बृद्ध ;
शरीर जीर्ण-क्षीण हो जाने के कारण भी एक तरह से मृत-प्राय वाली अवस्था ही हो जाती है।
9- अति-क्रोधी ;
हर वक्त क्रोधित रहने वाला,अपना आपा खो देना यानी अक्ल खो देना। ये अवस्था भी जीते जी मृत्यु के समान ही होती है।
10- निकृष्ट-धन ;
ग़लत तरीके से धन कमाना,किसी को धोखा दे कर अपना काम करने वाला भी जीते जी मृत्यु के समान ही होता है।
11-देहाभिमानी ;
तनु-पोषक;- हर वक्त स्वार्थ-परता में जीने वाला।अपनी देह के अहंकारयुक्त नशा में रहना भी पूरी तरह मृत्यु समान अवस्था ही है।
12-सदैव-निंदक ;
प्रत्येक अच्छी-भली बात की निंदा करने वाला पूर्वाग्रह से ग्रसित व्यक्ति भी जीते जी मरे के समान होता है।
13- परमात्म-विमुख ;
अति-अहंकारी,अति-भौतिकवादी एवं ईश्वरीय-शक्ति से अनजान लोग तो जीते जी मृत्यु-प्राय होते ही हैं।
14- श्रुति-संत विरोधी ;
ऐसे लोग जो सच्चे सन्तों,महापुरुषों आदि का भी विरोध करें सभी को नकारात्मक दृष्टि से देखें या पाखंडी समझें। ऐसे लोग भी जीते-जी.. मृत्यु के समान ही हो जाते हैं।
अब इस “अंगद-रावण” संवाद से हम सभी अपना-अपना आत्मावलोकन करें और देखें इन 14 दुर्गुणों में से कहीं हमारे ही अंदर ये विकृतियाँ तो नहीं हैं…?
अपने ग्रन्थों में विद्यमान “गूढ़ विचार” को चरित्र उत्थान के उद्देश्य से पुनःमानव- स्मृति में लाने का एक प्रयास..

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युग, पचहरा
नीमगाँव,राया,मथुरा उत्तर प्रदेश।
8006943731

16- Challenge & Change (Know the effect on people with Y.S.पचहरा)

चलो,.. मैं इन “दो अंग्रेजी” शब्दों के व्यक्तिगत प्रभाव को..अपनी मातृभाषा में स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ। ये दोनों शब्द मनुष्य की मनः स्थिति पर बहुत प्रभावी होते हैं। हालांकि वो लोगों के स्वयं के स्वभाव पर ही निर्भर करता है.. कि वह उसे ले किस रूप में रहे हैं.. “पॉजिटिव या नेगेटिव” आप अपनी तसल्ली के लिए इतिहास के पन्नों को अवश्य उलट के देखियेगा। क्योंकि मेरा ऐसा मानना है कि..
दुनियाँ में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन सब ने पहले अपने निकटतम शत्रु ‘आलस’ और बाद में “नींद और निंदा ” पर विजय पायी है। तब कहीं जा के वे अपने जीवन में वांछित मुक़ाम पर पहुँचे हैं। जिसके लिए वे दृढ़ संकल्पित थे। ऐसे लोगों को आगे बढ़ने से न तो कभी कोई रोक पाया है। न कभी रोक सकेगा। क्योकि “जो चीज़े आपको Challege करती हैं। मेरे ख़्याल से वही चीज़ें वास्तव में लोगों को change करने की सामर्थ्य.. भी रखती हैं।” अब फ़ैसला तो ख़ुद लोगों के ही हाथों में है…कि वे इसे कैसे लेते हैं।
But always be SMILE & HAPPY : thanks for reading…
युग,पचहरा
Contact No.8006943731

15- “श्रेय और प्रेय”

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने पर मनुष्य सृष्टि के आरम्भ से ही “श्रेय और प्रेय” के दो-राहे पर खड़ा है।

हालाँकि, इन दोनों में से किसी एक राह पर,तो चलना ही है…

सामान्य भाषा में ‘श्रेय और प्रेय’ जैसे शब्दों का सरलीकरण किया जाय तो,
दरअसल, ‘श्रेय’ का अर्थ है : ‘कल्याणकारी’ अर्थात पहले परिश्रम बाद में आनन्द मय जीवन।
उसी प्रकार इसके एकदम विपरीत है ‘प्रेय’ का अर्थ : ‘कष्टकारी’ जिसमें पहले आनन्द और बाद में दुःख ही दुःख। इसे

और अधिक स्पष्ट किया जाय तो..

“श्रेय-मार्ग” पर चल कर व्यक्ति दिन प्रतिदिन ईश्वर के समीप पहुंचने का प्रयत्न करता है।

जबकि प्रेय : के वशीभूत लोग दिनों दिन ईश्वर से दूर सांसारिकता की गुत्थियों में उलझते चले जाते है।

ये बात जग ज़ाहिर है..कि संसार में अपार दुःख है। इसीलिए संतों की भाषा में संसार को दु:खालय कहा जाता है। लेकिन उसी क्षण तक दुःख है जब तक कि आप “संसारी” हैं।

जैसे ही आसक्ति की जगह आपमें निरासक्त का भाव जागृत हो जाता है बस उसी क्षण आपके सारे दुःख छूमंतर हो जाते हैं।

अब फैसला आपके हाथ में है कि इन “दो-राहों” में से आप चुनते क्या हैं..??

जो ‘आत्मा का सुख’ चाहता है वो “श्रेय” और जो ‘इन्द्रिय-सुख’ (शारीरिक-सुख) चाहता है वो “प्रेय”..के वशीभूत होता चला जाता है।

कहना न होगा कि, संसार में जीने के ये दो तरीके हैं। इसलिए जीवन किसी एक अंदाज में तो जीना ही होगा।

इसीलिए स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा का प्रथम सोपान “मन पर नियन्त्रण ” को बताया है (Control of the Mind) क्योंकि इस “चंचल मन” को आप कभी खाली नहीं रख सकते। मन का तो स्वभाव है। वो तो हर पल कार्य करेगा। अगर आप सदमार्ग “श्रेय” की ओर ले जाने में असमर्थ रहते हैं, तो स्वाभाविक है “प्रेय” जो आउट ऑफ ट्रैक है। उधर तो व्यक्ति जायेगा ही।

सभी धर्म-शास्त्र कहते हैं कि इस “मानव देह” के समान दुनियाँ में कोई ‘दुर्लभ’ वस्तु नहीं है।। मग़र मनुष्य इसे भूला हुआ है।

शंकराचार्य जी ने कहा हैं कि तीन चीज़ ईश्वर की कृपा से मिलती हैं।
1- मनुष्य का शरीर
2- श्रेय-मार्ग की भूख (आत्मा के लक्ष्य “आनन्द” को पाने की पिपासा)
3- प्रबुद्धजनों का साथ (सु-संगति)

अगर लोगों की सोच के धरातल पर विभाजित होते मानसिक-स्तर पर ..मै प्रकाश डालू तो हमारे देश ही क्या.. पूरी दुनियां में
लगभग 11 धर्म हैं जो प्रचलन में हैं…अर्थात चल रहे हैं।

जैसे;-जापान में..

1-शिन्तो धर्म,

उसी प्रकार चीन में दो धर्म ..

2/अ- ताओ या लाओत्सी और 3/ब- कन्फ्यूशियन धर्म,..और दुनियाँ के शेष आठ धर्मो में से भारत में तो सभी धर्मों के लोग रहते हैं..

4-यहूदी धर्म, 5-हिन्दू-धर्म, 6-क्रिस्चियन-धर्म,7-सिक्ख-धर्म, 8-बौद्ध-धर्म,9- पारसी-धर्म, 10-इस्लाम-धर्म,11- जैन-धर्म।.. लेकिन ध्यान दीजियेगा ये 11 धर्म इन प्रमुख दो ” श्रेय और प्रेय ” के अंतर्गत ही आते हैं।

मग़र इस दुनियाँ की विडम्बना यही है..कि सम्पूर्ण आबादी में से अधिकांश 80% लोग जो पूर्ण रूप से भौतिकवादी हैं। वे “प्रेय मार्ग” की ओर ही जाते हैं। क्योंकि लोग Soul-Conscious होने की बजाय सिर्फ Body-Conscious हो के रह गए हैं।

हिंदुओं के धर्म-ग्रन्थ “रामायण” में लिखा है..कि
” बड़े भाग्य मानुष तन पावा, सुरदुर्लभ सद्ग्रंथनि गावा।”

जब ये मनुष्य शरीर बड़े “भाग्य” से मिलता है… तो सवाल उठता है.. कि ये भाग्य क्या है..? भाग्य: माने अपने ” ख़ुद के कर्मों से निर्मित प्रारब्ध ” अर्थात अपने ही पूर्व जन्मों की कमाई से आत्मा से अटैच्ड प्रारब्ध नाम का एक “शेष खाता” होता है। जैसा कि कर्मयोग में श्री कृष्ण ने भी कहा है…कि जब तक उसका हिसाब चुकता नहीं हो जाता प्रत्येक जीवन में जन्म-जन्मांतर तक ये जीव के साथ चलता है। परन्तु यहां आकर बहक मत जाइएगा.. मुख्य पहलू को पकड़ियेगा ,चाहे ईश्वर दे, चाहे कोई और..हमारी कमाई है “कर्म”..

हाँ! “वह कर्म” जरूर आपकी ही कमाई है। मग़र वो कमाई अपने आप तो “फल” नहीं बन जाती। अभी तो वह कर्म..” जड़ रुप “में हैं। जब तक ईश्वर उस कमाई को अपने संज्ञान में लेकर.. अर्थात आपके “कर्म,अकर्म एवं विकर्मों का उचित-अनुचित की दृष्टि से आंकलन नहीं कर लेते.. तब तक “वह कर्म” जड़ से “फल” नहीं बनता। तो फिर जीव को नया शरीर मिलेगा कैसे..? और ऐसा कहा जाता है कि, ये सारी मेहनत ईश्वर को किसी भी जीवात्मा के “शिशु ” रूप में माता के गर्भ में आने के पूर्व ही करनी होती है।

इस सब के लिए क्या ईश्वर किसी से कोई मेहनताना लेते हैं। मग़र यहां गौर करने वाली बात ये है। कि “ईश्वरीय कृपा ” और “मनुष्य का कर्म” दोनों अनिवार्य होने के साथ-साथ उनके प्रति उचित निर्णय भी आवश्यक है।

अगर ऐसा नहीं होता तो.. ईश्वर को तो सब पर कृपा कर देनी चाहिए थी=?
मनुष्य शरीर बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन “क्षणभंगुर” (Ephemeral) है।भौतिक दृष्टि से कहा जाय तो ये सबसे बड़ा दोष है।

मनुष्य जीवन में इस शरीर की क्षणभंगुरता ही सबसे बड़ी गड़बड़ी है।

मग़र आज का इंसान इसी से बेखबर भी है। जो आज का विचारणीय बिंदु है।

“वेद” कहता है।कि कोई भी बेटा,बाप के लिए कुछ नहीं करता। और कोइ भी बाप, बेटे के लिए कुछ नहीं करता। व्यक्ति इस तथ्य की गहराई को न समझ पाए वो अलग बात है। अगर इस तथ्य को मैं Spiritual-angle से स्पष्ट करूँ तो ….
प्रत्येक मनुष्य इस दुनियाँ में अपने ख़ुद के “स्प्रिचुअल-दिव्य-आनन्द” के लिए ही प्रयत्नशील है। वह वही करने में रुचि लेता है। जो उसे खुद अच्छा लगता है। ज़रा आप भी इस तथ्य पर थोड़ी देर के लिए चिंतन में जाइएगा..और सोचिएगा..कि,

आप लोग जितने रिश्तों में प्रेम करते हैं , ..जैसे;

माँ, बाप, बेटा, बेटी, पति, पत्नी,भाई, बहन..में क्यों करते हैं..? सिर्फ “अपने सुख ” रूपी वस्तु के लिए। उनके “सुख” के लिए तो कतई नहीं।

“वेदों” में कहा गया है। कि संसारी व्यक्ति को अपने से प्यार है। इसीलिए वो संसारी है। जब वह दूसरे के सुख में अपना सुख ढूंढ़ने लगेगा तभी वह सही रूप में “आत्मा-भिमानी ” बन पायेगा।
मग़र एक तरफा नहीं चलेगा..जैसा चल रहा है। ये जग ज़ाहिर है कि मनुष्य को अपने प्रति अनुकूलता में प्यार है। तो सब कुछ ठीक है। जैसे अपने मन के ही विपरीत स्थिति होती है..तो लोग झगड़ने लगते हैं…यहाँ तक है कि कुछ तो आपे से इतने बाहर हो जाते हैं कि गोली तक मार देते हैं चाहे कोई भी रिश्ता हो…तो फिर कहाँ है दूसरों में आनन्द/सुख..?

सभी रिश्तों एवं वस्तुओं से इंसान खुद ही लाभ चाहता है। बड़े बुजुर्ग ठीक ही कहते हैं कि “स्वारथ लाभ करहिं सब प्रीती…” जबकि आप समझते हैं कि मैं एक आत्मा हूँ।और ये संसार मैटेरियल है। और मैं स्प्रिचुअल हूँ..दिव्य हूँ। ईश्वरीय अंश हूँ। इसलिये मेरा सुख तो मेरे उस अंशी (ईश्वर) में ही होगा। क्योंकि मैं “परमात्म-आभिमानी”

(God-Conscious) हूँ। ये संसार तो इस पंचमहाभूत शरीर को चलाने के लिए है। न कि इसमें उलझने के लिए.. जिस प्रकार छोटे बच्चे को टॉयज मन बहलाने के लिए दिए जाते हैं न कि पूरे जीवन के लिए।

ठीक वैसे ही मनुष्य के लिए.. संसार है। लेकिन उस भव-सागर से पार उतरकर आत्मिक रूप में परिवर्तित होकर “श्रेय” की ओर जाना है। न कि “प्रेय” के वशीभूत हो जीवन के असल ध्येय से भटक जाय।

ये बहुत अजीब सी सच्चाई है। मग़र यही अध्यात्म है। और ये ही दुनियाँ का सच भी।

धन्यवाद👍
; युग,पचहरा,

88A वसुंधरापुरम,हाथरस।
Contact No.8006943731

14-“सच्चे कर्मयोगी”

“सच्चे कर्मयोगी”

: योगेन्द्र सिंह,

प्रशिक्षित स्नातक,अंग्रेजी
(के.एल.जैन इ.कॉलेज,
सासनी,हाथरस)

सम्पूर्ण विश्व एक विराट ‘ रंगमंच ‘ है। हमारे देखते ही देखते लोग अपनी भूमिका निभाकर इस नाट्य-शाला से भूमिका पूरी होते ही अदृश्य होते चले जा रहे हैं। नियति के खेल “जन्म-मरण” की प्रक्रिया सृष्टि के प्रारम्भ से निरन्तर अपनी गति से चल रही है..और जब तक दुनियां अपने वजूद में है ऐसे ही चलती रहेगी।
अंग्रेजी के एक मशहूर ..कवि ;मिस्टर जॉन मिल्टन, के अनुसार ..”दुनियाँ में सिर्फ दो ही चीजें हैं जो स्थायी हैं..एक मनुष्य का “विचार”,
दूसरा उस अमुक “विचार” के आधार से धरातल पर लोकहित में खड़ा किया गया “कृतित्व”। उदाहरणार्थ ; हमारी संस्था “के एल जैन इंटर कॉलेज,सासनी।” जो ऐसे ही एक “पुण्य विचार” का धरातल पर मजबूती से अवतीर्ण हुआ एक “मूर्तरूप” है।
अन्यथा संसार में जो कुछ भी हम देख रहे हैं वो सब “नश्वर” है, अविनाशी है।

ये सब जानते हैं कि परिवर्तन संसार का नियम है। ये प्रक्रिया प्रति-क्षण अनवरत चलती रहती है। जीवन की क्षणभंगुरता के बावजूद किसी भी “सजीव-निर्जीव” वस्तु, व्यक्ति या फिर जीव-जंतु आदि की दुनियाँ में जो मौजूदगी है …. वो सब “नियति” के अनुरूप परमसत्ता की “पूर्व-निर्धारण” व्यवस्था के अन्तर्गत ही है। समय समाप्त होते ही वे पांचों तत्व पुनः अपनी उसी अवस्था में वापस.. हो जाते हैं।

किंतु जीवन की सफलता के परिप्रेक्ष्य में वही जीवन सफल और धन्य हैं। जिनके “सुकृत्यों” से वंश-परिवार,समाज और राष्ट्र समुन्नत होते हैं।

सासनी नगर के लुहाड़िया भवन में “जैन” परिवार में जन्मे श्री छेदीलाल जी जैन (बडे बाबू जी) व श्री प्रकाशचंद्र जी जैन (छोटे बाबू जी)ने अपने उत्तम कार्यों से न केवल अपने परिवार को,वल्कि उन्होंने अखिल भारतीय जैन समाज को भी समुन्नत किया है।

वर्ष 1994 में अंशकालिक पद पर “प्रशिक्षित स्नातक अंग्रेजी शिक्षक” के रूप में जब मुझे सासनी के इस नामचीन “जैन कॉलेज” में पढाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वो मंजर आज भी मुझे अच्छी तरह से याद है। उस समय बड़े बाबू जी नीर क्षीर विवेकी संस्था के प्रबंधक थे एवं छोटे बाबूजी कॉलेज के निर्भीक संस्थापक थे।

विद्यालय में मुझे तैनाती मिलने के महज़ तीन-चार महीने बाद ही मुझे 02 दिसम्बर,1994 को विद्यालय में व्यवसायिक-भवन के उदघाट्न के अवसर पर छोटे बाबू जी को साक्षात देखने व सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

बड़े बाबूजी की तो शिक्षा प्रेम की अनेकों मिसाल सुनी हुई थीं, मगर तब मैंने जाना कि हमारे छोटे बाबूजी भी पीछे नहीं थे। मुझे तो दोनों बंधुओं की श्री राम लक्ष्मण जैसी जोड़ी लगती है।

उन दोनों का एक ही सपना था, कि नई पीढ़ी को शिक्षा के माध्यम से हमारे सुयोग्य शिक्षक-मंडल द्वारा ऐसे संस्कार दिए जाएं जिससे वे देश-दुनियाँ के लिए न केवल अच्छे और सच्चे नागरिक बनें अपितु राष्ट्र के भावी ‘कर्णधार’ बन पूर्ण निष्ठा के साथ समूचे राष्ट्र की सेवा करें। विश्व-पटल पर हमारी संस्था का परचम लहराएं।

दोनों महान विभूतियो kiki “विद्यालय के अस्सी की” स्मृति विशेषांक के द्वारा मैं बड़े अदब के साथ बताना चाहता हूं कि हमारे पूर्व शिक्षक साथियों के नक्शे कदम पर चलकर अल्पसंख्यक संस्था में तैनात हुए शिक्षक मंडल ने भी अपने शिक्षार्थियों की सफलता के रूप में अनेकों गौरवपूर्ण कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इसी प्रकार संस्था से जुड़े उस हर एक व्यक्ति को इसी धारणा और संकल्प को ध्यान में रख कर विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ “माँ सरस्वती” के मंदिर (के.एल.जैन इंटर कॉलेज,सासनी) के विकास के लिये पूर्ण समर्पित होकर सतत प्रयत्नशील रहना होगा।

अगर मैं स्पष्ट कह दूँ, तो छोटे बाबूजी विद्वान की अपेक्षा बुद्धिमान अधिक थे। विद्वानों के सम्मान करने के नायाब तरीके,तो कोई उनसे सीखे। इसीलिये किसी के भी सम्मान में हल्कापन उन्हें विल्कुल वर्दाश्त नहीं था।

मगर इसी व्यवसायिक भवन उदघाटन के दौरान स्वागत के वक्त किन्ही कारणों बस “स्वागत हार” थोड़ा सा छोटा क्या बन गया.. इस पर बाबूजी ने समस्त ‘स्वागत-मण्डल’ को अपने स्पीच के दौरान भविष्य के लिए एक बहुत अच्छी सीख दी। सच कहूँ, तो पहले-पहल बड़े बाबूजी की तुलना में छोटे बाबूजी मेरी मान्यता की परिधि में नहीं थे। लेकिन वे बाद में अपने गुणों के वातायन से वे न केवल मेरे आदर के आधार बने..अपितु धीरे-धीरे..एक दिन वे मेरे आदर्श भी बन गए।

उस थोड़े से समय में ..मैं, छोटे बाबू जी को जितना जान पाया , उस आधार पर मैं इस बात को थोड़ा और गम्भीरता से इसलिए भी लेता हूँ। क्योंकि उन दिनों मेरा शोध-कार्य “अधिकार और कर्तव्य” के मध्य रिलेशनशिप पर ही चल रहा था। बाबू जी ने कभी-भी अधिकार को कर्तव्य से बड़ा नहीं माना।और ये हक़ीकत भी है। “कर्तव्य” का स्थान सदैव अधिकार से ऊँचा होता है….और रहेगा। बाबू जी ने एक कर्मयोगी की भांति अधिकार और कर्तव्य के बीच सही सामंजस्य बिठाया और अधिकार की अपेक्षा सदैव कर्तव्य पर ही बल दिया।

एक सच्ची आध्यात्मिक जीवन-पद्धति के पथिक आदरणीय बंधुद्वे को अपने जीवन काल में जो सम्मान मिला,वैसा सम्मान.. राजस-तामस वृत्ति वाले वर्तमान धन-कुबेरों को स्वप्न में भी दुर्लभ नहीं है।
दोनों बंधूद्वे को अभिमान और दम्भ से सर्वथा दूर रहे.. वाक़ई वे “सच्चे कर्मयोगी” थे।

मैं एवं संस्था से जुड़ा हुआ हर एक “जन” उनके आदशों पर न केवल चलने के लिए संकल्पित हैं। अपितु ऐसे महान संस्कारित महा-मानवों को सदैव शत शत नमन करते हैं।

।।जय हिन्द जय भारत।।

धन्यवाद
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12- “विचार प्रभाव”… (Deep notions with Y.S. पचहरा)

व्यक्ति कोई भी, कैसा भी कार्य करे…समाज में उसके हर ‘ कार्य ‘ की प्रतिक्रिया अवश्य आती है। बड़ी सोच वालों की सकारात्मक एवं सीमित सोचने वालों की नकारात्मक…क्योंकि ये समाज ही तो वो आईना है। जिसमें हम अपनी “छवि” देख कर समय रहते समझ सकते हैं…और यदि छवि थोड़ी धूल-धूसरित सी लगे भी तो उसे चमका भी सकते हैं।
ये एक सामान्य सत्य है कि व्यक्ति जैसा विचारता है। वैसा ही वो अपने जीवन में करता भी है। मग़र बहुत बड़ा फ़र्क है।बुरा विचारने वाला अपना “आत्मबल” खोता चला जाता है।

जबकि अच्छा विचारने वाला दिनों-दिन “सबल “होने के साथ-साथ वह “आत्मविश्वास ” से भरता हुआ चला जाता है। जिससे वह अपने जीवन को सही आकर दे पाने में सफल होता है।
” विचार ” का मन पर प्रभाव तो अवश्य पड़ता है। ये वायुमण्डल में मौजूद तरंगों (Waves) से प्रभावित होता है।
मान लो कोई व्यक्ति बुरा काम करता है।तो ये भौतिक-विज्ञान के एक सिद्धान्त के मुताविक..उसके “मन” में एक विशेष प्रकार का कम्पन सा होता है।ठीक उसी प्रकार के विचार वाले लोग उस मन के कम्पन से अवश्य प्रभावित होते होंगे। वैसे ही मै जब कोई अच्छा कार्य करता हूँ।, तो मेरे मन पर भी कुछ विद्वानों के “मनो-भाव”………………….। (psychic- impressions) एवं वातावरण-प्रदत्त आवेग-संवेग आदि मेरे विचार-प्रवाह को भी काफी हद तक प्रभावित करते हैं। क्योंकि तरंगे (waves) वातावरण में सदैव होती हैं। वो न्यूनाधिक शक्ति के अनुसार कम या अधिक तो हो सकती हैं।
इसी उपमा को अब मैं कुछ और आगे ले जाता हूँ, ये कहा जा सकता है। कि जिस प्रकार कभी-कभी “आलोक-तरंगों” को किसी गंतव्य वस्तु तक पहुंचाने में लाखों वर्ष लग जाते हैं। उसी प्रकार “विचार तरंगों ” को भी व्यक्ति-विशेष तक पहुंचने में और फिर उस विचार को ठीक रूप में उसके दिलो-दिमांग में फिट बैठने में “कुछ वक्त” तो लग ही सकता है। अतएव यह नितांत संभव है। कि हमारी पृथ्वी पर मौजूद वायुमण्डल “अच्छी और बुरी ” दोनों तरह की “विचार-तरंगों” से भरा हुआ है।
“प्रत्येक मस्तिष्क से निकले हुये हर ‘विचार’ को “योग्य आधार” मिलने तक उसे वायुमण्डल में विचरण करना ही होता है।”
विचारों की समानता जहाँ होती है। अर्थात जो “मन” ऐसे आवेगों को ग्रहण करने के लिए तैयार होते हैं, वे तुरंत ही उन् विचारों को अपना लेते हैं। और वहां एक “सम-भाव” वाला आनन्दमयी वातावरण बनता …चला जाता है।
अन्य शक्तियों की तरह मनुष्य की शक्तियाँ भी “शुभ-अशुभ” दोनों में से “बल” संचित कर लेती हैं। उनमें से… जो वायुमण्डल में विचरण कर रहीं हैं।
ध्यान दीजिए.. विल्कुल “जल-धारा” की तरह ही होती है। ये “विचार-धारा” क्योंकि व्यक्ति के “मानस-पटल” पर हर-पल विचार का “प्रवाह” चलायमान ही रहता है।
हम सब के लिए यहाँ एक सीख है।….कि किसी भी नदी के चलायमान “जल ” को हम छू के छोड़ दें.., तो (अपनी गतिशीलता के कारण) “एक ही पल” के बाद “वो जल “जो हमने छुआ था। हमें पुनः उस जगह नहीं मिल सकता।स्वाभाविक सी बात है…वह आगे बढ़ जाता है। ठीक वैसे ही “विचार-धारा ” का प्रवाह भी प्रति-क्षण गतिशील होता है।
मान लो किसी कुप्रभाव में आकर अमुक व्यक्ति के मुख से कुछ अनुचित विचार निकल भी गया..तो हम “उस व्यक्ति ” के उन शब्दों को पकड़ कर क्यों बैठ जाते हैं। ये “विचार-धारा” भी तो “जल की धारा” की तरह चलायमान ही होती है। फिर हम “रात-गयी, बात-गयी..” वाले सिद्धांत पर अमल क्यों नहीं कर पाते…? क्यों उस “बासी विचार ” को पकड़ के जीवन के अमूल्य समय को लड़ने-झगड़ने में बर्वाद करते रहते हैं।…
सम्पूर्ण जनमानस अपने आपको इस “विचार-प्रभाव” वाले सिद्धान्त के साथ अपने में संकल्पित होकर ही जीवन मे आगे बढ़ना होगा।
जो पीढ़ी हमारे पीछे आ रही है।(New Generation) कम से कम उन के लिए हम वायुमण्डल में “दुर्भाव-तरंगे ” फैलाकर उनके भावी “जीवन-पथ” को दुर्गम न बनाये।…ये थोड़ा mind-over matter है। इसे न केवल गम्भीरतापूर्वक लें वल्कि सभी से करबद्ध निवेदन है इसे जीवन में आत्मसात अवश्य करें।

धन्यवाद..
विचारक:- YUG,पचहरा,
सम्पर्क-सूत्र:-8006943731

11-“सुख” जीवन का लक्ष्य नहीं…

जी हाँ.. आपको अटपटा अवश्य लग रहा होगा, मग़र यही सत्य है। वास्तव में जीवन का “लक्ष्य” सुख के पीछे भागना नहीं है।..क्योंकि ये “वाह्य सुख” तो विनाशी होता है। परंतु आजकल मै देख रहा हूँ कि जो लोग पूर्ण भौतिकवादी हैं।उनमें..दुनियाँ के लगभग अस्सी प्रतिशत लोगों ने इस “वाह्य सुख” को ही अपने जीवन का “चरम लक्ष्य “माना हुआ है। जो मेरे नज़रिये से देखा जाय… तो जीवन के लिए एकदम ग्रॉस ब्लंडर है। अर्थात ग़लतियो का भंडार है। और सांसारिक समस्याओं की मूल जड़ भी यही है।लेकिन…विडम्बना भी देखिए… ‘सुख-सुविधा’ जुटाने में अपने वेश-कीमती जीवन को खपा देने वाले लोग इसे ही अपने जीवन का लक्ष्य मान बैठे है। लेकिन बाद में कुछ समय पश्चात मैच्योर होने पर उन्हें ये अहसास होने भी लगता है.. कि जिस ओर वे जा रहे हैं। उस का अंत सिर्फ पछतावे पर ही होने वाला है। क्योंकि वे अपने उम्र दराज लोगों को उस स्थिति में देख रहे हैं … मग़र बार बार ग़लत अभ्यास करते रहने से स्वयं द्वारा बने ” संस्कारों” के कारण उनका जीवन जब तक उस वातावरण में ऐसा “रच-बस ” गया होता है। कि अपने ख़ुद के अंदर अब सारी तश्वीर स्पष्ट हो जाने के बावजूद भी वे..वही करते चले जाते हैं… जो वे अब, नहीं करना चाहते। इसलिए तो कहा गया है। कि “संस्कार-प्रबल” होते हैं। यही तो वो “नियति-नटी” का खेल है। वही समीकरण बनते चले जाते हैं जो होना है।…मनुष्य इस ख़ुश-फ़हमी में रहता है। कि सब कुछ वह ख़ुद कर रहा है। मग़र वास्तव में वह सिर्फ वही कर रहा है जो “नियति” उसे करा रही है। सब के पीछे वास्तव में “पूर्व-निर्धारण ” व्यवस्था का बहुत बड़ा खेल है। प्रत्येक व्यक्ति ये अच्छी तरह से जानता है.. कि जीवन की मूलभूत आवश्यकता.. “रोटी,कपड़ा,मकान और ज्ञान” है। उसके अलावा लगभग .. सब माया-रूपी जाल है। मगर वही बात…

“होनहार भावी प्रबल ,भरत कहहुँ मुनिनाथ। “हानि ,लाभ,जीवन,मरण,यश,अपयश विधि हाथ।।”

वाले सिद्धांत के तहत सब होता चला जा रहा है… हालाँकि उसके लिए भी “मनुष्य” या उसके द्वारा किये हुए कर्मों पर आधारित “पूर्व संस्कारों “से निर्मित “प्रारब्ध” को उत्तरदायी बता देते है। चूंकि प्रारब्ध का आधार हमारे खुद के “संचित-कर्म” होते हैं, इसलिए हर स्थिति-परिस्थिति के लिये “मनुष्य” स्वयं ही उत्तरदायी है कोई और नहीं। मग़र इन आध्यात्मिक तथ्यों की आपसी “रिलेशनशिप” को  बेचारे . “देहाभिमानी” (Body-Conscious) लोग इस कैलकुलेशन को कहाँ समझ पाते हैं। ये तो उनकी समझ से काफ़ी परे की चीज़ है।…हाँ दुनियाँ के लगभग बीस प्रतिशत “आत्माभिमानी” लोग (Soul-Conscious) जो “कर्म-संस्कार-प्रारब्ध ” इन तीनों के बीच आपसी “को-रिलेशन” को अच्छे से समझते हैं।…’सुख और दु:ख ” का रॉल भी मनुष्य के जीवन मे एक “महान शिक्षक” के जैसा होता है। क्योंकि ‘सीख’ एवं जीवन को जीने की ‘हिम्मत’ मनुष्य को इन दोनों से ही मिलती हैं। व्यक्ति के “चरित्र” को एक विशिष्ट ढाँचे में ढालने में “भलाई-बुराई” दोनों का बराबर का हाथ होता है। कभी-कभी.. क्यों..मेरा तो सदैव से ही ऐसा मानना है।कि “दुःख” तो सुख से भी बड़ा.. शिक्षक होता है।इसके लिए आप संसार के महापुरुषों के “चरित्र” का अध्ययन करें.. तो आप भी यह दावे के साथ कह पाएंगे कि अधिकांश दृष्टांतो में हमें यही देखने को मिलेता है। कि “सुख” की अपेक्षा “दुःख” ने ,तथा “सम्पन्नता” की अपेक्षा “निर्धनता” ने ही मनुष्य को अधिक सीख दी है।..किसी भी चीज का “अभाव” न केवल मनुष्य को बहुत कुछ सीखा जाता है।वल्कि उसे विकट परिस्थितियों से भी सामना करने की भरपूर ताकत दे पाता है। ये अपने अंदर धारण कर लें। कि “इन्द्रिय-सुख” मानव जीवन का लक्ष्य विल्कुल नहीं है। केवल “ज्ञान” (योग्यता) ही पिछले अरबों-खरबों वर्षों से “मनुष्यात्मा” का लक्ष्य रहा है।और आने वाले अरबों- खरबों वर्षों तक रहेगा भी।..अब इस तथ्य को थोड़ा और सरलीकरण करते हुए.. मै आगे बढ़ता हूँ.. अक्सर देखा जाता है कि.. एक “पशु” जितना आनन्द अपनी इंद्रियों के जरिये ले पाता है। उससे कहीं अधिक आनन्द का अनुभव तो मनुष्य अपनी बुद्धि से ही कर लेता है। साथ ही अपने रोजमर्रा के जीवन में हम ये भी देख रहे हैं कि अगर मनुष्य “आध्यात्मिक स्वभाव” का है, तो वह “बौद्धिक स्वभाव” वाले लोगों की तुलना में अपने जीवन में कहीं अधिक आनंदित एवं प्रफुल्लित रहता है। इसीलिए इसे मनुष्य के जीवन का “लक्ष्य” कहो या जीवन सम्बन्धी “परम-ज्ञान”(आध्यात्मिक-ज्ञान) ये ही है जिससे  परम्+आनंद = “परमानंद” की प्राप्ति होती है। उसे यदि “ब्रह्म-ज्ञान” कह दिया जाय तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।  अगर इसे “जहन’ में डाल पाए, तो  फिर आपके लिए संसार की सारी वस्तुएं..”मिथ्या” हैं। इसलिए मनुष्य सदैव सत्कर्म (अकर्म) करते रहना चाहिए। सर्वदा “पवित्र-चिंतन” में लगे रहना ही जीवन का लक्ष्य है। मग़र ये भी अपनी जगह सही है। “कइयों में कोई” अर्थात लाखों में कोई एक-दो ही होते है.. जो जीवन के “वास्तविक लक्ष्य” को प्राप्त कर पाते है। वरना अधिकतर लोग अपने भटकाव के वशीभूत होकर इस मृत्युलोक में बार-बार हिचकोले खाने को ही मजबूर हैं। और ये सिलसिला न जाने कितने युगों से जारी है। और युगयुगान्तर तक जारी रहेगा भी। ये ही इस दुनियाँ का “कटु-सत्य” है। अब फैसला आपको करना है। कि आप अपने लिए कौन सी राह चुनते हैं=? हाँ ये कतई न सोचें.. कि अब बहुत देर हो चुकी है। ऐसे निर्णय में देर कभी भी नही मानी जाती है।… “जीवन” की राह पर चलते हुए..तो विद्वानों का सदैव से यही मत रहा है। कि “जब आँखें खुली तभी सबेरा…” वाले सिद्धांत से जब मनुष्य में वैचारिक रूपांतरण हो जाय,..तभी सही। और चल पड़े जीवन के वास्तविक लक्ष्य की ओर..ईश्वर सब देख रहा है। निश्चित रूप से आपको अपना “लक्ष्य” अवश्य ही प्राप्त होगा। धन्यवाद, जय हिन्द जय भारत।

पूरा पढ़ कर अपना व्यू/कमेंट देने वालों को “युग पचहरा” का सदैव दिल की गहराइयों से आपको वंदन है, अभिनंदन है।

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