जी हाँ.. आपको अटपटा अवश्य लग रहा होगा, मग़र यही सत्य है। वास्तव में जीवन का “लक्ष्य” सुख के पीछे भागना नहीं है।..क्योंकि ये “वाह्य सुख” तो विनाशी होता है। परंतु आजकल मै देख रहा हूँ कि जो लोग पूर्ण भौतिकवादी हैं।उनमें..दुनियाँ के लगभग अस्सी प्रतिशत लोगों ने इस “वाह्य सुख” को ही अपने जीवन का “चरम लक्ष्य “माना हुआ है। जो मेरे नज़रिये से देखा जाय… तो जीवन के लिए एकदम ग्रॉस ब्लंडर है। अर्थात ग़लतियो का भंडार है। और सांसारिक समस्याओं की मूल जड़ भी यही है।लेकिन…विडम्बना भी देखिए… ‘सुख-सुविधा’ जुटाने में अपने वेश-कीमती जीवन को खपा देने वाले लोग इसे ही अपने जीवन का लक्ष्य मान बैठे है। लेकिन बाद में कुछ समय पश्चात मैच्योर होने पर उन्हें ये अहसास होने भी लगता है.. कि जिस ओर वे जा रहे हैं। उस का अंत सिर्फ पछतावे पर ही होने वाला है। क्योंकि वे अपने उम्र दराज लोगों को उस स्थिति में देख रहे हैं … मग़र बार बार ग़लत अभ्यास करते रहने से स्वयं द्वारा बने ” संस्कारों” के कारण उनका जीवन जब तक उस वातावरण में ऐसा “रच-बस ” गया होता है। कि अपने ख़ुद के अंदर अब सारी तश्वीर स्पष्ट हो जाने के बावजूद भी वे..वही करते चले जाते हैं… जो वे अब, नहीं करना चाहते। इसलिए तो कहा गया है। कि “संस्कार-प्रबल” होते हैं। यही तो वो “नियति-नटी” का खेल है। वही समीकरण बनते चले जाते हैं जो होना है।…मनुष्य इस ख़ुश-फ़हमी में रहता है। कि सब कुछ वह ख़ुद कर रहा है। मग़र वास्तव में वह सिर्फ वही कर रहा है जो “नियति” उसे करा रही है। सब के पीछे वास्तव में “पूर्व-निर्धारण ” व्यवस्था का बहुत बड़ा खेल है। प्रत्येक व्यक्ति ये अच्छी तरह से जानता है.. कि जीवन की मूलभूत आवश्यकता.. “रोटी,कपड़ा,मकान और ज्ञान” है। उसके अलावा लगभग .. सब माया-रूपी जाल है। मगर वही बात…
“होनहार भावी प्रबल ,भरत कहहुँ मुनिनाथ। “हानि ,लाभ,जीवन,मरण,यश,अपयश विधि हाथ।।”
वाले सिद्धांत के तहत सब होता चला जा रहा है… हालाँकि उसके लिए भी “मनुष्य” या उसके द्वारा किये हुए कर्मों पर आधारित “पूर्व संस्कारों “से निर्मित “प्रारब्ध” को उत्तरदायी बता देते है। चूंकि प्रारब्ध का आधार हमारे खुद के “संचित-कर्म” होते हैं, इसलिए हर स्थिति-परिस्थिति के लिये “मनुष्य” स्वयं ही उत्तरदायी है कोई और नहीं। मग़र इन आध्यात्मिक तथ्यों की आपसी “रिलेशनशिप” को बेचारे . “देहाभिमानी” (Body-Conscious) लोग इस कैलकुलेशन को कहाँ समझ पाते हैं। ये तो उनकी समझ से काफ़ी परे की चीज़ है।…हाँ दुनियाँ के लगभग बीस प्रतिशत “आत्माभिमानी” लोग (Soul-Conscious) जो “कर्म-संस्कार-प्रारब्ध ” इन तीनों के बीच आपसी “को-रिलेशन” को अच्छे से समझते हैं।…’सुख और दु:ख ” का रॉल भी मनुष्य के जीवन मे एक “महान शिक्षक” के जैसा होता है। क्योंकि ‘सीख’ एवं जीवन को जीने की ‘हिम्मत’ मनुष्य को इन दोनों से ही मिलती हैं। व्यक्ति के “चरित्र” को एक विशिष्ट ढाँचे में ढालने में “भलाई-बुराई” दोनों का बराबर का हाथ होता है। कभी-कभी.. क्यों..मेरा तो सदैव से ही ऐसा मानना है।कि “दुःख” तो सुख से भी बड़ा.. शिक्षक होता है।इसके लिए आप संसार के महापुरुषों के “चरित्र” का अध्ययन करें.. तो आप भी यह दावे के साथ कह पाएंगे कि अधिकांश दृष्टांतो में हमें यही देखने को मिलेता है। कि “सुख” की अपेक्षा “दुःख” ने ,तथा “सम्पन्नता” की अपेक्षा “निर्धनता” ने ही मनुष्य को अधिक सीख दी है।..किसी भी चीज का “अभाव” न केवल मनुष्य को बहुत कुछ सीखा जाता है।वल्कि उसे विकट परिस्थितियों से भी सामना करने की भरपूर ताकत दे पाता है। ये अपने अंदर धारण कर लें। कि “इन्द्रिय-सुख” मानव जीवन का लक्ष्य विल्कुल नहीं है। केवल “ज्ञान” (योग्यता) ही पिछले अरबों-खरबों वर्षों से “मनुष्यात्मा” का लक्ष्य रहा है।और आने वाले अरबों- खरबों वर्षों तक रहेगा भी।..अब इस तथ्य को थोड़ा और सरलीकरण करते हुए.. मै आगे बढ़ता हूँ.. अक्सर देखा जाता है कि.. एक “पशु” जितना आनन्द अपनी इंद्रियों के जरिये ले पाता है। उससे कहीं अधिक आनन्द का अनुभव तो मनुष्य अपनी बुद्धि से ही कर लेता है। साथ ही अपने रोजमर्रा के जीवन में हम ये भी देख रहे हैं कि अगर मनुष्य “आध्यात्मिक स्वभाव” का है, तो वह “बौद्धिक स्वभाव” वाले लोगों की तुलना में अपने जीवन में कहीं अधिक आनंदित एवं प्रफुल्लित रहता है। इसीलिए इसे मनुष्य के जीवन का “लक्ष्य” कहो या जीवन सम्बन्धी “परम-ज्ञान”(आध्यात्मिक-ज्ञान) ये ही है जिससे परम्+आनंद = “परमानंद” की प्राप्ति होती है। उसे यदि “ब्रह्म-ज्ञान” कह दिया जाय तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। अगर इसे “जहन’ में डाल पाए, तो फिर आपके लिए संसार की सारी वस्तुएं..”मिथ्या” हैं। इसलिए मनुष्य सदैव सत्कर्म (अकर्म) करते रहना चाहिए। सर्वदा “पवित्र-चिंतन” में लगे रहना ही जीवन का लक्ष्य है। मग़र ये भी अपनी जगह सही है। “कइयों में कोई” अर्थात लाखों में कोई एक-दो ही होते है.. जो जीवन के “वास्तविक लक्ष्य” को प्राप्त कर पाते है। वरना अधिकतर लोग अपने भटकाव के वशीभूत होकर इस मृत्युलोक में बार-बार हिचकोले खाने को ही मजबूर हैं। और ये सिलसिला न जाने कितने युगों से जारी है। और युगयुगान्तर तक जारी रहेगा भी। ये ही इस दुनियाँ का “कटु-सत्य” है। अब फैसला आपको करना है। कि आप अपने लिए कौन सी राह चुनते हैं=? हाँ ये कतई न सोचें.. कि अब बहुत देर हो चुकी है। ऐसे निर्णय में देर कभी भी नही मानी जाती है।… “जीवन” की राह पर चलते हुए..तो विद्वानों का सदैव से यही मत रहा है। कि “जब आँखें खुली तभी सबेरा…” वाले सिद्धांत से जब मनुष्य में वैचारिक रूपांतरण हो जाय,..तभी सही। और चल पड़े जीवन के वास्तविक लक्ष्य की ओर..ईश्वर सब देख रहा है। निश्चित रूप से आपको अपना “लक्ष्य” अवश्य ही प्राप्त होगा। धन्यवाद, जय हिन्द जय भारत।
पूरा पढ़ कर अपना व्यू/कमेंट देने वालों को “युग पचहरा” का सदैव दिल की गहराइयों से आपको वंदन है, अभिनंदन है।
पचहरा-हाउस ,88 A ,वसुंधरा- पुरम,लहरा-रोड, हाथरस Contact No.8006943731

Bahut Sundar lekh he. Ekdum sateek…Chacha g
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