
चलो,.. मैं इन “दो अंग्रेजी” शब्दों के व्यक्तिगत प्रभाव को..अपनी मातृभाषा में स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ। ये दोनों शब्द मनुष्य की मनः स्थिति पर बहुत प्रभावी होते हैं। हालांकि वो लोगों के स्वयं के स्वभाव पर ही निर्भर करता है.. कि वह उसे ले किस रूप में रहे हैं.. “पॉजिटिव या नेगेटिव” आप अपनी तसल्ली के लिए इतिहास के पन्नों को अवश्य उलट के देखियेगा। क्योंकि मेरा ऐसा मानना है कि..
दुनियाँ में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन सब ने पहले अपने निकटतम शत्रु ‘आलस’ और बाद में “नींद और निंदा ” पर विजय पायी है। तब कहीं जा के वे अपने जीवन में वांछित मुक़ाम पर पहुँचे हैं। जिसके लिए वे दृढ़ संकल्पित थे। ऐसे लोगों को आगे बढ़ने से न तो कभी कोई रोक पाया है। न कभी रोक सकेगा। क्योकि “जो चीज़े आपको Challege करती हैं। मेरे ख़्याल से वही चीज़ें वास्तव में लोगों को change करने की सामर्थ्य.. भी रखती हैं।” अब फ़ैसला तो ख़ुद लोगों के ही हाथों में है…कि वे इसे कैसे लेते हैं।
But always be SMILE & HAPPY : thanks for reading…
युग,पचहरा
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Sir, it’s Absolutely truth. No Any person can’t challenge this thing’s.
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