14-“सच्चे कर्मयोगी”

“सच्चे कर्मयोगी”

: योगेन्द्र सिंह,

प्रशिक्षित स्नातक,अंग्रेजी
(के.एल.जैन इ.कॉलेज,
सासनी,हाथरस)

सम्पूर्ण विश्व एक विराट ‘ रंगमंच ‘ है। हमारे देखते ही देखते लोग अपनी भूमिका निभाकर इस नाट्य-शाला से भूमिका पूरी होते ही अदृश्य होते चले जा रहे हैं। नियति के खेल “जन्म-मरण” की प्रक्रिया सृष्टि के प्रारम्भ से निरन्तर अपनी गति से चल रही है..और जब तक दुनियां अपने वजूद में है ऐसे ही चलती रहेगी।
अंग्रेजी के एक मशहूर ..कवि ;मिस्टर जॉन मिल्टन, के अनुसार ..”दुनियाँ में सिर्फ दो ही चीजें हैं जो स्थायी हैं..एक मनुष्य का “विचार”,
दूसरा उस अमुक “विचार” के आधार से धरातल पर लोकहित में खड़ा किया गया “कृतित्व”। उदाहरणार्थ ; हमारी संस्था “के एल जैन इंटर कॉलेज,सासनी।” जो ऐसे ही एक “पुण्य विचार” का धरातल पर मजबूती से अवतीर्ण हुआ एक “मूर्तरूप” है।
अन्यथा संसार में जो कुछ भी हम देख रहे हैं वो सब “नश्वर” है, अविनाशी है।

ये सब जानते हैं कि परिवर्तन संसार का नियम है। ये प्रक्रिया प्रति-क्षण अनवरत चलती रहती है। जीवन की क्षणभंगुरता के बावजूद किसी भी “सजीव-निर्जीव” वस्तु, व्यक्ति या फिर जीव-जंतु आदि की दुनियाँ में जो मौजूदगी है …. वो सब “नियति” के अनुरूप परमसत्ता की “पूर्व-निर्धारण” व्यवस्था के अन्तर्गत ही है। समय समाप्त होते ही वे पांचों तत्व पुनः अपनी उसी अवस्था में वापस.. हो जाते हैं।

किंतु जीवन की सफलता के परिप्रेक्ष्य में वही जीवन सफल और धन्य हैं। जिनके “सुकृत्यों” से वंश-परिवार,समाज और राष्ट्र समुन्नत होते हैं।

सासनी नगर के लुहाड़िया भवन में “जैन” परिवार में जन्मे श्री छेदीलाल जी जैन (बडे बाबू जी) व श्री प्रकाशचंद्र जी जैन (छोटे बाबू जी)ने अपने उत्तम कार्यों से न केवल अपने परिवार को,वल्कि उन्होंने अखिल भारतीय जैन समाज को भी समुन्नत किया है।

वर्ष 1994 में अंशकालिक पद पर “प्रशिक्षित स्नातक अंग्रेजी शिक्षक” के रूप में जब मुझे सासनी के इस नामचीन “जैन कॉलेज” में पढाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वो मंजर आज भी मुझे अच्छी तरह से याद है। उस समय बड़े बाबू जी नीर क्षीर विवेकी संस्था के प्रबंधक थे एवं छोटे बाबूजी कॉलेज के निर्भीक संस्थापक थे।

विद्यालय में मुझे तैनाती मिलने के महज़ तीन-चार महीने बाद ही मुझे 02 दिसम्बर,1994 को विद्यालय में व्यवसायिक-भवन के उदघाट्न के अवसर पर छोटे बाबू जी को साक्षात देखने व सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

बड़े बाबूजी की तो शिक्षा प्रेम की अनेकों मिसाल सुनी हुई थीं, मगर तब मैंने जाना कि हमारे छोटे बाबूजी भी पीछे नहीं थे। मुझे तो दोनों बंधुओं की श्री राम लक्ष्मण जैसी जोड़ी लगती है।

उन दोनों का एक ही सपना था, कि नई पीढ़ी को शिक्षा के माध्यम से हमारे सुयोग्य शिक्षक-मंडल द्वारा ऐसे संस्कार दिए जाएं जिससे वे देश-दुनियाँ के लिए न केवल अच्छे और सच्चे नागरिक बनें अपितु राष्ट्र के भावी ‘कर्णधार’ बन पूर्ण निष्ठा के साथ समूचे राष्ट्र की सेवा करें। विश्व-पटल पर हमारी संस्था का परचम लहराएं।

दोनों महान विभूतियो kiki “विद्यालय के अस्सी की” स्मृति विशेषांक के द्वारा मैं बड़े अदब के साथ बताना चाहता हूं कि हमारे पूर्व शिक्षक साथियों के नक्शे कदम पर चलकर अल्पसंख्यक संस्था में तैनात हुए शिक्षक मंडल ने भी अपने शिक्षार्थियों की सफलता के रूप में अनेकों गौरवपूर्ण कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इसी प्रकार संस्था से जुड़े उस हर एक व्यक्ति को इसी धारणा और संकल्प को ध्यान में रख कर विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ “माँ सरस्वती” के मंदिर (के.एल.जैन इंटर कॉलेज,सासनी) के विकास के लिये पूर्ण समर्पित होकर सतत प्रयत्नशील रहना होगा।

अगर मैं स्पष्ट कह दूँ, तो छोटे बाबूजी विद्वान की अपेक्षा बुद्धिमान अधिक थे। विद्वानों के सम्मान करने के नायाब तरीके,तो कोई उनसे सीखे। इसीलिये किसी के भी सम्मान में हल्कापन उन्हें विल्कुल वर्दाश्त नहीं था।

मगर इसी व्यवसायिक भवन उदघाटन के दौरान स्वागत के वक्त किन्ही कारणों बस “स्वागत हार” थोड़ा सा छोटा क्या बन गया.. इस पर बाबूजी ने समस्त ‘स्वागत-मण्डल’ को अपने स्पीच के दौरान भविष्य के लिए एक बहुत अच्छी सीख दी। सच कहूँ, तो पहले-पहल बड़े बाबूजी की तुलना में छोटे बाबूजी मेरी मान्यता की परिधि में नहीं थे। लेकिन वे बाद में अपने गुणों के वातायन से वे न केवल मेरे आदर के आधार बने..अपितु धीरे-धीरे..एक दिन वे मेरे आदर्श भी बन गए।

उस थोड़े से समय में ..मैं, छोटे बाबू जी को जितना जान पाया , उस आधार पर मैं इस बात को थोड़ा और गम्भीरता से इसलिए भी लेता हूँ। क्योंकि उन दिनों मेरा शोध-कार्य “अधिकार और कर्तव्य” के मध्य रिलेशनशिप पर ही चल रहा था। बाबू जी ने कभी-भी अधिकार को कर्तव्य से बड़ा नहीं माना।और ये हक़ीकत भी है। “कर्तव्य” का स्थान सदैव अधिकार से ऊँचा होता है….और रहेगा। बाबू जी ने एक कर्मयोगी की भांति अधिकार और कर्तव्य के बीच सही सामंजस्य बिठाया और अधिकार की अपेक्षा सदैव कर्तव्य पर ही बल दिया।

एक सच्ची आध्यात्मिक जीवन-पद्धति के पथिक आदरणीय बंधुद्वे को अपने जीवन काल में जो सम्मान मिला,वैसा सम्मान.. राजस-तामस वृत्ति वाले वर्तमान धन-कुबेरों को स्वप्न में भी दुर्लभ नहीं है।
दोनों बंधूद्वे को अभिमान और दम्भ से सर्वथा दूर रहे.. वाक़ई वे “सच्चे कर्मयोगी” थे।

मैं एवं संस्था से जुड़ा हुआ हर एक “जन” उनके आदशों पर न केवल चलने के लिए संकल्पित हैं। अपितु ऐसे महान संस्कारित महा-मानवों को सदैव शत शत नमन करते हैं।

।।जय हिन्द जय भारत।।

धन्यवाद
Contact No.8006943731

2 thoughts on “14-“सच्चे कर्मयोगी””

Leave a comment