17- “मृत-प्राय” (A Legendary Dialogue with Y.S.पचहरा)

हमारे महा ग्रंथ “रामायण ” में वर्णित “रावण-अंगद” संवाद के आधार पर 14 दुर्गुणों में से एक भी यदि किसी में है, तो वह जान ले.. जीते-जी मृत्यु के समान है।
राम-रावण युद्ध के दौरान जब वाली-पुत्र अंगद, रावण को समझाने लंका में पहुँचे.. तो वहां अंगद ने रावण से कहा, मैं तुझे “मरे हुए को क्या मारूं=?” क्योंकि तू ! तो अपने विकर्मों के कारण जीते-जी “मृत-प्राय” है।
तब रावण क्रोधित होकर बोला रे ! मूर्ख मैं तेरे सामने जीवित खड़ा हूँ। क्या… “मृत-प्राय,मृत-प्राय” रट रहा है।
उस वक्त वाली-पुत्र अंगद ने “मृत-प्राय” वाले तथ्य के प्रति अहंकार के कारण अनभिज्ञ रावण को पुनः स्मृत कराते हुए कहा.. हे राजन! सिर्फ “सांस लेने” को ही जीवित समझ लेने की भूल मत करियेगा… ऐसे तो सांस फिर लुहार का ‘भाता’ भी खूब लेता है। फिर तो वो भी ख़ुद को जीवित समझने लगेगा। अघ्यात्म के नज़रिए से इन “चौदह-दुर्गुणों” के बारे में यदि मैं अपना पक्ष रखूँ तो बात एकदम सीधी सी है।कि किसी मनुष्य के अंदर इन दुर्गुणों में से एक भी है।तो वाक़ई वह जीते- जी “मृत्यु के समान” ही है।
वो “चौदह-दुर्गुण हैं;–
1- अति काम-वासना ;
अत्यंत कामी,भोगी अर्थात जो संयम-नियम से नहीं चलते हैं।वे जीते जी मरे हुए के समान ही हैं।
2- वाम-मार्गी ;
बिना विचार करे हर बात का विरोध करने वाले लोग। “पूर्वाग्रह के मरीज” सदैव जीते जी मृत समान होते हैं।
3- कंजूस ;
किसी भी कार्य में समय की महत्ता समझने के बजाय पैसे को वरीयता देने वाले लोग..
4- अति-दरिद्रता ;
बेहद दरिद्र होंना भी एक श्राप है। पूर्व जन्मों के विकर्मों के कारण नियति ने जीवन तो उन्हें दिया है। मग़र सिर्फ नाम का, वे दुखों में इस प्रकार उलझे हैं।लगता है।कोई सज़ा पूरी कर रहे हों। अतः ये अवस्था भी मृत्यु के ही समान होती है।
5- विमूढ़ ; विवेक-शून्य
किसी जिम्मेदार पद पर आरूढ़ होने के बावजूद भी अपने विवेक से निर्णय लेने के बजाय बात-बात पर दूसरों पर आश्रित रहे वाला भी जीते जी मृत्यु के समान ही होता है।
6-आजसि ; कुख्यात
बुरे कार्यों में लिप्त बदनाम व्यक्ति भी मृत्यु प्राय ही होते हैं।
7-अति-रोगी ;
अधिकतर बीमार रहने वाला भी किसी काम का न होने के कारण दूसरों पर बोझ होने से मृत्यु समान ही हो जाता है।
8- अति-बृद्ध ;
शरीर जीर्ण-क्षीण हो जाने के कारण भी एक तरह से मृत-प्राय वाली अवस्था ही हो जाती है।
9- अति-क्रोधी ;
हर वक्त क्रोधित रहने वाला,अपना आपा खो देना यानी अक्ल खो देना। ये अवस्था भी जीते जी मृत्यु के समान ही होती है।
10- निकृष्ट-धन ;
ग़लत तरीके से धन कमाना,किसी को धोखा दे कर अपना काम करने वाला भी जीते जी मृत्यु के समान ही होता है।
11-देहाभिमानी ;
तनु-पोषक;- हर वक्त स्वार्थ-परता में जीने वाला।अपनी देह के अहंकारयुक्त नशा में रहना भी पूरी तरह मृत्यु समान अवस्था ही है।
12-सदैव-निंदक ;
प्रत्येक अच्छी-भली बात की निंदा करने वाला पूर्वाग्रह से ग्रसित व्यक्ति भी जीते जी मरे के समान होता है।
13- परमात्म-विमुख ;
अति-अहंकारी,अति-भौतिकवादी एवं ईश्वरीय-शक्ति से अनजान लोग तो जीते जी मृत्यु-प्राय होते ही हैं।
14- श्रुति-संत विरोधी ;
ऐसे लोग जो सच्चे सन्तों,महापुरुषों आदि का भी विरोध करें सभी को नकारात्मक दृष्टि से देखें या पाखंडी समझें। ऐसे लोग भी जीते-जी.. मृत्यु के समान ही हो जाते हैं।
अब इस “अंगद-रावण” संवाद से हम सभी अपना-अपना आत्मावलोकन करें और देखें इन 14 दुर्गुणों में से कहीं हमारे ही अंदर ये विकृतियाँ तो नहीं हैं…?
अपने ग्रन्थों में विद्यमान “गूढ़ विचार” को चरित्र उत्थान के उद्देश्य से पुनःमानव- स्मृति में लाने का एक प्रयास..

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युग, पचहरा
नीमगाँव,राया,मथुरा उत्तर प्रदेश।
8006943731

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