29-Extraordinary-kids..(A Visual- Interview)

https://infopac.data.blog/2023/03/12/%e0%a5%

Mostly people waste our time & money to be outwardly smartness or I mean they like to be physically smart only but first need is mentally smartness to all. But we see here and there mostly people are on digressive mode..They try to become only showing off figure..It is someone’s motive..very shameful While I think physically smartness is secondary so it comes automatically… Thanks

Pachahara YUG

88 A Vasundhrapuram,

Nikat bye pass,Hathras

28- भारतीय काव्य ग्रन्थों का “एक गहन विश्लेषण”

अगर आपने ग़ौर किया हो, तो… भारतीय काव्य-ग्रन्थ “रामायण” और “महाभारत” दोनों ही ग्रन्थ कदम-कदम पर हमें ये सीख देते हैं… कि “जाति” के कुछ माईने नहीं होते… (जैसा.. मै, समझ पाया हूँ..) लगभग ऐसा ही कुछ इशारा हमारे ये दोनों ग्रन्थ “खून के रिश्तों” की ओर भी करते हैं। ये कोई एरी-गैरी पुस्तकें तो हैं नहीं। ये ग्रन्थ न केवल भारत में वल्कि सम्पूर्ण विश्व में मान्य हैं.. I mean Both are authentic “Indian Great Epics..”.so we must follow these ideals in our routine life.
भारतीय काव्य ग्रन्थों को पढ़ने या इन दोनों के लोकप्रिय धारावाहिको को देखने पर मेरे ख़्याल से सभी को ऐसी ही अनुभूति होती होगी। मग़र वर्तमान परवेश में कुछ पाखंदी, धर्म के ठेकेदारों,मौका परस्त नेताओं व दकियानूसी विचार वाले लोगों ने कुछ व्यक्तिगत धारणाएं ऐसी बना रखी हैं। वे वातावरण में जहर घोलने का कार्य करती हैं। जब कभी ऐसी बातों से “मन” कुपित हुआ, तो मेरे अंतर मन में कई बार विचार आया……कि इस पर कुछ लिखा जाय…
लेकिन कार्य की व्यस्तता एवं समयाभाव के कारण अपने अन्दर के उदगारों को एक “लेख” का जामा पहनाने के लिए वक्त एवं मन में शान्त-भाव का होना भी आवश्यक होता है। नियति ने मुझे फ़ुर्सत के पल…. दिए, तो सही, मग़र बहुत बड़ी कीमत पर अर्थात इस “लॉक-डाउन” के रूप में। ईश्वर ऐसा वक्त फिर कभी न दें।
दरअसल, हुआ तो था, काम के आधार पर समाज का “वर्ग-विभाजन” मग़र अफसोस कुछ समाज के ठेकेदारों व बरसाती मेंढक टाइप नेताओं ने अपनी राजनीतिक दुकानें चलाने के लिये उस “भारतीय-सामाजिक-व्यवस्था” को “जाति-विभाजन” में कब तब्दील कर दिया हमारे देश की भोली जनता को पता ही नहीं चला..? जनता ने उसी बेहोशी में धीरे-धीरे लगभग इसे स्वीकार भी कर लिया। आज भारतीय सामाज में “जातियों के बटवांरे” की दृष्टि से ही अब जातियों को”ऊंच-नीच” के रूप में देखने की लोगों में एक मानसिकता सी बन गयी है, जो निंदनीय है। वैसे हम भारतीय रामानंदी, भजनानन्दी और न जाने क्या-क्या बनते है, लेकिन रामायण के बताए मार्ग पर चलने के नाम पर उसी प्रकार का पाखंडी व्यवहार करते हैं..जैसे अक्सर मौका परस्त नेता “संविधान की अवधारणा” को मानने में करते हैं..ये बातें आज नई पीढ़ी के कोमल मन में घर करने लगी है।…जिससे दिन-प्रतिदिन आपसी वैमनुष्यता बढ़ रही है। अतः मैंने भारतीय काव्य-ग्रन्थों का एक ठोस आधार लेते हुए..कान को लोगों की तरह घुमा फिरा के नहीं ‘एकदम सीधे पकड़ ने का प्रयास किया है’…मेरा मतलव वर्ण-व्यवस्था की मूल-वास्तविकता को लोगों के ज़हन में उसी रूप में उतारने की चेष्टा की है….जो हमारे ग्रन्थाकारों के लिखने का धेय रहा होगा..। अन्यथा इस संवेदनशील मुद्दे पर किसी भी प्रकार का निराकरण कर “अंतिम-निर्णय” सुनाने की मेरी क्या विसात है…?
मैं ये भी जानता हूँ कि आज “लिखने /पढ़ने” की आदत लोगों को बहुत कम है। फिर भी मैं शुक्र गुज़ार हूँ देश-विदेश में मौजूद उन तमाम स्वध्याय-करने वाले अपने “प्रबुद्ध पाठको” का जो न केवल मेरे आर्टिकल्स पढ़ते हैं वल्कि अपने कमैंट्स से मेरी “विचार-अभिव्यक्ति” की सराहना करके…. मेरा हौसला भी बढ़ाते हैं। वे मेरी अपेक्षा के आधार हैं। ऐसे विवेकशील “प्रबुद्ध-वर्ग” के सहारे मेरी “विचार-आभा” दुनियाभर में यूं ही ग्लोबलाइज़ होती रहे…और एक विचारक को चाहिए ही क्या…? पाठकों की “प्रतिक्रिया” ही उसकी असली ऊर्जा होती है।
अब मैं “विश्लेषण” की गहनता पर आता हूँ। मग़र एक बात पढ़ते वक्त “हर पाठक” को ज़हन में अवश्य रखनी होगी। कि रामायण और महाभारत काल के दौरान अर्थात वास्तव में इन घटनाओं के घटित होने के वक्त दुनियाँ में Science & Technology का Level बहुत ही उच्च-कोटि का था। अर्थात उस काल के लोग हर स्तर पर हमसे कई गुना अधिक एडवांस थे। इसलिए उस दौर की आज के दौर से तुलना नहीं की जा सकती। ये आपने भी देखा या पढ़ा होगा..कि भारतीय काव्यों में कई जगह ऐसे मोड़ आते हैं, जब वो दावा करते हैं कि, ये…माईने नहीं रखता कि आप किस परिवार में जन्मे हैं..? वल्कि मायने.. रखते हैं वो लोग जो अपने जीवन में मर्यादित हैं, मानवीय हैं, सदाचारी हैं, और कर्मशील हैं। जिनकी की सोच… लोक-कल्याणकारी है। सबसे विशेष बात तो ये कि उनसे आपके “विचार-मेल” खाते हैं।
और इसी लिए अपने विभाग, समाज, देश या फिर दुनियाँ की भीड़ में से आप उन्हें अपने लिए “चुन” लेते हैं। स्वतः ही आपका अन्तर-मन उन्हें अपने अच्छे मित्र-मंडल में शामिल भी कर चुका होता है। यदि ग़ौर करें,तो आपके जीवन का बहुमूल्य समय दूसरों की तुलना में उनके साथ कहीं अधिक व्यतीत होता है। आप यदि आत्मवलोकन करें, तो आपको इस बात का अहसास अवश्य होगा।
रामायण में ऐसे कई एक उदाहरण हैं जो इस ओर इशारा करते हैं। कि, “खून-के-रिश्ते” आपकी “पसन्द” के रिश्तों के बाद… आते हैं। न मानो तो अपने व्यक्तिगत जीवन में झांक के देख लीजिए….
जैसे- राम और लक्ष्मण सहोदर यानि सगे भाई नहीं थे। अर्थात उनकी माँएं अलग-अलग थी। कौशल्या व सुमित्रा। लक्ष्मण का सगा भाई शत्रुघ्न था। लेकिन लक्ष्मण जीवन में सदैव बड़े भाई राम के साथ ही रहे। वे दोनों स्वभाव से ठंडे-गर्म जरूर थे, मग़र दोनों की “विचार-धारा” समान होने से हर स्थिति-परिस्थिति में सदैव एक दूसरे के भाव समझते थे और साथ ही रहे ।
‘खून के रिश्ते’ वाले दृष्टिकोण से देखें, तो दशरथ अपने किसी भी पुत्र के वास्तविक पिता नहीं थे। ये आप सभी जानते हैं। वे चारों तभी पैदा हुए थे, जब राजा दशरथ ने अपनी तीनों रानियों को यज्ञ से प्राप्त… खीर खिलाई थी।
विल्कुल उसी प्रकार महाभारत में कोई भी पांडव… ‘पांडु’ का पुत्र नहीं था। हालाँकि महाराज पांडु ने उन्हें अपना नाम दिया और उत्तराधिकारी भी माना। ये सर्व विदित है कि पाँचों पाण्डव जिनसे पैदा हुए… वे देव-पुरुष थे…जैसे-
1-युधिष्ठिर- यमराज (यक्ष) के..
2-भीम-वायुदेव के..
3-अर्जुन- इन्द्र के..
ये तीन “पांडु” की पहली पत्नी कुंती के पुत्र थे। जबकि..
4-नकुल ,5- सहदेव } जुड़वाँ थे..ये अश्विन देव के आशीर्वाद से प्राप्त हुए थे।ये पांडु की दूसरी पत्नी माधुरी के पुत्र थे।
ये पांचों पाण्डव खून के रिश्ते से बंधे हुए नहीं थे। कहने को तो ये भी कहा जा सकता है कि, ये तीनों पांडव और दो छोटे भाई भी..आपस में सगें भाई नहीं थे। मग़र..
महाभारत के इन पाँच नायकों को जो करीब लाया वो था “पांडु का नाम” और “कुन्ती की इच्छा-शक्ति।”
चलो महाभारत से एक उदाहरण और ले लेते हैं.. कृष्ण और बलराम भी तो एक दूसरे के सगें भाई नहीं थे। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि कृष्ण वास्तव में देवकी के पुत्र थे। जबकि बलराम को रोहिणी ने जन्मा था। इसके बावजूद कृष्ण और बलराम आजीवन एक दूसरे के ऐसे करीब रहे, जो कि आज सगें भाई भी नहीं रह पाते..?
अब एक विल्कुल विपरीत उदाहरण पुनः रामायण से ही …कि रावण और उसका छोटा भाई विभीषण इन दोनों के बीच खून का रिश्ता था। परंतु वैचारिक भिन्नता होने के कारण…विभीषण के बहुत निभाने के बावजूद भी एक दिन “वो घड़ी” आ ही गयी…कि रावण ने खून के रिश्ते से बंधे अपने “पुत्र समान” आज्ञाकारी भाई को सब के सामने लात मारकर हमेशा के लिए अपने आप से दूर जाने को मज़बूर कर दिया। जो रावण के पतन का कारण भी कहा जाता है। विभीषण धार्मिक प्रवृत्ति का था, इसलिए उसने श्री राम की शरण लेना ही उचित समझा।
अब थोड़ा आगे बढ़ते हैं, और इन पारिवारिक बन्धनों को पीछे छोड़ते है.. और भारतीय समाज के लोगों को जन्म से प्राप्त होने वाली “जाति” के आधार पर “व्यक्ति” के ऊपर “ऊंच-नीच” का लेवल लगाने वाली मानसिकता जो किसी महामारी से कम नहीं है। इसकी..
ओर रुख करते हैं…क्योंकि नेताओं की तुष्टिकरण-नीति के कारण वर्षों से लोगों के दिलों में एक वैमनष्यता का बीज निरन्तर वोया जाता रहा है… मौका परस्तों (नेता) की धृष्टता तो देखिए…
भारत को आज़ाद हुए लगभग 72 वर्ष हो चुके हैं। सरकार द्वारा देश की जनता को सदैव जातियों में बांट कर रखने वाली “निकृष्ट-मानसिकता वाले मौका परस्तों द्वारा हमें आज भी “जातिवाद” के मायने समझाए जाते हैं। हमें बताया जाता है कि जिस “जाति” में हम पैदा हुए हैं वही हमारी ज़िन्दगी को निर्धारित करती है।
जबकि भारतीय इतिहास व काव्य ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं, जो न सिर्फ कहते हैं… बल्कि दावे के साथ सिद्ध भी करते हैं कि व्यक्ति के “कर्मों” द्वारा ही उसके भाग्य का निर्धारण होता हैं। न कि उसके “जन्म” द्वारा।
“जाति” से मुझे याद आया..कि महर्षि वाल्मीकि ब्राह्मण नहीं थे। वल्कि वो एक डांकू थे। हिंदी में एक कहावत है…कि “जब आँख खुलीं तभी सवेरा” अर्थात किसी के जीवन का रूपांतरण कब हो जाए… ये कोई नहीं जानता। अब देखिए कुछ साधुओं की बात से वाल्मीकि को अपने भटकते हुए जीवन का अहसास हुआ, तो लोगों द्वारा लूट-मार करने वाली “जाति” के व्यक्ति (वाल्मीकि) ने एक “रामायण” जैसे महाग्रन्थ की रचना कर डाली। अब आप “जाति” की श्रेष्ठता स्वीकारेंगे या “कर्म” की..? ये फैसला मैं आप पर छोड़ता हूँ..
यहां मेरा कहने का भाव ये है, कि किसी भी कार्य की सफलता के लिए पहले कार्य का “चुनाव” दूसरे चुने हुए कार्य के प्रति उस अमुक व्यक्ति का समर्पण.. कहीं अधिक महत्व रखता है। इन जन्म, जाति,धर्म आदि की अपेक्षा।
सामान्य तौर पर पुस्तकों में या लोगों द्वारा ये कह दिया जाता है, कि महाभारत के रचयिता “वेदव्यास भी कोई बहुत ऊंचे कुल ( जाति) के नहीं थे।”
लिखने की इस शैली को मैं भाषा का दिवालियापन कहता हूँ। अब आप दुनियाँ का इतिहास उठा के देख लीजियेगा..जो भी व्यक्ति दुनियाँ में बड़ा.. हुआ है वो कर्म, संस्कार एवं अपनी लगन से बड़ा हुआ है, न कि किसी जाति विशेष में पैदा होने से। वल्कि इसका उलट ये है। कि अच्छे कर्म, संस्कार और अपनी लगन से व्यक्ति जिस किसी “जाति” से होता है। उसे “धन्य” और कर देता है। वेदव्यास जी ने महाभारत जैसे ग्रन्थ की रचना करके अपने कर्म से ख़ुद को समूचे विश्व में एक कवि के रूप में स्थापित किया। ये उनके “कर्म” की महानता है। वेदव्यास जी के पिता तो एक पराशर-ऋषि थे। मग़र उनकी माता एक मछुआरिन थीं। इस विश्लेषण से ये समझ लेना चाहिए , कि बच्चे में यदि संस्कार अच्छे हैं, तो ये चीजें कोई मायने नहीं रखती। कि वो किस जाति / धर्म से है।शिक्षा :- 1- देश के जनसंख्या घनत्व को ध्यान में रखते हुए कम से कम 1 या अधिक से अधिक 2 बच्चों को देश के लिए अच्छे और सच्चे नागरिक देने का संकल्प ले सके तो ही सन्तान उत्पत्ति करें।2-इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि वो “लड़का” है या “लड़की”। हां ग़लत परवरिश से जरूर फ़र्क पड़ता है।एक अजीब विडम्बना देखिए.. वाल्मीकि कृत रामायण का खलनायक प्रबुद्ध-रावण ऋषि विस्वरवा का पुत्र था, जो जाति से “सारस्वत-ब्राह्मण” था। लेकिन अपने विकर्मों (ग़लत कर्मों) की बजह से उसने ख़ुद को एक दुष्ट खलनायक के रूप में स्थापित किया। कर्ण एवं एकलव्य दोनों ही कर्म, संस्कार और अपनी लगन के बल पर न केवल महान धनुर्धर बने। वल्कि उनकी “कार्य-निपुणता” का लोहा पूरी दुनियाँ, मानती है। और सदैव मानती रहेगी…लेकिन “जाति” से ऊंच-नीच का आंकलन करने वाली मानसिकता ने उन्हें भी कदम कदम पर जलालत महसूस कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
इसीलिए काव्य या फिर इतिहास सिर्फ सामाजिक मूल्यों और भाग्य को ही नहीं दर्शाते वो उस व्यक्ति की “इच्छा-शक्ति” और उससे सम्बंधित “कर्म” को भी दर्शाते हैं। वो आपके अस्तित्व के बारे में हैं। जीवन में लोगों का स्थान उनके जन्म लेने पर निर्भर नहीं करता। वो आकार लेता है, उनके “कर्मो” से ।और उस चुनाव से जिसे वे अपने लिए चुनते हैं।
विश्लेषण की गम्भीरता इस निष्कर्ष पर पहुंचती है। कि जाति,धर्म व खून के रिश्ते ज्यादा माईने नहीं रखते। अगर कुछ मायने रखता है, तो व्यक्ति का स्वभाव, कार्य का चुनाव और उसके प्रति ख़ुद का समर्पण-भाव।धन्यवाद; युग,फ्रॉम
नीमगाँव,राया,मथुरा।
Contact No.8006943731

27- सर्वे भवन्तु सुखिनः,सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु ,मा कश्चिद, दुःख भाग भवेत…

आपने अंग्रेजी की एक पुरानी और काफ़ी लोकप्रिय कहावत जरूर सुनी होगी…..
“Rome was not built in a day..”
लेकिन “समय-चक्र” ने आज अपनी चाल बदली, तो it collapsed in a week….अर्थात वही रोम एक सप्ताह में ढह गया।
जीत लिए सारे देश..?, कर ली औद्योगिक क्रांति.. ?, कमा लिए पेट्रो डॉलर.. ?,
हो गया ज़िहाद..? और बन गए सुपर पावर या अभी भी कुछ वाकी है..???
अरे…भले मानुस ! बार-बार अपनी हठ धर्मिता से बाज क्यों नहीं आते हो.?, प्रकृति से क्यों इतनी छेड़-छाड़ करते हो..? आपको समझ नहीं आता..?, इस दुनियाँ का अरबों-खरबों वर्ष पुराना इतिहास उठा के देख लो। जब-जब प्रकृति रुपी शक्ति (GOD) को नज़र अंदाज़ किया गया है। तब-तब सन्तुलन उसने स्वेम ही बनाया है।
शर्म करो..फिर Developped Country होने का दम क्यों भरते हो।
एक सूक्ष्म से परजीवी ने आपको घुटनों पर ला दिया…न आपके एटम बम काम आ रहे न पेट्रो रिफाइनरी..? क्योंकि इतिहास गवाह है। अनधिकार चेष्टा वाले देश हों या कोई परिवार अति-लालच में जहाँ “अनुशासन और नेक-नीयत” की कमी होती चली जाती है, वहाँ “वक़्त” की बदलती हुई करवट किसी से कभी भी झेली नहीं गयी है। वहाँ ग़लत तरीके से कमाया हुआ अनिष्ट धन एवं भौतिक ‘विकास’ सब धरा का धरा रह जाता है। धरासाई होते ऐसे मंज़र हमने कई बार देखे हैं। इतिहास सदैव अपने आपको दुहराता है। बड़े-बड़े सम्पन्न लोग (देश) एक छोटे से जीव का सामना नहीं कर पा रहे..? पूरा विश्व देख रहा है…बताओ निकल गयी ना सब “हेकड़ी ” इनकी।
इस “जनता कर्फ्यू” के दौरान वक्त मिलने पर मैने जब इतिहास के पन्नो में झांका तो पाया कि..

1-मध्य युग में पूरे यूरोप पर राज्य करने वाला रोम (इटली) संचित कर्म के खाते में विकर्मों की अधिकता हो जाने के ही कारण आज पूरी तरह नष्ट होने के कगार पर आ गया है।
2-मध्य पूर्व को अपने कदमों से रौंदने वाला ओस्मानिया साम्राज्य(ईरान,टर्की) देखते ही देखते वक्त के सामने आज घुटनों पर है।
3-ब्रिटिश-साम्राज्य, जिसकी लगाई हुई दीमक आज भी भारत की जड़ों को खोखला करने में कसर नहीं छोड़ रही। कहा जाता था कि जिसका सूर्य कभी अस्त नहीं होता। आज उसके वारिस बर्मिघम में कैद हैं,
4- जिनके एक इशारे पर दुनियाँ के नक्शे बदल जाते हैं। वो अमेरिका भी आज छट पटा रहा है।
5-आने वाले समय में जो सबको निगल जाने की धमकियां दिया करता था। वो “विश्वासघाती चीन” आज न केवल सबसे मुहँ छिपाता फिर रहा है। वल्कि सभी देशों की कुफर गालियाँ भी खा रहा है। अभी आगे देखते जाइये लोग (देश) चीन पर तो अपने “जान-माल” के नुकशान की भरपाई के दावे भी ठोकेंगे।
ताज्जुब की बात देखिए इन सब की भितर घातों से आहत “सौम्य- स्वभावी-भारत” के घाव अभी ढंग से ठीक भी नहीं हुए हैं। मगर बेहयाई की हद देखिए आज सब के सब उसी (आदर्श-भारत) की ओर आशा भरी नजरों से इक टक देखते नज़र आ रहे हैं। जो तीस मार खां बनते थे। उन सभी को एक छोटे से जीव ने उनकी औक़ात बता दी है।
जब इस ज्वलंत मुद्दे पर बात हो ही रही है तो विश्व स्तर पर हो रही सुगबुगाहट जो निकट भविष्य में एक सच्चाई के रूप में सामने आनी ही है। क्योंकि जैसे-जैसे ग्लोवल वार्मिंग बढ़ेगी, ग्लेशियर्स की बर्फ पिघलेगी, लाखों वर्षो से बर्फ की मोटी चादर में दवे दानवीय-विषाणु, जिनका न आपको परिचय है और न ही उनसे लड़ने की कोई किसी भी प्रकार की तैयारी है, जब वो आज़ाद होंगे तब क्या होगा…?
ज़नाब ये कोरोना तो सिर्फ एक झांकी है। ये तो बस एक चेतावनी है आने वाली उस विपदा की…, मनुष्य ने प्रकृति से लगातार खिलवाड़ करके ऐसी आपदाओं को स्वंय जन्म दिया है।
अब एक महत्वपूर्ण सवाल ; क्या आप जानते हैं ऐसी तमाम आपदाओं से बचने या लड़ने का तरीका…कहाँ छिपा है वो ब्रह्मास्त्र ..?
एक आसान सा जवाब ; अकूत ज्ञान के भंडार भारत में ही…
1-तक्षशिला के खंडहरों में,
2-नालन्दा की उन पुस्तकों की राख में,जो भारत देश के “अथाह ज्ञान” की ऊंचाई के सामने अपने बौने-पन को छिपाने के लिए जला के ख़ाक कर डाली।
3-शारदा पीठ के अवशेषों में,
4- मार्तण्डय के पत्थरों में। आदि..
सूक्ष्म या परजीवियों से मनुष्य का ये युद्ध कोई नया नहीं है। ये तो सृष्टि के आरम्भ से अनवरत चल रहा है। यदि प्रकृति से छेड़छाड़ जारी रही, तो आगे भी चलता रहेगा…, सभ्य-सुसंस्कृत भारत ने इनसे लड़ने के हथियार खोज भी लिए थे। लेकिन इन्हीं अहंकारी और लालची देशों ने जो आज घुटनों पर आ गए हैं, इनकी स्वंय को श्रेष्ठ साबित करने की हठ ने सब नष्ट कर दिया।
अगर आपको स्वर्ण और रत्नों के भण्डार ही चाहिए थे ,तो हम से मांग लिए होते।
राजा बलि के वंशज एवं दानवीर कर्ण के अनुयायी हैं हम। यूं ही दान में दे देते।
हम भरतीय वैभव त्यागकर (सन्तोषी स्वभाव) “शान्ति की खोज” करने वाले समाज के लिए तो वैसे भी ये सब चीजें मूल्यहीन ही थीं। ले जाते।
लेकिन अफसोस! आपने तो विश्वबंधुत्व के सिद्धांत पर उभरते हुए भारतीय सभ्य समाज को खत्म करके अपने को स्थापित करने की चाह में सब कुछ आरम्भ में ही नष्ट कर डाला।
किंतु “अच्छाई किसी पुरुस्कार या प्रशंसा की न कभी मोहताज़ रही है.. न रहेगी।
“आप हमारे गौरवशाली इतिहास को मिटाने के प्रयास एवं सदैव से कमतर आंकते आये हैं। क्योंकि आपको वो “MEAN-MENTALITY” की भयंकर बीमारी है , जिससे ग्रसित कुछ प्रतिशत लोग देश-दुनियाँ के हर समाज में व्याप्त होते हैं। जिन्हें अपने अतिरिक्त किसी दूसरे की “अच्छाई या उन्नति” हज़म नहीं होती… लेकिन ऐसी “निकृष्ट-सोच” रखने वाले ईर्ष्यालु लोग या देश सदैव मन-मसोस के ही रह जाते हैं। होता वही है जो अमुक व्यक्ति या फिर देश के प्रारब्ध के अनुरूप “पूर्व-निर्धारित” (PRE-DESTINATION) हो चुका होता है। मुक्त-इच्छा (FREE-WILL) के दृष्टिकोण से भी हम ह्रदय से काफ़ी उदार हैं।
इसलिए भी हम भारतीय आपको निराश नहीं करेंगे, ये एक सच्चे भारतीय होने के नाते मेरा ख़ुद का अटूट विश्वास भी है.. कि फिर से माँ भारती का आँचल सभी को इस संकट की घड़ी में छांव देगा। श्री राम के वंशज इस दानव से भी लड़ लेंगे, ऋषि दधीच के पुत्र अपने शरीर की अस्थि-मज्जा देकर भी आपको बचाएंगे।
किन्तु ध्यान रखियेगा…मार्ग उन्हीं नष्ट किये गए हवन कुण्डों से निकलेगा। जिन्हें कभी आपने अपने पैरों की ठोकरों से तोड़ा था।
आपको फिर से उसी नीम और पीपल की छांव में आना होगा, जिसके लिए आपने कभी हमारा उपहास किया था। आपको उसी गाय की महिमा को स्वीकार करना होगा, उन्हीं वेदों को पढ़ना होगा,जिन्हें कभी अट्टहास करते हुए नष्ट किया था।
उसी चंदन और तुलसी को मस्तक पर धारण भी करना होगा, जिसके कारण कभी हमारे मस्तक धड़ से अलग कर दिए गए थे।
ये किसी “मानव-निर्मित न्यायालय” का निर्णय नहीं ईश्वर-प्रदत्त “प्रकृति रूपी न्यायालय” का न्याय है, जो आपको सहर्ष स्वीकारना ही होगा।
फिर कहता हूं इस दुनियां में जीना है तो न केवल सोमनाथ में सिर झुकाने आना होगा अपितु तक्षशिला के खंडहरों से भी मांफी मांगनी होगी। और नालन्दा की खाक भी छाननी होगी।
तब कहीं सम्पूर्ण दुनियाँ में स्थापित हो सकेगा …
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , मा कश्चिद दुःख भाग भवेत….;

विचारक ; युग पचहरा, जन्म-भूमि; नीमगाँव,उत्तर प्रदेश,भारत।

26-“कोरोना” एक गुणात्मक वृद्धि …

“कोरोना” महामारी को एक “संख्यात्मक वृद्धि” समझने की भूल मत करियेगा “संख्यात्मक-वृद्धि एवं गुणात्मक-वृद्धि ” में जमीन-आसमान का फर्क होता है… आइए इस फ़र्क़ को वीरबल के नज़रिए से समझने का प्रयास करते हैं….
कोरोना महामारी के फैलने की “गुणात्मक-वृद्धि को समझने के लिए मैं आपको इतिहास के पन्नों से एक बहुत रोचक किस्सा सुनता हूँ…जो देश-दुनियाँ के आज के हालातों पर एकदम सटीक है..
ज़नाब ! हुआ यूं एक बार बादशाह अकबर और उनका प्रिय मंत्री बीरबल दोनों शतरंज खेलने बैठ गए। खेलने से पूर्व दोनों में शर्त लगी कि उनमें से जो भी आज के शतरंज की बाजी हार जाएगा। उसे विजेता की इच्छा के अनुसार जुर्माना चुकाना होगा। बीरबल ने कहा हुजूर यदि आप जीत गए और मै हार गया तो… आप हुकुम फ़रमायें कि मै आपको क्या जुर्माना चुकाऊंगा..? बादशाह ने तुरन्त कहा, यदि ऐसा हुआ तो तुम्हें, 100 स्वर्ण मुद्राएं देनी होंगी। ये शर्त बीरबल ने स्वीकार कर ली।
अब बीरबल ने कहा जहाँपनाह यदि इसका उलट हुआ। यानी आप हारे तो,… अकबर ने कहा ये तो तुम बताओ तुम्हें जुर्माने में क्या चाहिए… बीरबल ने बड़े हल्के से स्वर में बोल दिया कि जहाँपनाह हम लोगों को तो सदैव अपने खाने-दाने की ही फ़िकर लगी रहती है सो आप मुझे शतरंज के 64 खानों में गेंहूँ के दाने रखकर अपनी शर्त पूरी कर दीजियेगा। जैसे… पहले खाने में 1 दाना, दूसरे खाने में पहले के दो गुने दाने 2, तीसरे में दो के दो गुने यानी 4 दाने, इसी प्रकार चौथे में चार के दो गुने 8 दाने, पांच वें खाने में 16 इसी तरह गुणात्मक-वृद्धि में गेंहूँ के दाने रखते जाईयेगा मै उठवाता चलूंगा। बीरबल की इस छोटी सी शर्त को सुनकर बादशाह अकबर ने जोरदार ठहाका लगाया।और बोला “छोटे-लोग छोटी-सोच”बीरबल मुझे तुम्हारी ये शर्त मंजूर है।उसके बाद शतरंज का खेल शुरू हुआ। अब संयोग देखिए कि बीरबल ही इस बाजी को जीत गया। अब बारी थी हारने वाले को जीतने वाले की शर्त पूरी करने की। अकबर ने बड़े ही अहंकार के साथ अपने खजांची को हुकुम दिया कि “वह शतरंज के 1 से 64 खानों में गुणात्मक-वृद्धि, जैसे ये बोल रहे हैं… , करते हुए गेंहूँ के दानों का हिसाब लगा कर शर्त को मुकम्मल कर दें….
खजांची ने जब हिसाब फलाया तो उसका मुंह खुला का खुला रह गया। वह बादशाह के सामने आकर हाथ जोड़कर🙏 खड़ा हो गया। और बोला यदि हम सारे भण्डार का गेंहूँ तोल दें तो भी बीरबल की शर्त को मुकम्मल नहीं कर पाएंगे। एकबार को तो अकबर ने इस बात पर विश्वास नहीं किया।
ऐसा लग रहा है। एकदम तो आप को भी ये बात अजीब ही लग रही होगी। क्यों नहीं..सामान्यतः स्वाभाविक भी है।
चलिए अब मेरा गणित तो ज्यादा अभ्यास में है नहीं… कैलक्यूलेटर की सहायता से ही हिसाब लगाते हैं..शतरंज के पहले खाने में 1 दाना, दूसरे में 2 दाने, तीसरे खाने में 4 दाने चौथे खाने में 8 दाने…इसी तरह गुणात्मक-वृद्धि करते हुए कैलकुलेशन से शतरंज के सबसे आखिरी अर्थात अकेले 64 वें खाने में गेंहूँ के 9223372036854775808 दाने रखने का हिसाब बना।
और एक से लगा कर 64 तक के सभी खानों में रखे जाने वाले गेंहूँ के “कुल दानों” की संख्या हो रही थी।..18446744073709551615.

जानकरों के अनुसार जिनका कुल वज़न होता है..1,19,90,00,00,000 मैट्रिक टन ।
जो कि वर्ष 2019 के सम्पूर्ण विश्व के गेंहूँ के उत्पादन से भी 1645 गुना अधिक है।
साथियो ! वृद्धि दो तरह की होती है। एक संख्यात्मक, दूसरी गुणात्मक..यदि शतरंज के खानों में क्रमशः1,2,3….62, 63, 64.करके प्रत्येक खाने में उसकी संख्या के अनुसार दाने रखे जाते.. तो सभी 64 खानों में कुल 2080 दाने ही आते। ये कहलाती “संख्यात्मक वृद्धि” जबकि बीरबल की शर्त के मुताविक गणना है। “गुणात्मक वृद्धि”
साथियो Covid-19 यानी “कोरोना वायरस” की तेज वृद्धि और उसके विश्वव्यापी दुष्प्रभाव को देखते हुए मेरे मन में आज की इस भयावह महामारी की वृद्धि को लेकर चिन्ता हुई कहीं हम इसे “संख्यात्मक वृद्धि” समझने की भूल न कर बैठे, इसलिए लोगों को सचेत करने के उद्देश्य से इस विषय पर लिखने का विचार आया।

भाइयो ! ये “गुणात्मक वृद्धि” है। जो सामान्य लोगों के अनुमान से परे है। इसे हल्के में विल्कुल न लें। मेरा सभी से🙏हाथ जोड़कर निवेदन है। इस सम्बंध में हम सभी अवश्य गम्भीर हो जाएं। और प्रधानमंत्री जी के अनुसार 21 दिन या और यदि आवश्यक हो तो 40 दिन भी क्योंकि ” जान है तो जहान है।” आप अपने परिवार के साथ घरों में ही बने रहें। इससे आप तो सुरक्षित होंगे ही। इस महामारी को आगे बढ़ने से रोकने की भी आप एक अहम कड़ी साबित होंगे।
I Mean ऐसा करके ही हम Corona cycle (चक्र) को तोड़ पाएंगे….धन्यवाद।

विचारक ; युग,पचहरा,
जन्म-भूमि ; नीमगाँव,राया,मथुरा।
Contact No.8006943731
( for feedback)

25- “KNOW EXACTLY WHAT YOU KNOW…”

अर्थात “जो आप जानते हैं उसे ठीक-ठीक जानें”…क्योंकि संसार में अपार ज्ञान है… so You should be CONFIRM with that not CONFUSE
In the reference of INTELLIGENCE (बुद्धि)…
ये एक सामान्य सा विचार है.. कि कर्मेन्द्रियाँ ‘मन’ के अधीन होती हैं।
मग़र ये ‘सद्बुद्धि’ के अधीन हों, तो मेरा ऐसा मानना है कि “जीवन-लक्ष्य” प्राप्ति और… सहज हो जाती है। ये तो सभी मानते ही हैं कि बुद्धि बल – शरीर बल से बड़ा है। तभी तो अक्सर पूछ लिया जाता है..कि “अक्ल बड़ी या भैंस”=?
“बुद्धि” में ही वो सामर्थ्य है जो ‘ज्ञान’ को धारण करती है। मग़र किसी भी प्रकार की क्रिया/गति (any activity in the Brain) कभी भी बिना ‘ज्ञान’ के नहीं होती… इसीलिए
पहले शिक्षित होना… फिर अनुभवी लोगों की संगति में ‘गुनना’ अर्थात “प्राप्त ज्ञान” को जीवन के असल धरातल पर परखना..

I mean ‘उस ज्ञान’ के साथ अपने जीवन में in practical होना..प्रत्येक के लिए अति-आवश्यक है। और यही वो Process है जो Knowledge को Wisdom में तब्दील करता है।

otherwise ज्ञान के साथ-साथ दुनियाँ में ज्ञानियों की भी कोई… कमी नहीं है। ये आप भी जानते हैं कि…

सभी “Wise-Man” नहीं होते =?
जीव के अंदर या फिर बाहर उसके द्वारा की गयी…किसी भी प्रकार की हलचल ‘क्रिया’ अर्थात “कर्म” …जिस के बिना किसी भी कार्य की सिद्धि तो दूर… ये जीवन ही सम्भव नहीं है।
और ध्यान रहे “कर्म” चाहे Positive करो या Negative आपके जीवन के “बहुमूल्य-पल” दोनों में ही खर्च होने हैं। जो आपके पास सीमित हैं। तो फिर अपने समय और ऊर्जा की बर्बादी क्यों=?
लेकिन अगर परिणाम में जाएं…, तो Negative कर्म से व्यक्ति का जीवन गफ़लत में पड़ जाता है। जो घुटन देता है। जबकि Positive कर्म से व्यक्ति जीवन की वाँछनीय ऊंचाइयों को छू लेता है। जो सुकून देती है।
मग़र निर्णय लेने की स्वतंत्र-इच्छा (Free-Will)….को व्यक्ति अपना

जन्म सिद्ध अधिकार तो मानता है। लेकिन विल्कुल वैसे ही है। जैसे कुछ लोगों को “पैत्रिक धरोहर” तो मिल जाती है। परन्तु वे उसे संजो नहीं पाते। भटकाव के कारण बर्बाद होते चले जाते हैं। लेकिन ये Spiritual-System अभी भी सीधे-सादे लोगों की समझ से काफ़ी परे है…
इसीलिए केवल भौतिक सफलता ही नहीं बल्कि अध्यात्म ज्ञान की प्राप्ति के लिए भी बुद्धि (INTELLIGENCE) की नितांत आवश्यकता है। ये wisdom ही तो है जिसके बल पर मनुष्य..”आत्मा और परमात्मा” जैसे सूक्ष्म विषयों को ग्रहण कर इतना महान बन जाता है कि लाखों-करोड़ों लोग अपने ही जैसे चार-हाथ-पांव वाले समतुल्य-प्राणी “मनुष्य” की बुद्धिमत्ता के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। इससे ज़ाहिर होता है कि “बुद्धि” न केवल बहुत बड़ी शक्ति है, बल्कि ये वाक़ई “सिद्धदायिनी” है। इसके प्रति हम सब को At Any Cost सदैव गम्भीर रहना ही चाहिए….
धन्यवाद

योगेंद्र सिंह पचहरा,

नीमगाँव, राया, मथुरा

(महज़ एक विचार)

24-“DESTINY to FREE-WILL” Life is a Journey…(A Deep Discussion with Y.S.पचहरा)

As we go down the path of self awareness.One question that comes up is ….
Q.How much of our actions are dictated by Destiny=? OR

Q. How much of life is a result of our conscience-choice=? OR

Q.Are we the Master of our Destiny..=? Come on..

Deep Discussion…With me
Different philosophical scholars of thought believe different things. The two Prominent & dramatically opposite views are…
1- Determinism ;–Everything is Pre-determined in the world.
2- Free-Will ;– We have complete freedom of choice.
Which aspect…do You in favour…?
Ancient Eastern Philosophies have tended to lay greater emphasis on Determinism, while there’s been bigger support for Free-will among modern-Libertarians.
The rise of Individualism in modern society has furthered the notion (thought) that we create our own reality sharing up the concept of Free-Will.
Determinism– is casually determined by an unbroken chain of prior- occurrences. In it’s extreme version, it suggests that human beings have no way of changing the course events. This sound paralyzing but it may be grounded in trouth. Using biological approach, there’s the role of the genetics code the DNA carries the individual’s “Entire-History”.
Now the philosophy of “KARMA” decrease the human beings… primarily act out the effects of “Past-Karma”.
Meanwhile “FREE-WILL” supports the existence of our rational (VIVEKPURN) agency through -which we can exercise control over “Our-decision”.
It also implies that nature’s Universal-Laws do not exert (to force) any power over Individual-Will.
How to reconcile this with our intuitive belief that we are able to make independent decisions to create our own “Destiny” through Vision, Talent and Commitment.
Personal experience often supports ‘the view’ that we choose the career we want to pursue, decide on the food. We want eat, determine the extent of Hard-Work.We put in , have the freedom to choose our Leisure-Activities (FURSAT ke KRIYA-KALAP) and so on.
The discussion between “Determinism” & “Free-Will” has to examine whether the laws of nature are casually deterministic of our actions.You know the whole universe is governed by the law of Nature such as the cycle of ‘Birth’ & ‘Death’ and again ‘Karma’.
In general mostly people..
MIND-SET —
“Destiny is nothing but these laws of Nature unfolding scientific and spiritual progress merely helps us to understand these laws a bit better.”
The law of “Karma” also says ..Our experiences are dictated by our “Store-Karma” . That why some people instinctively get angry in a situation that leaves others calm., Why some are Pre-disposed to be ambitious and others not.
It is pre-arranged in our Karmic-Psyche.We are born with this Karmic-Psyche and every interaction with Environment means we generate and store “Additional-Karma” (Done by Desire) to that extent, all our decision even though we may confuse them with Free-Choice.
Infact they are at best an outcome of our “Conditioned-Will” (Not Free-Will) and constrained by our hereditary and Environmental limitations.
Shri Ram-Krishna Paramhans, Swami-Vivekanand’s Guru explained it thus ; Man is like a Cow tied to a pole with a rope bound by the Karmic debts and human Nature , and the amount of free-will .
She has analogous (ANURUP) only to the rope allows .
The argument strengthens the case for laws of Nature to be casually Deterministic of our lives…So
Q.Does Free-Will exist at all=?
Ans. Yes but it comes in to play only when we make a Conscious-Choice that we would not be governed by conditioned responses.
Our ability to make Meaningful-Choices is determined by our level of Mindfulness at that moment…How aware we are our True-Identity…? & How connected we are with our inner conscience ness, alive inside each of us , can be path to examining every situation with new awareness.But for this we need to let go of conditioned responses and let our inner wisdom guide us .
Swami Ramkrishna completed his explanation of ‘Free-Will’ saying that “As one progresses on the journey of spirituality, the rope of freedom becomes longer.”
Allowing for greater access to authentic” FREE-WILL”.

Please read “This discussion” very serious & carefully because it is… “Mind-over-matter”… Thanks

; Pachahara, YUG
(Neemgaon,Raya,Mathura)
Contact No.8006943731

23- “इच्छा-पत्र” ( Based on Spiritual-thought)

एक अमीर व्यक्ति ने अपनी आखिरी इच्छा व्यक्त करते हुए, अपने इकलौते बेटे से कहा, बेटा! अब ये मेरा लगभग आखिरी वक्त ही है। इसलिए जब मेरा ये शरीर छूट जाय,तो तू मेरे पैरों में ये फ़टे हुए मौजें अवश्य पहना देना। ये मेरी आखिरी इच्छा है। इसे जरूर पूरी कर देना।
कुछ दिन बाद जब उस पिता ने अपनी आखिरी सांस ली , तब उनके इकलौते पुत्र ने उनकी आखिरी इच्छा वहां पर मौजूद सभी लोगों को बताई।, तो अधिकांश लोगों ने उसे सनातन

धर्म के अनुसार उचित नहीं माना और..कहा कि मृत्यु मनुष्य जीवन का अंतिम संस्कार होता है। जिसमें मृत शरीर को कोई पुराना वस्त्र पहनाने की इजाज़त नहीं है। आख़िर ये बहस इतनी बढ़ गयी कि उस नगर के अनेक जानकर लोगों को बुलाया गया..जब कोई नतीजा नहीं निकलता दिखा, तो आख़िर में उनके ही पड़ौस से एक महोदय निकल कर आये। उन्होंने ने उस मृत पड़े व्यक्ति के इकलौते बेटे के हाथों में से वो कागज़ लेकर, जो “इच्छा-पत्र” कम एक पिता द्वारा दी गयी “नसीहत” कहीं अधिक था।, उसे समस्त उपस्थित लोगों को पढ़कर सुनाया। उसमें लिखा था..
” मेरे प्यारे बेटे अब तुम देख ही रहे होगे..ये दौलत, बंगला,गाड़ी,बिज़नेस-प्रोजेक्ट और अपने गाँव में बने फार्म-हाउस आदि इतना सब कुछ ताम-झाम इकट्ठा कर लेने के बावजूद भी मैं शरीर पे एक फटा हुआ मौजा,जो यहीं थोड़ी देर बाद सब कुछ जलके ख़ाक हो जाने वाला है। तो भी नहीं ले जा पा रहा हूँ। अब तुम सोचिएगा..कि जीवन की सच्चाई जब इतनी स्पष्ट है, तो फिर क्यों व्यक्ति “फेयर & फाउल” पूरे जीवन भर इस कवाड़ को जोड़ने में लगा रहता है..? नियति के अनुसार व्यक्ति या फिर कोई वस्तु अपने पूर्व-संस्कारों ( Pre-Rituals ) के संयोग के कारण ही इस मृत्यु-लोक में आते हैं..उन्हें पूरा करके अपने “नियत-समय” से चले जाते हैं। ये ही दुनियाँ की रीति है।

बेटे! जो बात मैं जीते जी तुमसे बार-बार कहता रहा..मग़र तुम हवा में उड़ाते रहे..उसी को आज फिर आखिरी बार मरने के बाद भी फ़र्ज़ स्वरूप अपने “इच्छा-पत्र” के माध्यम से समझाने का एक और निष्फल प्रयास ही सही… मग़र कर रहा हूँ..जो हर पिता करता है…
बेटा! अब तो जीवन के प्रति तुम होशियार हो जाईये..और सदैव यही कोशिस करियेगा कि “अपने लाभ के लिए कभी किसी को दुःख एवं धोखा मत दीजियेगा।” भगवान की “पूर्व-निर्धारण-व्यवस्था” के अनुरूप जो भी स्थिति-परिस्थिति बनें, बे-हिचक ईश्वर को हाज़िर-नाज़िर मानते हुए “अपने-आप” को हमेशां न्याय के पक्ष में ही रखियेगा। ये मेरा अटल विश्वास है। कि कभी तुम्हारा कोई अहित नहीं कर सकेगा। मनुष्य की जीवन यात्रा बहुत लम्बी नहीं होती है। उसका सारा जीवन “घर की दहलीज़ से लेकर श्मशान” तक पहुंचने में ही बीत जाता है।
एक और बात ध्यान रखना…कि साल में 50 मित्र बनाना एक आम बात है। मग़र एक मित्र से 50 साल तक मित्रता निभाना..जरूर ख़ास बात है।
बेटा ! ये बात सही है कि एक मिनट में ज़िन्दगी नहीं बदलती। परन्तु..इतिहास गवाह है। एक मिनट में “सोच-समझकर” लिए गए फैसले..सदैव से ज़िन्दगी बदलते आये हैं। शेष तुम ख़ुद समझदार हो…
पारिवारिक रिश्ते से एक पिता का शुभ-आशीष सदैव तुम्हारे साथ बना रहेगा..
Good bye… ”
“इच्छा-पत्र” को पढ़ने एवं सुनने वाले सभी प्रबुद्ध जनों का धन्यवाद

युग पचहरा” आभार प्रकट करते है। राधे-गोविन्द.. राधे-गोविन्द..धन्यवाद।

22-“जीना” इसी का नाम हैं

कुछ लोग ऐसा सोचेंगे कि, इस लेख का टाइटल मशहूर सिंगर मुकेश जी के एक गाने से प्रभावित होकर रखा गया है। कुछ ये कि अभिनेता फारुख शेख जी के एक कार्यक्रम का नाम भी यही था जो टीवी स्क्रीन पर बड़ी बड़ी शख्शियतों का बेहतरीन साक्षात्कार कराते थे.. ठीक है सोचने के लिए हर व्यक्ति स्वतंत्र है।आप भी अवश्य सोच लीजिएगा।

मगर आप से मेरा आग्रह तो इस लेख के प्रेरणा स्रोत व्यक्तित्व से कुछ सीख लेने का है..और कुछ नहीं।

चलो! तो पढ़ना शुरू करें

“जीना इसी का नाम है”

वैसे भी हर “सफल व्यक्ति” जीवन में किसी न किसी को अपना “रोल-मॉडल” मानता ही है। अधिकतर के लिए उसका पिता या फिर उसके अपने कैरियर से रिलेटिड क्षेत्र से उसका अपना कोई पसंदीदा “आइडियल-पर्सन।” जिसे फॉलो करके वह न केवल अपने जीवन में आगे बढ़ता है। अपितु वह अपनी ज़िन्दगी को हरपल वैसा ही आकार देने के प्रयास में रहता है। सम्भवतः पूरी सिद्धत व लगन के साथ की गयी मेहनत के दम पर एकदिन पूरी दुनियाँ से वह अपनी कामयाबी का लोहा मनवा ही लेता है।

क्योंकि वो अपने ख़ुद के अन्दर हर पल अपनी चॉइस के “ड्रीम-हीरो” को फ़ोकस करते हुए आगे बढ़ता है।

यदि स्थितियां बहुत अधिक प्रतिकूल न हों,तो वह एक न एक दिन अपने आदर्श के अनुरूप ख़ुद को स्थापित करके ही दम लेता है।

इसी लिए दुनियाँ में ये कहावत प्रचलित है। कि “इतिहास सदैव अपने आप को दोहराता है।” और आप देख ही रहे होंगे कि…
दुनियाँ का इतिहास ऐसे “रियल हीरोज़” की सच्ची कहानियों से भरा पड़ा है।
ऐसे ही …

एक सच्चे अन्तर्राष्ट्रीय “बास्केट बॉलर” मिस्टर ‘कोबी ब्रायंट’ (Mr. Kobe Brayant) जिसने अपने जीने के अंदाज़ से पूरी दुनियाँ को “आर्ट ऑफ लिविंग & आर्ट ऑफ डाइंग” का बेहतरींन पाठ पढ़ाया।

जो भारत के युवाओं के लिए ही नहीं.. पूरी दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति के लिए उनके मेहनत करने का अंदाज़, और उनकी जिंदादिली बेहद.. प्रेरणादायक है। इसलिए एक एक बिंदु को गंभीरता पूर्वक पढ़िएगा।

पूर्व NBA के खिलाड़ी एक सुप्रसिद्ध “अंतर्राष्ट्रीय बास्केट बॉलर” कोबी ब्रायंट, दुर्भाग्य से महज़ 41 वर्ष की उम्र में एक बहुत ही सुरक्षित बताए जाने वाले विमान “सिरोस्की S-76B” के क्रेस हो जाने से उनका स्थूल शरीर नष्ट हो गया। ये हम सबके लिए दिल दहलाने वाली ख़बर थी। उस वक्त शायद टेलीविज़न पर आपने भी अवश्य देखी या फिर सुनी होगी।

फिर भी हम ऐसे महान व्यक्तित्व की बहुत सी खूबियों से अछूते रह जाते हैं.. क्योंकि मैं, ऐसा मानता हूँ कि किसी भी महान व्यक्तित्व को अल्फाजों में कवर करना आसान नहीं होता।

मांफ कीजियेगा मगर वही निष्फल प्रयास (wild goose chase) इस लेख के ज़रिए एक बार मैं भी कर रहा हूँ…मन नहीं मानता..

“कोबी ब्रायंट ” को खेल से इतना अधिक प्यार एवं लगाव था कि वे लगभग 20 वर्ष तक निरन्तर अपने खेल को बेहतर बनाने में जुटे रहे।

ये NBA के इतिहास में सबसे कम उम्र के खिलाड़ी थे, 6 फ़ीट 4 इंच लम्बे इस खिलाड़ी ने मात्र 18 वर्ष की उम्र में खेलना शुरू कर दिया था। लेकिन ध्यान रहे 24 वर्ष की उम्र में वो “सबसे कम उम्र में.. सबसे ज्यादा ‘गोल-स्कोर’ करने वाले खिलाड़ी भी बने गए थे।”

हालाँकि कोबी, को ये सफलताएं इतनी आसानी से,तो नहीं मिली थीं। इसके लिए उन्होंने अपनी मेहनत से दिन रात का फर्क लगभग मिटा दिया था।

मैं, कैरियर-गाइडेंस के प्रोग्रेम्स में अपने छात्रों से एक बात सदैव बोलता रहा हूँ कि ..जुनून (Passion) तो कई लोगों में होता है। मग़र वो सारा जीवन… उसमें खपाना नहीं चाहते.., इस बात में विरोधाभाष अवश्य है।

मग़र ये सत्य है। लोग, परिवार व मित्रों के साथ भरपूर समय बिताना चाहते हैं.. , छुट्टियों पर घूमने की मस्ती…, अपने सभी रिश्तों को… पूरा वक्त देना चाहते हैं।… ये सब कुछ करते-कराते वे ‘ जीवन की ऊंचाइयों… ‘ को भी छूने की चाह.. रखते हैं।

जबकि वे अपनी दैनिक कार्य-शैली में कोई तब्दीली या परिवर्तन जैसा कुछ नहीं करते। ये विडम्बना अधिकतर के साथ होती है।

लेकिन इतिहास गवाह है। जिसने भी कीर्तमान स्थापित किये हैं… उसने शुरुआत अपनी “कार्य-शैली” के परिवर्तन से की होती है। और बड़े धैर्य के साथ स्टेप वाइज..धीरे धीरे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है।

शायद इसीलिए वे असाधारण होते हैं। उनके अंदर अपने कार्य के प्रति “पूर्ण समर्पण..”होता है। और “कोबी ब्रायंट” जैसे ; प्लेयर् तो मेरी नज़र में यूथ-जेनरेशन को जाग्रत करने के लिए एकदम… ‘फुल-पैकेज’ जैसे हैं।

कोबी, जैसे पूर्ण-समर्पित व्यक्तित्व हमें ये सिखाते हैं कि जब आप सफलता के रास्ते पर चलते हैं और अपने उद्देश्य को किसी भी स्थिति या फिर परिस्थिति में प्राप्त कर ही लेना चाहते हैं, तो आपके लिए कई एक चीजों के साथ “सामंजस्य” बिठा लेना भी आवश्यक होता है।

इस सन्दर्भ में कोबी ब्रायंट, अक्सर कहा करते थे.. कि मैं खेल-जगत से सन्यास लेने के बाद ये नहीं कहना चाहता कि,

“काश!. मैंने थोड़ी मेहनत और… करली होती!!”

हालांकि कोबी ब्रायंट आज शरीर से हम-सब के बीच तो नहीं हैं। लेकिन..अपने जिन्दा-दिल “विचार” से वे हर दिल में हैं और हमेशा रहेंगे….

यही वो “स्थिति” है जो मुझ जैसे नाचीज को

” जी..ना” इसी का नाम है.. ” जैसे बड़े विचार पर अपना व्यू रखने को बाध्य करती है।

उन्होंने जीवन के सबसे बड़े उद्देश्य को अपने जी..ते-जी… हांसिल कर लिया था।
कोबी ब्रायंट का कहना था..,

“जब मैं बास्केट बॉल के कोर्ट पर उतरता हूँ, तो मेरे अन्दर स्वत: किसी ‘ग्लेडिएटर’ अर्थात एक ‘योद्धा’ जैसी भावना आ जाती है।”

यानी कोर्ट पर आते ही उनका व्यक्तित्व एकदम से बदल जाया करता था। उनके इस विचार से मैं भी पूरी तरह एग्री करता हूं क्योंकि मैं भी सदैव से इस बात का पुरज़ोर समर्थक रहा हूँ कि By-Choice अपना कैरियर चुनने वाले हर व्यक्ति को अपने कार्य-क्षेत्र में कार्य करते वक्त ऐसी ही अनुभूति होती है। उस दौरान

बेहतर से बेहतर “परफोर्मेंस ” देने के अलावा दूसरी कोई बात ज़हन में होती ही नहीं है। ये अनुभूति ही हमारी “कर्तव्य निष्ठा” का सच्चा अवार्ड होती है। कोई ट्रॉफी या प्रसस्ति पत्र नहीं।

और यही वो अवस्था है जो इंसान को “आम से खास” बनाती है।

यदि हम इसे मनोवेज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो इसी अवस्था को “Mental Switch” कहा जाता है। ये अक्सर देखा भी गया है कि.. जब “परफॉर्मर” इस अवस्था में होता है…, तो वह मानसिक-स्तर पर अपने कार्य में इतना ‘तल्लीन’ हो जाता है कि, उस वक़्त वह बाहरी दुनियाँ से लगभग “डिस-कनेक्ट” सा हो जाता हैं। उस वक्त उसके सामने सिर्फ “लक्ष्य” होता है। और…. कुछ भी नहीं। This state of a human body is the “Mental-Switch” in psychology.

इतिहास साक्षी है।अपने “जीवन-लक्ष्य” को इस तरह Focus करने वाले व्यक्ति बहुत कम साधनों में बड़े से बड़े कीर्तमान स्थापित कर जाते हैं।

“कोबी” अपने समय के खिलाड़ियों की तुलना में अधिक मेहनत करने में ज्यादा विश्वास करते थे। जैसे उनकी ग्रिप अच्छी थी मग़र उनके हाथों की मांशपेशियां ज्यादा मजबूत नहीं थीं।इसलिए जबरदस्त अभ्यास करके मांशपेशियों को मजबूत बनाया।

उनके पास खेलने में गति.. अच्छी थी लेकिन वे उससे सन्तुष्ट नहीं थे, तो कड़ी मेहनत करके इस बाधा को भी दूर किया।

कई बार सब कुछ ठीक होने के बावजूद भी वे “गोल” करने से चूक जाया करते थे। वे घर आकर ख़ुद का पुनः आत्मविश्लेषण किया करते थे, जो हर किसी को करना चाहिए, तो उन्हें समझ आया कि सब ठीक था। लेकिन उनके पैरों में वो मजबूती नहीं थी। जो दूर से जम्प करके बॉल को बास्केट में डालने के लिए होनी चाहिए थी। तब उन्होंने अपनी ट्रैनिंग में कुछ और बदलाव किये। जिससे अभ्यास करके अपने पैरों को और मजबूत किया।

अध्यात्म भी यही कहता है.. हम अपनी इंद्रियों और स्थूल शरीर के क्रिया कलापों के केवल “दृष्टा” होते हैं भोक्ता नहीं। क्योंकि हम “सोल कॉन्शियस” है न कि “बॉडी कॉन्शियस”।

इससे पता चलता है कि वे स्वंय के ही प्रतिद्वंदी थे। इस तरह वे खेलते वक्त स्वंय को प्रतिदिन नई चुनौतियाँ दिया करते थे।उनके बहुत से गुणों में से ये गुण भी रिमार्केबल है। जो उन्हें एक महान खिलाड़ी की पंक्ति में ला कर खड़ा करता है।

अब आप थोड़ा सा “मानव-शरीर” की ‘क्षण-भंगुरता’ पर विचार कीजिये… क्योंकि ये भी संसार का “कटु-सत्य” है। अगर अचानक हमारे सामने मौत आकर खड़ी हो जाय, तो क्या हम उसे सहर्ष स्वीकार कर पाएंगे=? क्या इतने तैयार हैं हम..?
क्या हम ये कह पाएंगे कि हमने अब तक जो भी किया अपनी लगन और पूरी तन्मयता के साथ ईमानदारी से किया है…… तत्काल जाना भी पड़े तो कोई गिला नहीं!!

“कर्मण्येवाधिकारस्ते.. ” वाले सिद्धांत पर चलना… संसार की “नियति” है। दूसरा कोई विकल्प नहीं है। क्योंकि “परिश्रम के बाद मिली सफलता” को दुनियाँ की कोई ताक़त हम से छीन नहीं सकती।

मग़र अफ़सोस…! इस बात को पूरे दावे के साथ कहने वाले दुनियाँ में बहुत कम लोग होते हैं। और
अगर हैं , तो आप देख लीजियेगा वे जीवन की विकट परिस्थितियों में भी सदैव खुश…रहते हैं। वे कभी अपने ग़म शेयर नहीं करते। उन्हें ख़ुद की मौत का भी कोई भय नहीं होता।

लेकिन आप दुनियाँ में अपनी नज़रें फैला कर देख लीजियेगा। अधिकतर लोग जीवन की वास्तविकता से कोसों दूर…भोगों में लिप्त केवल “धन संचय” को ही अपना लक्ष्य बनाए हुए हैं।कोबी ब्रायंट, लगभग बीस वर्ष तक “लॉस एंजिल्स मेकर्स”के लिए खेलते रहे।

इसमें कोई दोराय नहीं, कोबी ब्रायंट विल्कुल अपनी मेहनत के दम पर ही दुनियाँ के सबसे अमीर एवं बेहतरीन खिलाड़ियों की सूची में थे।वे अपने फॉलोअर्स के ‘वैचारिक-मन’ में सदैव रहेंगे।

“सिरोस्की-एस-76 B ” के क्रेस होने का .. ये हादसा और अधिक ह्रदय विदारक इसलिए भी हो गया। क्योंकि उस वक्त उसमें कोबी ब्रायंट के साथ उनकी 13 वर्षीय बेटी “जिआना” भी थीं। गौर कीजियेगा वे ख़ुद अपनी बेटी के कोच थे। उस दिन वे एक कोच की हैसियत से अपनी बेटी को मैच खिलाने के लिए केलिफोर्निया ले जा रहे थे।
हालांकि कोबी, 38 वर्ष की उम्र में, 2016 में ही खेल-जगत से सन्यास ले चुके थे। जब हादसा हुआ तब वे 41 वर्ष के थे।

“पूर्व-निर्धारण-व्यवस्था” ..P.D.S. अर्थात (PRE-DESTINED-SYSTEM) के अंतर्गत हुए हादसे ‘कर्मयोगियों से सिर्फ उनका “स्थूल-शरीर” ही छीन पाते हैं और कुछ नहीं। क्योंकि लोगों के साथ उनके द्वारा की गयी अच्छाई-भलाई और मेहनत से मिली सफलताएं एवं कीर्तिमान जिन्हे वे स्थापित कर देते हैं, वे तो उनके बाद भी उसी जगह स्थापित रहते हैं। और जब तक ये दुनियां है वे हमेशा स्थापित रहेंगे। जिस ‘कर्म’ के लिए पूरी दुनियाँ उनका लोहा मान चुकी है। वो पूर्ण स्थाई है। इंग्लिश के एक महान कवि Mr. जॉन मिल्टन ने बड़े दावे के साथ कहा था कि..एकदिन मैं स्थूल-शरीर में इस दुनियाँ बिच नहीं होऊंगा.. लेकिन यदि मेरे विचार में दम है, तो ‘वैचारिक-रूप’ (Thought-Form) में मैं, लोगों के ज़हन में सदैव रहूँगा।

अर्थात उनका कहना था कि “दुनियाँ में सिर्फ दो ही चीज ‘परमानेन्ट’ हैं।..बाकी सब.. ‘टेम्परेरी’ है।

नंबर-01 व्यक्ति का “विचार”

नंबर-02 उस वैचारिक धरातल पर खड़ा किया गया उस ‘विचार’ का “मूर्तरूप”।

दुनियांभर की तमाम भौतिक चीजें, एवं व्यक्ति सभी क्षण-भंगुर हैं, मग़र अफसोस !! फ़िजूल की चीजों को जुटाने में हम अपनी पूरी ज़िन्दगी खपा देते हैं।

सवाल गम्भीर है ? चिंतन की दरकार है।

धन्यवाद👍
विचारक: योगेन्द पचहरा,जैन इंटर कॉलेज से..
Contact No.
7830743731

21- “सिला-रहमी”

सिला-रहमी अर्थात एक दूसरे की खैर-खबर लेते रहना..मेरा ऐसा मानना है कि, अपने दैनिक जीवन में “सिला-रहमी” को तरज़ीह देना जीवन की क्षण भंगुरता के लिहाज़ से बहुत आवश्यक है।

कर्मयोगी पुरुष अक्सर परिभाषित करते आये हैं.. और वो एकदम ठीक ही है कि..प्रत्येक जीव अपने पूर्व एवं जीवन के वर्तमान समय में किये हुए कर्म के आधार पर मिले “कर्मफल” के ही अनुरूप अपने-अपने भाग्य का “पाता एवं खाता” है।

दुनियाँ में सभी पूर्व संस्कारवश एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। केवल अपने उन्हीं अधूरे संस्कारों को पूरा करने के लिहाज़ से छोटी से लेकर बड़ी.. अर्थात प्रत्येक घटना… “पूर्व-निर्धारण-व्यवस्था” (Pre-Destined-System) के तहत अपने-अपने वक्त आने पर समयानुकूल घटित होती रही हैं। और आगे भी होती रहेंगी।

शुद्ध एवं सरल जीवन जीने वाले लोग अपने जीवन के अनुभव के आधार पर ख़ुद के, अंतर्ज्ञान (Intutions) जो किसी भी घटना से पूर्व में आभास होने की दस्तक देते है। उससे थोड़ा बहुत सचेत होकर अपने स्तर से बचाव का हम ‘एक प्रयास’ जरूर करते है, वरना दुनियाँ में सब कुछ अपनी गति से ही घट रहा है।

मैं, इसे रामायण के एक प्रकरण की सहायता से स्पष्ट करूँ तो ये मंज़र उस दौर का है.. जब मुनि वशिष्ठ भरत, को उनके बड़े भाई राम के वन जाने पर उन तीनों को अयोध्या लौटा के लाने की ज़िद पर समझाते हुए कहते हैं कि….

“सुनहुँ भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि,लाभ,जीवन,मरण,यश,अपयश विधि हाथ।।”

मनुष्य-जीवन के पूरे के पूरे छहः बड़े विभाग ईश्वर ने ख़ुद अपने पास रखे हैं।
जो दुनियाँ की “पूर्व-निर्धारण व्यवस्था” को ही बल देते हैं।

इसलिए जब तक ईश्वर कृपा से मनुष्य के पास वक्त है। यहां मैं ऐसा सोचता हूँ..उसे सभी लोगों के साथ “सिला-रहमी” रखते हुए जीवन को आनन्द के साथ जीते रहना चाहिए न कि वेबजह की उलझनों में फँस कर जीवन को ढोना चाहिए।

युग,पचहरा देश-विदेश में रह रहे..अपने सहस्रों प्रबुद्ध एवं नीर-क्षीर विवेकी पाठकों का हृदय से आभार प्रकट करते हैं। धन्यवाद👍
Contact No.8006943731

20-सदैव “सेहतमंद”रहें…

Q.- ज़रा विचार करें मनुष्य के खुश होने का सही क्राइटेरिया..क्या है..?

Ans.- अमूमन एक ही जवाब है.. कि इंसान की “सेहत का अच्छा” होना ही प्रसन्नता का सही क्राइटेरिया (Criteria) है।..
बात एकदम ठीक भी है। जब सेहत ही ठीक न होगी तो..सब कुछ बेकार है.. बड़ा-घर , गाड़ी-घोड़ा नौकर-चाकर आदि ये अपार सुविधाएं इंसान की खुशी का क्राइटेरिया तो नहीं है।
इसीलिए यदि आप जीवन को मेरे नज़रिए से देखें, तो इंसान की खुशी “Well-Being”अर्थात “सेहतमंद” होने में ही है। इसीलिये ये निम्न चार बातें मेरे ख़्याल से बेहद जरूरी हैं ; —
No.1 खाना प्रॉपर लें।,
No. 2 नियमित एक्सरसाइज करें।,
No. 3 स्लीपिंग यानि नींद भी प्रॉपर लें,
सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है..
No.4 फ़ुर्सत के पल (Leisure- Moments..) आज ये बेहद “अहम वक्त” लोगों के जीवन से तक़रीबन ग़ायब सा ही हो गया है।
कभी-कभी तो मुझे समाज के मौजूदा हालातों को देख कर बड़ा… ही दुःख होता है। कि आज का इंसान बचपन में पढ़ी हुई उस.. हैनी-पैनी & डकी-लकी वाली कहानी की तरह “Sky is falling..run-run sky is falling..” जैसी बे-वजह की “भागमभाग” में पड़ गया है.., और वाक़ई दुनियाँ के अधिकांश लोग उसी अंदाज में भाग रहे हैं…,पता नहीं वे कहाँ जा के रुकेंगे..और लग रहा है।कुछ तो रुकेंगे भी नहीं। इसी “भाग-दौड़” में अपने आनंदमयी जीवन को जीने के बजाय ढोने जैसे हालात बना लेते हैं।
इस लेख के माध्यम से दुनियाँ के सभी लोगों से बड़े अदब के साथ मेरी एक गुज़ारिश है।। कि “काम” आप चाहे जो भी करें..मग़र अपनी दिनचर्या में “Leisure-Time” को जगह अवश्य देनी चाहिए। वरना ‘सेहत’ गयी तो सब कुछ होते हुए.. भी आपके हाथ कुछ भी नहीं लगेगा।
किसान,मजदूर,दुकानदार,नौकरी-पेशा आदि लोग.. किसी भी रूप में आप अपनी जीविका चलाते हों ..चाहे थोड़े समय के लिए ही सही। सभी को “फुर्सत के पल” अवश्य बिताने चाहिए। जिससे स्ट्रेस, टेंशन,डिप्रेशन आदि परेशानियों से ख़ुद को दूर रख सकें।
ध्यान दीजिए, दुकान पर बैठना,शॉपिंग करना ये कोई Leisure-Time नहीं है।
जैसे;- मैं शिक्षक एवं विचारक अपनी स्वेच्छा से हूँ। और ये भी सत्य ही है कि क्लास में अपने स्टूडेंट्स के बीच लेक्चर के दौरान सदैव बहुत Enjoy भी करता हूँ। लेकिन..प्रबुद्ध-वर्ग की राय के मुताविक मेरे लिए भी वो Leisure-time नहीं कहा जाएगा।.. वैसे भी स्वाभाविक है। ड्यूटी टाइम Leisure Time तो नहीं हो सकता।
दरअसल Leisure-Moments यानि फुरसत के पल वो होते हैं जिनके लिए कोई एजेंडा न हो। एकदम Freeness in the mind..पूरी तरह “फ़ुर्सत में “..
इसे ठीक से स्पष्ट करने के लिए मैं आपको कुछ दशक पीछे ले जाना चाहूंगा। पहले गांवों में कई एक खास मौजूदा जगह ऐसी हुआ करती थीं। जहां घरों के सामने चौपाल पर या किसी अहाते में चारपाइयाँ या मूड़े या कहीं कहीं कुर्सियां अक्सर पड़ी रहा करतीं थीं। लोगों को “आओ-बैठना” देने के लिहाज़ से औऱ वहां सभी वर्गों के लोग बिना किसी संकोच के ,बिना किसी मक़सद(एजेंडा) के रोजाना पहुंते। और आपस में एक दूसरे की “खैर-ख़बर” लेते। मैंने अक्सर देखता है।लोगों की बहुत सी समस्याएं तो वहां बैठकर आपसी बातचीत में ही सुलझ जाया करतीं थीं। घण्टों वहां गपसप-कहानियां,किस्से आदि होते रहते थे। जिससे सब दिमांगी तौर पर एकदम Re-charge से हो जाया करते थे। आज मेरे अन्तर्मन की चिंता यही है। कि वो फुरसत के पल ( Leisure-Moments ) आज कहीं खो गए हैं=?
लेकिन आप ताज्जुब करेंगे..न केवल हमारे देश की संस्कृति एवं सभ्यता को पश्चिमी देश दिल से अपना रहे हैं,अपितु हमारी बहुत सी सामाजिक-व्यवस्थाएं आज वहां के समाज में देखी जा सकती हैं। मग़र तेजी से बदलते हुए भारतीय समाजिक-ढांचे एवं हमारे बड़ों का युवाओं के साथ “कम्युनिकेशन-गैप” भी नई-पीढ़ी का अपनी समाजिक-व्यवस्थाओं के प्रति बेरुखी के पीछे एक बहुत बड़ा कारण है। वो उन व्यवस्थाओं के बारे में जानें भी तो कैसे…?
जबकि हमने सदैव ये सुना है कि पश्चिमी देशों में लोगों की लाइफ बहुत .. Calculated होती है।मग़र फिर भी वहां के लोग अपने निर्धारित व्यस्ततम समय में से कुछ “फुर्सत के पल” आवश्य निकाल लेते हैं क्योंकि वे इसकी अहमियत समझते हैं। जैसे..म्यूजिक Programmes, कैफे में बैठ कर आपस में बात करना।या बच्चों के साथ सैर-सपाटे पर निकल कर आदि तरीके से Leisure-Moments में एन्जॉय करना आदि उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।
आज हमारे देश के लोगों की दिनचर्या में भी इसकी बहुत कमी महसूस की जा रही है। इसलिए मेरे विचार से “well being” को तरज़ीह देने की महती आवश्यकता है।
सभी प्रबुद्ध पाठकों को इसे “पढ़कर अपनी दिनचर्या में स्थान देने” के लिए

; युग, पचहरा आपका दिल से आभार प्रकट करते हैं।
(विनम्रता के साथ एक अपीलीय विचार)
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