19-“बड़ा-कौन=?”…

ये हिंदुओं के महान ग्रंथ”श्री रामायण जी” का ही एक बड़ा रोचक एवं प्रेरणा दायक वृत्तान्त है। आशा करता हूँ आपको जरूर पसन्द आएगा…
महोदय, ये मंज़र उस वक्त का है। जब महाराज दशरथ, अपने चारों पुत्रों को लेकर राजा जनक के दरवाजे पर पहुँचते हैं।…
तब राजा जनक अयोध्या से आने वाली बारात की तैयारियों में व्यस्त थे।मग़र जैसे ही उन्हें,बारात के अगमन की सूचना मिली,तो वे बेहद खुशी से बारात के समीप पहुंचे।और बहुत ही सम्मानजनक तरीके से सम्पूर्ण बारात का स्वागत किया। उसी बीच अचानक राजा दशरथ ने पूर्ण श्रद्धा-भाव से आगे बढ़कर जनक जी के चरण छू लिए। जनक जी एकदम से सहम गए। और उन्होंने दशरथ जी को थामते हुए कहा,..महाराज!आप हर रीति से बड़े हैं। दूसरे आप “वरपक्ष” वाले हैं। ये उल्टी गंगा क्यों बहा रहे हैं=?
इस पर दशरथ जी ने जनक जी के साथ-साथ वहाँ पर उपस्थित सारे समाज को.. (और दरअसल देखा जाए..तो आज उनके इस वृतान्त ने हम सब को भी एक सीख देने का काम किया है।) .. कहा।
महाराज जनक ! एवं यहाँ उपस्थित समाज ! मुझे बताए कि…
जब सदैव से “वरपक्ष” याचक की भूमिका में है।,तो फिर बड़ा कैसे हो सकता है..?
जबकि आप और हम देखते चले आ रहे हैं कि ” कन्यांपक्ष ” सदैव से “दाता” है।
अब सवाल ये है कि ‘याचक’ और ‘दाता’ में “बड़ा-कौन” =?
दशरथ जी ने कहा.. जनक जी “उल्टी गंगा… मै, नहीं ये आपका भटका हुआ समाज न जाने कब से इस “गंगा को उल्टी बहाता हुआ..” चला आ रहा है। सौभाग्य बस आज ही तो मेरे पास ये मौका है इस ग़लत परम्परा सीधी करने का..।
यहां पर अब मुख्य बात ये है कि जब “वर-पक्ष” आपकी “कन्या” को सहर्ष पसन्द कर लेता है। उसके बाद ही ससम्मान शादी करके ले जाता है। वो भी इस वादे के साथ कि ….

“आज के बाद आपकी बेटी की सारी जिम्मेदारियां..सुख-दुःख, हारी-बीमारी, इज्जत-सम्मान सब की रक्षा आदि..सभी बातें.. “वर-पक्ष” के परिवार..और विशेष कर उस वर को निर्वहन करनी हैं।जिस के लिये वो विवाह हो के आयी है।”
” कन्यां-पक्ष ” जिस श्रद्धा-भाव से अपनी बेटी को पाल-पोशकर,पढ़ा-लिखाकर उसकी इज्जत-सम्मान आदि की रक्षा करते हुए शादी-योग्य करके अपने “कलेजे के टुकड़े”, को सृष्टि को आगे बढ़ाने की परम्परा निभाते हुए..न केवल सम्पूर्ण समाज एवं ईश्वर को हाज़िर -नाज़िर मानकर अपितु मनुष्य-जीवन का एक आवश्यक संस्कार होने के नाते.. वह “वर-पक्ष” को ससम्मान, सौंप देता है। कन्या के माता-पिता के लिए क्या.. ये कम बड़ी बात है=? जो समाज के लोग ग़लत परम्परा को बढ़ावा देकर…सदैव से उसे हर मौके पर “छोटा”(तुच्छ) होने का अहसास कराते रहे हैं। कम से कम प्रबुद्ध-वर्ग को तो इस “कृत्य” पर अवश्य ही शर्म.. आनी चाहिए।
यहाँ पर मेरा ख़ुद का ऐसा मानना है। कि..प्रत्येक बेटी के भाग्य में “पिता” तो अवश्य होता है। मग़र ये जरूरी नहीं..कि हर पिता को “बेटी” नसीब हो। लेकिन प्रबुद्ध-वर्ग के लिए इस लेख में एक सन्देश जरूर छुपा है… कि “बेटियों” के मामले में कभी भी अपना पराया न देखें ,चाहे बेटी किसी की भी हो .. स्वयं तो सदैव उसे सम्मान और इज्ज़त दें.. ही। अगर आपको उनके साथ कोई अनहोनी होने की दस्तक महसूस भी हो.. तो ईश्वर को हाज़िर-नाज़िर मानकर तत्काल एक “धर्म-पिता” की भूमिका में दुरबुद्धियों से उनकी इज़्जत और सम्मान की रक्षा करने में अपने मन में विल्कुल भी संकोच न लाएं।
इस वृत्तान्त को पढ़ने एवं समझने के बाद “दाता और याचक” में कौन बड़ा है =?
तब दशरथ जी ने कहा, अब जनक जी बताईये मैं आपके चरण क्यों न छुऊँ..?
इस सुखद मंज़र में अपने होने वाले सम्बन्धी श्री दशरथ जी के ऐसे शुद्ध एवं क्रांतिकारी विचारों को सुनकर.. जनक जी के नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली..
इस पर मैं तो यही कहूँगा कि ..
“भाग्यशाली हैं वो.. जिनके घर कम से कम एक बेटी अवश्य होती है।और सौभाग्यशाली हैं वो..जिन्हें श्री दशरथ जी जैसे निःस्वार्थ विचार वाले “वरपक्ष” के पिता अपने ‘बड़े भाई के रूप’ में मिलते हैं।
धन्यवाद।
विचारक:

युग,पचहरा
जन्मभूमि ; नीमगाँव,राया,मथुरा 8006943731

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