
(Update & upgrade with this Modern-Thought : YUG,Pachahara)
पारिवारिक उन्नति के लिए प्रत्येक माता-पिता के घर में कम से कम एक “सुसंतान” औलाद का होना लाज़मी है। ये कॉमन सा कथन सामान्य लोगों के जहन में एक सवाल को जगह देता है।..
औलाद : बेटा या बेटी..?
“यूनिक फैमिली” तो ‘एक बेटा और एक बेटी’ वाले परिवार को ही कहा गया है। जिसमें न केवल परिवार अपितु सृष्टि भी सन्तुलित रहती है। दूसरे परिवार से एक बेटा दामाद के रूप में लेते हैं और उन्हें पुत्र बधू के रूप में एक बेटी देते हैं। ठीक वैसे ही अपने बेटे के लिये एक लडक़ी.. पुत्रबधू के रूप में अन्य परिवार से लेते हैं।
लेकिन इतिहास साक्षी है..प्राचीन समाज में अधिकतर लोगों के मन में “पुरुष-प्रधानता” घर किये हुई थी। जिस के कारण मानसिक-स्तर से अति-पिछड़े ,दकियानूसी विचार-धारा वाले लोग भारतीय समाज में एक-आद किसी कोने में अभी भी मिल जाते हैं। हालांकि पहले की तुलना में आज नई पीढ़ी में जो “माँ-बाप” बन रहे हैं वे आधुनिक विचारों से काफी अपडेटेड हैं।…
इसलिए सन्तान या औलाद में Male-Female doesn’t matter. क्योंकि सृष्टि को आगे बढ़ाने में दोनों का विल्कुल बराबर का हाथ होता है। तो बेटे-बेटी को यूं अलग-अलग तराजू में तोलना बन्द करें। बहुत हो चुका..अर्थात दोहरी-मानसिकता रखने वालों के दिन अब लद गए… मैं तो उन्हें यही परामर्श करूंगा.. कि अपना बुढ़ापा खराब नहीं करना हो,तो वे समय रहते सम्भल जाएं।
“सन्तान” कोई भी हो ‘बेटा या बेटी’ मैं देख रहा हूँ आज के ‘युवा-दम्पतियों’ पर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। हाँ पुराने विचार की बुजुर्ग पीढ़ी के कुछ लोग जरूर मौका पाते ही अभी भी घर के अच्छे भले वातावरण में जहर घोलने से बाज नहीं आ रहे..।
मग़र असल सवाल तो बच्चे के पालन-पोषण का होता है। कि उसे “परवरिश” कैसी..दी गयी है=?
ये “परवरिश” ही वो चीज़ है। जो एक सामान्य से बच्चे को भी… “सुपात्र-सन्तान” (सु-सन्तान) का आकार दे-पाती है।
अध्यात्म की दृष्टि से “नियति” के अनुसार माता-पिता एवं संतान दोनों ही एक-दूसरे को सौभाग्य एवं संस्कारों के अच्छे संश्लेषण से मिलते हैं। लापरवाही से पैदा किये हुए सौ “कुपात्र-बच्चों” से… एक “सुपात्र-सन्तान” हमेशा अच्छी होती है।
ये सर्व-विदित है कि अकेला चाँद पूरी दुनिया का अंधेरा मिटा देता है। जबकि हमारी आंखों के ही सामने “उसी-अंधेरे” को असंख्य तारे नहीं मिटा पाते।
माँ-बाप के ‘कलेजे’ को सुपात्र-सन्तान के “अच्छे-कर्मों ” से जितनी ‘ठंडक’ पहुंचती है। दुनियां की दूसरी कोई चीज़ उतना सुकुन नहीं पहुँचा पाती।
इसलिए यहां “नव-दम्पत्तियों” को एक सीख लेना नितांत आवश्यक है। कि उनके घर में सन्तान पैदा होते ही उनमें “सन्तान-धर्म-पालन” का उत्तर-दायित्व स्वतः ही आजाना चाहिए।
एक और बात, कुपात्र-बच्चे परिवार का ही नहीं,सम्पूर्ण समाज व राष्ट्र के लिए भी कष्टदायी होते हैं।
दूसरे , उनके ग़लत क्रिया-कलापों को जानने और समझने के बाद भी मां-बाप की तरफ से उन्हें सपोर्ट या आश्रय मिलते रहना…मेरी नज़र से इसे परिवार-द्रोह, समाज-द्रोह या राष्ट्र-द्रोह भी कह दिया जाय.. तो भी कोई ग़लत नहीं होगा। क्योंकि भारत में जन्म लेते ही कानूनन हर व्यक्ति देश का नागरिक होता है। इसलिए भारत-भूमि पर जन्मे प्रत्येक “बच्चे” की पहली जिम्मेदारी अपने परिवार के साथ-साथ देश के लिए एक अच्छा नागरिक बन के तैयार होने की भी है। और जिस भू खंड का खाते हैं उसके लिए सदैव सच्चे-भाव रखने की भी।
जबकि कुछ ही अच्छे सुसंस्कृत एवं संस्कारयुक्त नागरिक होते हैं। जोअपने वंश के साथ-साथ देश का परचम पूरी दुनियाँ में लहराते हैं।
किसी भी महिला के लिए “स्त्री-धर्म” की सफलता.. अच्छी सन्तान की “माँ” कहलाने में है। न कि कई बच्चों की सिर्फ जननी बनने में..?
सपूत या फिर सपूतनी जैसे; लक्ष्मीबाई, मदर-टेरिसा एवं मीराबाई आदि ये वो “सु-संतान” हैं। जो पूरी दुनियाँ पर अपना लोहा मनवा चुकी हैं। ऐसे चरित्रों की हमारे इतिहास में भरमार है। जो न सिर्फ अनुकरणीय हैं,अपितु हमारे लिए वंदनीय भी हैं।
इसलिए आज के दौर की महती आवश्यकता है। कि सम्पूर्ण परिवार,समाज और फिर देश न केवल अपने मानसिक-स्तर को उठाएं अपितु उसमें मानव-मूल्यों एवं नैतिक-मूल्यों को जगह दें। ऐसा करने से केवल पारिवारिक स्वर्ग ही नहीं सम्पूर्ण कायनात में स्वर्ग स्थापित हो जायेगा।
जय हिन्द! जय भारत!
धन्यवाद।
विचारक; युग पचहरा
Contact No. 7830743731
Excellent thinking!
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