15- “श्रेय और प्रेय”

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने पर मनुष्य सृष्टि के आरम्भ से ही “श्रेय और प्रेय” के दो-राहे पर खड़ा है।

हालाँकि, इन दोनों में से किसी एक राह पर,तो चलना ही है…

सामान्य भाषा में ‘श्रेय और प्रेय’ जैसे शब्दों का सरलीकरण किया जाय तो,
दरअसल, ‘श्रेय’ का अर्थ है : ‘कल्याणकारी’ अर्थात पहले परिश्रम बाद में आनन्द मय जीवन।
उसी प्रकार इसके एकदम विपरीत है ‘प्रेय’ का अर्थ : ‘कष्टकारी’ जिसमें पहले आनन्द और बाद में दुःख ही दुःख। इसे

और अधिक स्पष्ट किया जाय तो..

“श्रेय-मार्ग” पर चल कर व्यक्ति दिन प्रतिदिन ईश्वर के समीप पहुंचने का प्रयत्न करता है।

जबकि प्रेय : के वशीभूत लोग दिनों दिन ईश्वर से दूर सांसारिकता की गुत्थियों में उलझते चले जाते है।

ये बात जग ज़ाहिर है..कि संसार में अपार दुःख है। इसीलिए संतों की भाषा में संसार को दु:खालय कहा जाता है। लेकिन उसी क्षण तक दुःख है जब तक कि आप “संसारी” हैं।

जैसे ही आसक्ति की जगह आपमें निरासक्त का भाव जागृत हो जाता है बस उसी क्षण आपके सारे दुःख छूमंतर हो जाते हैं।

अब फैसला आपके हाथ में है कि इन “दो-राहों” में से आप चुनते क्या हैं..??

जो ‘आत्मा का सुख’ चाहता है वो “श्रेय” और जो ‘इन्द्रिय-सुख’ (शारीरिक-सुख) चाहता है वो “प्रेय”..के वशीभूत होता चला जाता है।

कहना न होगा कि, संसार में जीने के ये दो तरीके हैं। इसलिए जीवन किसी एक अंदाज में तो जीना ही होगा।

इसीलिए स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा का प्रथम सोपान “मन पर नियन्त्रण ” को बताया है (Control of the Mind) क्योंकि इस “चंचल मन” को आप कभी खाली नहीं रख सकते। मन का तो स्वभाव है। वो तो हर पल कार्य करेगा। अगर आप सदमार्ग “श्रेय” की ओर ले जाने में असमर्थ रहते हैं, तो स्वाभाविक है “प्रेय” जो आउट ऑफ ट्रैक है। उधर तो व्यक्ति जायेगा ही।

सभी धर्म-शास्त्र कहते हैं कि इस “मानव देह” के समान दुनियाँ में कोई ‘दुर्लभ’ वस्तु नहीं है।। मग़र मनुष्य इसे भूला हुआ है।

शंकराचार्य जी ने कहा हैं कि तीन चीज़ ईश्वर की कृपा से मिलती हैं।
1- मनुष्य का शरीर
2- श्रेय-मार्ग की भूख (आत्मा के लक्ष्य “आनन्द” को पाने की पिपासा)
3- प्रबुद्धजनों का साथ (सु-संगति)

अगर लोगों की सोच के धरातल पर विभाजित होते मानसिक-स्तर पर ..मै प्रकाश डालू तो हमारे देश ही क्या.. पूरी दुनियां में
लगभग 11 धर्म हैं जो प्रचलन में हैं…अर्थात चल रहे हैं।

जैसे;-जापान में..

1-शिन्तो धर्म,

उसी प्रकार चीन में दो धर्म ..

2/अ- ताओ या लाओत्सी और 3/ब- कन्फ्यूशियन धर्म,..और दुनियाँ के शेष आठ धर्मो में से भारत में तो सभी धर्मों के लोग रहते हैं..

4-यहूदी धर्म, 5-हिन्दू-धर्म, 6-क्रिस्चियन-धर्म,7-सिक्ख-धर्म, 8-बौद्ध-धर्म,9- पारसी-धर्म, 10-इस्लाम-धर्म,11- जैन-धर्म।.. लेकिन ध्यान दीजियेगा ये 11 धर्म इन प्रमुख दो ” श्रेय और प्रेय ” के अंतर्गत ही आते हैं।

मग़र इस दुनियाँ की विडम्बना यही है..कि सम्पूर्ण आबादी में से अधिकांश 80% लोग जो पूर्ण रूप से भौतिकवादी हैं। वे “प्रेय मार्ग” की ओर ही जाते हैं। क्योंकि लोग Soul-Conscious होने की बजाय सिर्फ Body-Conscious हो के रह गए हैं।

हिंदुओं के धर्म-ग्रन्थ “रामायण” में लिखा है..कि
” बड़े भाग्य मानुष तन पावा, सुरदुर्लभ सद्ग्रंथनि गावा।”

जब ये मनुष्य शरीर बड़े “भाग्य” से मिलता है… तो सवाल उठता है.. कि ये भाग्य क्या है..? भाग्य: माने अपने ” ख़ुद के कर्मों से निर्मित प्रारब्ध ” अर्थात अपने ही पूर्व जन्मों की कमाई से आत्मा से अटैच्ड प्रारब्ध नाम का एक “शेष खाता” होता है। जैसा कि कर्मयोग में श्री कृष्ण ने भी कहा है…कि जब तक उसका हिसाब चुकता नहीं हो जाता प्रत्येक जीवन में जन्म-जन्मांतर तक ये जीव के साथ चलता है। परन्तु यहां आकर बहक मत जाइएगा.. मुख्य पहलू को पकड़ियेगा ,चाहे ईश्वर दे, चाहे कोई और..हमारी कमाई है “कर्म”..

हाँ! “वह कर्म” जरूर आपकी ही कमाई है। मग़र वो कमाई अपने आप तो “फल” नहीं बन जाती। अभी तो वह कर्म..” जड़ रुप “में हैं। जब तक ईश्वर उस कमाई को अपने संज्ञान में लेकर.. अर्थात आपके “कर्म,अकर्म एवं विकर्मों का उचित-अनुचित की दृष्टि से आंकलन नहीं कर लेते.. तब तक “वह कर्म” जड़ से “फल” नहीं बनता। तो फिर जीव को नया शरीर मिलेगा कैसे..? और ऐसा कहा जाता है कि, ये सारी मेहनत ईश्वर को किसी भी जीवात्मा के “शिशु ” रूप में माता के गर्भ में आने के पूर्व ही करनी होती है।

इस सब के लिए क्या ईश्वर किसी से कोई मेहनताना लेते हैं। मग़र यहां गौर करने वाली बात ये है। कि “ईश्वरीय कृपा ” और “मनुष्य का कर्म” दोनों अनिवार्य होने के साथ-साथ उनके प्रति उचित निर्णय भी आवश्यक है।

अगर ऐसा नहीं होता तो.. ईश्वर को तो सब पर कृपा कर देनी चाहिए थी=?
मनुष्य शरीर बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन “क्षणभंगुर” (Ephemeral) है।भौतिक दृष्टि से कहा जाय तो ये सबसे बड़ा दोष है।

मनुष्य जीवन में इस शरीर की क्षणभंगुरता ही सबसे बड़ी गड़बड़ी है।

मग़र आज का इंसान इसी से बेखबर भी है। जो आज का विचारणीय बिंदु है।

“वेद” कहता है।कि कोई भी बेटा,बाप के लिए कुछ नहीं करता। और कोइ भी बाप, बेटे के लिए कुछ नहीं करता। व्यक्ति इस तथ्य की गहराई को न समझ पाए वो अलग बात है। अगर इस तथ्य को मैं Spiritual-angle से स्पष्ट करूँ तो ….
प्रत्येक मनुष्य इस दुनियाँ में अपने ख़ुद के “स्प्रिचुअल-दिव्य-आनन्द” के लिए ही प्रयत्नशील है। वह वही करने में रुचि लेता है। जो उसे खुद अच्छा लगता है। ज़रा आप भी इस तथ्य पर थोड़ी देर के लिए चिंतन में जाइएगा..और सोचिएगा..कि,

आप लोग जितने रिश्तों में प्रेम करते हैं , ..जैसे;

माँ, बाप, बेटा, बेटी, पति, पत्नी,भाई, बहन..में क्यों करते हैं..? सिर्फ “अपने सुख ” रूपी वस्तु के लिए। उनके “सुख” के लिए तो कतई नहीं।

“वेदों” में कहा गया है। कि संसारी व्यक्ति को अपने से प्यार है। इसीलिए वो संसारी है। जब वह दूसरे के सुख में अपना सुख ढूंढ़ने लगेगा तभी वह सही रूप में “आत्मा-भिमानी ” बन पायेगा।
मग़र एक तरफा नहीं चलेगा..जैसा चल रहा है। ये जग ज़ाहिर है कि मनुष्य को अपने प्रति अनुकूलता में प्यार है। तो सब कुछ ठीक है। जैसे अपने मन के ही विपरीत स्थिति होती है..तो लोग झगड़ने लगते हैं…यहाँ तक है कि कुछ तो आपे से इतने बाहर हो जाते हैं कि गोली तक मार देते हैं चाहे कोई भी रिश्ता हो…तो फिर कहाँ है दूसरों में आनन्द/सुख..?

सभी रिश्तों एवं वस्तुओं से इंसान खुद ही लाभ चाहता है। बड़े बुजुर्ग ठीक ही कहते हैं कि “स्वारथ लाभ करहिं सब प्रीती…” जबकि आप समझते हैं कि मैं एक आत्मा हूँ।और ये संसार मैटेरियल है। और मैं स्प्रिचुअल हूँ..दिव्य हूँ। ईश्वरीय अंश हूँ। इसलिये मेरा सुख तो मेरे उस अंशी (ईश्वर) में ही होगा। क्योंकि मैं “परमात्म-आभिमानी”

(God-Conscious) हूँ। ये संसार तो इस पंचमहाभूत शरीर को चलाने के लिए है। न कि इसमें उलझने के लिए.. जिस प्रकार छोटे बच्चे को टॉयज मन बहलाने के लिए दिए जाते हैं न कि पूरे जीवन के लिए।

ठीक वैसे ही मनुष्य के लिए.. संसार है। लेकिन उस भव-सागर से पार उतरकर आत्मिक रूप में परिवर्तित होकर “श्रेय” की ओर जाना है। न कि “प्रेय” के वशीभूत हो जीवन के असल ध्येय से भटक जाय।

ये बहुत अजीब सी सच्चाई है। मग़र यही अध्यात्म है। और ये ही दुनियाँ का सच भी।

धन्यवाद👍
; युग,पचहरा,

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