9- “Om Govinday Namo Namah”

Om Krishnay…. Govinday Namo Namah… I pray to My Lord ,You are the well-wisher of the entire human society and whole universe for perfect human society there must be protection of “Gau-Mata” & her cubs. When the demoniac give too much trouble to the cows and birds & another animals..In this situation..I pray to You..(KRISHNA) come on..To re-establish religious principales…As You have said in “Bhagavad-Gita”…………”Yada yada hi Dharmasya.Glanir Bhavati.. Bharat Abhyutthanam Adharmasya..Tadatmanam Srijamyaham”………………………. ” Whenever and wherever there is a decline in religious practice, O descendant of Bharat, and a predominant rise of irreligion—at that time I descend Myself.” Now in the present age, Kaliyug , people are very much sinful and are consequently suffering on large-scale. Therefore Krishna has incarnated in the form of His name,as found in the Maha-Mantra..Hare Krishna,Hare Krishna,Krishna-Krishna,Hare Hare/Hare Rama,Hare Rama, Rama-Rama,Hare Hare….My Lord Krishna’s smile was as enchanting as His glorification, responded by smiling , and His smile engaged in trying to Lord it over the material-world,are also enchanted by My Lord’s mystic-Powers, but His devotees are enchanted in different way by glories of Lord. Thus all the devotees worship the Lord by chosen words. No amount of chosen words are sufficient to enumerate the Lord’s glory,yet He is satisfied by such prayers,just as a father is satisfied even by the broken linguistic attempts of a growing child.Thus It’s my belief that my Lord would smile and accept my prayer..;-

Pachahara, Yug.., contact No. 8006943731

8-आलोचक या शिक्षक

मनुष्य का स्वभाव है.. प्रशंसा की तरफ आकर्षित होना, और आलोचकों से दूर भागने का। क्योंकि डांटने वाले शिक्षक को बच्चे कम ही पसन्द करते हैं। उसी प्रकार निष्ठुर अधिकारी का भी लोग सहयोग नहीं करते। जिसका पड़ोसी आलोचक हो…वह सदा अपने को दुखी महसूस करता है। वो इसलिए कि प्रत्येक की मानसिकता है। कि उसकी..प्रशंसा हो। ये “सामान्य जन” का स्वभाव है। जो काफ़ी हद तक सत्य है। मग़र आप देखिए….और हो सके तो इतिहास के पन्नों को उलटिये…तो आप एकदम इसके विपरीत पाएंगे..हिंदी में एक कहावत भी है।….
” निंदक नियरे राखिये आंगन कुटी छवाये। बिन पानी ,साबुन बिना उजरा करे सुभाय।।” अर्थात यदि आपको दुनियाँ में ख़ास तरीके से परिभाषित होना है।,तो ‘आम-जन ‘ की “लीक ” से हटके तो चलना ही पड़ेगा। सामान्य स्तर से विशेष’ की ओर निहारना होगा। मेरा मतलव एकदम साफ है। ‘महा-मानव’ या ‘महापुरुष ‘ के रूप में स्थापित कोई यूं ही नहीं हो जाता….? इसके लिये एक अच्छी रणनीति की दरकार तो है ही। मेरे अब तक के जीवन का अनुभव भी यही कहता है.. कि ‘आलोचनाए’ मनुष्य के लिए सदैव ” पथ-प्रदर्शक ” होती हैं।..इसलिए मनुष्य सकारात्मकता के साथ-साथ यदि सहनशील भी है। तो फिर उसके अंदर सारी संभावनाएं मौजूद हो सकती हैं।
किसी ने ये भी कहा है.. कि ” निंदा हमारी जो करे मित्र हमारो सो।…” ….
इसीलिए ये कहना अनुचित नहीं होगा ..कि
“साधना के मार्ग पर ‘साधक’ को एक खूबसूरत मूर्ति बनाने वाला “शिल्पी ” वास्तव में “आलोचक” ही होता हैं। न कि “प्रशंसक”….(इस पर चिंतन करियेगा तो ही ज़हन में ठीक से बैठा पाओगे)
आख़िर में मेरा सभी से यही आग्रह है।कि
“आलोचक” के अंदर छिपे “शिक्षक” को पहचानने के लिए हमें अपने दृष्टिकोण को नेगेटिव से पॉजिटिव करना होगा।.. जो “सुधारात्मक सुझाव” हमें आलोचना लगते हैं। दरअसल वही हमारे लिए हितकारी होते हैं। इस बात को अपनी मानसिकता में बिठाना ही होगा।
यदि सकारात्मक दृष्टिकोण से सोचें,तो जहां तक मैं देख पा रहा हूँ। कि …..
क़ायदे का आलोचक सच्चे अर्थों में एक ” नैतिक चिकित्सक” होता है। जिस प्रकार कोई मरीज चिकित्सक के पास जांच के लिए जाता है। तो वह मरीज के शरीर के अंदर जो-जो बीमारी पाता है। उन्हें वह बड़े अच्छे से बता देता है। वैसे ही तो एक सही आलोचक आपकी “नैतिक” कमजोरियों की ओर संकेत करके आपके “चरित्र का उत्थान “करता है। क्योंकि यदि.. “नैतिकता” का पतन हुआ तो मनुष्य की एक तरह से सामाजिक मृत्यु ही हो जाती है।उसके बाद तो वह सिर्फ जीता ही है। समालोचक रूपी शिक्षक हमारे अंदर छिपी हुई बुराई की तरफ ध्यान आकर्षित कर.. हमें जागरूक बनाता है। जीवन के ऐसे “पथ प्रदर्शक ” को सिर्फ एक निंदक समझना, मेरे ख्याल से तो लोगों की एक बहुत बड़ी ‘ना समझ’ ही है। वास्तव में तो वह एक… नैतिक चिकित्सक /Moral Doctor होता है।
इस विषय को कोई भी हल्के में न लें…इस संदर्भ में समूचे समाज को एक गहन चिंतन की आवश्यकता है।…..
लेखक;-योगेन्द्र सिंह पचहरा (नीमगाँव वाले)
निवासी;- 88A वसुंधरापुरम,हाथरस ।
उत्तर प्रदेश, भारत।
Contact No. 8006943731

7- “गीता विज्ञान से आगे..”

बेशक ऐसा लगता जरूर है कि विज्ञान ने आज बहुत तरक्की कर ली है।हमारे वैज्ञानिक दिन प्रतिदिन कुछ नया ही खोज रहे है। हम देख भी रहे हैं। आये दिन अनेको नई तकनीक स्तेमाल भी हो रहीं हैं।जिससे आज के नव युवक बोलते भी हैं कि हमारा जमाना हर क्षेत्र में काफी उन्नत है।लेकिन अगर आप वास्तव में देखें..तो आज नए अविष्कार कम.. पुराने Develop अधिक हो रहे हैं जैसे.. एडिसन ने “बल्व” का अविष्कार किया था।जिसमें बिजली की ख़पत को बचाने के लिए आज के वैज्ञानिकों ने उसे develop करके ट्यूब लाइट,और एलईडी बल्व तैयार कर दिए। हालांकि ये भी बहुत बड़ा काम है। एक बल्व की बिजली की खपत में अब सारे घर के 10 से 15 तक LED बल्व जल जाते हैं।बहुत बड़ा आर्थिक लाभ है। मग़र कोई ये कहे कि ट्यूब लाइट्स एवं LED बल्व आज के अविष्कार हैं एकदम ग़लत होगा। “बल्व” का अविष्कार एडिसन के ही नाम रहेगा।
इसे ठीक से समझने के लिए हमें लगभग 5000 वर्ष पूर्व घटित हुई घटनाओं के विश्लेषण में जाना होगा। क्योकि “महाभारत” के समय विज्ञान का जो स्तर था वो अभी भी नहीं है। जबकि आज Science & Technology..की बातें बहुत होती हैं।लेकिन काम भी हो रहे हैं.. इससे भी कोई इन्कार नहीं किया जा सकता। मग़र अभी हम विज्ञान के उस स्तर को नहीं छू पाए हैं।जो उस वक्त था।ये बात भी अपनी जगह सही है।
जिस प्रकार Science & Technology आज भौतिकवाद का पर्याय है। ठीक उसी प्रकार हमारे धार्मिक ग्रंथ..जैसे;–रामायण,भगवतगीता,कुरान,बाइबिल एवं ईसाइयों का ‘Sermon on the Mount’ ये अध्यात्म का पर्याय कहे जा सकते हैं।
अब मूल विषय के अनुसार धार्मिक ग्रन्थ जैसे; “गीता ” एवं “विज्ञान” में आज कौन आगे है…=?
इस पर काफ़ी विश्लेषण करने के बाद मैं तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। ,कि गीता – विज्ञान से अभी भी बहुत आगे है।क्योंकि शोध के दौरान हमने पाया। कि गीता व्यक्ति के सभी संशयों का निराकरण करती है।
ये भी गीता का ही ज्ञान था। जिससे अर्जुन का मोह दूर हुआ। आज के विज्ञान पर आत्ममुग्ध इंसान ने जब कहीं थाह पाने की सोची, तो उसे भी आख़िर में इसी ग्रंथ “गीता’ से ही दिशा मिली।
गीता के अध्ययन,वाचन और चिंतन से हमे अर्थात सम्पूर्ण मानव-जाति को इस बात का बोध होता है। कि इस नश्वर संसार में अविनाशी सुख की प्राप्ति कैसे की जा सकती है=?
गीता , मनुष्य के भ्रम और जिज्ञासाओं का समाधान करती है।ये देशकाल आदि सीमाओं से परे है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ।कि आज की सांसारिक समस्याओं का हल भी श्री कृष्ण की अमृतमयी वाणी “गीता” में ही है। कहीं अन्यत्र नहीं है। गीता आकार में बड़ा ग्रंथ तो नहीं है।फिर भी मनुष्य के कल्याण से संबंधित कोई भी प्रश्न ऐसा नहीं है। जिसका उत्तर (समाधान) इसमें न हो। मै देख रहा हूँ। कि आज के समय में “होड़ और विलासिता” लोगों में इस हद तक पहुँच गयी है।कि वे अपने दुःख से दुःखी नहीं हैं। वे दूसरों के “सुख” से…, कहीं अधिक दुखी हैं।क्योंकि आज ये देखने को मिलता है। कि लोगों में “अपनापन” (आत्मीयता) खत्म हो गयी है। मग़र सही सोच रखने वालों के साथ साथ विलासिता से ऊबे हुए व्यक्तियों को भी “शांति” की तलाश.. हो, तो उनके लिए भी गीता में युक्ति, तर्क-संगत-साधन आदि सब निहित है। क्योंकि अध्ययन के दौरान मैने पाया कि ” गीता ” में कहीं युक्ति तो कहीं दृष्टान्त के साथ ..क्यों=? और कैसे=?..
का भी जवाब है। इसमें व्यक्ति को कर्तव्य का ज्ञान जिस तरीके से कराया गया है। वह तो वाक़ई अपने आप में बेजोड़ (Unique) है।
प्रबुद्ध लोग तो यहां तक कहते हैं कि इसके नियमित वाचन और श्रवन से “घोर-पापी” का भी रूपांतरण (Transformation) हो.. जाता है। शायद आपने भी सुना या देखा होगा। कि जब व्यक्ति जीवन के आख़िरी पड़ाव पर अपने विकर्मों को पूरा कर रहा होता है। मतलव मृत्यु के निकट होता है।,तो उसे गीता श्रवन कराया जाता है। वो भी शायद इसी प्रकार का सन्देश देता है।कि..
भगवत गीता न केवल भारत.. वल्कि ये तो विश्व शांति का संवाहक है। वैसे तो गीता का एक एक अक्षर मानव सृष्टि के कल्याण के लिए है।मग़र गीता के बारह वें अध्याय में श्री कृष्ण जी की उदारता..तो देखते ही बनती है।
इस में भगवन ‘जीव ‘ के उद्धार के लिए अत्यंत कटिबद्ध और उत्सुक नज़र आते हैं।ध्यान दीजियेगा ..उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा भी है।..हे मानव! अपना “मन” और “बुद्धि” तू मुझे अर्पण कर ,अभ्यास योग का आश्रय ले। या फिर रोज के रोज रात्रि में सोने से पूर्व अपने दिन भर के सारे क्रिया-कलाप मुझे समर्पित करता जा। तो इतने मात्र से ही तेरा रूपांतरण होता चला जाएगा…और इसी से तेरा उद्धार भी हो जाएगा। विडम्बना वही है कि मनुष्य इतना आसान से काम भी नहीं कर पाता।परन्तु दूसरों के दिखावे के चक्कर में मनुष्य धार्मिकता का नकली चोला पहन कर जिस प्रकार अपने मनुष्य साथियों को शुरू से बहकाता चला आया है।… वही काम वह भगवान के साथ भी करने लगा है।आप ही बताओ फिर ऐसे मनुष्यों का भला हो.. कैसे जाएगा।
इसी 12 वें अध्याय में एक प्रश्न के समाधान की तरफ मैं आपका ध्यान-आकर्षित कराना चाहूंगा। कि..
” भक्त का ‘स्वरूप’ एवं भक्त की ‘अवस्था ‘ क्या होनी चाहिए=?
श्रीमद्भागवत “गीता” के इस अध्याय में इसका तो बहुत ही सुन्दर एवं मधुर वर्णन दिया गया है। जो सम्पूर्ण मानव जाति के लिए अनुकरणीय है। भक्त के लक्षण इस चैप्टर में वर्णित है। वही वास्तव में मानव जीवन की दिव्यता है।इसके अध्ययन के दौरान मुझे ऐसा लगा…कि सम्पूर्ण सृस्टि के प्रत्येक जीव को भगवत गीता के ज्ञान की महती आवश्यकता है।
वर्तमान काल आज मनुष्य की खुद की ना समझियों की बजह से ही “परिस्थितियों का काल” बन गया है। इसलिए अब तो और भी “गीता” की उपादेयता बढ़ गयी है।
वेशक विज्ञान ने हमे काफ़ी चमत्कारिक संस्थान दिए हैं। लेकिन मानसिक तनाव, अशांति ,भय ,रोग,दुर्भावनाएं आदि दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। यहाँ तक है कि हम इतने असुरक्षित हो गए हैं। कि जैसे.. “बारूद के ढेर पर बैठे” हों। अब तो मानव इन परिस्थितियों में ऐसा फँस गया है।कि उसे अब इसका समाधान विज्ञान के पास तो नज़र नहीं आत। इसलिए भगवतगीता सम्पूर्ण विश्व के लिए न केवल शाश्वत शांति का अमोघ साधन है।वल्कि इसका अग्रदूत भी है।गीता में जिस “त्याग” की बात कही गयी है।दरअसल आज के दौर में राष्ट्रीय स्तर पर उसकी बहुत आवश्यकता महसूस की जा रही है। क्योंकि न केवल “त्याग ” के उपदेश से वल्कि इसे जिम्मेदारों के आचरण में लाने से शासन परंपराओं में राष्ट्र के प्रति प्रेम और प्रजा हित की भावनाएं पैदा की जा सकती हैं।
भगवान श्री कृष्ण इस महा ग्रंथ के उपादेष्टा हैं। ध्यान दीजियेगा..तभी तो ग्वाल-वालों के संग “प्रीतिभोज” और निर्धन साथी सुदामा को अपने सिंहासन पर बैठा कर स्वंय उसके चरणों में बैठकर भगवान श्री कृष्ण की “सबको समान” देखने की भावना की एकदम स्पष्ट अभिव्यक्ति है।जो सबके लिए एक संदेश है।
यदि हम किसी को भी अपना इष्ट मानते हैं .. तो गीता के संदेश को एवं श्री कृष्ण के जीवन को अपने आचरण में उतारने की आवश्यकता है। धार्मिक ग्रंथों के मात्र अक्षरों को प्रतिदिन पढ़ने से हम धर्मिक नहीं हो जाते..जब तक उनके “भाव” हमारे मन-मस्तिष्क में रच-बस नहीं जाते, और हमारे दैनिक आचरण में प्रतिबिम्बित नहीं होते। तब तक वो वाचन या पठन-पठान आदि सब मिथ्या है।व्यर्थ है।हमारे बहुमूल्य समय की बर्वादी है। अपने इष्ट/ईश्वर के चरित्र एवं आदर्श की ‘पूजा-अर्चना’ का वास्तविक अर्थ है। अपने जीवन में उनके गुणों एवं आदर्शों को आत्मसात करना।..जीव मात्र के प्रति सेवा-भाव रखना है। सबको समान दृष्टि से देखना है। हमें ईश्वर के न केवल “चित्र” का वल्कि “चरित्र” का भी पुजारी होना चाहिए।
अब एक तुलनात्मक अध्ययन पर नज़र डालिये;…

दरअसल सदैव से ये दुनियाँ भर में एक स्कूली ” सिद्धांत “के रूप में प्रतिपादित है…
√【Psycho-state always is person to person differentiate..】

अब आप विद्यार्थी की भांति स्रोता की “मनःस्थिति” का फ़र्क देखिए. जैसे:- क्लास में लेक्चरर का Pattern of Teaching सभी विद्यार्थियों के लिए वही होता है।परन्तु उनकी मनः स्थिति एक जैसी न होने की बजह से Securing of marks different होते हैं विल्कुल वही आप यहां पाएंगे..कि
“गीता” में श्री कृष्ण वक्ता हैं ..अर्जुन, संजय, और धृतराष्ट्र ये तीन स्रोता हैं।
अर्जुन ने गीता का उपदेश सुनकर ये स्वीकार किया कि “वस्तु या व्यक्तियों ” की आसक्ति (लगाव) निरर्थक है। इसलिए उसकी आसक्ति नष्ट हो गयी। गीता का ज्ञान अर्जुन के लिए आंख खोलने(Eye Opener) वाला सिद्ध हुआ। जिससे उसे कर्तव्य बोध हो गया।
संजय को आनंद और दिव्य दृष्टि मिली। जबकि गीता का उपदेश तो धृतराष्ट्र ने भी सुना था। परन्तु अपने ” हठ औऱ अहम ” की आसक्ति के पिंजड़े में बन्द रहने के कारण
वह “गीता की पवित्रता” की अनुभूति तक नहीं कर सका।
यहाँ एक प्रश्न का उदय होता है कि..
समाज में आज कितने लोग हैं जो रोजाना नियमित मन्दिर, मस्ज़िद, गुरुद्वारों में जा कर आरती, शबद, कीर्तन,अज़ान आदि में सम्मलित होते हैं। मग़र उनके व्यक्तिगत जीवन-शैली को देखा जाय, तो क्या वो जिस किसी “इष्ट देव” को मानते हैं उसके चरित्र का एक भी गुण उनके आचरण से झलकता है।
क्योंकि ऐसे लोग सिर्फ “ईश्वर को मानते हैं” परंतु “ईश्वर की.. नहीं मानते।”
मग़र ज़मीनी हक़ीक़त एकदम अलग है।यानि बहुत कम लोग हैं जिनकी “करनी-कथनी” समान होती है। हर समाज में पाखंडियों की जमात ( भीड़ ) है।
गीता में संभाव्य की बात यही संकेत करती है। कि सभी “जीवों” में परमात्मा का अंश होता है।और परमात्मा में सभी हैं।तो फिर Q..हम समाज में छोटे-बड़े , ऊँच- नीच का ज़हर क्यों घोलते रहते हैं=? आप विचार करियेगा..
यहाँ मेरा सभी से ये सवाल है कि हम मनुष्य “कर्तव्यपरायणता” से विमुख होकर “आत्मज्ञान” कैसे प्राप्त करेंगे..?
एक और बात गीता ” कर्म ” (कर्तव्य) की बात करती है। “अधिकारों ” की नहीं । लेकिन हम कैसे भगवत प्रेमी हैं..?★जो “कर्तव्य” को भूल कर “अधिकारों” के लिए लड़ने-मरने में जीवन गुज़ार देते हैं।★
जबकि श्री कृष्ण ने बार बार कहा है कि
“कर्तव्य ही तेरा अधिकार है।”
वास्तव में कर्तव्य के प्रति निष्ठा एवं समर्पण भाव किसी “पुरुस्कार” से कम नहीं है। गीता को सम्पूर्ण विश्व के लिए “शांति” का सबसे बड़ा सफल मंत्र माना गया है।
गीता में युवाओं के लिए विशेष रूप से कहा गया है। कि “वे अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक रहें। गीता कहती है..कि कर्तव्य के प्रति निष्क्रियता, आलस्य, प्रमाद आदि अपने अंदर न पनपने दें।क्योंकि फल की इच्छा के लिए किया गया कार्य.. आपकी आंतरिक ऊर्जा को नष्ट करता है।
अगर कार्य (जॉब) किसी ने स्वेच्छा से ( by choice) चुना है।, तो उसे वो पूरे मनोयोग से करता है। वह ऐसा सोचता है। कि उसे सौभाग्य से लाखों-करोड़ों लोगों में से ख़ुद ईश्वर ने चुना है। इस सकारात्मक विचार से उस व्यक्ति की कार्य-क्षमता में वृद्धि होती है। जिससे कभी भी नीरसता नहीं आती। लेकिन इसके दूसरी तरफ .. अधिकतर लोग परिस्थिति बस या किसी एप्रोच से By chance जो कार्य (जॉब) पा जाते हैं। अगर उनके ऊपर सही पर्यवेक्षक न हो तो वे ‘खाना-पूर्ति ‘ ही करते है।
एक और बात, गीता पर जितनी टीकाएँ लिखी गई हैं। उतनी किसी भी धर्म ग्रंथ पर नहीं लिखी गयी हैं। “गीता का सार ” मानव जीवन को हर परिस्थिति से निकालने में सफल होने का मूल मंत्र देता है।
अब मेरे ख्याल से कई तरह से आँकलन हो चुका है। कि गीता वास्तव में निःसंदेह विज्ञान से बहुत आगे है। तुलनात्मक अध्ययन की रिपोर्ट भी इसी ओर इशारा कर चुकी है। कि “गीता ही विज्ञान से आगे है।”

Thinker ; Pachahara,Yug
(8006943731)

6- मोक्ष का मार्ग..

गरुण पुराण की तर्ज पर संक्षिप्त में मानव के लिए “मोक्ष का मार्ग…” तलाशने का एक प्रयास…भर है।

भारतीय समाज में हमारे पूर्वजों द्वारा हमें एक ऐसी स्वस्थ परंपरा दी गई है कि किसी आत्मा के स्थूल-शरीर छोड़ने के बाद अंतिम-संस्कार के वक्त ‘शमशान’ में या त्रियोदशी होने तक ‘शोक-संतृप्त घड़ी के उन बारह/तेरह दिनों में,एकबार को लगता है..कि, वक़्त कुछ ठहर सा गया है।

सामाजिक लोग उस दौरान गमी वाली जगह अपना हर काम छोड़कर जाते हैं… और वहां बैठते हैं, शोकाकुल परिवार को धीरज बंधाने के साथ साथ एक दूसरे की खैर-ख़बर भी हो जाती है। अन्यथा समूची दुनियाँ में इंसान ऐसी दौड़ भर रहे हैं कि, बस.. कुछ पूछो ही नही।

मूलत: मनुष्य होता तो आत्माभिमानी (Soul-Conscious) ही है।

परन्तु वह दुनियादारी में जीवन की असल राह से भटक कर आज देहाभिमानी (Body-Conscious) बनकर ही रह गया है।

आप स्वयं ऑब्जर्व कीजिएगा.. अक्सर वह अपने इष्ट से इतर दुनियां के प्रपंच की बातों में ही लगा मिलेगा।

उसके आचरण से लगता है,मानो ! अपने समाज और देश के प्रति, तो उसका कोई दायित्व बनता नहीं।

यदि मैं, आंकड़ों में जाऊं,तो दुनियां के लगभग अस्सी फीसदी लोग “डिग्रेस मोड” पर बड़े तल्लीन होकर अपनी ‘उचित-अनुचित’ जैसी भी कमाई है ‘गृहस्थ’ नाम की भट्टी में झोंकेते चले जा रहे हैं।

जबकि, आत्मा की प्रोपेंसिटी एंजॉयिंग होती है। परंतु मुझे लगता है कि दुनियां में भौतिकता की “अति” का चकाचौंद आम इंसान को “आनंदित जीवन” की राह से भटकाये हुए रहता है।

क्या आपको नहीं लगता! कि,मनुष्य चेतना के स्थान पर सिर्फ मन और बुद्धि के हाथों की एक कठपुतली बनकर रह गया है..??

गरुण पुराण कहता है कि “मानव योनि” में जिंदगी को व्यवस्थित तरीके से जीने के लिए.. मनुष्य को हमेशा विवेकशील होकर..इन चार मूलभूत आवश्यकताओं को फोकस करना लाज़मी है। वाकी तो जो उससे बन पड़े ठीक है।

ये चार चीजें हैं.. “रोटी, कपड़ा, मकान एवं

“ज्ञान”।

और जो “मनुष्य आत्माएं” किसी गफलत में धन के गठजोड़ को अपने जीवन का पार्ट समझ.., दुनियां में व्याप्त “रेट 🐀 रेसिंग” में शामिल होकर अपने मन का चैन एवं हैप्पीनेस ऑफ द लाइफ” जो जीवन के महत्वपूर्ण पहलू हैं उन्हें दांव पर लगाये हुए हैं।

अतः वे भटक कर “मोक्ष के मार्ग” से काफी दूर निकल गए हैं।

मनुष्य की “सोच” को आधार मानकर समूचे जगत को तीन भागों में बांटा गया है..

मन का प्रतीक..

1-भौतिक जगत (80%)

बुद्धि का प्रतीक

2-मानसिक जगत (12%)

चेतना एवं विवेक का प्रतीक

3-आत्मिक जगत (08%)

अच्छा! ये आंकड़े इस ओर भी इशारा कर रहे हैं कि, भौतिक जगत जो 80 प्रतिशत है वह दुनियां की एक बहुत बड़ी आबादी है।

कहना न होगा कि, संसार में सदैव से भटके हुए लोगों का बाहुल्य रहा है।

जो “फेयर & फ़ाउल” धन इकट्ठा करने में लगे होते हैं। ऐसा करके “ये तो.. ये..वे अपना परलोक भी बिगाड़ लेते हैं।”

इतिहास साक्षी है “ऐसे लोग जिंदगी के झमेलों में उलझकर एक दिन प्रायश्चित की दहलीज पर अपना दम तोड़ देते हैं।”

जबकि धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष। ये चार दरवाजे हैं ,जिनसे प्रत्येक मनुष्य को गुजरना होता है।

जीवन में किये गए कर्मो से निर्मित संस्कारो के आधार पर न केवल मनुष्य को वल्कि प्रत्येक “जीव” को कभी अच्छे तो कभी बुरे हालातों… में जाना होता है। और ये तब तक होता है।,जब तक “जीवात्मा” ब्रहम्म में विलीन नहीं हो जाती।

कटु सत्य;

कर्मयोग में श्री कृष्ण कहते हैं कि, कोई भी “जीव” अपने द्वारा किये गए कर्म के भोग को ‘भोग’ नहीं लेता.. तब तक उसे इस मृत्युलोक से जाने की अनुमति मुश्किल से ही मिल पाती है।

ये एक अहम सवाल है कि, प्राणी अपने आप को इस जन्म-मरण के चक्कर से बचा कर “मोक्ष के मार्ग” की ओर मुखातिब करे..भी, तो कैसे =?

इसके लिए मेरा अध्ययन कहता है कि मनुष्य अपना सम्पूर्ण जीवन “अनासक्त” भाव (Detachment) से जीए, तो संभावनाएं अवश्य बन सकती हैं।

मग़र इसे शब्दों में कहना जितना आसान है, जिंदगी को त्यागपूर्ण भाव में “जीना” उतना ही दुर्लभ भी है।

आध्यात्म में गोते लगाते लगाते ..ये भी नोट करलें कि, मोक्ष के लिए व्यक्ति में “स्थित-प्रज्ञता” का होना भी नितांत आवश्यक बताया गया है। जिससे वह अध्यात्म को अपनाकर न केवल “ब्रह्मज्ञान” प्राप्त कर सकेगा, वल्कि इसे आत्म-सात करके अपने हर कर्म को त्यागपूर्ण भाव से..अर्थात किसी से कोई भी अपेक्षा न रखते हुये ‘जीवन’ को सही राह पर ला सकता है।

Infact, it may be..

“the way to SALVATION”

अगर दुनियाँ की किसी वस्तु या व्यक्ति में आपकी आशक्ति (Attachment ) शेष है। तो फिर ये भी जान लो ..जैसे ही नया कर्म बनना शुरू होता है, ठीक उसी ममता रूपी कर्म-बीज से ‘भाग्य ‘बनना भी शुरू हो जाता है। और फिर वही सब नए कर्म का नया चक्कर.. अर्थात संचित कर्म, “प्रारब्ध” जो आत्मा में निहित “जीव” के कर्मों का एक स्थाई खाता होता है।

ध्यान रखिएगा! ये प्रारब्ध नाम का “स्थाई खाता” जन्म-जन्मांतर तक ‘चेतना’ की तरह सदैव “आत्मा” के साथ रहता है। यही वो कारण भी है जो लोगों को ग़लतफ़हमी में रखता है।

आपने सुना भी होगा.. अक्सर लोग हैरानी से कहते पाए जाते हैं कि “भई इंसान तो बड़ा नेक दिल था न जाने उसके साथ ऐसा कैसे…? हो गया।”

या फिर इसके विपरीत “वो व्यक्ति बड़ा नीयत का बुरा है,जालसाज है,स्वार्थी है, दुराचारी है..असामाजिक है वग़ैरह वग़ैरह। पर न जाने क्यों.. ? उसके दुष्कर्म अभी सामने नहीं आ रहे..?”

यहां कर्म-योग प्रत्येक जीव को सचेत करते हुए कहता है… कि,” कोई कभी भी किसी खुशफ़हमी में न रहें.. कर्म का लेखा जोखा

अवश्य ही आगे आता है ..क्योंकि हमारे बड़े बुजुर्ग कहते आए हैं कि, “दुनियाँ में देरी जरूर है मग़र अंधेरी, तो बेटा! कतई नहीं है।”

इस वृत्तांत से अगर एक भी व्यक्ति के कर्म की चाल में बदलाव आ जाए.. और वह कर्म/अकर्म एवं विकर्म का गणित.. समझ जाए, …तो मेरा मक़सद भी सार्थक हो जाएगा।..

अकर्म= परोपकार.. (उच्च स्तर)

कर्म=सुकर्म…(मध्य स्तर)

विकर्म = दुष्कर्म ( निम्न स्तर)

समय मेहरवान हो, तो इतिहास में झांककर अवश्य देखिएगा..जिन्होंने इन बातों को अपने जीवन में उतारा है। केवल वही इस “भव-सागर” से ससम्मान पार हो सके हैं।
उदाहरण के तौर पर मीराबाई और सुदामा जी दोनों ही “स्थित-प्रज्ञ” योगी थे। जो न केवल इस भव सागर से पार हो गए, वल्कि आने वाली अनेकों संततियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनकर एक नई राह दिखा गए।

दुनियाँ में दिन प्रतिदिन बढ़ता हुआ जनसंख्या घनत्व भी इसी ओर इशारा कर रहा है। मुक्ति न होने के कारण अधिकतर ‘जीव’ बार बार संसार में लौटकर इस भवसागर में हिचकोले खाने को मजबूर हैं।

अक्सर ये भी देखा जाता है कि कुछ आत्माएं (मनुष्य) संसार में आकर अपने पैदा होने का मूल कारण भूल कर, कर्तव्यों से विमुख, अपना बहुमूल्य मानव-जीवन स्वार्थ के वशीभूत होकर सिर्फ अधिकारों की जिद्दो-जहद में और ख़ुद की बनाई हुई मनगढंत धारणाओं के “इच्छा भंवर “में फंसकर जिंदगी को ऐसा उलझा लेते हैं कि उन्हें सिर्फ अपनी ही बात ठीक लगती है। उनमें दूसरों की सुनने की,तो सामर्थ्य ही…नहीं होती। ये स्थिति ही विध्वंसक होती है।

मगर ऐसे लोगों को हमें केवल एक उदाहरण बतौर ही लेना चाहिए.. उनके “नामों” में,तो कभी भी नहीं जाना चाहिए। अन्यथा! लोगों की नजर में उनके चेहरे खराब हो जायेंगे।

समाज में दुर्भाग्य से ऐसे ही कुछ मंज़र मैंने कई एक बार साक्षात देखे हुए हैं। शायद ऐसी ही कुछ विडम्बनाओं ने मेरी अन्तरात्मा को इस विषय पर अपना मनतव्य ज़ाहिर करने को बाध्य कर दिया होगा। तभी मैं ये सब कह गया.. वरना! लोगों को “मोक्ष का मार्ग” दिखाने की मेरी क्या.. विसात है..!!

दूसरे मानव शरीर की “क्षण-भंगुरता” एवं “मृत्यु अंतिम सत्य है।” ये कॉमन सी बात कौन नहीं जानता..??

मेरा अध्ययन और मेरे अनुभव कहते हैं कि, व्यक्ति के संचित कर्मों के आधार पर सब कुछ “पूर्व निर्धारित” “नियति-नटी” के खेल जैसा है। लेकिन “मन की चंचलता” से यदि बचे रहेंगे, तो समझो जीते-जी भी मनुष्य के “मोह का क्षय” हो सकता है, जो “मोक्ष का सच्चा मार्ग” बताया गया है।

इसी संदर्भ में हिंदी के एक महाकवि श्री भूधरदास जी की इन पंक्तियों के साथ मैं,अपनी लेखनी को विराम देना चाहूंगा..

“राजा ,राणा,छत्रपति।
हाथिन के असवार।।
जाना (मरना) सबको एक दिन।
अपनी-अपनी बार।।”

ॐ शांति.. ॐ शांति..ॐ शांति..

एक ‘मानव-मन’ की संवेदनाओं के माध्यम से जीवन के असल पहलू को छूने का एक प्रयास..

विचारक ;- योगेन्द्र सिंह पचहरा पुत्र श्री जयन्ती प्रसाद, पौत्र श्री साहब सिंह मुखिया जी।,नीमगांव। cont. No.(7830743731)

कार्यरत; जैन इंटर,कॉलेज,सासनी।

5-“प्रसन्नता”..(Happiness)

“प्रसन्नता” इसे जीवन का मूल उद्देश्य भी कह दिया जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

‘खुशी’ अर्थात ‘प्रसन्नता’ न सिर्फ मानव स्वभाव है,अपितु ये आत्मा की प्रवृत्ति भी है। एक और बात आप अनुभव कीजिएगा हर जीवात्मा में स्वभावत: अपनी जगह से आगे बढ़कर नंबर वन पोजिशन पर आने की चाहत अवश्य होती है ये ईश्वरीय गुण है। क्योंकि..नाम चाहे जितने हों ईश्वर तत्व तो एक ही है न।

सुव्यवस्थित जीवन की प्रसन्नता के पीछे मानव शरीर में चार हारमोंस का होना भी एक साइंटिफिक रीज़न..है।।

यही वज़ह है कि एक छोटा बच्चा ज़िन्दगी के शुरुआती दिनों.. मतलब बचपन में सबसे ज्यादा ख़ुश रहता है। मग़र जैसे जैसे उसकी उम्र बढ़ती है..परिवार,समाज या मित्र मंडली आदि के विचारों,कभी कभी कुछ वेबजह के दवाबों के वातावरण के कारण उसके दिलो-दिमांग पर जो प्रभाव पड़ते है , उनसे उसकी खुश रहने की मानवीय फ़ितरत जो प्राकृतिक व ईश्वर प्रदत्त होती है। कहीं गुम होने लगती है।

मनोचिकित्सकों के अनुसार भी खुश रहने को अच्छे स्वास्थ्य एवं जीवन के लिए बेहद जरूरी बताया गया है।

मग़र अब यहां एक सवाल खुद ब खुद उपस्थित होता है कि,

Q क्या “ख़ुश रहना ” आसान है..?

हाँ, मग़र ये “प्रसन्नता ” इतनी ही आसान होती तो दुनियाँ में जितने लोग भौतिक रूप से सुविधाएं या अपार संपत्ति इकट्ठा करने वाली लॉबी या “देश ” यूं..घुट-घुट कर तो नहीं मर रहे होते!! या झूठ-मुठ की खुशी समाज एवं दुनियाँ को नहीं दिखा रहे होते!!

हिंदी में एक बड़ी मशहूर कहावत है कि लोगों के पास “सुविधाएं होती हैं पर सुकून नहीं..होता!!”

दरअसल! ” चैन ” या फिर ‘सुकुन’ अर्थात् वास्तविक प्रसन्नता (Real Happiness) के लिए विद्वानों ने कुछ मानक निर्धारित किए हैं।

प्रमुख रूप से ये छह (6)हैं।

यदि मनुष्य या फिर कोई देश उन मानकों के दायरे में स्वयं को रख पाता है,तो…ही “HAPPINESS” की कृपा उस पर बरसती है।

इतिहास साक्षी है जीवन में “सच्ची प्रसन्नता” कोई अमीरजादा अपनी “अपार संपत्ति” लुटाकर भी नहीं खरीद पाया है।

अब आप स्वयं ही देख लीजिएगा कि, जिंदगी में खुश रहने के मायने कितने अलग होते हैं।

कि कोई तो अपनी छोटी-छोटी खुशियों में जी..लेता है। और किसी के लिए अपार धन,दौलत भी खुशी जुटा नहीं पाती!!

बताइए ! ये कैसी विडंबना है…?

इसीलिए लोग अक्सर बोल देते हैं कि “खुशी” को मापने के सभी ने अपने-अपने पैरामीटर्स बनाए हुए हैं। हैं।

मगर मेरा व्यक्तिगत मानना ये कि, खुशी के पैरामीटर्स अलग अलग नहीं हो सकते ये सार्वभौम होते हैं। अर्थात समूचे ब्रह्मांड में खुशी के मानक सबके लिए एक होते हैं।

अब ये तो उस अमुक व्यक्ति पर ही निर्भर करता है कि “वह” खुशी किस चीज़ में ढूंढ़ता है..??

जैसे किसी को दूसरों की मदद करके (जन सेवा में) आत्मिक सुख मिलता है। तो किसी को जीवन भर सब कुछ अपने “गृहस्थ की भट्टी ” में झोंकते रहने..में मज़ा आता है। चाहे परिवारी जन तवज्जो दें या नहीं।

ये तो सही है। और ऐसा होना भी चाहिए वरना सब एक जैसा । सोचने लगे.., तो फिर ये दुनियाँ रंग-बिरंगी कैसे होती।

इसी “मन की प्रसन्नता ” के विचार पर.. अब हम व्यक्तियों…से आगे बढ़ कर ” देश और दुनियाँ ” की प्रसन्नता की बात करते हैं…

हां तो ये मंजर उस दौर का है जब 1972 में पहली बार किसी देश ने दुनियाँ में हो रही “भटकाव की रेट-रेसिंग” से अपने आप को अलग करते हुए जीवन के मूल उद्देश्य को न केवल समझने वल्कि उसे सही तवज्जो दे कर एक सार्थक पहल की थी।

जबकि भौगोलिक स्थिति में वह एक छोटा सा देश है जिसे हम “भूटान” के नाम से जानते हैं। मग़र यहाँ एक बात हम सबको अवश्य समझ लेनी चाहिए, कि किसी व्यक्ति या देश के पास आर्थिक या भौतिक संपन्नता एक बार को न भी हो लेकिन उसे छोटा समझने की भूल कभी न करें। क्योंकि किसी व्यक्ति या देश का कद बड़ा होता है उसकी ” सकारात्मक सोच, सही रणनीति एवं वक्त को समझते हुए लिए गए “सही फैसलों से।”

मैं ऐसा मानता हूँ किसी देश या व्यक्ति का आकार यहां कोई मायने नहीं रखता।

‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है। जो सदैव अंतरराष्ट्रीय मामलों में अपने सभी सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व करती है। “प्रसन्नता” के मानकों का निर्धारण करने के लिए UNO के समक्ष जब भूटान देश ने आग्रह किया तो काफ़ी विचार-विमर्श एवं योजना के बाद पहली बार 1972 में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर “सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता सूचकांक” की अवधारणा बनी।

इसके बाद से समय रहते जो देश इन मानकों की कसौटी पर अपने आपको कस सके वही देश प्रति वर्ष ” World Happiness Index ” (W.H.I.) में अपने आपको टॉप TEN में ला पाए हैं और कुछ लगातार अभी भी प्रयासरत हैं।

किसी व्यक्ति या फिर देश अपनी “प्रति व्यक्ति-आय” “जीओ और जीने दो” जो जीवन की “प्रसन्नता” के लिए मूलभूत आवश्यकता होती है। उसके प्रति कोई जितना सजग होता है,उतना ही वह परिवार या देश का प्रबन्धन अच्छा कर लेता है।

इसके लिए हमें स्वयं इसे जानने के साथ- साथ अपने समाज या फिर देश के सभी नागरिकों को जागरूक करना होगा। उन्हें बताना होगा कि किसी भी परिवार ,समाज या देश की भौतिक समृद्दि ,आर्थिक सुरक्षा और व्यक्ति की खुशी जिनका कि आपस में बहुत नज़दीकी सम्बन्ध होता है। अगर ये चीजें सुव्यवस्थित हैं तो वह व्यक्ति या देश निश्चित ही “प्रसन्नता” के काफ़ी नज़दीक होगा।

पिछले वर्ष 2018 -19 तक UNO में विश्व भर के लगभग 156 सदस्य देश हैं..जब प्रतिवर्ष “विश्व प्रसन्नता सूचकांक” की रिपोर्ट तैयार होती है, तो सभी देशों को उल्लिखित 6 मानको की दृष्टि से देखा जाता है।

जो देश इस कसौटी पर खरे पाए जाते हैं उन्हीं को टॉप Ten में जगह मिलती है।

अगर इस बीच अपने देश “भारत” की बात करूँ तो कुछ बीते दशकों में जनसंख्या भार और बढ़ा है।जिससे देश के नागरिकों की खुशी व आत्मसंतोष में लगातार गिरावट आती जा रही है,जो चिंता का विषय है।

W.H.I.,2018 में भारत 156 में 140 वें पायदान पर रहा।, जो काफी पीछे है। हमको लोगों के मन में “प्रसन्नता “लाने के लिए बहुत परिश्रम करना होगा।
अगर बुद्धिजीवी लोग इसे अतिशयोक्ति से न देखें तो मेरा अपना ख्याल ये है कि

“क्यों न भारत सरकार के मंत्रालयों में एक मिनिस्ट्री ‘ Happiness ‘ के नाम से नव सृजित कर ली जाय।आखिर सरकार का उद्देश्य भी तो पहले अपने नागरिको के साथ साथ देश की व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करना ही है।


जो लोग दुनियाँ में घटित होने वाली छोटी से छोटी हलचल पर भी अपनी पैनी नज़र बनाये रखते हैं।अर्थात current affairs..के शौक़ीन हैं। उन्हें तो ये जानकारी अवश्य होगी ही,कि अभी दो वर्ष पूर्व यानि सन 2016 में संयुक्त अरब अमीरात में ” हैप्पीनेस मिनिस्ट्री” वास्तव में बनाई भी गयी है।
जिसके द्वारा वहाँ के सम्राट ने अपने देश के सभी वाशिंदों को खुशी देने का जिम्मा इसी मंत्रालय के मंत्री को सौंपा है। क्योंकि World Happiness Index,2016 में ये देश काफी पिछड़ रहा था।मग़र बहुत ज्यादा भी नहीं 156 देशों में ये 28 वें स्थान पर था।
लेकिन आप इस देश के प्रधानमंत्री की will power एवं सकारात्मक संकल्प शक्ति भी तो देखिए कि 2021 तक वह अपने देश को 28 वें स्थान से top five में देखना चाहता है।

अब यहाँ जो एक सवाल उभरता है। वो ये है कि हमारे देश की सरकारों की दोहरी एवं सिर्फ दिखावे वाली उनकी कायरतापूर्ण नीतियों से पर्दा उठाने के लिए विचारकों को लिखने को मजबूर करता है। एक एक शब्द पर जिम्मेदार लोग न केवल गौर करें वल्कि शीघ्र अति शीघ्र इन आवश्यक मानकों को अपने जीवन में क्रियान्वित भी करे, तो “हैप्पीनेस ” देश से पूर्व हर व्यक्ति के जीवन में आना पहले आवश्यक है……

आम लोगों की खुशी के लिए सबसे पहले तो उनके पेट का भरा होना बेहद जरूरी है। और इसी समुचित व्यवस्था के लिए सरकारों का गठन किया जाता है।यही वो सवाल है,जिसके प्रति हमारे देश व प्रदेशों की सरकारें उदासीन है। वे केवल व्यक्ति को हर समय एक वोट समझकर ही बात करते हैं। सच कहूं,तो सरकारें उल्टे बेरोजगारों से पैसे कमाती रहीं हैं पिछले लगभग दो दशकों से तो सारी हदें ही पार हो गयीं हैं।

जबकि आम जनता की प्रसन्नता के लिए सरकार को सर्वप्रथम बिना किसी “आंकड़े बाजी” के “रोजगार उपलब्ध” कराना नितांत आवश्यक है।

हाँ अगर देश के विभागों में किसी भी स्तर पर अनियमितताएं हैं.. तो कड़े निर्णय लेकर उन्हें दुरुस्त करें न कि जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ कर कायरता पूर्ण तरीके से संस्थानों को बेच दें।

सरकार “सरकारी टैक्स” को देश के होनहारों को क़ायदे से योग्य बनाने पर या देश की व्यवस्थाओं को चुस्त-दुरुस्त करने पर खर्च करे न कि नेताओं या ऑफिसर्स के एसो-आराम या किसी अन्य आडम्बर पर।

भारत देश में ऐसी तमाम योजनाएं हैं जो गरीबों के नाम पर नेताओं और अधिकारियों एवं थोड़ा बहुत दलाल टाइप बिचौलियों की जेब ही भर रहीं हैं।

जनता विद्रोह के लिए मजबूर हो.. उससे पहले PM/CM/DM आदि सभी को पद की मदहोशी को त्याग कर शुध्द ह्रदय से अपने-अपने क्षेत्र में व्यवस्थाओं को समय रहते ही दुरुस्त करना होगा…

विज्ञान भले ही यह कहता हो कि इंसान का स्वभाव “संघर्ष और हिंसा” से जुड़ा है। लेकिन इसी के साथ-साथ विज्ञान ने ये भी साबित किया है कि करीबी पारिवारिक व सामाजिक नाते-रिश्तों के अभाव में व्यक्ति उपलब्धि हासिल कर लेने के बावजूद भी खुश नहीं रह सकता।

“प्रसन्नता”..के इस मुद्दे पर सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा..है,कि
“हम कभी-कभी जीवन में असमानताओं को नज़र अंदाज़ कर देते हैं, उस वक्त हम भूल जाते हैं कि हमारे पास क्या है=? केवल हमारा ध्यान होता है कि हमारे पास क्या नहीं है=? अधिक की आशा रखना ठीक है, परन्तु हमें उन चीज़ो पर अवश्य खुश होना चाहिए जो इस समय हमारे पास हैं” ; अमिताभ बच्चन

विज्ञान तो यह पहले ही बता चुका है कि हर इंसान के अन्दर खुशी देने वाले हार्मोन्स होते हैं वो बात अलग है वे कितने सक्रिय हैं।

एक और हैरानी की बात ये है कि..
World Happiness Index,2018-19 की रिपोर्ट ये कहती है कि टॉप ten की वरिष्ठता सूची में एशिया महाद्वीप का एक भी देश अपने आप को प्रसन्नता सूची में शामिल नहीं कर सका।

आखिर लोग किन झमेलों में फँसे हैं=? न केवल हम ‘भारतीय’ वल्कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे आर्थिक सम्पन्न देशों के जीवन में भी ‘प्रसन्नता” नहीं है।

मैं देखता रहता हूं ..ठीक वैसे ही हमारे आस-पास धन से सम्पन्न होने का दम भरने वाले लोग “प्रसन्नता” से पूरी तरह “विपन्न” हैं।

इसीलिये ये मैं ऊपर पहले ही दावे के साथ उल्लेख कर चुका हूँ।कि “प्रसन्नता “के लिए “आर्थिक सम्पन्नता” का कोई ताल्लुक नहीं है।

फिर भी अमेरिका और ब्रिटेन 18वें व 19वें स्थान पर रहकर भारत से तो काफ़ी अधिक प्रसन्न हैं। असली Question Mark (?) तो हम भारतीयों पर है इसीलिए ये बिंदु विचारणीय है।……

विचारक ; पचहरा सर के. एल.

जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस

4- “शिक्षकत्व”

—- पचहरा सर ————————————–
शिक्षक के दो बड़े दायित्व होते है।

एक ओर तो शिक्षक के लिए आज की जो आवश्यक शिक्षा है। जिसके लिए वह दृढ़ संकल्पित है उस ओर तो अपने शिक्षार्थियों को आगे ले जाना ही है।

लेकिन इसके साथ-साथ वह अपने विद्यार्थी के मन के अंदर…झांककर उसमें कोई परिवर्तन ला सके, असली ज्ञान का संयोग तो वो है।

जैसे;–
उसके हृदय की गहराइयों…. को बढ़ाने का।,
उसके जीवन के अंदर कुछ वेशकीमती मूल्यों की स्थापना… करने का।, यदि शिक्षा के साथ-साथ शिक्षक अपने शिक्षार्थी की संवेदनाओं को जगाने का कार्य कर पाया। तो जरूर कहा जा सकेगा… कि शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक ने अपने समूचे दायित्व को बख़ूबी निभाया है।

मांफ कीजियेगा …सभी सरकारी कर्मचारियों की वर्तमान समय में चल रही दैनिक कार्य-शैली के सम्बंध में अगर “नीर-क्षीर विवेकी” दृष्टिकोण से मैं यदि अपना पक्ष रखूँ , तो अन्य की तो बात शायद कुछ इतर हो भी सकती है। मग़र शिक्षक तीन प्रकार के होते हैं।आंकड़ों में जाऊं तो स्थिति ये है। ;-

1- एक तो वे जो शिक्षा एवं अपने शिक्षार्थियों के लिए सदैव पूर्ण समर्पित रहते हैं। ये वो शिक्षक हैं जिन्होंने “By- Choice” शिक्षा के क्षेत्र को चुना हैं।और कड़ी मेहनत एवं लम्बी तपस्या के बाद शिक्षक बने हैं।..20%

2-दूसरे वो जो आकर्षक सैलरी-स्केल, अवकाश आदि की सुविधायें देखकर ..वो भी किसी अप्प्रोच के माध्यम से नियोक्ताओं की आव-भगत करके.. “By-Chance” शिक्षा-विभाग में घुस-पैठिओं की तरह बैकडोर रास्ता बना कर घुसे हैं। वे शिक्षण में रुचि तो तब लें जब उनके बूते की बात हो।…30%

3- तीसरे वो जो ज्यादातर मौक़ा-परस्ती में माहिर हैं। मग़र अपने विषय में कमजोर न होने के वाबजूद भी अपने नियमित शिक्षण-कार्य में रुचि नहीं लेते। व्यवस्थापकों की व्यवस्थाओं की केवल चौकसी करते रहने में व्यस्त और मस्त रहते हैं। लेकिन अपनी सेवाओं को बचाने में निपुण हैं।…50%

अब सवाल फिर वही दूसरे विभागों की तो क्या कहूँ..मग़र अपने देश मे शिक्षा विभाग में तो दिन-प्रतिदिन जिम्मेदार लोगों का नैतिक-पतन इतनी तेजी से हो रहा है। जो विल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है।जिससे आये दिन नित नई विडम्बनाये पनपती ही जा रहीं हैं। क्योंकि देखा गया है। कि अधिकतर जिम्मेदार पदों पर आरूढ़ पदा-अधिकारी खुद अपने पद के प्रति भी दृढ़-संकल्पित एवं ईमानदार नहीं हैं। भृष्टाचारियों में खुले-आम एक लूट सी मच रही है। जैसे वेतन तो उन्हें मिलता ही नहीं.. इस गन्दे पैसे से ही उनके घर चलेंगे।एक कहावत के आधार से कहूँ तो विल्कुल पिछले कई वर्षों से “अंधेर नगरी चौपट राजा… ” वाली ही हालत हो गयी है।

लेकिन चाहे कोई कुछ भी करे अंत मे मेरा तो फिर भी यही मानना है।कि अगर हम देश के सच्चे और जिम्मेदार नागरिक हैं।और अपने माता-पिता की “सुपात्र-सन्तान” हैं।, तो देश एवं अपना ख़ुद का प्रारब्ध सही बनाने.. के नज़रिए से.. कम से कम शिक्षकों एवं शिक्षार्थियों को सदैव मर्यादा में रहना ही होगा। ; मैं एक विचारक के रूप में इस “विचार पर”ख़ुद भी अमल करते हुए..इस बात को गम्भीरता से लेने वाले सभी पाठकों का आभार प्रकट करता हूँ। धन्यवाद

जय हिंद ! जय भारत !

2- सुना आपने

अक्सर लोग ऐसे ही अपनी बात शुरू कर देते है, कि “सुना आपने..!”

इसी से संबंधित एक मंजर है.. कि,

एक बार संत सुकरात से उनके मित्र मिलने आये।आते ही आते उन्होंने कहा, “सुना! आपने…”
तब सुकरात मुस्कराकर बोले “अक्सर लोग इसी तरह बात शुरू कर देते हैं। लेकिन न केवल तुमको बल्कि आज मैं सबके हित में एक
महत्वपूर्ण जानकारी शेयर कर ही लेता हूँ। इससे पहले कि तुम मुझे “सुना आपने” के संदर्भ में उस आदमी के बारे में कुछ बताओ..उससे पहले मैं आपको तीन सवाल पूछता हूँ…..???


यह सुन, वह मित्र कुछ सक पका सा गया, लेकिन जवाब देने के लिए हाँ, बोल दिया। सुकरात ने पहला सवाल पूछा…


1- मित्र ! जो बात आप मुझसे शेयर करना चाह रहे हो क्या वो सच है..?


मित्र का जवाब था : “पता नहीं” मैं, तो बस अभी-अभी सुनकर आ रहा हूँ..


2- तो क्या वह बात उस व्यक्ति की अच्छाई और गुणों के बारे में है..?


जो बात आप शेयर करने वाले हो..


इस पर भी मित्र ने कहा: “नहीं” वो बात तो उस व्यक्ति को बेइज्जत करने वाली है।


आखिरी एवं तीसरा प्रश्न पूछा..

3- क्या वो मेरे, आपके, समाज या दुनियाँ में किसी के भी हित की है..?
मित्र ने बड़े उदास मन से कहा: ”जी नहीं” मैं तो बस यूं ही तुम्हें बताने लग गया ऐसी तो उसमें कोई खासियत है नहीं..


अंत में ..

सुकरात लम्बी सांस लेकर उस मित्र को समझाते हुए बोले !.. तो फिर मुझे मांफ कीजियेगा मित्र, मैं तुम्हारी ये बात कतई नहीं सुन सकूंगा…

जो कि, न तो सच है

न उसमे किसी की अच्छाई का ही बखान है,

और नहीं वो मेरे, समाज व देश-दुनियाँ में किसी के हित की ही है। तो उसे सुनकर मैं अपना और आपका ‘समय’ ही बर्वाद क्यों करूँ।

क्योंकि ऐसी बातें सिर्फ “पर निंदा” वाली ही होती हैं जो मनुष्य की बेशकीमती तीनों चीजों…:- समय, ऊर्जा एवं जीवन को खराब करती हैं।

किसी विद्वान ने ठीक ही कहा है कि..

सामान्य दर्जे के व्यक्ति ” लोगों की बातें ” करते हैं।


औसत दर्जे के व्यक्ति “घटनाओं की.. ” कर लेते हैं।


जबकि …

महान व्यक्ति अपना “कीमती वक्त” “बौद्धिक लोगों के विचारों ” की चर्चा करके अपने समय,ऊर्जा और वेशकीमती जीवन का सदुपयोग करता है।


जिससे…उनमें सम्पूर्ण समाज को जीवन की नयी राह दिखाने की सामर्थ्य बनती हैं।

पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद


विचारक ; पचहरा सर, नीमगांव वाले

1- सफल, समर्थ एवं महान

सफल,
समर्थ
एवं
महान
———-
मैं किसी भी एंगल से ” सफल ” शब्द को उस रूप में “सम्भाव्य” नहीं समझता। जिस रूप में आज दुनियाँभर में ये प्रचलित है।

मग़र इसका मतलव ये भी मत लगा लीजियेगा कि मैं इन शब्दों के प्रति नकारात्मक हूँ।

मेरी मान्यताओं की परिधि में व्यक्ति के..अलग-थलग पड़ने से बेहतर है कि वह अपने सकारात्मक विचारों के साथ परिवार,समाज एवं देश-दुनियाँ के किसी भी प्लेटफॉर्म पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहे..

क्योंकि विचारकों व शिक्षकों का स्थान-निर्धारण या उनके सफल-असफल होने का मूल्यांकन करना इतना आसान नहीं होता है।

इसीलिए मैं, खुद व्यक्तिगत तौर पर सफल, समर्थ और महान जैसे भारी भरकम शब्दों से हमेशा बचने का प्रयास करता हूँ।


हाँ, मैं महत्व देता हूँ। “जनकल्याण “से जुड़े उन कार्यों को…जिससे न केवल खून के रिश्तों में वल्कि समाज के किसी भी वर्ग के लोगों के दिलों में प्रेमपूर्वक, चाहे कुछ देर के लिए ही सही, लेकिन एक आत्मीय रिश्ता बनता है।


जीवन के उन आदर्श मानव मूल्यों को,मैं सदैव महत्व देता हूँ।

वैसे प्रकृति, ,संस्कार,परम्परा या फिर चमत्कार इत्यादि अपनी जगह ठीक है।


सच में मुझे तो इन अल्फाज़ो से भी बहुत ज्यादा मोह नहीं है।


मेरे लिखने की इच्छा और प्रयुक्त की गई शब्दावली , मेरी ख़ुद चुनी हुई शब्दावली होती है। अपने भाव स्पष्ट करने के लिए..चाहे मुझे कोई शब्द अंग्रेजी या उर्दू भाषा से ही उधार क्यों न लेना पड़े। मैं ले लेता हूं।

यहाँ मेरा ऐसा मानना है कि “विचारक” का भाव यदि उच्च है, और उसकी अभिव्यक्ति में तटस्थता के साथ-साथ शब्दों का बेहतर चयन है।, तो उसकी लेखनी शून्य में भी अपने शरीरी और अशरीरी (रियल & फ़िक्शन) दोनों प्रकार के व्यक्तित्व को लोगों के जहन में स्थापित कर सकती है।

1- प्रत्येक जीव के लिए “एक सुव्यवस्थित जीवन ” तथा..

2-जीवों के मृत्युलोक में बार बार आने से “मुक्ति-प्रयास” के रास्ते तलाशते रहना मेरे लेखन की प्रकृति है।


ध्यान दीजिएगा मेरा “लेखन” भावनाओं का मायाजाल कतई नहीं है। आप गौर करें तो पाएंगे ये लोगों के परिश्रम और उनकी प्रतिभाओं का यथार्थ प्रदर्शन है।

मेरा ऐसा मानना है,कि आज के ‘लेखन की दुनियां में “भावनात्मक-जाल” बुनने वालों के दिन तो अब लद गए..


हमें, एक बात तो माननी पड़ेगी, “परिश्रम एवं प्रतिभा” व्यक्ति को अकेला अवश्य बना देते हैं। जिससे ऐसी ” विवशता ” में उसके पास दूसरों का ‘साथ’ निभाने का वक्त ही कब होता है।
वो तो अपना “हर पल “जो बहुत कीमती है,अपनी ‘प्रतिभा और परिश्रम’ को ही देने की चाह में जी…ता है। अब उसकी ऐसी “विवशता” को यदि कोई व्यक्ति अपने चश्मे से …
स्वार्थी,अहंकारी या ओवर-रिजर्व होने का नाम दें ,तो..जनाव! दोष उनके आंकलन में है। न कि अमुक व्यक्ति की “प्रतिभा और परिश्रम” में।
दूसरे को समझने के संदर्भ में यदि मैं पुनः कहूँ..तो हुज़ूर बात थोड़ी कड़वी जरूर है। मगर एकदम ‘सोलह आना’ सही है।

जिस प्रकार “एक ही छत के नीचे रहने वाले परिवारों के सदस्य वैचारिक एवं स्वाभाविक दृष्टि से अलग-अलग हो सकते हैं। ठीक उसी प्रकार (अंतरंग मनोभाव की दृष्टि से ) वो आपस में एक दूसरे को निजी
तौर पर उतना नहीं समझ पाते जितना उन्हें बाहर यानि समाज के, लोग जिनका वैचारिक एंगल लगभग एक है।,

(But I know it may be point to point differentiation…)
मैंने Re-search के दौरान जब “गृहस्थ-लोगों” के विचार लेने के लिए कुछ सर्वे किये, (क्योंकि मेरा शोध-कार्य
” Relationship” based था ) तो हमारी सर्वे टीम को गृहस्थ जीवन में एकरूपता की प्रतिमूर्ति कहे जाने वाले “पति-पत्नी” के बीच भी बहुत बड़े Understanding-Gap मिले, जो उस वक्त मेरी समझ से परे थे। उतना तो नहीं मगर आज मैं मान सकता हूँ। कि “पति- पत्नी” के बीच का Gap दो शब्दों के बीच इस ‘डेस’ के जैसा है। तब तो ठीक है। मग़र उससे अधिक है तो ग़लत है।….


मांफ कीजियेगा अब मैं असल मुद्दे पर आता हूँ।


परिश्रमी और प्रतिभावान व्यक्ति के पास दूसरों के भाव, रुचियों,आराम एवं आलस्य का हिस्सेदार बनने के लिए वक्त नहीं होता।


हाँ ये बात भी गौरतलब है कि अगर कोई व्यक्ति परिश्रमी है। तो उसकी ‘मेहनत’ और लोगों की दुआ, बुजुर्गों का आशीर्बाद उसे भीड़ बनने और प्रतिभा उसे दुनियांदारी की भीड़ में खो जाने की इज़ाज़त नहीं देते। एक न एक दिन वह ख़ुद व खुद एक सितारे की तरह चमक उठता है।
मनुष्य होना तो मेरी नियति थी, एक शिक्षक एवं विचारक मै खुद अपने परिश्रम के आधार पर स्वेच्छा से (By-Choice) हूँ।


आज मैं जो भी हूँ। अगर वक्त की इजाज़त हुई तो आने वाले समय में ख़ुद को जो Prove कर पाऊंगा। वो अपनों की दुआओं,बड़ों के शुभाशीष एवं मेरी ख़ुद के अर्जित संस्कारों के बल पर ही कर पाऊंगा।
अपने अब तक के जीवन-अनुभव के आधार पर मेरा ऐसा मानना है कि यश, प्रतिष्ठा और लेखन का मूल्य..अच्छा लिखने से नहीं,
ये तो यश और मूल्य देने वाले लोगों की इच्छा के अनुरूप लिखने या करने से मिलता है। जो मुझे स्वीकार नहीं या फिर ये समझो कि वो कला मुझे आती ही नहीं।
ऐसी दोहरी (Double standard) ज़िन्दगी की सुविधाओं से कम से कम मुझे तो कोई लगाव नहीं।
क्या बताऊँ कभी-कभी जीवन में ऐसे ‘टर्निंग पॉइंट’ भी आए हैं जहाँ मैंने वैचारिक तौर पर “अपने सिद्धांत” के साथ ख़ुद को अकेला पाया है।। चाहे मामला पारिवारिक हो या सामाजिक मुद्दे का।

मगर मैं अच्छे से जनता हूँ वैचारिक “मत-भेद” किसी मुद्दे पर “बाप-बेटे” के बीच भी हो सकते हैं। ये कोई दोष नहीं।क्योंकि चीज़ो को देखने एवं समझने का और फिर उनको अभिव्यक्त करने का नजरिया Person to Person differ हो सकता है।
(ये 30 सितंबर,2019 को ब्लॉग-राइटिंग के शुरू में पब्लिश किया हुआ पहला ब्लॉग है।)


विचारक ; पचहरा सर
जैन कॉलेज,सासनी वाले