12- “विचार प्रभाव”… (Deep notions with Y.S. पचहरा)

व्यक्ति कोई भी, कैसा भी कार्य करे…समाज में उसके हर ‘ कार्य ‘ की प्रतिक्रिया अवश्य आती है। बड़ी सोच वालों की सकारात्मक एवं सीमित सोचने वालों की नकारात्मक…क्योंकि ये समाज ही तो वो आईना है। जिसमें हम अपनी “छवि” देख कर समय रहते समझ सकते हैं…और यदि छवि थोड़ी धूल-धूसरित सी लगे भी तो उसे चमका भी सकते हैं।
ये एक सामान्य सत्य है कि व्यक्ति जैसा विचारता है। वैसा ही वो अपने जीवन में करता भी है। मग़र बहुत बड़ा फ़र्क है।बुरा विचारने वाला अपना “आत्मबल” खोता चला जाता है।

जबकि अच्छा विचारने वाला दिनों-दिन “सबल “होने के साथ-साथ वह “आत्मविश्वास ” से भरता हुआ चला जाता है। जिससे वह अपने जीवन को सही आकर दे पाने में सफल होता है।
” विचार ” का मन पर प्रभाव तो अवश्य पड़ता है। ये वायुमण्डल में मौजूद तरंगों (Waves) से प्रभावित होता है।
मान लो कोई व्यक्ति बुरा काम करता है।तो ये भौतिक-विज्ञान के एक सिद्धान्त के मुताविक..उसके “मन” में एक विशेष प्रकार का कम्पन सा होता है।ठीक उसी प्रकार के विचार वाले लोग उस मन के कम्पन से अवश्य प्रभावित होते होंगे। वैसे ही मै जब कोई अच्छा कार्य करता हूँ।, तो मेरे मन पर भी कुछ विद्वानों के “मनो-भाव”………………….। (psychic- impressions) एवं वातावरण-प्रदत्त आवेग-संवेग आदि मेरे विचार-प्रवाह को भी काफी हद तक प्रभावित करते हैं। क्योंकि तरंगे (waves) वातावरण में सदैव होती हैं। वो न्यूनाधिक शक्ति के अनुसार कम या अधिक तो हो सकती हैं।
इसी उपमा को अब मैं कुछ और आगे ले जाता हूँ, ये कहा जा सकता है। कि जिस प्रकार कभी-कभी “आलोक-तरंगों” को किसी गंतव्य वस्तु तक पहुंचाने में लाखों वर्ष लग जाते हैं। उसी प्रकार “विचार तरंगों ” को भी व्यक्ति-विशेष तक पहुंचने में और फिर उस विचार को ठीक रूप में उसके दिलो-दिमांग में फिट बैठने में “कुछ वक्त” तो लग ही सकता है। अतएव यह नितांत संभव है। कि हमारी पृथ्वी पर मौजूद वायुमण्डल “अच्छी और बुरी ” दोनों तरह की “विचार-तरंगों” से भरा हुआ है।
“प्रत्येक मस्तिष्क से निकले हुये हर ‘विचार’ को “योग्य आधार” मिलने तक उसे वायुमण्डल में विचरण करना ही होता है।”
विचारों की समानता जहाँ होती है। अर्थात जो “मन” ऐसे आवेगों को ग्रहण करने के लिए तैयार होते हैं, वे तुरंत ही उन् विचारों को अपना लेते हैं। और वहां एक “सम-भाव” वाला आनन्दमयी वातावरण बनता …चला जाता है।
अन्य शक्तियों की तरह मनुष्य की शक्तियाँ भी “शुभ-अशुभ” दोनों में से “बल” संचित कर लेती हैं। उनमें से… जो वायुमण्डल में विचरण कर रहीं हैं।
ध्यान दीजिए.. विल्कुल “जल-धारा” की तरह ही होती है। ये “विचार-धारा” क्योंकि व्यक्ति के “मानस-पटल” पर हर-पल विचार का “प्रवाह” चलायमान ही रहता है।
हम सब के लिए यहाँ एक सीख है।….कि किसी भी नदी के चलायमान “जल ” को हम छू के छोड़ दें.., तो (अपनी गतिशीलता के कारण) “एक ही पल” के बाद “वो जल “जो हमने छुआ था। हमें पुनः उस जगह नहीं मिल सकता।स्वाभाविक सी बात है…वह आगे बढ़ जाता है। ठीक वैसे ही “विचार-धारा ” का प्रवाह भी प्रति-क्षण गतिशील होता है।
मान लो किसी कुप्रभाव में आकर अमुक व्यक्ति के मुख से कुछ अनुचित विचार निकल भी गया..तो हम “उस व्यक्ति ” के उन शब्दों को पकड़ कर क्यों बैठ जाते हैं। ये “विचार-धारा” भी तो “जल की धारा” की तरह चलायमान ही होती है। फिर हम “रात-गयी, बात-गयी..” वाले सिद्धांत पर अमल क्यों नहीं कर पाते…? क्यों उस “बासी विचार ” को पकड़ के जीवन के अमूल्य समय को लड़ने-झगड़ने में बर्वाद करते रहते हैं।…
सम्पूर्ण जनमानस अपने आपको इस “विचार-प्रभाव” वाले सिद्धान्त के साथ अपने में संकल्पित होकर ही जीवन मे आगे बढ़ना होगा।
जो पीढ़ी हमारे पीछे आ रही है।(New Generation) कम से कम उन के लिए हम वायुमण्डल में “दुर्भाव-तरंगे ” फैलाकर उनके भावी “जीवन-पथ” को दुर्गम न बनाये।…ये थोड़ा mind-over matter है। इसे न केवल गम्भीरतापूर्वक लें वल्कि सभी से करबद्ध निवेदन है इसे जीवन में आत्मसात अवश्य करें।

धन्यवाद..
विचारक:- YUG,पचहरा,
सम्पर्क-सूत्र:-8006943731

1 thought on “12- “विचार प्रभाव”… (Deep notions with Y.S. पचहरा)”

  1. परम आदरणीय चाचा जी को सादर चरण स्पर्श और नमस्कार! आपके द्वारा बहुत ही सुंदर व्याख्या की गई है चाचा जी ।
    किसी दार्शनिक ने कहा था कि कोई भी विचार निष्क्रिय नहीं हो सकता है उसे कभी न कभी साकार होना ही होता है फिर क्यों न हमें अपने बारे में , अपने जीवन में निकटतम संबंधियों, और बल्कि अपने समाज, राष्ट्र ,और सम्पूर्ण विश्व के संबंध में शुद्ध, सकारात्मक विचार निर्माण करने चाहिए।जो हमारी आत्मा के लिए भी एक सकारात्मक शक्ति-पुंज निर्मित करेंगे।
    उदाहरण स्वरूप १०९३ अविष्कार करने वाले एडिसन ने बिना सकारात्मक कल्पना के एक्सपेरिमेंट करना प्रारंभ नहीं किये थे इस की प्रारम्भ अवस्था सकारात्मक विचार ही होते थे जो कल्पना के रूप में थे।
    नमः शिवाय !👌👍

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