अगर आपने ग़ौर किया हो, तो… भारतीय काव्य-ग्रन्थ “रामायण” और “महाभारत” दोनों ही ग्रन्थ कदम-कदम पर हमें ये सीख देते हैं… कि “जाति” के कुछ माईने नहीं होते… (जैसा.. मै, समझ पाया हूँ..) लगभग ऐसा ही कुछ इशारा हमारे ये दोनों ग्रन्थ “खून के रिश्तों” की ओर भी करते हैं। ये कोई एरी-गैरी पुस्तकें तो हैं नहीं। ये ग्रन्थ न केवल भारत में वल्कि सम्पूर्ण विश्व में मान्य हैं.. I mean Both are authentic “Indian Great Epics..”.so we must follow these ideals in our routine life.
भारतीय काव्य ग्रन्थों को पढ़ने या इन दोनों के लोकप्रिय धारावाहिको को देखने पर मेरे ख़्याल से सभी को ऐसी ही अनुभूति होती होगी। मग़र वर्तमान परवेश में कुछ पाखंदी, धर्म के ठेकेदारों,मौका परस्त नेताओं व दकियानूसी विचार वाले लोगों ने कुछ व्यक्तिगत धारणाएं ऐसी बना रखी हैं। वे वातावरण में जहर घोलने का कार्य करती हैं। जब कभी ऐसी बातों से “मन” कुपित हुआ, तो मेरे अंतर मन में कई बार विचार आया……कि इस पर कुछ लिखा जाय…
लेकिन कार्य की व्यस्तता एवं समयाभाव के कारण अपने अन्दर के उदगारों को एक “लेख” का जामा पहनाने के लिए वक्त एवं मन में शान्त-भाव का होना भी आवश्यक होता है। नियति ने मुझे फ़ुर्सत के पल…. दिए, तो सही, मग़र बहुत बड़ी कीमत पर अर्थात इस “लॉक-डाउन” के रूप में। ईश्वर ऐसा वक्त फिर कभी न दें।
दरअसल, हुआ तो था, काम के आधार पर समाज का “वर्ग-विभाजन” मग़र अफसोस कुछ समाज के ठेकेदारों व बरसाती मेंढक टाइप नेताओं ने अपनी राजनीतिक दुकानें चलाने के लिये उस “भारतीय-सामाजिक-व्यवस्था” को “जाति-विभाजन” में कब तब्दील कर दिया हमारे देश की भोली जनता को पता ही नहीं चला..? जनता ने उसी बेहोशी में धीरे-धीरे लगभग इसे स्वीकार भी कर लिया। आज भारतीय सामाज में “जातियों के बटवांरे” की दृष्टि से ही अब जातियों को”ऊंच-नीच” के रूप में देखने की लोगों में एक मानसिकता सी बन गयी है, जो निंदनीय है। वैसे हम भारतीय रामानंदी, भजनानन्दी और न जाने क्या-क्या बनते है, लेकिन रामायण के बताए मार्ग पर चलने के नाम पर उसी प्रकार का पाखंडी व्यवहार करते हैं..जैसे अक्सर मौका परस्त नेता “संविधान की अवधारणा” को मानने में करते हैं..ये बातें आज नई पीढ़ी के कोमल मन में घर करने लगी है।…जिससे दिन-प्रतिदिन आपसी वैमनुष्यता बढ़ रही है। अतः मैंने भारतीय काव्य-ग्रन्थों का एक ठोस आधार लेते हुए..कान को लोगों की तरह घुमा फिरा के नहीं ‘एकदम सीधे पकड़ ने का प्रयास किया है’…मेरा मतलव वर्ण-व्यवस्था की मूल-वास्तविकता को लोगों के ज़हन में उसी रूप में उतारने की चेष्टा की है….जो हमारे ग्रन्थाकारों के लिखने का धेय रहा होगा..। अन्यथा इस संवेदनशील मुद्दे पर किसी भी प्रकार का निराकरण कर “अंतिम-निर्णय” सुनाने की मेरी क्या विसात है…?
मैं ये भी जानता हूँ कि आज “लिखने /पढ़ने” की आदत लोगों को बहुत कम है। फिर भी मैं शुक्र गुज़ार हूँ देश-विदेश में मौजूद उन तमाम स्वध्याय-करने वाले अपने “प्रबुद्ध पाठको” का जो न केवल मेरे आर्टिकल्स पढ़ते हैं वल्कि अपने कमैंट्स से मेरी “विचार-अभिव्यक्ति” की सराहना करके…. मेरा हौसला भी बढ़ाते हैं। वे मेरी अपेक्षा के आधार हैं। ऐसे विवेकशील “प्रबुद्ध-वर्ग” के सहारे मेरी “विचार-आभा” दुनियाभर में यूं ही ग्लोबलाइज़ होती रहे…और एक विचारक को चाहिए ही क्या…? पाठकों की “प्रतिक्रिया” ही उसकी असली ऊर्जा होती है।
अब मैं “विश्लेषण” की गहनता पर आता हूँ। मग़र एक बात पढ़ते वक्त “हर पाठक” को ज़हन में अवश्य रखनी होगी। कि रामायण और महाभारत काल के दौरान अर्थात वास्तव में इन घटनाओं के घटित होने के वक्त दुनियाँ में Science & Technology का Level बहुत ही उच्च-कोटि का था। अर्थात उस काल के लोग हर स्तर पर हमसे कई गुना अधिक एडवांस थे। इसलिए उस दौर की आज के दौर से तुलना नहीं की जा सकती। ये आपने भी देखा या पढ़ा होगा..कि भारतीय काव्यों में कई जगह ऐसे मोड़ आते हैं, जब वो दावा करते हैं कि, ये…माईने नहीं रखता कि आप किस परिवार में जन्मे हैं..? वल्कि मायने.. रखते हैं वो लोग जो अपने जीवन में मर्यादित हैं, मानवीय हैं, सदाचारी हैं, और कर्मशील हैं। जिनकी की सोच… लोक-कल्याणकारी है। सबसे विशेष बात तो ये कि उनसे आपके “विचार-मेल” खाते हैं।
और इसी लिए अपने विभाग, समाज, देश या फिर दुनियाँ की भीड़ में से आप उन्हें अपने लिए “चुन” लेते हैं। स्वतः ही आपका अन्तर-मन उन्हें अपने अच्छे मित्र-मंडल में शामिल भी कर चुका होता है। यदि ग़ौर करें,तो आपके जीवन का बहुमूल्य समय दूसरों की तुलना में उनके साथ कहीं अधिक व्यतीत होता है। आप यदि आत्मवलोकन करें, तो आपको इस बात का अहसास अवश्य होगा।
रामायण में ऐसे कई एक उदाहरण हैं जो इस ओर इशारा करते हैं। कि, “खून-के-रिश्ते” आपकी “पसन्द” के रिश्तों के बाद… आते हैं। न मानो तो अपने व्यक्तिगत जीवन में झांक के देख लीजिए….
जैसे- राम और लक्ष्मण सहोदर यानि सगे भाई नहीं थे। अर्थात उनकी माँएं अलग-अलग थी। कौशल्या व सुमित्रा। लक्ष्मण का सगा भाई शत्रुघ्न था। लेकिन लक्ष्मण जीवन में सदैव बड़े भाई राम के साथ ही रहे। वे दोनों स्वभाव से ठंडे-गर्म जरूर थे, मग़र दोनों की “विचार-धारा” समान होने से हर स्थिति-परिस्थिति में सदैव एक दूसरे के भाव समझते थे और साथ ही रहे ।
‘खून के रिश्ते’ वाले दृष्टिकोण से देखें, तो दशरथ अपने किसी भी पुत्र के वास्तविक पिता नहीं थे। ये आप सभी जानते हैं। वे चारों तभी पैदा हुए थे, जब राजा दशरथ ने अपनी तीनों रानियों को यज्ञ से प्राप्त… खीर खिलाई थी।
विल्कुल उसी प्रकार महाभारत में कोई भी पांडव… ‘पांडु’ का पुत्र नहीं था। हालाँकि महाराज पांडु ने उन्हें अपना नाम दिया और उत्तराधिकारी भी माना। ये सर्व विदित है कि पाँचों पाण्डव जिनसे पैदा हुए… वे देव-पुरुष थे…जैसे-
1-युधिष्ठिर- यमराज (यक्ष) के..
2-भीम-वायुदेव के..
3-अर्जुन- इन्द्र के..
ये तीन “पांडु” की पहली पत्नी कुंती के पुत्र थे। जबकि..
4-नकुल ,5- सहदेव } जुड़वाँ थे..ये अश्विन देव के आशीर्वाद से प्राप्त हुए थे।ये पांडु की दूसरी पत्नी माधुरी के पुत्र थे।
ये पांचों पाण्डव खून के रिश्ते से बंधे हुए नहीं थे। कहने को तो ये भी कहा जा सकता है कि, ये तीनों पांडव और दो छोटे भाई भी..आपस में सगें भाई नहीं थे। मग़र..
महाभारत के इन पाँच नायकों को जो करीब लाया वो था “पांडु का नाम” और “कुन्ती की इच्छा-शक्ति।”
चलो महाभारत से एक उदाहरण और ले लेते हैं.. कृष्ण और बलराम भी तो एक दूसरे के सगें भाई नहीं थे। जैसा कि आप सभी जानते हैं कि कृष्ण वास्तव में देवकी के पुत्र थे। जबकि बलराम को रोहिणी ने जन्मा था। इसके बावजूद कृष्ण और बलराम आजीवन एक दूसरे के ऐसे करीब रहे, जो कि आज सगें भाई भी नहीं रह पाते..?
अब एक विल्कुल विपरीत उदाहरण पुनः रामायण से ही …कि रावण और उसका छोटा भाई विभीषण इन दोनों के बीच खून का रिश्ता था। परंतु वैचारिक भिन्नता होने के कारण…विभीषण के बहुत निभाने के बावजूद भी एक दिन “वो घड़ी” आ ही गयी…कि रावण ने खून के रिश्ते से बंधे अपने “पुत्र समान” आज्ञाकारी भाई को सब के सामने लात मारकर हमेशा के लिए अपने आप से दूर जाने को मज़बूर कर दिया। जो रावण के पतन का कारण भी कहा जाता है। विभीषण धार्मिक प्रवृत्ति का था, इसलिए उसने श्री राम की शरण लेना ही उचित समझा।
अब थोड़ा आगे बढ़ते हैं, और इन पारिवारिक बन्धनों को पीछे छोड़ते है.. और भारतीय समाज के लोगों को जन्म से प्राप्त होने वाली “जाति” के आधार पर “व्यक्ति” के ऊपर “ऊंच-नीच” का लेवल लगाने वाली मानसिकता जो किसी महामारी से कम नहीं है। इसकी..
ओर रुख करते हैं…क्योंकि नेताओं की तुष्टिकरण-नीति के कारण वर्षों से लोगों के दिलों में एक वैमनष्यता का बीज निरन्तर वोया जाता रहा है… मौका परस्तों (नेता) की धृष्टता तो देखिए…
भारत को आज़ाद हुए लगभग 72 वर्ष हो चुके हैं। सरकार द्वारा देश की जनता को सदैव जातियों में बांट कर रखने वाली “निकृष्ट-मानसिकता वाले मौका परस्तों द्वारा हमें आज भी “जातिवाद” के मायने समझाए जाते हैं। हमें बताया जाता है कि जिस “जाति” में हम पैदा हुए हैं वही हमारी ज़िन्दगी को निर्धारित करती है।
जबकि भारतीय इतिहास व काव्य ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं, जो न सिर्फ कहते हैं… बल्कि दावे के साथ सिद्ध भी करते हैं कि व्यक्ति के “कर्मों” द्वारा ही उसके भाग्य का निर्धारण होता हैं। न कि उसके “जन्म” द्वारा।
“जाति” से मुझे याद आया..कि महर्षि वाल्मीकि ब्राह्मण नहीं थे। वल्कि वो एक डांकू थे। हिंदी में एक कहावत है…कि “जब आँख खुलीं तभी सवेरा” अर्थात किसी के जीवन का रूपांतरण कब हो जाए… ये कोई नहीं जानता। अब देखिए कुछ साधुओं की बात से वाल्मीकि को अपने भटकते हुए जीवन का अहसास हुआ, तो लोगों द्वारा लूट-मार करने वाली “जाति” के व्यक्ति (वाल्मीकि) ने एक “रामायण” जैसे महाग्रन्थ की रचना कर डाली। अब आप “जाति” की श्रेष्ठता स्वीकारेंगे या “कर्म” की..? ये फैसला मैं आप पर छोड़ता हूँ..
यहां मेरा कहने का भाव ये है, कि किसी भी कार्य की सफलता के लिए पहले कार्य का “चुनाव” दूसरे चुने हुए कार्य के प्रति उस अमुक व्यक्ति का समर्पण.. कहीं अधिक महत्व रखता है। इन जन्म, जाति,धर्म आदि की अपेक्षा।
सामान्य तौर पर पुस्तकों में या लोगों द्वारा ये कह दिया जाता है, कि महाभारत के रचयिता “वेदव्यास भी कोई बहुत ऊंचे कुल ( जाति) के नहीं थे।”
लिखने की इस शैली को मैं भाषा का दिवालियापन कहता हूँ। अब आप दुनियाँ का इतिहास उठा के देख लीजियेगा..जो भी व्यक्ति दुनियाँ में बड़ा.. हुआ है वो कर्म, संस्कार एवं अपनी लगन से बड़ा हुआ है, न कि किसी जाति विशेष में पैदा होने से। वल्कि इसका उलट ये है। कि अच्छे कर्म, संस्कार और अपनी लगन से व्यक्ति जिस किसी “जाति” से होता है। उसे “धन्य” और कर देता है। वेदव्यास जी ने महाभारत जैसे ग्रन्थ की रचना करके अपने कर्म से ख़ुद को समूचे विश्व में एक कवि के रूप में स्थापित किया। ये उनके “कर्म” की महानता है। वेदव्यास जी के पिता तो एक पराशर-ऋषि थे। मग़र उनकी माता एक मछुआरिन थीं। इस विश्लेषण से ये समझ लेना चाहिए , कि बच्चे में यदि संस्कार अच्छे हैं, तो ये चीजें कोई मायने नहीं रखती। कि वो किस जाति / धर्म से है।शिक्षा :- 1- देश के जनसंख्या घनत्व को ध्यान में रखते हुए कम से कम 1 या अधिक से अधिक 2 बच्चों को देश के लिए अच्छे और सच्चे नागरिक देने का संकल्प ले सके तो ही सन्तान उत्पत्ति करें।2-इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि वो “लड़का” है या “लड़की”। हां ग़लत परवरिश से जरूर फ़र्क पड़ता है।एक अजीब विडम्बना देखिए.. वाल्मीकि कृत रामायण का खलनायक प्रबुद्ध-रावण ऋषि विस्वरवा का पुत्र था, जो जाति से “सारस्वत-ब्राह्मण” था। लेकिन अपने विकर्मों (ग़लत कर्मों) की बजह से उसने ख़ुद को एक दुष्ट खलनायक के रूप में स्थापित किया। कर्ण एवं एकलव्य दोनों ही कर्म, संस्कार और अपनी लगन के बल पर न केवल महान धनुर्धर बने। वल्कि उनकी “कार्य-निपुणता” का लोहा पूरी दुनियाँ, मानती है। और सदैव मानती रहेगी…लेकिन “जाति” से ऊंच-नीच का आंकलन करने वाली मानसिकता ने उन्हें भी कदम कदम पर जलालत महसूस कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
इसीलिए काव्य या फिर इतिहास सिर्फ सामाजिक मूल्यों और भाग्य को ही नहीं दर्शाते वो उस व्यक्ति की “इच्छा-शक्ति” और उससे सम्बंधित “कर्म” को भी दर्शाते हैं। वो आपके अस्तित्व के बारे में हैं। जीवन में लोगों का स्थान उनके जन्म लेने पर निर्भर नहीं करता। वो आकार लेता है, उनके “कर्मो” से ।और उस चुनाव से जिसे वे अपने लिए चुनते हैं।
विश्लेषण की गम्भीरता इस निष्कर्ष पर पहुंचती है। कि जाति,धर्म व खून के रिश्ते ज्यादा माईने नहीं रखते। अगर कुछ मायने रखता है, तो व्यक्ति का स्वभाव, कार्य का चुनाव और उसके प्रति ख़ुद का समर्पण-भाव।धन्यवाद; युग,फ्रॉम
नीमगाँव,राया,मथुरा।
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