अर्थात “जो आप जानते हैं उसे ठीक-ठीक जानें”…क्योंकि संसार में अपार ज्ञान है… so You should be CONFIRM with that not CONFUSE
In the reference of INTELLIGENCE (बुद्धि)…
ये एक सामान्य सा विचार है.. कि कर्मेन्द्रियाँ ‘मन’ के अधीन होती हैं।
मग़र ये ‘सद्बुद्धि’ के अधीन हों, तो मेरा ऐसा मानना है कि “जीवन-लक्ष्य” प्राप्ति और… सहज हो जाती है। ये तो सभी मानते ही हैं कि बुद्धि बल – शरीर बल से बड़ा है। तभी तो अक्सर पूछ लिया जाता है..कि “अक्ल बड़ी या भैंस”=?
“बुद्धि” में ही वो सामर्थ्य है जो ‘ज्ञान’ को धारण करती है। मग़र किसी भी प्रकार की क्रिया/गति (any activity in the Brain) कभी भी बिना ‘ज्ञान’ के नहीं होती… इसीलिए
पहले शिक्षित होना… फिर अनुभवी लोगों की संगति में ‘गुनना’ अर्थात “प्राप्त ज्ञान” को जीवन के असल धरातल पर परखना..
I mean ‘उस ज्ञान’ के साथ अपने जीवन में in practical होना..प्रत्येक के लिए अति-आवश्यक है। और यही वो Process है जो Knowledge को Wisdom में तब्दील करता है।
otherwise ज्ञान के साथ-साथ दुनियाँ में ज्ञानियों की भी कोई… कमी नहीं है। ये आप भी जानते हैं कि…
सभी “Wise-Man” नहीं होते =?
जीव के अंदर या फिर बाहर उसके द्वारा की गयी…किसी भी प्रकार की हलचल ‘क्रिया’ अर्थात “कर्म” …जिस के बिना किसी भी कार्य की सिद्धि तो दूर… ये जीवन ही सम्भव नहीं है।
और ध्यान रहे “कर्म” चाहे Positive करो या Negative आपके जीवन के “बहुमूल्य-पल” दोनों में ही खर्च होने हैं। जो आपके पास सीमित हैं। तो फिर अपने समय और ऊर्जा की बर्बादी क्यों=?
लेकिन अगर परिणाम में जाएं…, तो Negative कर्म से व्यक्ति का जीवन गफ़लत में पड़ जाता है। जो घुटन देता है। जबकि Positive कर्म से व्यक्ति जीवन की वाँछनीय ऊंचाइयों को छू लेता है। जो सुकून देती है।
मग़र निर्णय लेने की स्वतंत्र-इच्छा (Free-Will)….को व्यक्ति अपना
जन्म सिद्ध अधिकार तो मानता है। लेकिन विल्कुल वैसे ही है। जैसे कुछ लोगों को “पैत्रिक धरोहर” तो मिल जाती है। परन्तु वे उसे संजो नहीं पाते। भटकाव के कारण बर्बाद होते चले जाते हैं। लेकिन ये Spiritual-System अभी भी सीधे-सादे लोगों की समझ से काफ़ी परे है…
इसीलिए केवल भौतिक सफलता ही नहीं बल्कि अध्यात्म ज्ञान की प्राप्ति के लिए भी बुद्धि (INTELLIGENCE) की नितांत आवश्यकता है। ये wisdom ही तो है जिसके बल पर मनुष्य..”आत्मा और परमात्मा” जैसे सूक्ष्म विषयों को ग्रहण कर इतना महान बन जाता है कि लाखों-करोड़ों लोग अपने ही जैसे चार-हाथ-पांव वाले समतुल्य-प्राणी “मनुष्य” की बुद्धिमत्ता के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। इससे ज़ाहिर होता है कि “बुद्धि” न केवल बहुत बड़ी शक्ति है, बल्कि ये वाक़ई “सिद्धदायिनी” है। इसके प्रति हम सब को At Any Cost सदैव गम्भीर रहना ही चाहिए….
धन्यवाद
योगेंद्र सिंह पचहरा,
नीमगाँव, राया, मथुरा
(महज़ एक विचार)