एक अमीर व्यक्ति ने अपनी आखिरी इच्छा व्यक्त करते हुए, अपने इकलौते बेटे से कहा, बेटा! अब ये मेरा लगभग आखिरी वक्त ही है। इसलिए जब मेरा ये शरीर छूट जाय,तो तू मेरे पैरों में ये फ़टे हुए मौजें अवश्य पहना देना। ये मेरी आखिरी इच्छा है। इसे जरूर पूरी कर देना।
कुछ दिन बाद जब उस पिता ने अपनी आखिरी सांस ली , तब उनके इकलौते पुत्र ने उनकी आखिरी इच्छा वहां पर मौजूद सभी लोगों को बताई।, तो अधिकांश लोगों ने उसे सनातन
धर्म के अनुसार उचित नहीं माना और..कहा कि मृत्यु मनुष्य जीवन का अंतिम संस्कार होता है। जिसमें मृत शरीर को कोई पुराना वस्त्र पहनाने की इजाज़त नहीं है। आख़िर ये बहस इतनी बढ़ गयी कि उस नगर के अनेक जानकर लोगों को बुलाया गया..जब कोई नतीजा नहीं निकलता दिखा, तो आख़िर में उनके ही पड़ौस से एक महोदय निकल कर आये। उन्होंने ने उस मृत पड़े व्यक्ति के इकलौते बेटे के हाथों में से वो कागज़ लेकर, जो “इच्छा-पत्र” कम एक पिता द्वारा दी गयी “नसीहत” कहीं अधिक था।, उसे समस्त उपस्थित लोगों को पढ़कर सुनाया। उसमें लिखा था..
” मेरे प्यारे बेटे अब तुम देख ही रहे होगे..ये दौलत, बंगला,गाड़ी,बिज़नेस-प्रोजेक्ट और अपने गाँव में बने फार्म-हाउस आदि इतना सब कुछ ताम-झाम इकट्ठा कर लेने के बावजूद भी मैं शरीर पे एक फटा हुआ मौजा,जो यहीं थोड़ी देर बाद सब कुछ जलके ख़ाक हो जाने वाला है। तो भी नहीं ले जा पा रहा हूँ। अब तुम सोचिएगा..कि जीवन की सच्चाई जब इतनी स्पष्ट है, तो फिर क्यों व्यक्ति “फेयर & फाउल” पूरे जीवन भर इस कवाड़ को जोड़ने में लगा रहता है..? नियति के अनुसार व्यक्ति या फिर कोई वस्तु अपने पूर्व-संस्कारों ( Pre-Rituals ) के संयोग के कारण ही इस मृत्यु-लोक में आते हैं..उन्हें पूरा करके अपने “नियत-समय” से चले जाते हैं। ये ही दुनियाँ की रीति है।
बेटे! जो बात मैं जीते जी तुमसे बार-बार कहता रहा..मग़र तुम हवा में उड़ाते रहे..उसी को आज फिर आखिरी बार मरने के बाद भी फ़र्ज़ स्वरूप अपने “इच्छा-पत्र” के माध्यम से समझाने का एक और निष्फल प्रयास ही सही… मग़र कर रहा हूँ..जो हर पिता करता है…
बेटा! अब तो जीवन के प्रति तुम होशियार हो जाईये..और सदैव यही कोशिस करियेगा कि “अपने लाभ के लिए कभी किसी को दुःख एवं धोखा मत दीजियेगा।” भगवान की “पूर्व-निर्धारण-व्यवस्था” के अनुरूप जो भी स्थिति-परिस्थिति बनें, बे-हिचक ईश्वर को हाज़िर-नाज़िर मानते हुए “अपने-आप” को हमेशां न्याय के पक्ष में ही रखियेगा। ये मेरा अटल विश्वास है। कि कभी तुम्हारा कोई अहित नहीं कर सकेगा। मनुष्य की जीवन यात्रा बहुत लम्बी नहीं होती है। उसका सारा जीवन “घर की दहलीज़ से लेकर श्मशान” तक पहुंचने में ही बीत जाता है।
एक और बात ध्यान रखना…कि साल में 50 मित्र बनाना एक आम बात है। मग़र एक मित्र से 50 साल तक मित्रता निभाना..जरूर ख़ास बात है।
बेटा ! ये बात सही है कि एक मिनट में ज़िन्दगी नहीं बदलती। परन्तु..इतिहास गवाह है। एक मिनट में “सोच-समझकर” लिए गए फैसले..सदैव से ज़िन्दगी बदलते आये हैं। शेष तुम ख़ुद समझदार हो…
पारिवारिक रिश्ते से एक पिता का शुभ-आशीष सदैव तुम्हारे साथ बना रहेगा..
Good bye… ”
“इच्छा-पत्र” को पढ़ने एवं सुनने वाले सभी प्रबुद्ध जनों का धन्यवाद
युग पचहरा” आभार प्रकट करते है। राधे-गोविन्द.. राधे-गोविन्द..धन्यवाद।

Very good and realistic thought. यही इस जीवन का सार है।
धन्यवाद…
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Thanks for your urgent & positive response..
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सर इस प्रेरणादायक कहानी को लिखने के लिए आपको मेरा कोटि-कोटि नमन
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Thanks
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आपका प्रत्येक ब्लॉक इतना सुंदर एवं प्रेरणादायक होता है आपका ब्लॉग पढ़कर मन को अत्यंत प्रसन्नता एवं शांति की अनुभूति होती है।।।।।
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मुझे अपने आप पर गर्व है कि मैं आप जैसी महान आत्मा का श student हूं और अब भी आप को फॉलो करता हूं
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Thanks फ़ॉर your great thoughts
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