
आपने अंग्रेजी की एक पुरानी और काफ़ी लोकप्रिय कहावत जरूर सुनी होगी…..
“Rome was not built in a day..”
लेकिन “समय-चक्र” ने आज अपनी चाल बदली, तो it collapsed in a week….अर्थात वही रोम एक सप्ताह में ढह गया।
जीत लिए सारे देश..?, कर ली औद्योगिक क्रांति.. ?, कमा लिए पेट्रो डॉलर.. ?,
हो गया ज़िहाद..? और बन गए सुपर पावर या अभी भी कुछ वाकी है..???
अरे…भले मानुस ! बार-बार अपनी हठ धर्मिता से बाज क्यों नहीं आते हो.?, प्रकृति से क्यों इतनी छेड़-छाड़ करते हो..? आपको समझ नहीं आता..?, इस दुनियाँ का अरबों-खरबों वर्ष पुराना इतिहास उठा के देख लो। जब-जब प्रकृति रुपी शक्ति (GOD) को नज़र अंदाज़ किया गया है। तब-तब सन्तुलन उसने स्वेम ही बनाया है।
शर्म करो..फिर Developped Country होने का दम क्यों भरते हो।
एक सूक्ष्म से परजीवी ने आपको घुटनों पर ला दिया…न आपके एटम बम काम आ रहे न पेट्रो रिफाइनरी..? क्योंकि इतिहास गवाह है। अनधिकार चेष्टा वाले देश हों या कोई परिवार अति-लालच में जहाँ “अनुशासन और नेक-नीयत” की कमी होती चली जाती है, वहाँ “वक़्त” की बदलती हुई करवट किसी से कभी भी झेली नहीं गयी है। वहाँ ग़लत तरीके से कमाया हुआ अनिष्ट धन एवं भौतिक ‘विकास’ सब धरा का धरा रह जाता है। धरासाई होते ऐसे मंज़र हमने कई बार देखे हैं। इतिहास सदैव अपने आपको दुहराता है। बड़े-बड़े सम्पन्न लोग (देश) एक छोटे से जीव का सामना नहीं कर पा रहे..? पूरा विश्व देख रहा है…बताओ निकल गयी ना सब “हेकड़ी ” इनकी।
इस “जनता कर्फ्यू” के दौरान वक्त मिलने पर मैने जब इतिहास के पन्नो में झांका तो पाया कि..
1-मध्य युग में पूरे यूरोप पर राज्य करने वाला रोम (इटली) संचित कर्म के खाते में विकर्मों की अधिकता हो जाने के ही कारण आज पूरी तरह नष्ट होने के कगार पर आ गया है।
2-मध्य पूर्व को अपने कदमों से रौंदने वाला ओस्मानिया साम्राज्य(ईरान,टर्की) देखते ही देखते वक्त के सामने आज घुटनों पर है।
3-ब्रिटिश-साम्राज्य, जिसकी लगाई हुई दीमक आज भी भारत की जड़ों को खोखला करने में कसर नहीं छोड़ रही। कहा जाता था कि जिसका सूर्य कभी अस्त नहीं होता। आज उसके वारिस बर्मिघम में कैद हैं,
4- जिनके एक इशारे पर दुनियाँ के नक्शे बदल जाते हैं। वो अमेरिका भी आज छट पटा रहा है।
5-आने वाले समय में जो सबको निगल जाने की धमकियां दिया करता था। वो “विश्वासघाती चीन” आज न केवल सबसे मुहँ छिपाता फिर रहा है। वल्कि सभी देशों की कुफर गालियाँ भी खा रहा है। अभी आगे देखते जाइये लोग (देश) चीन पर तो अपने “जान-माल” के नुकशान की भरपाई के दावे भी ठोकेंगे।
ताज्जुब की बात देखिए इन सब की भितर घातों से आहत “सौम्य- स्वभावी-भारत” के घाव अभी ढंग से ठीक भी नहीं हुए हैं। मगर बेहयाई की हद देखिए आज सब के सब उसी (आदर्श-भारत) की ओर आशा भरी नजरों से इक टक देखते नज़र आ रहे हैं। जो तीस मार खां बनते थे। उन सभी को एक छोटे से जीव ने उनकी औक़ात बता दी है।
जब इस ज्वलंत मुद्दे पर बात हो ही रही है तो विश्व स्तर पर हो रही सुगबुगाहट जो निकट भविष्य में एक सच्चाई के रूप में सामने आनी ही है। क्योंकि जैसे-जैसे ग्लोवल वार्मिंग बढ़ेगी, ग्लेशियर्स की बर्फ पिघलेगी, लाखों वर्षो से बर्फ की मोटी चादर में दवे दानवीय-विषाणु, जिनका न आपको परिचय है और न ही उनसे लड़ने की कोई किसी भी प्रकार की तैयारी है, जब वो आज़ाद होंगे तब क्या होगा…?
ज़नाब ये कोरोना तो सिर्फ एक झांकी है। ये तो बस एक चेतावनी है आने वाली उस विपदा की…, मनुष्य ने प्रकृति से लगातार खिलवाड़ करके ऐसी आपदाओं को स्वंय जन्म दिया है।
अब एक महत्वपूर्ण सवाल ; क्या आप जानते हैं ऐसी तमाम आपदाओं से बचने या लड़ने का तरीका…कहाँ छिपा है वो ब्रह्मास्त्र ..?
एक आसान सा जवाब ; अकूत ज्ञान के भंडार भारत में ही…
1-तक्षशिला के खंडहरों में,
2-नालन्दा की उन पुस्तकों की राख में,जो भारत देश के “अथाह ज्ञान” की ऊंचाई के सामने अपने बौने-पन को छिपाने के लिए जला के ख़ाक कर डाली।
3-शारदा पीठ के अवशेषों में,
4- मार्तण्डय के पत्थरों में। आदि..
सूक्ष्म या परजीवियों से मनुष्य का ये युद्ध कोई नया नहीं है। ये तो सृष्टि के आरम्भ से अनवरत चल रहा है। यदि प्रकृति से छेड़छाड़ जारी रही, तो आगे भी चलता रहेगा…, सभ्य-सुसंस्कृत भारत ने इनसे लड़ने के हथियार खोज भी लिए थे। लेकिन इन्हीं अहंकारी और लालची देशों ने जो आज घुटनों पर आ गए हैं, इनकी स्वंय को श्रेष्ठ साबित करने की हठ ने सब नष्ट कर दिया।
अगर आपको स्वर्ण और रत्नों के भण्डार ही चाहिए थे ,तो हम से मांग लिए होते।
राजा बलि के वंशज एवं दानवीर कर्ण के अनुयायी हैं हम। यूं ही दान में दे देते।
हम भरतीय वैभव त्यागकर (सन्तोषी स्वभाव) “शान्ति की खोज” करने वाले समाज के लिए तो वैसे भी ये सब चीजें मूल्यहीन ही थीं। ले जाते।
लेकिन अफसोस! आपने तो विश्वबंधुत्व के सिद्धांत पर उभरते हुए भारतीय सभ्य समाज को खत्म करके अपने को स्थापित करने की चाह में सब कुछ आरम्भ में ही नष्ट कर डाला।
किंतु “अच्छाई किसी पुरुस्कार या प्रशंसा की न कभी मोहताज़ रही है.. न रहेगी।
“आप हमारे गौरवशाली इतिहास को मिटाने के प्रयास एवं सदैव से कमतर आंकते आये हैं। क्योंकि आपको वो “MEAN-MENTALITY” की भयंकर बीमारी है , जिससे ग्रसित कुछ प्रतिशत लोग देश-दुनियाँ के हर समाज में व्याप्त होते हैं। जिन्हें अपने अतिरिक्त किसी दूसरे की “अच्छाई या उन्नति” हज़म नहीं होती… लेकिन ऐसी “निकृष्ट-सोच” रखने वाले ईर्ष्यालु लोग या देश सदैव मन-मसोस के ही रह जाते हैं। होता वही है जो अमुक व्यक्ति या फिर देश के प्रारब्ध के अनुरूप “पूर्व-निर्धारित” (PRE-DESTINATION) हो चुका होता है। मुक्त-इच्छा (FREE-WILL) के दृष्टिकोण से भी हम ह्रदय से काफ़ी उदार हैं।
इसलिए भी हम भारतीय आपको निराश नहीं करेंगे, ये एक सच्चे भारतीय होने के नाते मेरा ख़ुद का अटूट विश्वास भी है.. कि फिर से माँ भारती का आँचल सभी को इस संकट की घड़ी में छांव देगा। श्री राम के वंशज इस दानव से भी लड़ लेंगे, ऋषि दधीच के पुत्र अपने शरीर की अस्थि-मज्जा देकर भी आपको बचाएंगे।
किन्तु ध्यान रखियेगा…मार्ग उन्हीं नष्ट किये गए हवन कुण्डों से निकलेगा। जिन्हें कभी आपने अपने पैरों की ठोकरों से तोड़ा था।
आपको फिर से उसी नीम और पीपल की छांव में आना होगा, जिसके लिए आपने कभी हमारा उपहास किया था। आपको उसी गाय की महिमा को स्वीकार करना होगा, उन्हीं वेदों को पढ़ना होगा,जिन्हें कभी अट्टहास करते हुए नष्ट किया था।
उसी चंदन और तुलसी को मस्तक पर धारण भी करना होगा, जिसके कारण कभी हमारे मस्तक धड़ से अलग कर दिए गए थे।
ये किसी “मानव-निर्मित न्यायालय” का निर्णय नहीं ईश्वर-प्रदत्त “प्रकृति रूपी न्यायालय” का न्याय है, जो आपको सहर्ष स्वीकारना ही होगा।
फिर कहता हूं इस दुनियां में जीना है तो न केवल सोमनाथ में सिर झुकाने आना होगा अपितु तक्षशिला के खंडहरों से भी मांफी मांगनी होगी। और नालन्दा की खाक भी छाननी होगी।
तब कहीं सम्पूर्ण दुनियाँ में स्थापित हो सकेगा …
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , मा कश्चिद दुःख भाग भवेत….;
विचारक ; युग पचहरा, जन्म-भूमि; नीमगाँव,उत्तर प्रदेश,भारत।
Bahut Sunder Vichaar…
These are most valuable things which you are described..!!
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Thanks shailendra जी but comment के साथ like भी हो जाय तो …खैर कोई बात नहीं ठीक Thanks again
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