कुछ लोग ऐसा सोचेंगे कि, इस लेख का टाइटल मशहूर सिंगर मुकेश जी के एक गाने से प्रभावित होकर रखा गया है। कुछ ये कि अभिनेता फारुख शेख जी के एक कार्यक्रम का नाम भी यही था जो टीवी स्क्रीन पर बड़ी बड़ी शख्शियतों का बेहतरीन साक्षात्कार कराते थे.. ठीक है सोचने के लिए हर व्यक्ति स्वतंत्र है।आप भी अवश्य सोच लीजिएगा।
मगर आप से मेरा आग्रह तो इस लेख के प्रेरणा स्रोत व्यक्तित्व से कुछ सीख लेने का है..और कुछ नहीं।
चलो! तो पढ़ना शुरू करें
“जीना इसी का नाम है”
वैसे भी हर “सफल व्यक्ति” जीवन में किसी न किसी को अपना “रोल-मॉडल” मानता ही है। अधिकतर के लिए उसका पिता या फिर उसके अपने कैरियर से रिलेटिड क्षेत्र से उसका अपना कोई पसंदीदा “आइडियल-पर्सन।” जिसे फॉलो करके वह न केवल अपने जीवन में आगे बढ़ता है। अपितु वह अपनी ज़िन्दगी को हरपल वैसा ही आकार देने के प्रयास में रहता है। सम्भवतः पूरी सिद्धत व लगन के साथ की गयी मेहनत के दम पर एकदिन पूरी दुनियाँ से वह अपनी कामयाबी का लोहा मनवा ही लेता है।
क्योंकि वो अपने ख़ुद के अन्दर हर पल अपनी चॉइस के “ड्रीम-हीरो” को फ़ोकस करते हुए आगे बढ़ता है।
यदि स्थितियां बहुत अधिक प्रतिकूल न हों,तो वह एक न एक दिन अपने आदर्श के अनुरूप ख़ुद को स्थापित करके ही दम लेता है।
इसी लिए दुनियाँ में ये कहावत प्रचलित है। कि “इतिहास सदैव अपने आप को दोहराता है।” और आप देख ही रहे होंगे कि…
दुनियाँ का इतिहास ऐसे “रियल हीरोज़” की सच्ची कहानियों से भरा पड़ा है।
ऐसे ही …
एक सच्चे अन्तर्राष्ट्रीय “बास्केट बॉलर” मिस्टर ‘कोबी ब्रायंट’ (Mr. Kobe Brayant) जिसने अपने जीने के अंदाज़ से पूरी दुनियाँ को “आर्ट ऑफ लिविंग & आर्ट ऑफ डाइंग” का बेहतरींन पाठ पढ़ाया।
जो भारत के युवाओं के लिए ही नहीं.. पूरी दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति के लिए उनके मेहनत करने का अंदाज़, और उनकी जिंदादिली बेहद.. प्रेरणादायक है। इसलिए एक एक बिंदु को गंभीरता पूर्वक पढ़िएगा।
पूर्व NBA के खिलाड़ी एक सुप्रसिद्ध “अंतर्राष्ट्रीय बास्केट बॉलर” कोबी ब्रायंट, दुर्भाग्य से महज़ 41 वर्ष की उम्र में एक बहुत ही सुरक्षित बताए जाने वाले विमान “सिरोस्की S-76B” के क्रेस हो जाने से उनका स्थूल शरीर नष्ट हो गया। ये हम सबके लिए दिल दहलाने वाली ख़बर थी। उस वक्त शायद टेलीविज़न पर आपने भी अवश्य देखी या फिर सुनी होगी।
फिर भी हम ऐसे महान व्यक्तित्व की बहुत सी खूबियों से अछूते रह जाते हैं.. क्योंकि मैं, ऐसा मानता हूँ कि किसी भी महान व्यक्तित्व को अल्फाजों में कवर करना आसान नहीं होता।
मांफ कीजियेगा मगर वही निष्फल प्रयास (wild goose chase) इस लेख के ज़रिए एक बार मैं भी कर रहा हूँ…मन नहीं मानता..
“कोबी ब्रायंट ” को खेल से इतना अधिक प्यार एवं लगाव था कि वे लगभग 20 वर्ष तक निरन्तर अपने खेल को बेहतर बनाने में जुटे रहे।
ये NBA के इतिहास में सबसे कम उम्र के खिलाड़ी थे, 6 फ़ीट 4 इंच लम्बे इस खिलाड़ी ने मात्र 18 वर्ष की उम्र में खेलना शुरू कर दिया था। लेकिन ध्यान रहे 24 वर्ष की उम्र में वो “सबसे कम उम्र में.. सबसे ज्यादा ‘गोल-स्कोर’ करने वाले खिलाड़ी भी बने गए थे।”
हालाँकि कोबी, को ये सफलताएं इतनी आसानी से,तो नहीं मिली थीं। इसके लिए उन्होंने अपनी मेहनत से दिन रात का फर्क लगभग मिटा दिया था।
मैं, कैरियर-गाइडेंस के प्रोग्रेम्स में अपने छात्रों से एक बात सदैव बोलता रहा हूँ कि ..जुनून (Passion) तो कई लोगों में होता है। मग़र वो सारा जीवन… उसमें खपाना नहीं चाहते.., इस बात में विरोधाभाष अवश्य है।
मग़र ये सत्य है। लोग, परिवार व मित्रों के साथ भरपूर समय बिताना चाहते हैं.. , छुट्टियों पर घूमने की मस्ती…, अपने सभी रिश्तों को… पूरा वक्त देना चाहते हैं।… ये सब कुछ करते-कराते वे ‘ जीवन की ऊंचाइयों… ‘ को भी छूने की चाह.. रखते हैं।
जबकि वे अपनी दैनिक कार्य-शैली में कोई तब्दीली या परिवर्तन जैसा कुछ नहीं करते। ये विडम्बना अधिकतर के साथ होती है।
लेकिन इतिहास गवाह है। जिसने भी कीर्तमान स्थापित किये हैं… उसने शुरुआत अपनी “कार्य-शैली” के परिवर्तन से की होती है। और बड़े धैर्य के साथ स्टेप वाइज..धीरे धीरे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है।
शायद इसीलिए वे असाधारण होते हैं। उनके अंदर अपने कार्य के प्रति “पूर्ण समर्पण..”होता है। और “कोबी ब्रायंट” जैसे ; प्लेयर् तो मेरी नज़र में यूथ-जेनरेशन को जाग्रत करने के लिए एकदम… ‘फुल-पैकेज’ जैसे हैं।
कोबी, जैसे पूर्ण-समर्पित व्यक्तित्व हमें ये सिखाते हैं कि जब आप सफलता के रास्ते पर चलते हैं और अपने उद्देश्य को किसी भी स्थिति या फिर परिस्थिति में प्राप्त कर ही लेना चाहते हैं, तो आपके लिए कई एक चीजों के साथ “सामंजस्य” बिठा लेना भी आवश्यक होता है।
इस सन्दर्भ में कोबी ब्रायंट, अक्सर कहा करते थे.. कि मैं खेल-जगत से सन्यास लेने के बाद ये नहीं कहना चाहता कि,
“काश!. मैंने थोड़ी मेहनत और… करली होती!!”
हालांकि कोबी ब्रायंट आज शरीर से हम-सब के बीच तो नहीं हैं। लेकिन..अपने जिन्दा-दिल “विचार” से वे हर दिल में हैं और हमेशा रहेंगे….
यही वो “स्थिति” है जो मुझ जैसे नाचीज को
” जी..ना” इसी का नाम है.. ” जैसे बड़े विचार पर अपना व्यू रखने को बाध्य करती है।
उन्होंने जीवन के सबसे बड़े उद्देश्य को अपने जी..ते-जी… हांसिल कर लिया था।
कोबी ब्रायंट का कहना था..,
“जब मैं बास्केट बॉल के कोर्ट पर उतरता हूँ, तो मेरे अन्दर स्वत: किसी ‘ग्लेडिएटर’ अर्थात एक ‘योद्धा’ जैसी भावना आ जाती है।”
यानी कोर्ट पर आते ही उनका व्यक्तित्व एकदम से बदल जाया करता था। उनके इस विचार से मैं भी पूरी तरह एग्री करता हूं क्योंकि मैं भी सदैव से इस बात का पुरज़ोर समर्थक रहा हूँ कि By-Choice अपना कैरियर चुनने वाले हर व्यक्ति को अपने कार्य-क्षेत्र में कार्य करते वक्त ऐसी ही अनुभूति होती है। उस दौरान
बेहतर से बेहतर “परफोर्मेंस ” देने के अलावा दूसरी कोई बात ज़हन में होती ही नहीं है। ये अनुभूति ही हमारी “कर्तव्य निष्ठा” का सच्चा अवार्ड होती है। कोई ट्रॉफी या प्रसस्ति पत्र नहीं।
और यही वो अवस्था है जो इंसान को “आम से खास” बनाती है।
यदि हम इसे मनोवेज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो इसी अवस्था को “Mental Switch” कहा जाता है। ये अक्सर देखा भी गया है कि.. जब “परफॉर्मर” इस अवस्था में होता है…, तो वह मानसिक-स्तर पर अपने कार्य में इतना ‘तल्लीन’ हो जाता है कि, उस वक़्त वह बाहरी दुनियाँ से लगभग “डिस-कनेक्ट” सा हो जाता हैं। उस वक्त उसके सामने सिर्फ “लक्ष्य” होता है। और…. कुछ भी नहीं। This state of a human body is the “Mental-Switch” in psychology.
इतिहास साक्षी है।अपने “जीवन-लक्ष्य” को इस तरह Focus करने वाले व्यक्ति बहुत कम साधनों में बड़े से बड़े कीर्तमान स्थापित कर जाते हैं।
“कोबी” अपने समय के खिलाड़ियों की तुलना में अधिक मेहनत करने में ज्यादा विश्वास करते थे। जैसे उनकी ग्रिप अच्छी थी मग़र उनके हाथों की मांशपेशियां ज्यादा मजबूत नहीं थीं।इसलिए जबरदस्त अभ्यास करके मांशपेशियों को मजबूत बनाया।
उनके पास खेलने में गति.. अच्छी थी लेकिन वे उससे सन्तुष्ट नहीं थे, तो कड़ी मेहनत करके इस बाधा को भी दूर किया।
कई बार सब कुछ ठीक होने के बावजूद भी वे “गोल” करने से चूक जाया करते थे। वे घर आकर ख़ुद का पुनः आत्मविश्लेषण किया करते थे, जो हर किसी को करना चाहिए, तो उन्हें समझ आया कि सब ठीक था। लेकिन उनके पैरों में वो मजबूती नहीं थी। जो दूर से जम्प करके बॉल को बास्केट में डालने के लिए होनी चाहिए थी। तब उन्होंने अपनी ट्रैनिंग में कुछ और बदलाव किये। जिससे अभ्यास करके अपने पैरों को और मजबूत किया।
अध्यात्म भी यही कहता है.. हम अपनी इंद्रियों और स्थूल शरीर के क्रिया कलापों के केवल “दृष्टा” होते हैं भोक्ता नहीं। क्योंकि हम “सोल कॉन्शियस” है न कि “बॉडी कॉन्शियस”।
इससे पता चलता है कि वे स्वंय के ही प्रतिद्वंदी थे। इस तरह वे खेलते वक्त स्वंय को प्रतिदिन नई चुनौतियाँ दिया करते थे।उनके बहुत से गुणों में से ये गुण भी रिमार्केबल है। जो उन्हें एक महान खिलाड़ी की पंक्ति में ला कर खड़ा करता है।
अब आप थोड़ा सा “मानव-शरीर” की ‘क्षण-भंगुरता’ पर विचार कीजिये… क्योंकि ये भी संसार का “कटु-सत्य” है। अगर अचानक हमारे सामने मौत आकर खड़ी हो जाय, तो क्या हम उसे सहर्ष स्वीकार कर पाएंगे=? क्या इतने तैयार हैं हम..?
क्या हम ये कह पाएंगे कि हमने अब तक जो भी किया अपनी लगन और पूरी तन्मयता के साथ ईमानदारी से किया है…… तत्काल जाना भी पड़े तो कोई गिला नहीं!!
“कर्मण्येवाधिकारस्ते.. ” वाले सिद्धांत पर चलना… संसार की “नियति” है। दूसरा कोई विकल्प नहीं है। क्योंकि “परिश्रम के बाद मिली सफलता” को दुनियाँ की कोई ताक़त हम से छीन नहीं सकती।
मग़र अफ़सोस…! इस बात को पूरे दावे के साथ कहने वाले दुनियाँ में बहुत कम लोग होते हैं। और
अगर हैं , तो आप देख लीजियेगा वे जीवन की विकट परिस्थितियों में भी सदैव खुश…रहते हैं। वे कभी अपने ग़म शेयर नहीं करते। उन्हें ख़ुद की मौत का भी कोई भय नहीं होता।
लेकिन आप दुनियाँ में अपनी नज़रें फैला कर देख लीजियेगा। अधिकतर लोग जीवन की वास्तविकता से कोसों दूर…भोगों में लिप्त केवल “धन संचय” को ही अपना लक्ष्य बनाए हुए हैं।कोबी ब्रायंट, लगभग बीस वर्ष तक “लॉस एंजिल्स मेकर्स”के लिए खेलते रहे।
इसमें कोई दोराय नहीं, कोबी ब्रायंट विल्कुल अपनी मेहनत के दम पर ही दुनियाँ के सबसे अमीर एवं बेहतरीन खिलाड़ियों की सूची में थे।वे अपने फॉलोअर्स के ‘वैचारिक-मन’ में सदैव रहेंगे।
“सिरोस्की-एस-76 B ” के क्रेस होने का .. ये हादसा और अधिक ह्रदय विदारक इसलिए भी हो गया। क्योंकि उस वक्त उसमें कोबी ब्रायंट के साथ उनकी 13 वर्षीय बेटी “जिआना” भी थीं। गौर कीजियेगा वे ख़ुद अपनी बेटी के कोच थे। उस दिन वे एक कोच की हैसियत से अपनी बेटी को मैच खिलाने के लिए केलिफोर्निया ले जा रहे थे।
हालांकि कोबी, 38 वर्ष की उम्र में, 2016 में ही खेल-जगत से सन्यास ले चुके थे। जब हादसा हुआ तब वे 41 वर्ष के थे।
“पूर्व-निर्धारण-व्यवस्था” ..P.D.S. अर्थात (PRE-DESTINED-SYSTEM) के अंतर्गत हुए हादसे ‘कर्मयोगियों से सिर्फ उनका “स्थूल-शरीर” ही छीन पाते हैं और कुछ नहीं। क्योंकि लोगों के साथ उनके द्वारा की गयी अच्छाई-भलाई और मेहनत से मिली सफलताएं एवं कीर्तिमान जिन्हे वे स्थापित कर देते हैं, वे तो उनके बाद भी उसी जगह स्थापित रहते हैं। और जब तक ये दुनियां है वे हमेशा स्थापित रहेंगे। जिस ‘कर्म’ के लिए पूरी दुनियाँ उनका लोहा मान चुकी है। वो पूर्ण स्थाई है। इंग्लिश के एक महान कवि Mr. जॉन मिल्टन ने बड़े दावे के साथ कहा था कि..एकदिन मैं स्थूल-शरीर में इस दुनियाँ बिच नहीं होऊंगा.. लेकिन यदि मेरे विचार में दम है, तो ‘वैचारिक-रूप’ (Thought-Form) में मैं, लोगों के ज़हन में सदैव रहूँगा।
अर्थात उनका कहना था कि “दुनियाँ में सिर्फ दो ही चीज ‘परमानेन्ट’ हैं।..बाकी सब.. ‘टेम्परेरी’ है।
नंबर-01 व्यक्ति का “विचार”
नंबर-02 उस वैचारिक धरातल पर खड़ा किया गया उस ‘विचार’ का “मूर्तरूप”।
दुनियांभर की तमाम भौतिक चीजें, एवं व्यक्ति सभी क्षण-भंगुर हैं, मग़र अफसोस !! फ़िजूल की चीजों को जुटाने में हम अपनी पूरी ज़िन्दगी खपा देते हैं।
सवाल गम्भीर है ? चिंतन की दरकार है।
धन्यवाद👍
विचारक: योगेन्द पचहरा,जैन इंटर कॉलेज से..
Contact No.
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Beautiful…..
Good Job…..
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Nice…..
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