सिला-रहमी अर्थात एक दूसरे की खैर-खबर लेते रहना..मेरा ऐसा मानना है कि, अपने दैनिक जीवन में “सिला-रहमी” को तरज़ीह देना जीवन की क्षण भंगुरता के लिहाज़ से बहुत आवश्यक है।
कर्मयोगी पुरुष अक्सर परिभाषित करते आये हैं.. और वो एकदम ठीक ही है कि..प्रत्येक जीव अपने पूर्व एवं जीवन के वर्तमान समय में किये हुए कर्म के आधार पर मिले “कर्मफल” के ही अनुरूप अपने-अपने भाग्य का “पाता एवं खाता” है।
दुनियाँ में सभी पूर्व संस्कारवश एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। केवल अपने उन्हीं अधूरे संस्कारों को पूरा करने के लिहाज़ से छोटी से लेकर बड़ी.. अर्थात प्रत्येक घटना… “पूर्व-निर्धारण-व्यवस्था” (Pre-Destined-System) के तहत अपने-अपने वक्त आने पर समयानुकूल घटित होती रही हैं। और आगे भी होती रहेंगी।
शुद्ध एवं सरल जीवन जीने वाले लोग अपने जीवन के अनुभव के आधार पर ख़ुद के, अंतर्ज्ञान (Intutions) जो किसी भी घटना से पूर्व में आभास होने की दस्तक देते है। उससे थोड़ा बहुत सचेत होकर अपने स्तर से बचाव का हम ‘एक प्रयास’ जरूर करते है, वरना दुनियाँ में सब कुछ अपनी गति से ही घट रहा है।
मैं, इसे रामायण के एक प्रकरण की सहायता से स्पष्ट करूँ तो ये मंज़र उस दौर का है.. जब मुनि वशिष्ठ भरत, को उनके बड़े भाई राम के वन जाने पर उन तीनों को अयोध्या लौटा के लाने की ज़िद पर समझाते हुए कहते हैं कि….
“सुनहुँ भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि,लाभ,जीवन,मरण,यश,अपयश विधि हाथ।।”
मनुष्य-जीवन के पूरे के पूरे छहः बड़े विभाग ईश्वर ने ख़ुद अपने पास रखे हैं।
जो दुनियाँ की “पूर्व-निर्धारण व्यवस्था” को ही बल देते हैं।
इसलिए जब तक ईश्वर कृपा से मनुष्य के पास वक्त है। यहां मैं ऐसा सोचता हूँ..उसे सभी लोगों के साथ “सिला-रहमी” रखते हुए जीवन को आनन्द के साथ जीते रहना चाहिए न कि वेबजह की उलझनों में फँस कर जीवन को ढोना चाहिए।
युग,पचहरा देश-विदेश में रह रहे..अपने सहस्रों प्रबुद्ध एवं नीर-क्षीर विवेकी पाठकों का हृदय से आभार प्रकट करते हैं। धन्यवाद👍
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