बन्धुवर ! इस बात का कितनों को अहसास है..? कि, संसार में मूलतः “सुख-दुःख” पांच तरह के हैं।
1-धन , 2-तन , 3-मन , 4-बुद्धि और 5-आध्यात्म का सुख।
जैसे; आपने मिठाई खरीदी तो “धन” का सुख,
उसे खाया तो “तन” का सुख,
फिर अपने बच्चों को खिलाया, तो “मन” का सुख,
किसी के द्वारा आपकी योग्यता को सराहा.. गया, तो “बुद्धि” का सुख।
परंतु परमात्म-स्मरण “आध्यात्मिक-सुख” के क्षेत्र में आता है।
जिस प्रकार ये पाँच सुख है। ज़रा अपने दिमाग के घोड़ों को और दौड़ाइएगा तो आप अवश्य पाएंगे कि जीवन में पांच तरह के “दु:ख” भी हैं। जो शायद “जिंदगी” का दूसरा पहलू है। जैसे; आपके हजार रुपए खो गए, तो “धन का दु:ख”,
किन्हीं कारणवश शरीर के किसी अंग का खराब हो जाना.. “तन का दु:ख”,
छोटी उम्र में अपने किसी नज़दीकी व्यक्ति का अचानक गुज़र जाना, “मन का दु:ख”,
और किसी पारिवारिक व्यक्ति का दिमांगी-सन्तुलन बिगड़ जाना, “बुद्धि का दु:ख”,
परंतु विडम्बना देखिये! दुनियाँ का जो सबसे बड़ा दु:ख है, उसकी तो “अनुभूति” भी बहुत कम लोगों को हो पाती है, वह है.. “अध्यात्म का दु:ख”।
दरअसल दुनियाँ में आने के बाद “अपने आपको” न जान पाना “अध्यात्म-दुःख” है। “सामान्य-जन” का ख़ुद के जीवन को आध्यात्मिक नज़र से न देख पाना ही मेरे ख़्याल से सारे दुःखों की जननी है।
और इसके अभाव में जीवन जीने वालों की हालत इस तरह की हो जाती है..कि वे अक्सर अपनी भटकी हुई जुबान में ही सही मग़र कहते सही हैं कि, यारो! “दुःख सहने की इस क़दर आदत सी हो गयी है.. कि दर्द होता, तो है, मग़र हो..ता नहीं है।”
अर्थात उनकी अनभिज्ञता में उन्हें शायद अपने जीवन में इस “आध्यात्मिक-दु:ख” की कमी का अहसास भी नहीं हो पाता।
क्या जो मैं देख पा रहा हूं आप भी ऐसा ही देख पा रहे हैं ..?
धन्यवाद
सभी को नमस्कार
विचारक ; युग पचहरा नीमगाँव, राया, मथुरा।