85-“हार्मोन्स”

मनुष्य अपने जीवन में कितना प्रसन्न है ये उसके निजी कर्मों के साथ-साथ उसको अपनी “ज़िन्दगी की कितनी समझ” है। इस बात पर कहीं अधिक निर्भर करता है।

आपने अक्सर देखा होगा जिन लोगों की मासूमियत एक लम्बे समय तक या फिर ताउम्र जिंदा रहती है। वे लोग, प्राकृतिक रूप से शुद्ध होते हैं। मग़र अधिकतर ऐसे चरित्र के लोगों का वर्तमान सामाजिक वातावरण में सामंजस्य नहीं बैठ पाता है..?

और मैं ऐसा मानता हूँ कि ऐसा इसलिए हो पाता है कि, वे एक सामान्य जन की तरह दुनियाँदारी के ‘ भटकावपूर्ण-वातावरण’ या ‘अति-भौतिकवाद’ की एक वेबजह की रेस जो चल रही है वे उस में शामिल नहीं होते। अर्थात वे अपनी आत्मा पर “सांसारिक कार्मिक-लेयर” को जमने नहीं देते,

इसीलिए वे अंदर से कुदरती तौर पर शरीर में मौजूद ईश्वर प्रदत्त”हार्मोन्स” के ज़रिये अपने आपको न केवल खुश रखते हैं, वल्कि विकट परिस्थितियों में भी वे हमेशा ख़ुश-मिज़ाज़ ही बने रहते हैं। मानव-शरीर में इस प्रकार के चार हार्मोन्स स्वतः ही इन बिल्ट हैं ;–

न.01- सेरोटॉनिन;- यह हार्मोन मूड को बेहतर बनाता है। और इंसान को डिप्रेशन से बाहर निकालने में मदद करता है।

न.02- डोपामिन;- इस हार्मोन का उत्पादन मनुष्य के ब्रेन में कुदरती तौर पर होता है।जो मनुष्य को खुशी की अनुभूति कराता है।

न.03- ऑक्सीटोसिन;- इस हार्मोन को “हैप्पी-हार्मोन” के नाम से भी जाना जाता है। ये ही वो हार्मोन है जो इंसानों को आपस में “प्यार के बंधन” में बाँधे रखने में सहायक होता है।

न.04- एंडोर्फिन;- ये हार्मोन तो एक तरह से कुदरती “दर्द-निवारक” है। जो इंसान को दिनभर ख़ुशनुमा व तरो-ताज़ा बनाये रखता है।

मग़र ये हार्मोन्स तभी सही कार्य करते हैं जब मनुष्य अपने जीवन में संयम-नियम से चलता है।

ये बात एकदम सत्य है कि, दूसरों पर पैसे ख़र्चने पर ख़ुशी होती है। ठीक वैसे ही अपनी सामर्थ्य के मुताविक ज़रूरत मन्द एवं असहाय प्राणियों के लिए कुछ भी करते रहने से मन को कहीं ज़्यादा ख़ुशी व तस्सली मिलती है।

ये भी कहीं तक सत्य ही है कि, इंसान अपने दुःखों का कारण भी कहीं न कहीं ख़ुद ही होता है।

क्योंकि वह छोटी-छोटी खुशियों को नजरअंदाज करके असीमित इच्छाओं को मन में पालता चला जाता है। जिससे एक दिन इस “खूबसूरत ज़िन्दगी” को दुःख के झंझावातों से घिरा हुआ पाता है।

दूसरे जिनकी इच्छाएं सीमित होतीं हैं,वे जीवन में उतने ही ख़ुशहाल भी होते हैं। मेरा अनुभव कहता है कि, यदि इंसान की “संगति” ठीक रही हो, तो सच्चे “दोस्तों” का साथ पाकर अक्सर ज़िन्दगी महक जाया करती है।

क्योंकि “अच्छी-संगति” हमें सकारात्मक ऊर्जा देती है,जिससे हम “स्टेप-वाइज” आगे बढ़ते हुए समय से अपने धेय को प्राप्त कर जाते हैं। 👍

विचारक ;

युग पचहरा नीमगाँव,राया,मथुरा।

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