अभी कुछ ही दिन पूर्व मैंने एक मन्दिर में लगभग आठ वर्ष का एक मासूम सा बच्चा देखा, जो अपनी छोटी बहन को लेकर मंदिर के एक तरफ कोने में बैठा हाथ जोडकर ईश्वर से कुछ मांग रहा था.. उसके कपड़े मैले जरूर थे। मगर चेहरे पर बहुत तेज़ था।
वह ईश्वर से प्रार्थना करते-करते इतना भाव-विभोर हो गया कि,उसके नन्हे नन्हे से गाल आँसूओं से भीग गए । वहाँ मौजूद बहुत से लोग उसकी तरफ आकर्षित हो रहे थे,
मग़र उस वक्त वह दुनियां से बिल्कुल अनजान ईश्वर के साथ अपनी अर्जी लगाने में तल्लीन था । जैसे ही वह उठा तो मैंने उसके पास जाते हुए पूछा : -कहो, “बेटा! कैसे हो..? अभी आपने भगवान से क्या मांगा..?”
उसने कहा : – “मेरे पापा जो आज इस दुनियाँ में नहीं हैं। उनके लिए “स्वर्ग”,
मेरी माँ हर पल रोती रहती है उनके लिए “सब्र”,
और ये जो मेरी प्यारी सी बहन है इसके लिए अच्छे-अच्छे कपडे, कुछ खिलौने और थोड़े से पैसे, जो ये रोजाना माँ से मांगती रहती है।
बेटा! क्या तुम स्कूल जाते हो”..? ये मेरा स्वाभाविक सा सवाल था । लड़के ने कहा, जी,हाँ! स्कूल जाता हूँ।”
मैंने पूछा, कौन सी क्लास में पढ़ते हो ? उसने कहा, नहीं अंकल पढ़ने नहीं जाता, मां मुझे कुछ चने बनाकर दे देती है। मैं,तो उन्हें स्कूली बच्चों को बेचने चला जाता हूँ। और बहुत सारे बच्चे मुझसे चने खरीदते हैं, जिससे हमारे घर की रोजी-रोटी का जुगाड़ हो जाता है। बच्चे का एक-एक शब्द मेरी रूह में उतर रहा था ।
मैंने पूछा, “तुम्हारा कोई रिश्तेदार है क्या..?”
लड़के ने कहा, “पता नहीं, माँ ऐसा कहती है कि, बेटा! गरीब का कोई रिश्तेदार नहीं होता..! और मेरी माँ ज्यादातर झूठ नहीं बोलती। परन्तु अंकल, मुझे लगता है मेरी माँ कभी-कभी अपने लिए, तो झूठ बोलती है, जिस वक़्त हम खाना खाते हैं,तो वो हमें देखती रहती है । जब मैं कहता हूँ..कि, माँ तुम भी खाओ, तो कहती है मैने अभी-अभी खा लिया, जबकि अधिकतर माँ बच्चों को खिलाने के बाद ही खाती हैं। उस समय तो मुझे जरूर लगता है कि वह हमारे लिए ही सही मग़र “झूठ बोलती,तो है।”
बेटा अगर तुम्हारे घर का खर्च मिल जाय तो पढाई करोगे ? “बिल्कुल नहीं” “क्यों,भई क्यों….? अंकल! वो इसलिए नहीं! क्योंकि मैंने देखा है कि, “पढ़े-लिखे इंसानों में “मानवीय संवेदनाएं” नहीं होती। उनके नैतिक एवं मानव मूल्य दोनों ही अपने स्तर पर नहीं होते ।..और वह गरीबों से नफरत करते हैं।”
आपके अतिरिक्त आज तक हमें किसी पढ़े हुए बन्दे ने कभी नहीं पूछा,
कि बेटा तुम कैसे हो..? पास से बस यूं ही गुज़र जाते हैं ।
ये सुनकर मैं हैरान! कम शर्मिंदा कहीं अधिक था। फिर उसने कहा, “हर दिन मैं, इसी मंदिर आता हूँ। यहाँ कभी किसी ने नहीं पूछा – जबकि यहाँ पर आने वाले ज्यादातर लोग मेरे पिताजी को अच्छी तरह जानते थे – मगर अब हमें.. कोई नहीं जानता..? ये कहते-कहते बच्चे, का गला भर आया और वह जोर-जोर से रोने लगा। उसने कहा, अंकल ! जब किसी बच्चे का बाप मर जाता है, तो जान-पहचान वाले सब उन बच्चों के साथ अजनबियों जैसा बर्ताब क्यों हो करते हैं.. ?
वाक़ई मेरे पास भी इसका कोई ठोस जवाब नही था…क्योंकि कई एक रिश्तों को लेकर धर्मक्षेत्र की अदालत में, उस वक़्त मैं, अपने आपको भी कठघरे में खड़ा हुआ महसूस कर रहा था।
हमारे ही आस-पास ऐसे कितने मासूम होंगे जो हसरतों से घायल हैं..?
बस, एक कोशिश कीजिये और न केवल मानव जाति को वल्कि सभी जीवों को जो हमारे आसपास बेचारे हालात के मारे यतीम व बेसहारा हैं। उनको जितना सम्भव हो सके, हमें उनकी मदद करनी ही चाहिए। मेरे ख्याल से दुनियाँ में इससे बड़ा कोई..’धर्म-कर्म’ हो ही नहीं सकता।
अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो पिछले कई दशकों से हम सभी भटके हुए तो हैं मग़र अंदाज नया है।
अब अधिकतर न केवल गांव-गांव, कस्बा या शहर अर्थात हर जगह कॉलोनी या मुहल्लों में कई कई मंदिरों के निर्माण कार्य जो “धर्म-कर्म” की आड़ में कुछ एक आलीशान लिविंग-रूम,बेड-रूम,किचिन आदि बनवाने की एक मुहिम सी छिड़ी हुई है। जो उस क्षेत्र के किसान, मजदूर और नौकरी-पेशा आदि को “धर्म-कर्म” का पाठ पढ़ाकर ईश्वरीय आस्था के नाम पर समाज के बीच एक छोटे-बड़े की प्रतिष्ठा का सा वातावरण तैयार करके.. ईंट, पत्थर, सीमेंट, अनाज व नगदी वसूल कर उसी दान-दाता समाज के बीच अपने लिए एक “एसो-आराम” से रहने की न केवल उम्दा जगह बना लेते हैं। वल्कि वहां बैठकर कुछ निठल्ले लोग समाज “मेहनत- कस” लोगों से धन ऐंठने की नई-नई योजनाएं बनाते रहते हैं।जो निंदनीय और चिंतनीय दोनों है।
यदि आपको ‘धर्म-कर्म’ (दान-पुण्य) की सही समझ हो, तो आप अपने आस-पास निर्धन व जरूरतमंद लोगों एवं असहाय जीवों को पहले वरीयता दें।
क्योंकि आपके सहयोग की भरे पेट वालों से “उन्हें” कहीं ज्यादा जरूरत हो सकती है.. 👍 राधे-गोविंद🙏🙏
विचारक; युग पचहरा,
नीमगाँव, राया, मथुरा।
पचहराजी आप का लेख पढ़ा, ह्रदय को छू लेने वाला है । आप की लेखनी अतुल्य है ।इसी प्रकार प्रेरणा देते रहें।
LikeLike
🙏🏻💚अनुकरणीय, प्रेरणादायक उद्धरण! धन्यवाद चाचा जी👍🏻
LikeLike
👍👍
LikeLike
Thanks to all intellectuals..
LikeLike