मेरा ऐसा मानना है कि, इस धरा पर मनुष्य का “व्यवहार” ही “अमूल्य-धन” है। इससे बढ़कर दुनियाँ में कोई और धन मुझे तो कहीं नज़र आया नहीं। क्योंकि जो “पैसा रूपी धन” पूरे विश्व में व्याप्त है वही हर जगह भौतिकता का पर्याय बना हुआ है, वो आवश्यक है, मग़र उन कीमतों पर नहीं जिन पर हम उसे हासिल करने की फिराक में रहते हैं। फिर भी वक़्त के मुताविक पैसा एक “ज़रिया” तो है। ध्यान रहे ये पैसा आता है..और चला जाता है..मग़र अंकित रह जातीं हैं, हिर्दय पर अच्छे व बुरे व्यवहार से बनी कुछ लकीरें जो समय समय पर सुख और दुख की अनुभुति कराती हैं। इसीलिए मैं, स्वयं भी सदैव इसी प्रयास में जीता हूँ। और अपने सभी, शुभ-चिंतकों से भी आग्रह करता हूँ कि, चाहे आपके सामने कभी कितनी ही परिस्थितियां क्यों न हों..? लेकिन अपनी एवं अपने परिवार, समाज, संस्था व देश जिससे हमारा बजूद है। उसकी “छबि” को किसी भी कीमत पर धूमिल न होने दीजियेगा। 👍धन्यवाद।
; युग पचहरा