79 तथाकथित.. “अनपढ़-किसान”

मांफ कीजियेगा शीर्षक को देखकर नाराज ना होइएगा..! मेरा आशय ये है कि, आजकल वो दिल्ली में चल रहे “किसान आंदोलन” के दौरान एक पत्रकार के पूछे जाने पर हमारे एक किसान भाई ने बहुत ही सदी हुई भाषा में अपनी वाकपटुता से एक पत्रकार, के साथ वार्तालाप करते-करते सभी को ये सन्देश दे दिया है कि, ‘तथाकथित अनपढ़ किसान’ सिर्फ कहने को ही है मग़र आज किसान को अनपढ़ समझने की भूल कोई भी न करे.. वक़्त रहते ऐसे लोग अपनी जीर्ण-शीर्ण मानसिकता बदल लें.. मेरा ऐसा मानना है कि, हमारा किसान शुरू से ही न तो शिक्षितों से कभी पीछे था.. ना, ही आज है। मैं अपनी इसी विचारधारा को प्रमाणित करने के लिए कुछ तथ्य आपके समक्ष रखता हूँ..जिनमें से बहुत सी बातों का तो,अपने पिता जी के साथ-साथ मैं खुद भी साक्षी रहा हूँ। जैसे; हल खींचते समय यदि कोई बैल गोबर या पिशाब करने की स्थिति में होता था, तो किसान कुछ देर के लिए हल चलाना बन्द करके बैल के मल-मूत्र त्यागने तक खड़ा हो जाया करते थे। ताकि बैल आराम से यह नित्यकर्म कर सके, ये एक आम चलन था….क्योंकि मैं भी एक किसान पुत्र हूँ। इसलिए यह सारी बातें बचपन में स्वयं अपनी आंखों से देखता आ रहा हूं …. जीवों के प्रति यह गहरी संवेदना हमारे उन महान पुरखों में जन्मजात थी। इसीलिए वे शिक्षित थे, वो “अनपढ़-किसान” किसी भी एंगल से नहीं कहे जा सकते!….. यह सब अभी 30-40 वर्ष पूर्व तक होता रहा है… उस जमाने का “देसी घी’ जिसका यदि आजकल के हिसाब से मूल्य लगाएं तो इतना शुद्ध होता था कि 2 हजार रुपये किलो तक बिक सकता है, लेकिन वो भोले-भाले किसान का है, इसलिए उसे वाजिव दाम किसी भी चीज का नहीं मिल सकता..? मग़र उस देसी घी को किसान खेती में मेहनत के दिनों में हर दो दिन बाद आधा-आधा किलो घी अपने बैलों को अवश्य पिलाया करते थे।

टिटहरी नामक पक्षी/चिड़िया अपने अंडे हमेशा खुले खेत की मिट्टी पर देती है और उनको वहीं सेती है। हल चलाते समय यदि सामने कहीं कोई टिटहरी चिल्लाती मिलती थी, तो किसान उसका इशारा समझ जाते थे और उस अंडे वाली जगह को बिना हल जोते खाली छोड़ दिया करते थे। उस जमाने में आधुनिक शिक्षा नहीं थी मग़र किसान को व्यवहारिक-ज्ञान, मानवीय-ज्ञान भरपूर था। सब आस्तिक थे। दोपहर को किसान का जब भोजन करने का समय होता तो सबसे पहले बैलों को पानी पिलाकर चारा डालता। उसके बाद ही खुद भोजन करता था । यह एक सामान्य नियम था । बैल जब बूढ़ा हो जाता था तो उसे कसाइयों को बेचना शर्मनाक एवं सामाजिक-अपराध की श्रेणी में आता था । बूढा बैल कई सालों तक खाली बैठा चारा खाता रहता था, मरने तक उसकी सेवा होती थी । उस जमाने के तथाकथित “वो अनपढ़ किसान” का मानवीय तर्क था कि इतने सालों तक हमने इसकी माँ का दूध पिया है और इसकी कमाई खाई है, तो इसे अब बुढापे में कैसे छोड़ दें , कैसे कसाइयों को दे दें कटवाने के लिए ??? जब बैल मर जाता तो किसान फफक-फफक कर रोता था और उन भरी दुपहरियों को याद करता था जब उसका यह वफादार मित्र हर कष्ट में उसके साथ होता था । माता-पिता को रोता देख किसान के बच्चे भी अपने बुड्ढे बैल की मौत पर रोने लगते थे । पूरा जीवन काल तक बैल अपने स्वामी किसान की मूक भाषा को समझता था कि वह क्या कहना चाह रहा है । वह पुराना भारत इतना शिक्षित एवं सम्पन्न था कि, अपने जीवन व्यवहार में ही जीवन के सारे रस खोज लिया करता था ।दरअसल वही करोड़ों वर्ष पुरानी संस्कृति वाला “वैभवशाली-भारत” था। वाक़ई वह..अतुल्य..भारत..था !

आजकल हर इंसान दुःखी और तनाव ग्रस्त है क्योंकि वो अपनी संस्कृति और संस्कारों से दूर कहीं जीवन तलाशने का प्रयास कर रहा है,जो निहायत ही गलत है और सभी आवश्यक मानकों को भूलकर पूर्णतःस्वार्थ में लिप्त होता चला जा रहा है…अफ़सोस..! अपने लिए समस्याओं का पहाड़ खड़ा कर ले रहा है.. जैसे दूध पीने के बाद गाय को छोड़ देना..बेचारे उसके बछड़े व बैल तो मशीन युग आने से बेरोजगार हो ही गए हैं। हम सभी के लिए ये विचारणीय बिंदु हैं👍

युग पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा।

78-“तालीम बिन तहज़ीब”

हर तरफ यही वातावरण है..शिक्षा के समुचित प्रचार-प्रसार एवं अनेकों तकनीकी प्लेटफॉर्म की उपलब्धता के परिणाम स्वरूप आज पढ़े लिखे लोगों की तो कहीं भी कोई कमी नहीं रही।

मग़र अफ़सोस! इस बात का जरूर है कि आज की पीढ़ी जो “तालीम, हासिल कर रही है..उसमें से “तहजीब” अवश्य कहीं गायब है।

अर्थात आज की “तालीम” बिना “तहज़ीब” के नजर आती है। ऐसे मंज़र देख या सुनकर हर मानव मन बेचैन हो उठता है। क्योंकि यदि शिक्षा ही “संस्कार-विहीन” हो,तो भला किस काम की..??

आज इस बिंदु पर मैं, भारत में हुई कुछ “अप्रिय” घटनाओं का जिकर करते हुए अपना मंतव्य आपके सामने रख रहा हूं…

गुज़रात के राजकोट में रह रही स्कूल अध्यापिका श्रीमती जयश्री बेन, जिसने अपना सारा जीवन, अपने इकलौते बेटे की परवरिश और उसे बेहतर तालीम देने,में पूरे समर्पण भाव में खपा दिया, दुनियाँ की हर माँ की तरह जयश्री बेन ने भी अपने सुखी जीवन के सपने अवश्य देखे होंगे..

अच्छा,देखिए! उनकी मेहनत भी खूब रंग लायी बेटा सफलता की सीढ़ियां चढ़ता गया और एक यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर बन गया। उसकी शादी भी एक डॉ लड़की से हो गयी।..सब कुछ मन मुताबिक होता गया..जय श्री बेन के परिवार में रुपये-पैसे की अब कोई कमी नहीं थी।

मग़र “तालीम” बिन “तहज़ीब” के जो थी,तो वक़्त ने ऐसी करवट बदली कि, बेचारी जय श्री बेन को लकवा क्या! मार गया, वश उनका तो दुर्भाग्य ही शुरू हो गया.. बेचारी मजबूरन पूरी तरह अपनी बहु-और बेटे पर आश्रित ही हो गयी।

परन्तु एक रोज क्या हुआ… उनके प्रोफेसर बेटे ने बीमार मां को सहारा देते हुए किसी तरह खड़ा कर लिया और धीरे-धीरे घर की चौथी मंजिल पर ले गया, माँ बड़ी खुश हुई कि मुझे बिस्तर पर पड़ी देख मेरा बेटा मन बहलाने व जाड़े में धूप सेंकने के लिए शायद छत पर ले जा रहा है। छत पर पहुँचते ही प्रोफ़ेसर बेटे ने जब अपनी माँ को गोदी में उठाया तो माँ और ‘भाव-विभोर’ हो गयी..फिर सोचने लगी कि, मैं यहाँ आते-आते थक सी गयी हूँ, इसलिए गोद में उठाकर शायद कहीं ठीक से बिठाएगा..??

मग़र इससे आगे उस निष्ठुर बेटे ने जो किया… आप सभी ईश्वर से दुआ कीजियेगा कि किसी का बेटा ऐसा न करे ! अफ़सोस! उस निकृष्ट बेटे ने एक “लाचार-माँ” को चार मंजिला इमारत से नीचे गिरा दिया..😢

उस क्षण वह अभागी ‘ माँ ‘ जाने क्या सोच.. पायी होगी..उससे पहले बेचारी की जीवन-लीला ही समाप्त हो गयी।

बाद में घटना को इस प्रकार दर्शाया गया जैसे भूल बस बुढ़िया छत पर घूमते घूमते चक्कर आदि आने से गिर गयी..हो।

लेकिन सदैव याद रखिएगा..कोई भी गलत काम चाहे कितनी ही प्लानिंग से क्यों न किया जाय..ईश्वर की लीला ऐसी है.. फिर भी कोई न कोई ‘सुराग’ मिल ही जाता है। इसीलिए दुनियां में मिशाल दी जाती है..”दिन देरी है मगर अंधेरी नहीं है।”

वे भी अपने घर में लगे सी.सी. फ़ुटेज का कुछ कर पाते उससे पूर्व पुलिस जांच आ गयी। जिससे स्पष्ट हो गया कि, बुढ़िया गिरी नहीं.. बल्कि उसके अपने ही प्रोफ़ेसर बेटे ने अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए उसे नीचे पटक दिया था।

“इल्म की तासीर जब गुरुर में बदली,

बुनियाद रिश्तों की महज़-दस्तूर में बदली,

और बुजुर्गों को फ़क़त आफ़त समझ बैठी औलाद,

आदम के वेनूर में बदली।”

दूसरे प्रकरण में..ऐसा ही कुछ मुम्बई की श्रीमती आशा साहनी के साथ भी हुआ…इनके बेटे ने खूब तालीम हासिल की.. इतनी कि अमेरिका में एक मशहूर डॉक्टर की हैसियत से स्थापित हो गया। वहीं किसी गोरी मेम से शादी भी करली।

मग़र उस संस्कारविहीन कागज के आधार पर पढ़े लिखे कहे जाने वाले बेटे ने लौटकर अपनी माँ को कभी नहीं देखा।

बेचारी आशा साहनी ने वर्षों बेटे का इंतजार किया। मग़र अफ़सोस ! बहू-बेटे से मिलने की आस लिए इंतजार.. से थककर एक रोज़ बिस्तर पर पड़े-पड़े ही उस अभागी-मां के प्राण-पखेरू उड़ गए..

उसके मर जाने के भी डेढ़ साल बाद जब बेटा बाई द वे विदेश से आया, तो अफसोस!!!! बिस्तर पर उन मां-बेटे के रिश्ते की ही तरह एक मां के शरीर की हड्डियों का एक खोखला सुखा ढाँचा (कंकाल) जरूर पड़ा मिला।

ठीक वैसा ही इलाहाबाद के कमलेन्द्र श्रीवास्तव व सूरत की चम्पा वेन के साथ भी हुआ। अर्थात

मग़र कई वर्षों से मैं देख रहा हूँ कि, हमारे भारतीय समाज में ऐसी घटनाएं तो अब सामान्य सी बात हो गयी है। अगर आप इन घटनाओं पर ग़ौर करें तो, आप इनमें एक “दुःखद समानता” जरूर पाएंगे.. कि घटनाओं को अंजाम देने वाले ये लोग “अच्छी तालीम के साथ साथ आर्थिक रूप से खूब सम्पन्न लोग थे।”

ऐसी कोई एक दो घटना हों तो, कहा जा सकता था कि, किसी अमुक व्यक्ति की मनोवृत्ति में कोई ख़राबी रही होगी…। मगर अफसोस!; अब तो इस दुनियां बिच ऐसी घटनाओं का एक सिलसिला सा शुरू हो गया है।

दरअसल, इस लेख के माध्यम से मैं वर्तमान में गिरते मानव-मूल्यों, संस्कारों आदि की ओर सम्पूर्ण प्रबुद्ध वर्ग का ध्यानाकर्षण कराना चाहता हूं

ये हम सब लोग अक्सर देख रहे हैं कि “शिक्षा तो है, मग़र संस्कार नहीं दिखते!

कहने का मतलव है कि आज “तालीम तो अच्छी है, लेकिन तहज़ीब कहीं खो सी गई है..?” ऐसा क्यों..?? हुआ है अब एक नजर इस पर भी हो जाए..

यहां एक सवाल उठता है…? कि. ये घटनाएं दिन प्रतिदिन बढ़ रहीं हैं।आखिर इसके पीछे कारण क्या हैं..?? तो मांफ कीजियेगा खोट कहीं अन्यत्र नहीं है, हम “माँ-बाप” की “डीलिंग” अर्थात हमारी परवरिश में ही है।

दरअसल होता क्या है..ऐड़ी-चोटी का जोर लगाकर पहले तो हम “मां बाप” ही अपने बच्चों को बिना “तहजीब” वाली ‘तालीम’ दिलवाए चले जाते हैं, उसी तालीम से ..वे बच्चे इंजीनियर,डॉक्टर, प्रोफ़ेसर,जज आदि बड़े-बड़े पदों को हासिल कर भी लेते..हैं। मगर वे ये सब करते कराते एक संस्कार विहीन व्यक्ति बन कर तैयार जो हो जाते हैं।। और फिर हम उनसे संस्कारवान होने की अपेक्षा करते हैं। तो दोषी बच्चे हैं या मां बाप..??

सच तो यही है, ये सब बनते-बनते उनके अंदर का ‘इंसान मर चुका होता है…? जो हम “मां बाप” से दिली लगाव रखता था। उनके अंदर असीमित रुपए पैसे की भूख वाला मशीनी दिमांग डेवलप होता चला जाता है। जाहिर है तब उन्हें ये रिश्ते,नाते,जिम्मेदारियां बोझ जैसी लगने लगती होंगी..शायद इसीलिए वे इतने निष्ठुर हो जाते हैं।

आप ऐसा विल्कुल भी मत समझ लीजियेगा कि, इस लेख के ज़रिए मैं देश की “शिक्षा-नीति” को कोसने वाला हूँ। जी,नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं होगा।

क्योंकि मैं शिक्षक By Choice हूँ, जबकि आप रिसर्च कीजिएगा तो पाएंगे.. अधिकतर लोग शिक्षा के क्षेत्र में “By-Chance” आ जाते हैं।

शायद इसीलिए शिक्षा-जगत से जुड़े हुए ज्यादातर पहलुओं को गंभीरता से समझने का प्रयास करता रहता हूँ, किसी भी देश में जाकर देख लीजियेगा, हर देश में “शिक्षा-नीतियाँ” तो लगभग इसी तरह कार्य करतीं हैं।

यहाँ मेरी व्यक्तिगत रिसर्च ये कहती है.. कि,”अकादमिक-शिक्षा” का निर्धारण कुछ ऐसा किया गया है कि,तहज़ीब व सभ्यता से सीधे तौर पर इसका कोई सरोकार नहीं दिखता!!

तहज़ीब सिखाने का कार्य माता-पिता, परिवार व समाजिक वातावरण करता है। इसलिए जिम्मेदारी भी इन्हीं सबकी बनती है। ये जमीनी हक़ीक़त है।क्योंकि माता-पिता बच्चे को संस्कार देने की उम्र में रट्टा मारकर आगे बढ़ना सिखाने को पढ़ना समझते हैं।

जी..हाँ, मगर मांफ कीजिएगा..मैं ये कहने की हिमांकत अवश्य कर रहा हूं .. परंतु केवल हम “मां बाप” के कर्मों के हवाले से ख़ुद से एक शब्द भी नहीं।

दरअसल, हम “मां बाप” सिखाने की उम्र में रोबॉट या किसी मशीन की तरह अपने बच्चों की प्रोग्रामिंग कर रहे होते हैं…और जब वे इंसानियत छोड़ वो बन जाते हैं, जो उन्हें बना गया था। फिर यही “मां-बाप” उस ह्रदयहीन रोबॉट या मशीन में ” इंसानी रिश्ते, प्यार एवं संवेदनाएं खोजते नज़र आते हैं। जब वे दिली रिश्ते नहीं मिलते, तब वही मां बाप आसमान सिर पर उठा लेते हैं। कैसी अजीब!! विडंबना है??

हिंदी-फिल्मों के डायरेक्टर्स ने कई एक फिल्में “एजुकेशन” को टारगेट करके बनाई हैं। जैसे;- “थ्री-इडियट्स”, “तारे- जमीन पर”, “सुपर-30 और हाल ही में..”ट्वेल्थ फेल” जो मनोज शर्मा के आई पी एस बनने के संघर्ष की कहानी पर आधारित है।आदि। अब आप “तारे-जमीन पर” फ़िल्म का वो सीन याद कीजिये.. जब एक मां-बाप की जोड़ी अपने बच्चे को बोर्डिंग-स्कूल में छोड़कर रवाना हो रही होती है, तब वह छोटा सा बच्चा अपनी माँ के पल्लू को पकड़कर रोने लगता है.. और कहता है…”भीड़ में यूं न छोड़ो मुझे.. घर लौटकर भी आ न पाऊँ..मैं, माँ, क्या..? इतना… बुरा हूँ.. मैं, माँ…वगैरह वगैरह (गीत के माध्यम से) मां-बाप “तहज़ीब” से “तालीम” “को कहीं अधिक मानते हुए निष्ठुर होकर चल देते हैं..” इस रवैये से बच्चे की संवेदनाएं लगभग मर ही जाती हैं। वह “संवेदनहीन” हो जाता है,तो फिर वही माँ-बाप बहुत परेशान दिखते हैं।

मैं ऐसे कई एक बुजुर्ग मां-बाप को जानता हूँ। जिन्होंने अपने बच्चों को घर से काफ़ी दूर अच्छी “तालीम” के लिए भेजा हुआ है। इस बात में कोई दो राय नहीं, कि वे अपना अच्छा कैरियर सेट कर लेंगे।

मग़र एक चीज़ जो कई बार मैं महसूस करता हूँ। वो ये कि, ऐसे बच्चों का अपने माँ-बाप के साथ एक मजबूत “रिश्ता” तो छोड़िए! क्या कोई रिश्ता कायम रह भी पाएगा। जो उनसे अपेक्षाएं की जातीं है। अब यदि ऐसा “संस्कार-विहीन-बालक” बीस-पच्चीस वर्ष बाद अपने माँ-बाप को घर से निकाल कर किसी वृद्धा-आश्रम में छोड़ भी आयेगा, तो आप ही बताइएगा..?? इसमें कौनसी अचरज़ की बात है।

क्योंकि..

” करता था सो क्यों किया..?? अब कर.. क्यों पछिताय..??, बोया पेड़ बबूल का ,तो आम कहाँ से आए..?? ”

जब दुनियादारी की अंधी रेस में हमने अपने नौ-निहालों के हिर्दय रूपी खेत में प्यार,संवेदना, सम्मान व संस्कार रूपी बीज बोये ही नहीं हैं, तो फिर मधुर फलों की चाह ही क्यों रखते हैं..?

आख़िर में, सबसे मेरा यही आग्रह है कि,गुजरात की जयश्री बेन व मुम्बई की आशा साहनी की तरह पश्चाताप के साथ दुनियाँ में घुट-घुट कर नहीं मरना चाहते हैं, तो तालीम के साथ-साथ “तहज़ीब” सिखाने की ओर समय रहते ही मुख़ातिब हो जाइएगा..? वरना..आप ख़ुद समझदार हैं।

धन्यवाद एवं नमस्कार

विचारक : योगेंद्र सिंह पचहरा,

मूल निवासी: नीमगांव, राया,मथुरा।

88A वसुन्धरापुरम, हाथरस।

77-“स्नान” या फिर “नहाना”

क्या आप “स्नान” और “नहाने” के बीच जो फर्क है उसे समझते हैं…? ‘स्नान’ आध्यात्मिक है,जबकि ‘नहाना’ सिर्फ भौतिक है।

एक बार देवी सत्यभामा ने देवी रुक्मणि से पूछा कि दीदी क्या आपको मालुम है कि श्री कृष्ण जी बार बार द्रोपदी से……. मिलने क्यो जाते है। कोई अपनी बहन के घर बार बार मिलने थोड़ी ना जाता है, मुझे तो लगता है कुछ गड़बड़ ….. है, ऐसा क्या है ? जो बार बार द्रोपदी के घर जाते है । तो देवी रुक्मणि ने कहा : बेकार की बातें मत करो ये बहन भाई का पवित्र सम्बन्ध है जाओ जाकर अपना काम करो। ठाकुर जी सब समझ ग्ए । और कहीं जाने लगे तो देवी सत्यभामा ने पूछा कि प्रभु आप कहां जा रहे हो ठाकुर जी ने कहा कि मैं द्रोपदी के घर जा रहा हूं । अब तो सत्यभामा जी और बेचैन हो गई और तुरन्त देवी रुक्मणि से बोली, ‘देखो दीदी फिर वही द्रोपदी के घर जा रहे हैं ‘।

कृष्ण जी ने कहा कि क्या तुम भी हमारे साथ चलोगी तो सत्यभामा जी फौरन तैयार हो गई और देवी रुक्मणि से बोली कि दीदी आप भी मेरे साथ चलो और द्रोपदी को ऐसा मज़ा चखा के आएंगे कि वो जीवन भर याद रखेगी। देवी रुक्मणि भी तैयार हो गई। जब दोनों देवियां द्रोपदी के घर पहुंची तो देखा कि द्रोपदी अपने केश संवार रही थी जब द्रोपदी केश संवार रही थी तो भगवान श्री कृष्ण ने पूछा : द्रोपदी क्या कर रही हो तो द्रोपदी बोली : भैया केश संवार के अभी आई तो कृष्ण बोले तुम काहे को केश संवार रही हो, तुम्हारी तो दो दो भाभी आई है ये तुम्हारे केश संवारेगी फिर कृष्ण जी ने देवी सत्यभामा से कहा कि, तुम जाओ और द्रोपदी के सिर में तेल लगाओ और देवी रूक्मिणी तुम जाकर द्रोपदी की चोटी करो। सत्याभाम जी ने रुक्मणि जी से कहा बड़ा अच्छा मौका मिला है ऐसा तेल लगाऊंगी कि इसकी खोपड़ी के एक – एक बाल तोड़ के रख दूंगी। और जैसे ही सत्यभामा जी ने द्रोपदी के सिर में तेल लगाना शुरु किया और एक बाल को तोड़ा तो बाल तोड़ते ही आवाज आई : “हे कृष्ण” फिर दूसरा बाल तोड़ा फिर आवाज आई : “हे कृष्ण” फिर तीसरा बाल तोड़ा तो फिर आवाज आई : “हे कृष्ण ”सत्यभामा जी को समझ नहीं आया और देवी रुक्मणि से पूछा, “दीदी आखिर ऐसी क्या बात है द्रोपदी के मस्तक से जो भी बाल तोड़ती हूं तो कृष्ण का नाम क्यों निकल कर आता है,”रुक्मणि जी बोली ,” मैं तो नहीं जानती “, पीछे से भगवान बोले : ”देवी सत्यभामा तुम देवी रुक्मणि से पूछ रही थी कि मैं दौड़ – दौड़ कर इस द्रोपदी के घर क्यो जाता हूं“, क्योंकि पूरे भूमण्डल पर, पूरी पृथ्वी पर कोई सन्त, कोई साधु, कोई संन्यासी, कोई तपस्वी, कोई साधक, कोई उपासक ऐसा नहीं हुआ जिसने एक दिन में साढ़े तीन करोड़ बार मेरा नाम लिया हो और केवल द्रोपदी ही ऐसी है जो एक दिन में साढ़े तीन करोड़ बार मेरा नाम लेती है। ये प्रति.. दिन, स्नान करती है इसलिए उसके रोम रोम में कृष्ण नजर आता है और इसलिए मेरा “ईश्वरीय तत्व शरीर” तुम्हें रोज उसकी ओर जाता दिखता है। ये भक्त के “शुद्ध-भाव” का ही तो भूखा होता है, दुनियाँ भर की ताम-झाम से इसका कोई सरोकार नहीं है। ये तो सदैव भक्त के बस में रहा है और रहेगा।” यही है वो “स्नान” जिसे देवी द्रोपदी प्रतिदिन किया करती थी ।

हम जो हर रोज साबुन, शैम्पू और तेल लगा कर अपने तन को स्वच्छ कर लिया करते हैं, जो भौतिकीय स्नान अर्थात नहाना ‘कहा गया है । “स्नान” का मतलब है : हमारी त्वचा में साढ़े तीन करोड़ रोम छिद्र है जब नारायण से पूछा गया : ये साढ़े तीन करोड़ रोम छिद्र कर्म प्रदत्त हैं, तो नारायण ने कहा : जब मनुष्य साढ़े तीन करोड़ बार भगवान का नाम ले लेता है तब जीवन में एक बार उसका स्नान हो पाता है “। “इसको कहते हैं स्नान” श्री कृष्ण का नाम तब तक जपते रहिए जब तक साढ़े तीन करोड़ बार भगवान का नाम ना जप लें। आपने देखा होगा..हर बृजवासी इसीलिए अपनी आती-जाती हर सांस से.. हरे राम हरे कृष्ण जपता रहता है। धन्यवाद 🌹🌹 राधे कृष्ण 🌹🌹 हरे कृष्ण हरे कृष्ण। कृष्ण कृष्ण हरे हरे।। हरे राम हरे राम । राम राम हरे हरे।। 🙌🏻

Thinker ; युग पचहरा.., from नीमगाँव,राया,मथुरा

76-“राष्ट्रवाद”

7 Dec., 1941 वो सामान्य सुबह थी। अमेरिका के पर्ल हार्बर के नौसेनिक अड्डे पर हर अमेरिका वासी की सोच थी कि, यूरोप और एशिया से दूर होने की वजह से अमेरिका दुश्मन के सीधे हमले से सुरक्षित है…… पर हमला हुआ, भयानक हमला….. जापान के कामकाज़ी पायलटों ने अमेरिका के “पर्ल” नामक बन्दरगाह को तहस नहस कर दिया चारों तरफ सिर्फ मौत ही मौत दिख रही थी…… पूरा अमेरिका उस हमले से बेहद दुखी था,उस वक़्त हर अमेरिकी भीतर से धधक रहा था…

ऐसे में अमेरिका के राष्ट्रपति के द्वारा तत्काल एक उच्च स्तरीय मीटिंग बुलाई गई बड़े सैन्य अधिकारी, कैबिनेट के लोग सब मौजूद थे….. जबकि राष्ट्रपति पिछले 20 साल से व्हीलचेयर पर थे, 1921 के बाद वो अपने पैरों से पक्षाघात की वजह से लाचार थे….. मीटिंग शुरु हुई और सभी जब राष्ट्रपति के मुंह से कुछ सुनने को उनकी तरफ एक टक देख ही रहे थे, तभी अचानक उन्होंने मज़बूती से सामने की टेबल को पकड़ा और लडखडाते हुए अपनी व्हीलचेयर से खड़े हो गए… उनका निजी सहायक उनकी तरफ सहारा देने चला उन्होंने उसे इसारे से रोक दिया….. राष्ट्रपति के अचानक यूँ उठ खड़े होने से सब अवाक थे ….. राष्ट्रपति ने अपने दोनों हाथ आगे किये और बोले…. “हम लाचार नहीं है.. हम उन्हें ये बतायेंगे, उन्हें इसकी कीमत चुकानी ही होगी” …… आगे जो हुआ वो इतिहास में दर्ज है, अर्थात हमारे सामने है। अमेरिका ने दूसरा युद्ध जीता, और जापान से भयंकर तरीके से बदला भी लिया……

अमेरिका के महानतम राष्ट्रपतियों में से एक प्रखर और “राष्ट्रवादी” Franklin Delano Roosevelt. इन्हीं खूबियों के कारण वे चार बार अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए…. 1933 में जब उनका देश भयावह आर्थिक हालात का सामना कर रहा था..तब ही उन्होंने ये पद संभाला था। और देश की अर्थ व्यवस्था को पुनः खड़ा किया,उन्होंने “धन सृजन”पर बल दिया।अर्थात हर स्तर पर प्रोडक्टिविटी को निखारा ताकि उन्हें पड़ौसी देशों के मार्केट में जगह मिल सके तभी तो विदेशी मुद्रा को अपनी ओर खींचा जा सकेगा। दरअसल देश की असल कमाई तो वही होती है। और दूसरे महायुद्ध में जब अमेरिका को न चाहते हुए भी उतरना ही पड़ा, तो उन्होंने आगे बढ़कर नेतृत्व किया….

“रूज़वेल्ट” वो जननायक बने जो दुश्मन को मिट्टी में मिलाने की ज़िद और जज्बा दोनों रखते थे, तो अपनी नर्स के बच्चों के साथ बच्चा बनकर खेलते भी थे….! ये उनका स्वभाव था कि, वे आगे आकर हर हालत में अपने लोगों के साथ खड़े होते, सफलता पर पीठ ठोंकते तो असफलता पर हौसला भी बढ़ाते….। इसी का नतीजा था कि थोड़े ही समय में अमेरिका ने उनके आदेश पर परमाणु बम तक तैयार कर लिया था….. हर अमेरिकी उनके लिए अपनी जान की बाज़ी तक लगाने को तैयार था, हर अमेरिकी अपनी सफलता को अमेरिका की सफलता समझता था…..राष्ट्रपति ने ऐसा जज़्बा पैदा किया था जनता में। इसीलिए वहां के जन-जन से रूज़वेल्ट का अटूट-रिश्ता ताउम्र रहा। अर्थात ये रिश्ता 12 अप्रैल 1945 को उनकी मृत्यु तक बरकरार कायम रहा…..! बाद में तो वे हम सभी के लिए भी देवतुल्य हो गए..हैं।

राष्ट्रपति रूज़वेल्ट दिल जीतने में माहिर थे, वामपंथी जब भी “राष्ट्रवाद” की बात करते हैं सदैव हिटलर, मुसोलिनी का ही उदाहरण देते है एक भी नकारात्मक नरेटिव तैयार करने को…. कभी “रूज़वेल्ट” का नाम उनके मुंह से नहीं निकलता….! क्योंकि रूज़वेल्ट, महामानव थे, ऐसे व्यक्तित्व ख़ुद के लिए कुछ नहीं होते हैं, वे पूर्णरूप से देश को समर्पित रहते हैं।

अगर अमेरिकियों के उनके प्रति और उनके अमेरिका के प्रति समर्पण को देखें तो 20वीं सदी में रूज़वेल्ट से बड़ा कोई नायक नहीं दिखता…..वाक़ई वे सच्चे जन नायक थे!!

अब मैं आपका ध्यान एक रिक्शा चालक के मनोभाव को आधार बना कर अपने असल मुद्दे “राष्ट्रवाद” की ओर आकर्षित कराना चाहूँगा।… रांची का एक रिक्शा चालक अखबार में चन्द्रयान-2 के लैंडिंग में व्यवधान की खबर पढ़कर बेहद दुखी होता है….. उसकी ख्वाहिश है “उतर जाता तो मज़ा आता” जबकि हम सब अच्छी तरह जानते हैं कि इसमें उसका कोई निजी लाभ/हानि नहीं। उसे नहीं पता इसे चाँद पर क्यों भेजा गया…. पर वो इस ख़बर से दुखी है…..क्योंकि वो देश का सच्चा नागरिक है। अपने राष्ट्र के नाम चढ़ने वाली उपलब्धि को समझता है वह अपने राष्ट्र की उपलब्धि पर गर्व करना जानता है। यही वो “भाव” है जिसे “राष्ट्रवाद” कहते है….!

मानो या न मानो आज भारत देश की जनता को अपने “देश की सोच” में एक बड़ा परिवर्तन दिखता है। इतना तो मैं भी देख रहा हूँ कि 2014 के बाद देश के लिए “उत्तरदायित्व” की सोच भी काफ़ी बलवती हुई है….. “निज” पर “राष्ट्र” हावी हुआ है… मानव-मूल्यों,सामाजिक-मूल्यों एवं नैतिक-मूल्यों का स्तर बढ़ा है।

मैं, तमाम ऐसे लोगों को जानता हूँ जो GST, नोट बंदी, आवारा गौवंश की या नौकरी पेशा लोग सरकार की ओर से आये दिन नए-नए फरमानों की बजह से निजी तौर पर बहुत प्रभावित हैं। उनमें व्यापारी है, ठेकेदार हैं, किसान भाई हैं और सरकारी कर्मचारी भी हैं….. मग़र देख लीजिये फिर भी उन्होंने 2019 में मोदी को ही वोट दिया, मोदी के लिए वोट डलवाया…… इसके पीछे वजह.. अगर एक शब्द में कहूँ तो, “राष्ट्रहित” सर्वोपरि है।

जनता की नज़र में देश के नेतृत्व के लिए अभी सबसे सही व्यक्ति मोदी ही हैं। शायद ये बात आमजन के दिल में घर कर गयी है!

अमेरिकी राष्ट्रपति रूज़वेल्ट की भाँति मोदी को जनता की नब्ज पकड़कर उसके दिल पर राज करने का हुनर अच्छे से आता है.. अपने प्रतिद्वंदियों को साम,दाम,दंड,भेद चारों नीतियों से परास्त करने की महारत तो हासिल है ही। वो जनता को निराशा में उत्साह का संचार करते है, असफलताओं में आगे बढ़कर हौसला भी बढ़ाते हैं, तो सफलता पर तुरन्त पीठ ठोंक उसे उत्सव में बदल देते हैं……

पाकिस्तान को 24 घंटे के भीतर विंग कमांडर अभिनंदन को लौटाने पर मजबूर करना हो। या बड़े भाई की तरह इसरो प्रमुख के सिवन को गले लगाना…… संदेश एकदम साफ है तुम अपना काम इत्मिनान से करते रहो बाकी के लिए मैं हूँ न!! ये “सपोर्टिव थॉट” ही तो “मोदी” को अन्य नेताओं से अलग दर्शाता है।

न जाने क्यों स्वाध्याय के दौरान मुझे इतिहास के पन्नों को उलटने की शायद एक बुरी आदत है। निजी तौर पर अपनी जानकारी के आधार से…तो मुझे भी मोदी में #भारत_के_रूज़वेल्ट दिखते हैं, या मैं जब रूज़वेल्ट पर कुछ पढ़ता हूँ, तो वो मुझे अमेरिका के मोदी……के रूप में दिखते हैं। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है।आप स्वयं पढ़कर देख लीजियेगा। आप रूज़वेल्ट को 20वीं सदी का मोदी कह सकते हैं, चाहे मोदी को 21वीं सदी का रूज़वेल्ट….!

हम सरकारी कर्मचारियों को “रविवार”का अवकाश एक दिन अपने दैनिक कार्य से इतर कुछ अलग करने जैसे ; सामाजिक-कार्यों में अपना योगदान देने से, दिमांगी तौर पर तरो-ताज़ा हो कर अगले दिन उतनी ही मुस्तेदी से पुनः अपने दैनिक कार्य में जुट जाना होता है। तो अधिकतर रविवार के दिन अक्सर अपने निर्धारित कार्य के दौरान हमारा समाज के लोगों से जनसम्पर्क तो होता ही है। इस आधार पर मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि, आज देश के आम जनमानस में ये जाग्रति आ चुकी है कि उन्हें ख़ुद से अधिक अपने राष्ट्र से प्रेम है…. और उनके इस राष्ट्रप्रेम को चरम पर पहुंचाने का श्रेय जिस व्यक्तित्व को जाता है.. वो देश का वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी… है। लोग बड़े धड़ल्ले से कहते हैं कि, “आप शौक से हमें भक्त कहिये….. वो तो हम हैं.. “राष्ट्र” के, और अपने “राष्ट्र-नायक” दोनों के !!!! –जय हिन्द जय भारत।

विचारक; युग, पचहरा, के एल जैन इंटर कॉलेज, सासनी,हाथरस। निवासी; नीमगाँव,राया,मथुरा।

75- “लीडरशिप”..

उत्तर प्रदेश के अखबारों में छपी एक खबर पढ़कर..तो वाक़ई मैं हैरान रह गया कि, अपने देश में नेताओं की चुप्पी एवं प्रशासन की बेहोसी के कारण आज़ादी के बाद से कई एक ऐसी सीना जोरी की सी घटनाएं अक्सर होती रही हैं.. और हमारी सरकारें बोट बैंक न खिसक जाय इस डर से आंखें बंद किए बैठी तुष्टीकरण के खेल में मस्त रहती हैं ??

1964 में एक पाकिस्तानी देवबंद आने के नाम पर वीजा लेता है और उत्तर प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र मुजफ्फरनगर के पास फॉरेस्ट विभाग की एक जमीन पर पीर बाबा बनकर बैठ जाता है। उसने दो शादियां पाकिस्तान में कर रखी थी, फिर दो शादियां भारत में और कर लेता है। तमाम मुस्लिम धीरे-धीरे उसके पास अपनी रूहानी समस्याओं को लेकर आने लग जाते हैं.. फिर उसने “वन विभाग” की जमीन को हथियाने का एक शातिराना चाल के तहत तरीका अपनाया वहाँ उसने कुछ मजार बनवा दिए। अपने मुस्लिम भाइयों व बिकाऊ मीडिया से इस बात का प्रचार- प्रसार करवा दिया..कि ये मज़ार चमत्कारी हैं। इन मजार पर सर झुकाने से सारी समस्याएं दूर हो जाती हैं। भारत में भटके हुए लोगों का बाहुल्य है ..अब तो हर तबके के परेशान लोग धीरे-धीरे हजारों की संख्या में वहां पहुंचने लगे.. अगली चाल चलते हुए उसने उन लोगों को ठहरने के नाम पर कुछ पक्के कमरे बनवाए..तब भी तत्कालीन मौका परस्त मुख्यमंत्री व नेता लोगों के दबाब के कारण वन विभाग चुप्पी सादे रहा.. और देखते ही देखते उसने उत्तर प्रदेश “वन विभाग” की 100 एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया अपना एक आलीशान गेस्ट हाउस बनवा लिया, वहीं शानदार आश्रम स्थापित भी कर दिया और 1964 से लेकर अब तक अपना धंधा धड़ल्ले से चलाता रहा…है।

मग़र सौभाग्य से पूर्व की भांति जैसे ही..जिम्मेदार गुप्तचर एजेंसियों की रिपोर्ट वर्तमान मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के सामने पेश हुई तो, मा० केंद्रीय मंत्री श्री #संजीव_बलियान जी ने सारी ताम-झाम पर बुलडोजर चलवाकर पूरीतरह ध्वस्त कर दिया.. और पूरी जमीन पुनः “वन विभाग” को सुपुर्द कर दी। अभी इस बात का भी पता चला है कि इसके बारे में गुप्तचर एजेंसीयो द्वारा 1964 से लेकर तमाम सरकारों के चलते इस माँफ़िया की पूरी रिपोर्ट भेजी जाती थी। लेकिन वोट बैंक के चक्कर में योगी से पूर्व की सभी सरकारें इस धूर्त पर हाथ नहीं डाल सकी। थोड़ी देर के लिए अपना व्यक्तिगत हित-लाभ छोड़कर.. विचार कीजियेगा कि आपके ख़ुद के वजूद के साथ-साथ, देश व प्रदेश किन हाथों में सुरक्षित है…?

विचारक ; युग पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा।

74-“गलती से मिस्टेक”

एक बार ऐसे ही कुछ चर्चा-परिचर्चा.. के दौरान किसी बन्दे ने बड़ी भद्दी टिप्पणी करते हुए कहा कि, सुनने में आया है कि, हिन्दू लोग तो “परिवार-नियोजन” के पक्षधर हैं। लेकिन उन्होंने अपने देवताओं को खुल्ला छोड़ दिया है,क्या..? जिस कारण वे “तेंतीस-करोड़” हो गए हैं !!

ये सुनते ही एक बार को तो मेरा पारा चढ़ा, मग़र कुछ समय पहले तक तो मैंने भी न जाने किस से ऐसा ही कुछ सुन रखा था।.. वो तो अच्छा है, संस्कार बस मुझे सदैव से “बुजुर्गों के बीच बैठने की आदत है। अतः ये प्रसंग लगभग पांच या छह वर्ष पूर्व मैंने “तीर्थधाम-मंगलायतन” में एक “धार्मिक-परिचर्चा”में शामिल होने के दौरान जान लिया था। इसलिए बड़े इत्मिनान से मैंने उस बन्दे के साथ-साथ वहां पर मौजूद सभी महानुभावों को,किसी अनुवादक द्वारा हमारे वेदों को दूसरी भाषा में अनुवाद करते समय जो “गलती से मिस्टेक” कभी पूर्व में हुई है। उस दिन इस तथ्य का रहस्योद्घाटन करने का सौभाग्य समझकर … मैंने सभी को विनम्रता से कहा,

भाइयो! दरअसल बात कुछ इस प्रकार से है कि, हमारे वेदों का अनुवाद दूसरी भाषा में करते समय एक अनुवादक महोदय ने शायद भ्रमित-अवस्था में “तेंतीस कोटि देवता” का अनुवाद गलती से “तेंतीस करोड़ देवता” समझ लिया। जिससे अधिकतर लोग आज तक भ्रमित हैं। “करोड़” वाली “कोटि” में एवं “उच्चकोटि”वाली “कोटि” में वैसा ही फर्क है जैसे मात्रा और समूह में है, सीमित और असीमित में है।

इसलिये इस अंतर को ज़रा गम्भीरता पूर्वक समझियेगा क्योंकि “तेंतीस कोटि देवता” का अर्थ है…”तेंतीस उच्चकोटि के भगवान” आपको यदि यकीन न हो तो, इसका उल्लेख ऋग्वेद,यजुर्वेद एवं दूसरे उपनिषदों में भी है। आप स्वयं देख सकते हैं। और यदि आप स्वाध्याय में रुचि रखते हो, तो एक बात और बता दूँ, यही प्रश्न वृहिदारण्य उपनिषद में याज्ञवल्कय प्रश्नावली में भी पूछा गया है..? प्रमुख वेदों में बताया गया है कि… आठ ; वसु, बारह ; आदित्य, ग्यारह ; रुद्र एवं दो …अश्वनी कुमारों को मिलाकर कुल “तेंतीस उच्चतम देवता” होते हैं वेदों की भाषा में जिन्हें “तेंतीस कोटि देवता” कहा गया है।

अगर मैं और विस्तार में जाऊँ, तो आठ- “वसु” ;— पृथ्वी के विभिन्न भागों… जैसे ;1- अनिल-वायु,

2-अपस-जल, 3-दयोस-अन्तरिक्ष,

4-धरा-पृथ्वी,

5-ध्रुव जिसे हम ध्रुव तारे के नाम से भी जानते हैं।,

6-अनल-अग्नि,

7-प्रभास-अरुणोदय जिसे आप सूर्योदय के नाम से भी जानते हैं।

और अंतिम है…

8-सोम अर्थात चन्द्रमाँ।

अब बारह “आदित्य” ;–

ये बारह “आदित्य” हमें सामाजिक-जीवन के बारह भागों एवं वर्ष के बारह महीनों के बारे में बताते हैं।

प्रथम है शक अर्थात नेतृत्व,

दूसरा है अंश अर्थात हिस्सा,

तीसरा है आर्यमान अर्थात श्रेष्ठता,

चौथा है भार अर्थात धरोहर,

पांचवां है धात्री अर्थात अनुष्ठान कौशल, छटा है वस्त्र अर्थात शिल्प कौशल, सातवां है मित्र अर्थात मित्रता,

आठवां है रवि अर्थात कुशल जो समृद्धि का प्रतीक है।,

नौवां है सवित्र या परिजन्य जिसका अर्थ है शब्दों में छिपी शक्ति।,

दसवां है सूर्य या विवसवान अर्थात सामाजिक कानून,

ग्यारहवां है वरुण जो भाग्य का प्रतीक है। और अंतिम..

बारहवां है वामन अर्थात ब्रह्माण्डीय-कानून। अब हैं ग्यारह रुद्र;- जो हमारी ग्यारह इन्दियों के स्वामी है। जिनमें प्रथम पांच हैं;– 1-आनन्द,खुशी या प्रसन्नता।, 2-विज्ञान-ज्ञान, 3-मनस-विचार, 4-प्राण-प्राणशक्ति, 5-वाक-व्याख्यान,

शेष छः में से पांच महाशिव के रूपों के नाम हैं। जैसे ;– 6-प्रथमंशान अर्थात शशक।, 7-तत्पुरुष अर्थात व्यक्ति।, 8-अघोरा अर्थात अघोरी साधु।, 9-वामदेव अर्थात प्रत्यक्ष ब्राह्मण।, 10-सद्योजात अर्थात जो भी उत्पन्न हुआ..वो। और अंतिम… 11- “आत्मा” जो हर जीव में विद्यमान अजर-अमर “आत्मा”है..वो। और शेष दो हुए अश्वनी कुमार। इसप्रकार कुल देवता होते हैं … 8+12+11+2=”33 उच्च कोटि” देवता।

विशेष;- कुछ वेदों में दो अश्वनी कुमारों के स्थान पर इन्द्र और प्रजापति का भी उल्लेख किया गया है।

धन्यवाद युग पचहरा नीमगाँव, राया, मथुरा।

73- “शक्ति-सिद्धांत”

!!”Another-Theory”of Power…!!

देश के नेता जब चुनाव जीत जाते हैं मंत्रालय मिल जाता है, तो उसे अपनी बपौती समझकर और फिर अगले पांच वर्ष की तैयारी में जुट जाने के अतिरिक्त कुछ नहीं करते। सेवा भाव तो लगभग शून्य ही हो जाता है। इसके उलट आज के नेताओं में असीमित .. धन लोलुपता दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।

ये सब देखते हुए आज देश जिस दिशा में जाता दिख रहा है, उस मंज़र को सोचकर भी दिल कांप उठता है। मेरा ऐसा मानना है कि देश में आये दिन ऐसे हालात बनते जा रहे हैं जो चिन्तनीय और निन्दनीय दोनों हैं। अब “सिर्फ समाज और देश की युवा शक्ति की जागरूकता में ही वो ताकत है जो समय रहते देश के भविष्य को अंधकारमय होने से बचा सकती है।” अब ना चाहते हुए, मैं भी “शक्ति” के “दूसरे सिद्धान्त” पर बल देने की बात कहने को मजबूर हूँ। देश के हालातों ने आज मेरी मनः स्थिति को भी ऐसा कर दिया है कि, मैं खुद नहीं समझ पा रहा हूँ कि शक्ति के “दूसरे सिद्धांत” की बात मुझे आप से करनी भी चाहिये या नहीं। और ये भी हो सकता है कि, कुछ देर तो “हायर मॉरल वैल्यूज” के लोगों को मेरी ये कवायद डाइजेस्ट भी न हो.. लेकिन न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि, इस विचार से लोगों को अपने राष्ट्र के प्रति कुछ सोचने की प्रेरणा तो अवश्य मिलेगी।

क्योंकि, मैं “इतिहास” को सदैव दुनियाँ की सबसे बड़ी अदालत का दर्जा देता आया हूँ । सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ..?, हाई कोर्ट में क्या हुआ..?,लड़ाई के मैदान में क्या हुआ..? और चुनावों में क्या हो रहा है..? इस तरह की बातें एक तरफ से ख़बर बनकर आती हैं और दूसरी ओर चली जाती हैं। क्योंकि दिन प्रतिदिन घटनाओं और खबरों के अम्बर लगे रहने से लोग विस्मृति के शिकार हो गए हैं। इसलिए केवल “इतिहास” ही है,जो पुनः स्मृति दिलाता है। अतः मैं उसे वक़्त के छोटे भाई के रूप में देखता हूँ।क्योंकि हर छोटी-बड़ी घटना का ख़ुद वही तो साक्षी होता है।

अब आप इतिहास के पन्नों में झांकिए और गौर से देखिये कि, इतिहास का निर्णय सदैव उसी के पक्ष में गया है, जो शक्तिशाली होता है।

कैसी विडम्बना है कि इतिहास ने कभी भी उसका साथ नहीं दिया जो ‘न्याय के साथ’ था। और ‘सही’ था। उदाहरण के तौर पर आप ख़ुद देख लें कि “दिल्ली में बाबर रोड तो है लेकिन राणा सांगा रोड नहीं है।क्योंकि बाबर आया और विजयी हुआ..भले ही देश राणा सांगा का है मग़र वो तो हार गये थे, तो रोड उनके नाम से क्यों बनता..? दूसरी तरफ अगर ऐसा नहीं होता तो,हिन्दू शाही किंगडम अफगानिस्तान से होती हुई सिकुड़ती-सिकुड़ती यहाँ तक न आ जाती..?

सुसंस्कारी सच्चे और अच्छे “लोग” या बड़े स्तर पर “देश” कभी किसी पर कुदृष्टि नहीं डालते, इतिहास गवाह है कि, भारतीयों ने कभी किसी के जीवन मूल्यों,धर्म-ग्रंथों और धर्म स्थलों को नष्ट नहीं किया। इससे सिद्ध होता है कि हम भारतीय न्याय संगत थे और सत्य भी हमारे पक्ष में था। मग़र गौर तलब है कि, “शक्ति” हमारे साथ नहीं थी। जो कि सदैव से नितांत आवश्यक है। इसलिए दोष इतिहास का नहीं हमारा है इतिहास ने हमें वही सजा दी है। जिसके हम हकदार थे। ध्यान रहे इतिहास हमेशा उन्हें सजा देता है,जो “विचारों” को “कर्म” से और “न्याय” को “शक्ति” से अधिक महत्व देते हैं।

मग़र यहां मेरे इस कथन का आशय ये विल्कुल मत निकालियेगा कि, हमें “न्याय” और “सत्य” को तिलांजलि दे देनी चाहिए। मेरा मतलव ये विल्कुल नहीं है कि न्याय का अपना महत्व नहीं है। लेकिन यदि कंसिस्ट ऑफ़ इंटरेस्ट” (Consist of interest) हो, तो शक्तिशाली बनना ज्यादा आवश्यक है। अच्छा एक बार आप चारों ओर अपनी नज़र फैला के देख लीजियेगा कि, कोई “व्यक्ति” या फिर कोइ “देश” रसूख़दार या वजूददार तभी बनता है जब वह अन्य आवश्यक फैक्टर्स के साथ-साथ शक्ति के सिद्धान्त को भी तरज़ीह देता है। अर्थात सभी के बीच एक सही संश्लेषण बना के चलता है। उसी आधार पर किसी व्यक्ति या देश की शक्ति का आंकलन किया जाता है। तब कहा जाता है कि, वह शक्तिशाली है या फिर कमज़ोर!!

जैसे; कि हम वॉर-फेयर के उसूलों के नज़रिये से देखें, किसी भी राष्ट्र की कॉम्प्रीहेंसिव-स्टेट “पॉवर” होती है। जिन चीजों से वह फाइट करता है। भारत के पास सदैव जनशक्ति, धनशक्ति, ज्ञानशक्ति व टेक्नोलॉजी आदि सब कुछ समुचित व्यवस्था में था। और है। जिन्होंने भारत पर आक्रमण किये, अनुपातिक तुलनात्मक स्थिति में उनसे हम हज़ार गुना बेहतर थे, इसके बावजूद भी न्याय हमारे पक्ष में नहीं रहा..क्यों..?

कश्मीर के राजा ने हमें हस्ताक्षर करके दिए थे, जिस आधार पर संविधान कहता है कि “कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।” फिर, अभी भी उस पर जिद्दोजहद है.. क्यों..?

करोड़ों की संख्या में बंगलादेशी हमारे देश की सीमा में घुसपैठ कर भारत में आ जाते हैं। जबकि हमारी सीमाओं व सभी एयरपोर्ट पर साफ-साफ लिखा हुआ है कि, “पूर्ण चौकसी रखी जाय, ताकि एक भी व्यक्ति बिना वीजा या पासपोर्ट के भारत में प्रवेश न कर पाय।”

अगर आप देश और दुनियां के कर्रेंट अफेयर्स में रुचि रखते हों,तो 25 जुलाई,2005 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इसका संज्ञान लेते हुए कहा था कि, “भारत में सीमा पार से होने वाली घुसपैठ किसी आक्रमण से कम नहीं है। इसके दुष्परिणाम देश की आने वाली पीढ़ियों के लिए भयंकर होंगे।” दुर्भाग्य देखिये कि वही सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के तीन दिन के अंदर एक नया अध्यादेश जारी करके उन सारे कानूनों को “फोरिनर-एक्ट” के तहत… “इन कॉर्पोरेट”(समाविष्ट) कर लेती है। क्योंकि जो I.N.Duty-act था। उसे सुप्रीम कोर्ट ने Null & void(अमान्य) कर दिया था।

आप ही बताइये कि, इस तरह की बातें हमें “सोचने” के लिए बाध्य करती हैं या नहीं..?

अब मै, और अधिक गहराई में न जाते हुए..एक बहुत ही प्रमुख बात की ओर आपका रुख़ चाहूँगा। भारत कभी विदेशियों से नहीं हारा। अंग्रेजों ने भी भारत से क़भी कोई ऐसी लड़ाई नहीं जीती कि जिसकी फौज में भारतीय सिपाही न हो। चाहे अंग्रेजों ने हम से कोई भी लड़ाई लड़ी हो मग़र अंग्रेजों के साथ सदैव हमारी “नेटिव-आर्मी” रही है।

अगर बिना किसी लाग्-लपेट के कह दूँ, तो “हिंदुस्तान को सदैव हिंदुस्तानियों ने ही शिकस्त दी है।” जिन्हें हम अपने कहते हैं उन लोगों ने कभी देश का साथ नहीं दिया। ये कड़वा जरूर है मग़र सच है। आप स्वयं देख रहे हो अभी भी लगातार वैसे ही प्रपंच आये दिन रचे जाते रहे हैं। इसलिए आज “समाज” को और देश की “युवा शक्ति” को ऐसे धोखेवाजों से देश को सुरक्षित रखने का संकल्प लेने की दरकार है।

मुझे ही क्या आज देश के हर सच्चे विचारक को अगर कष्ट है,तो केवल इसी बात का। कि अपने ही सदैव से आस्तीन के सांप बनकर काटते रहे हैं। मग़र ऐसा आख़िर कब तक..?

दर्द इस बात का नहीं है कि, बाहरी लोगों ने या विदेशियों ने हमारे साथ क्या किया..? वो तो दुश्मन के रूप में सामने थे। जो किया वो स्वीकार है। मग़र जो पार्टिबन्द अपनों का चोला पहन कर भितर-घात में लगे थे और आज भी लगे हैं कष्ट… तो इस बात का है।

भारत को वाह्य शक्तियों से जो खतरा है, उससे तो वह निपट लेगा लेकिन अपनों की जब तक काऊन्सिललिंग नहीं होगी तब तक खतरे टलेंगे नहीं..? हमें आपस में बांट कर कहीं राष्ट्र की सुरक्षा,अस्मिता और राष्ट्र के गौरव का ये लोग सौदा न कर बैठें। क्योंकि तुच्छ सोच रखने वाले,धन लोलुप अपने आज के सुख के लिए आने वाली पीढ़ी के भविष्य को अंधकारमय कर सकते हैं। ये सम्भव है।

इसीलिए.. मेरा प्रबुध्द वर्ग से आग्रह है, अब समय आ गया है। “युवा शक्ति” व “भारतीय समाज” को भटकाव से बचते हुए हर वक़्त जागरूक नागरिक का परिचय देना होगा।

धन्यवाद

विचारक ; युग पचहरा

जैन कॉलेज,सासनी,हाथरस, मूलनिवासी; नीमगाँव,राया,मथुरा।

72- “प्रेरणादायी-व्यक्तित्व”

Do You Know…about an inspiring personality “King of spice”..?

महोदय, MDH मसाले वाले महाशय “श्री धर्मपाल जी गुलाटी” को लेकर फेसबुक व टी वी पर आपने बहुत मज़ाक देखे होंगे, जैसे;- कि बुढ़ऊ मरता नहीं… अपने मसालों के विज्ञापन ख़ुद ही करता है..कितना उम्र दराज है..बगैरा बगैरा पर जब इन महाशय जी के जीवन के बारे में पढ़ेंगे तो मेरा दावा है कि, इनके समक्ष आप अवश्य नतमस्तक होना चाहेंगे। इनके नाम के आगे जो “महाशय” शब्द लगा है,वो ठीक ही है। क्योंकि महाशय का शाब्दिक अर्थ होता है”जिनका आशय यानी अर्थ महान हो, ऊंचा हो

दरअसल वही होते हैं “महाशय”

सच्चे वैदिक विद्वान ,’पद्म भूषण’ से सम्मानित इनकी जीवन गाथा आज के युवाओं के लिए प्रेरणा बन सकती है।यही सोचकर मै इन महाशय पर लिखने की हिमांकत कर रहा हूं ..विशेषकर उन लोगों को ध्यान में रखकर जो निठल्ले बैठे सरकार को कोसते रहते है। अखंड भारत के पंजाब प्रांत के सियालकोट में जन्मे महाशय जी के पिता की छोटी सी मसाले की दुकान थी नाम था, “महाशया दी हट्टी” यानि हिंदी में महाशय जी की दुकान। आज़ादी के पूर्व ,स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागी बने, बंटवारे के बाद ये संपन्न परिवार पहले भारतीय पंजाब के रिफ्यूजी कैम्प में रहा अपना सब कुछ लुटा कर । उनके पिता जी ने कुल 1500 रूपये ,महाशय जी को दिए और कुल इतनी राशि लेकर वो दिल्ली आये । करीब 650 रूपये में घोड़ा व तांगा ख़रीदा और 2 आना सवारी वाले तांगे के सहारे जीवन की गाड़ी आगे बढ़ाई। फिर अपनी कुशाग्र बुद्धि से पुनः MDH यानि मसाले के कारोबार में उतरे। आज ये करीब 1000 करोड़ की कंपनी के मालिक हैं , महाशय पूरी दुनिया में ‘किंग ऑफ़ स्पाइस’ माने जाते है। अन्य प्रतिष्ठान जैसे; एक हॉस्पिटल , पन्द्रह स्कूल भी हैं जिन्हें ये स्वयं चलाते है। और हिन्दू धर्म के प्रचार प्रसार में तन मन धन से सदैव सहयोग देते आये हैं।

एक सच्चे आर्य समाजी , सफल व्यवसायी , महादानी और आज 96 वर्ष की आयु में भी योग व वैदिक दिनचर्या के कारण स्वस्थ हैं। अब इनका मज़ाक बनाने से पहले एक बार सोचियेगा जरूर कि, ये महाशय नमन के योग्य है, या फिर मज़ाक के..? निर्णय आपके ऊपर छोड़ा है। धन्यवाद।

विचारक; युग पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा।

71-Two Cup Tea

71-“Two Cup-Tea.”. “दो कप-चाय” एक दिन एक प्रोफ़ेसर ने कक्षा में अपने छात्रों से कहा कि मैं आज तुम्हें जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाना चाहता हूँ क्या आप तैयार हैं..? सभी छात्रों ने एक स्वर में कहा Yes Sir. प्रोफेसर अपने साथ एक काँच का बड़ा जार लेकर आये थे। वो उन्होंने टेबल पर रखा और उसमें “टेबल टेनिस की गेंदें” डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची … उन्होंने छात्रों से पूछा – क्या जार पूरा भर गया.. ? आवाज आई … “हाँ” फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे – छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये धीरे – धीरे जार को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी, अच्छे से समा गये , फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब जार पूरा भर गया है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ … कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस जार में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे … फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह जार पूरा भर गया ना ? हाँ .. अब तो पूरा भर गया है .. सभी ने एक स्वर में कहा .. सर ने टेबल के नीचे से “चाय के दो- कप” निकालकर उनकी की चाय जार में उड़ेल दी, चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी सी जगह में समा गयी। प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया बच्चो थोड़ी देर के लिए इस काँच के “जार” को तुम लोग अपना जीवन समझो …. “टेबल टेनिस की गेंदें” सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और आपके निजी शौक हैं। “छोटे कंकर” मतलब तुम्हारी नौकरी , कार,मकान आदि हैं, और “रेत” से यहाँ छोटी-छोटी बे मतलब की बेकार सी बातें, आपसी-मनमुटाव और झगड़े हैं। अब यदि तुमने काँच के ज़ार में सबसे पहले “रेत” भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या “कंकर” भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी … ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है … यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा … मन के सुख के लिये क्या जरूरी है क्या नहीं। ये तुम्हें ही तय करना है। अपने बच्चों के साथ खेलो , पिकनिक पर जाओ पौधों आदि में पानी डालो , सुबह-शाम पत्नी व बच्चों के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, वक़्त वक्त पर अपना मेडिकल चेक-अप करवाते रहो … “टेबल टेनिस गेंदों” की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है … पहले तय करो कि क्या जरूरी है … बाकी सब तो रेत है .. ये सारा वृतांत छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे ..

अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि यहाँ “चाय के दो-कप” क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, और बोले .. मैं भी यही सोच रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं उठाया..? हाँ बेटे ! इसका उत्तर ये है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगने लगे, परन्तु अपने खास लोगों के साथ सिला रहमी अर्थात “दो-कप चाय” (Two Cup-Tea) पीने की जगह सदैव रखनी चाहिये। अगर दुनियां में ख़ुद के होने का तनिक भी भान है, तो जीव मात्र से निस्वार्थ भाव से न केवल प्रेम करें वल्कि व्यस्ततम समय में से वक़्त निकाल कर उनकी खैर खबर भी लेते रहा करें।

धन्यवाद ; युग पचहरा, 88-A वसुंधरा, निकट बाई-पास, हाथरस।

70-“SUNDAY..?”

Know the real story after “SUNDAY”…कुछ लोग सोच रहे होंगे,कि आख़िर रविवार की छुट्टी के पीछे उस महान व्यक्ति का क्या मक़सद रहा होगा..?

तो मैं बता दूँ, देश-दुनियाँ के किसी भी सार्वजनिक कार्य के पीछे ‘ऊँची सोच’ रखने वाले लोगों का मक़सद व्यक्तिगत कभी नहीं सदैव ‘लोक कल्याणकारी’ ही होता है।।

… इसका इतिहास जानने के लिए ध्यानपूर्वक पढियेगा… जिस व्यक्ति की वजह से हमें ये छुट्टी हासिल हुई, उस महापुरुष का नाम है, “नारायण मेघाजी लोखंडे”।

जो ‘ज्योतिराव फुले’ के .. “सत्यशोधक-आन्दोलन” के न केवल एक सच्चे कार्यकर्ता थे वल्कि एक कामगार नेता भी थे।

अंग्रेजी-शासन में पूरे सप्ताह मजदूरों को काम करना पड़ता था। लेकिन “नारायण मेघाजी” लोखंडे का ये मानना था कि, हम सभी लोग सप्ताह के सातों दिन अपने परिवार की जीविका चलाने के लिए काम करते है।

भारतीय समाज ने शिक्षित लोगों को नौकरी-पेशा द्वारा सुव्यवस्थित तरीके से जीवन जीने का अवसर दिया है।

इसीलिए उनका समाज के लिए भी कुछ करने का दायित्व बनता है। अपने “निर्धारित-कार्यों” के अतिरिक्त अपने ख़ुद के दिमांग की तरो-ताज़गी के साथ-साथ कार्य-कुशलता बढ़ाने हेतु सप्ताह में एक दिन की छुट्टी जरूर होनी चाहिए। ऐसा सोचकर.. मेघा जी ने अंग्रेजो के सामने पहली बार सन 1881 में ‘एक सवाल’ के साथ ये महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा।

लेकिन अंग्रेज इस प्रस्ताव को मानने के लिए तैयार नहीं हुऐ। तब आख़िरकार ‘नारायण मेघाजी लोखंडे ‘ को Sunday की छुट्टी के लिए 1881 में एक आन्दोलन भी करना पड़ा। ये आन्दोलन दिन-व-दिन बढ़ता गया। लगभग आठ साल तक लगातार ये आन्दोलन चला..

तब कहीं जाकर 1889 में अंग्रेजो ने हार मानकर Sunday की छुट्टी का ऐलान कर ही दिया.. अर्थात उन्हें करना ही पड़ा। ये था Sunday की छुट्टी का इतिहास।

Did You know before it..? कम पढ़े-लिखे लोग तो दूर… ज्यादातर पढ़े-लिखे लोगों को भी शायद ही इस तथ्य की गहराई पता होगी। और यदि जानकारी होती, तो Sunday के दिन “Personal-Enjoy” में वक़्त जाया न करके वे “जनकल्याण की राह पर चलकर…” समाज के पिछड़े हुए कार्यों में नुक्स न निकालकर.. हाथ बटा रहे होते….और यदि हम सबने समाज का काम ईमानदारी से किया होता.., तो आज समाज में भुखमरी, बेरोजगारी, बलात्कार, गरीबी, लाचारी आदि मौजूदा समस्याये नहीं होती..?

मेरे ख्याल से अब एकदम स्प्ष्ट हो गया है कि, इस Sunday की छुट्टी पर हमारा कोई व्यक्तिगत हक़ नहीं है, कायदे से इस पर “समाज” का हक़ है।

चलो कोई बात नहीं, “जब आँख खुलीं तभी सबेरा..” वाले नज़रिए से हमें Sunday का ये दिन कम से कम आज से “सामाजिक-कार्यों” के लिए समर्पित कर देना चाहिए !!

धन्यवाद जय हिंद जय भारत।

विचारक / शिक्षक ; युग पचहरा, जैन इंटर कॉलेज,सासनी,हाथरस।,

(मूल निवासी; नीमगाँव,राया मथुरा)