हर तरफ यही वातावरण है..शिक्षा के समुचित प्रचार-प्रसार एवं अनेकों तकनीकी प्लेटफॉर्म की उपलब्धता के परिणाम स्वरूप आज पढ़े लिखे लोगों की तो कहीं भी कोई कमी नहीं रही।
मग़र अफ़सोस! इस बात का जरूर है कि आज की पीढ़ी जो “तालीम, हासिल कर रही है..उसमें से “तहजीब” अवश्य कहीं गायब है।
अर्थात आज की “तालीम” बिना “तहज़ीब” के नजर आती है। ऐसे मंज़र देख या सुनकर हर मानव मन बेचैन हो उठता है। क्योंकि यदि शिक्षा ही “संस्कार-विहीन” हो,तो भला किस काम की..??
आज इस बिंदु पर मैं, भारत में हुई कुछ “अप्रिय” घटनाओं का जिकर करते हुए अपना मंतव्य आपके सामने रख रहा हूं…
गुज़रात के राजकोट में रह रही स्कूल अध्यापिका श्रीमती जयश्री बेन, जिसने अपना सारा जीवन, अपने इकलौते बेटे की परवरिश और उसे बेहतर तालीम देने,में पूरे समर्पण भाव में खपा दिया, दुनियाँ की हर माँ की तरह जयश्री बेन ने भी अपने सुखी जीवन के सपने अवश्य देखे होंगे..
अच्छा,देखिए! उनकी मेहनत भी खूब रंग लायी बेटा सफलता की सीढ़ियां चढ़ता गया और एक यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर बन गया। उसकी शादी भी एक डॉ लड़की से हो गयी।..सब कुछ मन मुताबिक होता गया..जय श्री बेन के परिवार में रुपये-पैसे की अब कोई कमी नहीं थी।
मग़र “तालीम” बिन “तहज़ीब” के जो थी,तो वक़्त ने ऐसी करवट बदली कि, बेचारी जय श्री बेन को लकवा क्या! मार गया, वश उनका तो दुर्भाग्य ही शुरू हो गया.. बेचारी मजबूरन पूरी तरह अपनी बहु-और बेटे पर आश्रित ही हो गयी।
परन्तु एक रोज क्या हुआ… उनके प्रोफेसर बेटे ने बीमार मां को सहारा देते हुए किसी तरह खड़ा कर लिया और धीरे-धीरे घर की चौथी मंजिल पर ले गया, माँ बड़ी खुश हुई कि मुझे बिस्तर पर पड़ी देख मेरा बेटा मन बहलाने व जाड़े में धूप सेंकने के लिए शायद छत पर ले जा रहा है। छत पर पहुँचते ही प्रोफ़ेसर बेटे ने जब अपनी माँ को गोदी में उठाया तो माँ और ‘भाव-विभोर’ हो गयी..फिर सोचने लगी कि, मैं यहाँ आते-आते थक सी गयी हूँ, इसलिए गोद में उठाकर शायद कहीं ठीक से बिठाएगा..??
मग़र इससे आगे उस निष्ठुर बेटे ने जो किया… आप सभी ईश्वर से दुआ कीजियेगा कि किसी का बेटा ऐसा न करे ! अफ़सोस! उस निकृष्ट बेटे ने एक “लाचार-माँ” को चार मंजिला इमारत से नीचे गिरा दिया..😢
उस क्षण वह अभागी ‘ माँ ‘ जाने क्या सोच.. पायी होगी..उससे पहले बेचारी की जीवन-लीला ही समाप्त हो गयी।
बाद में घटना को इस प्रकार दर्शाया गया जैसे भूल बस बुढ़िया छत पर घूमते घूमते चक्कर आदि आने से गिर गयी..हो।
लेकिन सदैव याद रखिएगा..कोई भी गलत काम चाहे कितनी ही प्लानिंग से क्यों न किया जाय..ईश्वर की लीला ऐसी है.. फिर भी कोई न कोई ‘सुराग’ मिल ही जाता है। इसीलिए दुनियां में मिशाल दी जाती है..”दिन देरी है मगर अंधेरी नहीं है।”
वे भी अपने घर में लगे सी.सी. फ़ुटेज का कुछ कर पाते उससे पूर्व पुलिस जांच आ गयी। जिससे स्पष्ट हो गया कि, बुढ़िया गिरी नहीं.. बल्कि उसके अपने ही प्रोफ़ेसर बेटे ने अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए उसे नीचे पटक दिया था।
“इल्म की तासीर जब गुरुर में बदली,
बुनियाद रिश्तों की महज़-दस्तूर में बदली,
और बुजुर्गों को फ़क़त आफ़त समझ बैठी औलाद,
आदम के वेनूर में बदली।”
दूसरे प्रकरण में..ऐसा ही कुछ मुम्बई की श्रीमती आशा साहनी के साथ भी हुआ…इनके बेटे ने खूब तालीम हासिल की.. इतनी कि अमेरिका में एक मशहूर डॉक्टर की हैसियत से स्थापित हो गया। वहीं किसी गोरी मेम से शादी भी करली।
मग़र उस संस्कारविहीन कागज के आधार पर पढ़े लिखे कहे जाने वाले बेटे ने लौटकर अपनी माँ को कभी नहीं देखा।
बेचारी आशा साहनी ने वर्षों बेटे का इंतजार किया। मग़र अफ़सोस ! बहू-बेटे से मिलने की आस लिए इंतजार.. से थककर एक रोज़ बिस्तर पर पड़े-पड़े ही उस अभागी-मां के प्राण-पखेरू उड़ गए..
उसके मर जाने के भी डेढ़ साल बाद जब बेटा बाई द वे विदेश से आया, तो अफसोस!!!! बिस्तर पर उन मां-बेटे के रिश्ते की ही तरह एक मां के शरीर की हड्डियों का एक खोखला सुखा ढाँचा (कंकाल) जरूर पड़ा मिला।
ठीक वैसा ही इलाहाबाद के कमलेन्द्र श्रीवास्तव व सूरत की चम्पा वेन के साथ भी हुआ। अर्थात
मग़र कई वर्षों से मैं देख रहा हूँ कि, हमारे भारतीय समाज में ऐसी घटनाएं तो अब सामान्य सी बात हो गयी है। अगर आप इन घटनाओं पर ग़ौर करें तो, आप इनमें एक “दुःखद समानता” जरूर पाएंगे.. कि घटनाओं को अंजाम देने वाले ये लोग “अच्छी तालीम के साथ साथ आर्थिक रूप से खूब सम्पन्न लोग थे।”
ऐसी कोई एक दो घटना हों तो, कहा जा सकता था कि, किसी अमुक व्यक्ति की मनोवृत्ति में कोई ख़राबी रही होगी…। मगर अफसोस!; अब तो इस दुनियां बिच ऐसी घटनाओं का एक सिलसिला सा शुरू हो गया है।
दरअसल, इस लेख के माध्यम से मैं वर्तमान में गिरते मानव-मूल्यों, संस्कारों आदि की ओर सम्पूर्ण प्रबुद्ध वर्ग का ध्यानाकर्षण कराना चाहता हूं
ये हम सब लोग अक्सर देख रहे हैं कि “शिक्षा तो है, मग़र संस्कार नहीं दिखते!
कहने का मतलव है कि आज “तालीम तो अच्छी है, लेकिन तहज़ीब कहीं खो सी गई है..?” ऐसा क्यों..?? हुआ है अब एक नजर इस पर भी हो जाए..
यहां एक सवाल उठता है…? कि. ये घटनाएं दिन प्रतिदिन बढ़ रहीं हैं।आखिर इसके पीछे कारण क्या हैं..?? तो मांफ कीजियेगा खोट कहीं अन्यत्र नहीं है, हम “माँ-बाप” की “डीलिंग” अर्थात हमारी परवरिश में ही है।
दरअसल होता क्या है..ऐड़ी-चोटी का जोर लगाकर पहले तो हम “मां बाप” ही अपने बच्चों को बिना “तहजीब” वाली ‘तालीम’ दिलवाए चले जाते हैं, उसी तालीम से ..वे बच्चे इंजीनियर,डॉक्टर, प्रोफ़ेसर,जज आदि बड़े-बड़े पदों को हासिल कर भी लेते..हैं। मगर वे ये सब करते कराते एक संस्कार विहीन व्यक्ति बन कर तैयार जो हो जाते हैं।। और फिर हम उनसे संस्कारवान होने की अपेक्षा करते हैं। तो दोषी बच्चे हैं या मां बाप..??
सच तो यही है, ये सब बनते-बनते उनके अंदर का ‘इंसान मर चुका होता है…? जो हम “मां बाप” से दिली लगाव रखता था। उनके अंदर असीमित रुपए पैसे की भूख वाला मशीनी दिमांग डेवलप होता चला जाता है। जाहिर है तब उन्हें ये रिश्ते,नाते,जिम्मेदारियां बोझ जैसी लगने लगती होंगी..शायद इसीलिए वे इतने निष्ठुर हो जाते हैं।
आप ऐसा विल्कुल भी मत समझ लीजियेगा कि, इस लेख के ज़रिए मैं देश की “शिक्षा-नीति” को कोसने वाला हूँ। जी,नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं होगा।
क्योंकि मैं शिक्षक By Choice हूँ, जबकि आप रिसर्च कीजिएगा तो पाएंगे.. अधिकतर लोग शिक्षा के क्षेत्र में “By-Chance” आ जाते हैं।
शायद इसीलिए शिक्षा-जगत से जुड़े हुए ज्यादातर पहलुओं को गंभीरता से समझने का प्रयास करता रहता हूँ, किसी भी देश में जाकर देख लीजियेगा, हर देश में “शिक्षा-नीतियाँ” तो लगभग इसी तरह कार्य करतीं हैं।
यहाँ मेरी व्यक्तिगत रिसर्च ये कहती है.. कि,”अकादमिक-शिक्षा” का निर्धारण कुछ ऐसा किया गया है कि,तहज़ीब व सभ्यता से सीधे तौर पर इसका कोई सरोकार नहीं दिखता!!
तहज़ीब सिखाने का कार्य माता-पिता, परिवार व समाजिक वातावरण करता है। इसलिए जिम्मेदारी भी इन्हीं सबकी बनती है। ये जमीनी हक़ीक़त है।क्योंकि माता-पिता बच्चे को संस्कार देने की उम्र में रट्टा मारकर आगे बढ़ना सिखाने को पढ़ना समझते हैं।
जी..हाँ, मगर मांफ कीजिएगा..मैं ये कहने की हिमांकत अवश्य कर रहा हूं .. परंतु केवल हम “मां बाप” के कर्मों के हवाले से ख़ुद से एक शब्द भी नहीं।
दरअसल, हम “मां बाप” सिखाने की उम्र में रोबॉट या किसी मशीन की तरह अपने बच्चों की प्रोग्रामिंग कर रहे होते हैं…और जब वे इंसानियत छोड़ वो बन जाते हैं, जो उन्हें बना गया था। फिर यही “मां-बाप” उस ह्रदयहीन रोबॉट या मशीन में ” इंसानी रिश्ते, प्यार एवं संवेदनाएं खोजते नज़र आते हैं। जब वे दिली रिश्ते नहीं मिलते, तब वही मां बाप आसमान सिर पर उठा लेते हैं। कैसी अजीब!! विडंबना है??
हिंदी-फिल्मों के डायरेक्टर्स ने कई एक फिल्में “एजुकेशन” को टारगेट करके बनाई हैं। जैसे;- “थ्री-इडियट्स”, “तारे- जमीन पर”, “सुपर-30 और हाल ही में..”ट्वेल्थ फेल” जो मनोज शर्मा के आई पी एस बनने के संघर्ष की कहानी पर आधारित है।आदि। अब आप “तारे-जमीन पर” फ़िल्म का वो सीन याद कीजिये.. जब एक मां-बाप की जोड़ी अपने बच्चे को बोर्डिंग-स्कूल में छोड़कर रवाना हो रही होती है, तब वह छोटा सा बच्चा अपनी माँ के पल्लू को पकड़कर रोने लगता है.. और कहता है…”भीड़ में यूं न छोड़ो मुझे.. घर लौटकर भी आ न पाऊँ..मैं, माँ, क्या..? इतना… बुरा हूँ.. मैं, माँ…वगैरह वगैरह (गीत के माध्यम से) मां-बाप “तहज़ीब” से “तालीम” “को कहीं अधिक मानते हुए निष्ठुर होकर चल देते हैं..” इस रवैये से बच्चे की संवेदनाएं लगभग मर ही जाती हैं। वह “संवेदनहीन” हो जाता है,तो फिर वही माँ-बाप बहुत परेशान दिखते हैं।
मैं ऐसे कई एक बुजुर्ग मां-बाप को जानता हूँ। जिन्होंने अपने बच्चों को घर से काफ़ी दूर अच्छी “तालीम” के लिए भेजा हुआ है। इस बात में कोई दो राय नहीं, कि वे अपना अच्छा कैरियर सेट कर लेंगे।
मग़र एक चीज़ जो कई बार मैं महसूस करता हूँ। वो ये कि, ऐसे बच्चों का अपने माँ-बाप के साथ एक मजबूत “रिश्ता” तो छोड़िए! क्या कोई रिश्ता कायम रह भी पाएगा। जो उनसे अपेक्षाएं की जातीं है। अब यदि ऐसा “संस्कार-विहीन-बालक” बीस-पच्चीस वर्ष बाद अपने माँ-बाप को घर से निकाल कर किसी वृद्धा-आश्रम में छोड़ भी आयेगा, तो आप ही बताइएगा..?? इसमें कौनसी अचरज़ की बात है।
क्योंकि..
” करता था सो क्यों किया..?? अब कर.. क्यों पछिताय..??, बोया पेड़ बबूल का ,तो आम कहाँ से आए..?? ”
जब दुनियादारी की अंधी रेस में हमने अपने नौ-निहालों के हिर्दय रूपी खेत में प्यार,संवेदना, सम्मान व संस्कार रूपी बीज बोये ही नहीं हैं, तो फिर मधुर फलों की चाह ही क्यों रखते हैं..?
आख़िर में, सबसे मेरा यही आग्रह है कि,गुजरात की जयश्री बेन व मुम्बई की आशा साहनी की तरह पश्चाताप के साथ दुनियाँ में घुट-घुट कर नहीं मरना चाहते हैं, तो तालीम के साथ-साथ “तहज़ीब” सिखाने की ओर समय रहते ही मुख़ातिब हो जाइएगा..? वरना..आप ख़ुद समझदार हैं।
धन्यवाद एवं नमस्कार
विचारक : योगेंद्र सिंह पचहरा,
मूल निवासी: नीमगांव, राया,मथुरा।
88A वसुन्धरापुरम, हाथरस।