86-“शिक्षक”

महोदय, मत पूछिए कि शिक्षक क्या है..? आपके प्रश्न का सटीक उत्तर तो सदैव मौन…. है।

मग़र भाव समझ सको तो “शिक्षक” न पद है, न पेशा है, न व्यवसाय है और ना ही गृहस्थी चलाने वाली कोई “इनकम”।

अगर कोई इस पद का निर्वाह कर सके तो “शिक्षक” सभी धर्मों से ऊंचा एक धर्म है। गीता में उपदेशित..

“मा फलेषु कदाचन” वाला “निश्छल-कर्म” है।

शिक्षक तो एक प्रवाह है। मंज़िल भी नहीं वह महज़ एक राह.. है।

शिक्षक वही, जो मर्यादा में है, फिर वह पवित्र क्या!! चारों दिशाओं में महक फैलाने वाला एक इत्र है।

शिक्षक स्वयं एक जिज्ञासा..है। खुद ही जल श्रोत है फिर भी ‘वह’ सदैव प्यासा है। तभी,तो वह “एक शिक्षक” है।

क्योंकि उसमें चांद, सितारों तक को तुम्हारी झोली में डालने की एक अभिलाषा है..

“शिक्षक” सदैव अपने सामने मौजूद व्यक्ति के स्तर को समझते हुए.. उसी जुबान में बोलता है, जिससे कि, बेहतर तरीके से उसे समझा सके। वह अपने शिष्य के सिर पर कभी मित्र, कभी मां तो, कभी पिता के जैसा वर्ध हस्त है। क्योंकि नज़दीक न होते हुए भी, अपने विचारों से ताउम्र..अपने शिक्षार्थी के साथ है।

बच्चों को वह नायक, खलनायक, तो कभी विदूषक लगता है। शायद इतने सारे मुखौटे वह उन बच्चों के लिए ही बदलता है। परन्तु इतने सारे मुखौटों के बावजूद भी, वह समरूप है, समभाव है, क्योंकि यही उसका, “सहज-स्वभाव” है।

ऊँचाई मांपोगे तो, शिक्षक मीरा के गोविंद सा.., बहुत ऊंचा है।

अच्छा, आप ही बताओ ! उसके स्तर तक भला अभी तक कोई अन्य पहुंचा है..?? प्राकृतिक रूप से वह न तो वृक्ष है, न पत्तियां, और ना ही फल है।

मेरे विचार में तो, वह केवल हरी “खाद” है।

शिक्षक खाद बनकर, हजारों को पनपाता है। मोमबत्ती की तरह खुद के स्थूल-शरीर को खपा कर,अपनी शुद्ध-वैचारिक आभा से सब के जीवन में ज्ञान रूपी प्रकाश बन, सदैव के लिए अमर हो जाता है..

क्योंकि “शिक्षक” कोई व्यक्ति नहीं, एक विचार है.. आइना है, सु-संस्कार है।

“शिक्षक” न दीपक है, न बाती है, और ना ही वह रॉशनी है। वह तो महज़ एक तेल है।

क्योंकि उस पर ही तो “दीपक” का सारा खेल है।

“शिक्षक” तुम ख़ुद ही हो, शिक्षक तुम्हारे भीतर की प्रत्येक “अभिव्यक्ति” है।

अब आप ही बताओ! कैसे कह सकते हो..? कि शिक्षक केवल एक “व्यक्ति” है।

इतिहास उठाकर देख लो!! शिक्षक चाणक्य, सान्दिपनी तो कभी विश्वामित्र है। गुरु और शिष्य की प्रवाही परंपरा का एक बेहतरीन चित्र है।

दरअसल, शिक्षक भाषा का मर्म है। अपने शिष्यों के लिए वह धर्म है। साक्षी और साक्ष्य है। चिर अन्वेषित लक्ष्य है। “शिक्षक” एक अनुभूत सत्य है। जो स्वयं में एक तथ्य है।

देश के अन्नदाता की तरह “शिक्षक” में ऊसर को उर्वरा करने की एक “अकूत-हिम्मत” है।

वह एक ऐसा इंद्रधनुष है, जिसमें सभी रंग है। कभी सागर है, तो कभी तरंग है।

वह रोज़ छोटे-छोटे सपनों से मिलता है। मानो उनके बहाने स्वयं पुष्प की तरह खिलता है!

उसके हिर्दय की गहराई तो समझिए वह देश के सर्वोच्च “राष्ट्रपति” पद पर आसीन होकर भी, अपने आपको “शिक्षक” कहलवाने में ही गौरवान्वित होता है।

शिक्षक,पुष्प का बाह्य सौंदर्य नहीं, कभी न मिटने वाली एक सुगंध है। और इस बदलते परिवेश की आंधियों में, अपनी उड़ानों को जिंदा रखने वाली एक पतंग है।

अनगिनत और बिखरे विचारों के दौर में, मात्राओं के दायरे में लय बद्ध, भावों को अभिव्यक्त करने वाला एक छंद है।

मग़र जब से सरकार ने “शिक्षा” का व्यवसायीकरण किया है, यदि तब से ढूंढोगे, तो जरूर उसमें सैकड़ों कमियां नजर आ जाएंगी। क्योंकि “शिक्षण” जो एक “कला” है उसे एक “काम” समझ लिया गया है..?

तुम्हारे आसपास कोई ऐसी ही सूरत नजर आएगी.. लेकिन मेरा यकीन मानो, कभी ज़ीरो-ग्राउंड (कक्षा में) पर आकर देखो, जिस वक़्त “शिक्षक अपनी भूमिका में होता है। तब वह जमीन पर होकर भी, आसमान.. सा होता है।”

अगर चाहते हो उसे जानना। और ठीक-ठीक पहचानना। तो अपने सारे पूर्वाग्रहों.. को मिट्टी में गाड़ दो। और अपनी आस्तीन पे लगी, अहम् की सारी रेत झाड़ दो। फाड़ दो वे पन्ने जिन में, शिक्षक के प्रति नियोजित तरीके से बेतुकी शिकायतें गढ़ी गयी हैं। उखाड़ दो वे जड़े, जिनमें निजी फायदे छुपे हैं। फिर देखो.. “शिक्षक” आपको धीरे-धीरे स्वतः ही समझ में आने लगेगा अपने “सत्य-स्वरूप” के साथ, तुम्हीं में वह खुद व खुद समाने लगेगा.. 👍

धन्यवाद शिक्षा जगत से जुड़े सभी साथियों को सादर समर्पित .. 🙏

मां सरस्वती के मंदिर..”के.एल.जैन इंटर कॉलेज,सासनी,” का है एक छोटा सा पुजारी (शिक्षक)

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