मेरा सभी किसान व मजदूर भाइयों को.. नमस्कार !
मैंने, वर्तमान सरकार (बी.जे.पी.) की ‘किसान विरोधी’ नीतियों से दुःखी होकर..जब अपने देश के ‘इतिहास’ के पन्नो को उलट कर देखा, तो तत्कालीन भारत के एक जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति के एक ग़लत निर्णय से देश के गुलाम होने के मूल कारण पर आकर मेरा दिमांग एकदम ठहर सा गया..
ये मंज़र सत्रह वीं सदी के उस दौर का है, जब ‘हेक्टर’ नामक जहाज़ कुछ अंग्रेज व्यापरियों को लेकर भारत आया था। जिसके कप्तान हॉकिन्स ने सबसे पहले उस वक़्त के शासक बादशाह जहांगीर के दरबार में बड़े अदब से न केवल घुटनों के बल झुककर भारत की मातृभूमि को चूमा वल्कि बादशाह के प्रति अपना आदर भाव भी प्रकट किया। जो “नबन नींच की अति दुःख दायी” वाली कहावत को चरितार्थ करता है।
फिर एक बहुत ही क़ीमती भेंट प्रस्तुत करते हुए अपने देश इंग्लैंड के राजा जैक्स का पत्र जहांगीर को दिया…जिसको पढ़ने के पश्चात जहांगीर ने अंग्रेजों को देश में व्यापार करने की इजाज़त दे दी।
मानो, तभी से भारत का दुर्भाग्य शुरू हो गया…धीरे-धीरे अंग्रेजों ने न केवल अपना व्यापार फैलाया वल्कि भारत में अपनी जड़ें मज़बूत भी करने लगे..
देखते ही देखते भारत में अंग्रेजों का साम्राज्य स्थापित होने लगा..
1755 में अंग्रेजों ने हमारे देश वासियों की कमजोरियों का लाभ उठाते हूए.. अपनी ‘फ़ूट डालो और शासन करो’ (Divid & Rule ) वाली नीति से..
1760 में भारत के चार राज्यों ; बंगाल,बिहार,उड़ीसा और गुजरात को चूस कर न सिर्फ कंगाल कर दिया अपितु तबाही, भुखमरी जैसे हालात पैदा कर दिए जिससे वहाँ चारो तरफ ‘मौत ही मौत’ नज़र आने लगीं।
इसके बाद 1772 में इंग्लैंड से लॉर्ड हेस्टिंग्ज एक नए जनरल के रूप में आया..
उसका मक़सद था भारत के अधिक से अधिक सोने-चाँदी को इंग्लैंड पहुंचाना। उसने वही किया।
उसने एक एक्ट पास किया, जिससे भारतीय उद्योग धंधों को नष्ट करके गुजरात के सूरत में जुलाहों पर अत्याचार करके, रेशम के कपड़ा बुनकरों का उत्पीड़न करके उनका दस रुपये का कपड़ा एक रुपये में बेचने को मजबूर करने का खेल खेला गया।
इससे परेशान बेचारे कुछ देशभक्त जुलाहों ने अपने अंगूठे तक काट लिए थे
.. बाद में लार्ड विलियम वेंटिक ने देश वासियों को अपनी संस्कृति से दूर करने के लिए और उन पर अपनी अंग्रेजियत हावी करने के लिए अंग्रेजी भाषा अनिवार्य रूप से लागू करदी..
मग़र ये कदम उनका ग़लत साबित हुआ, इससे भारत के कुछ सच्चे देशभक्तों ने इसे सीखने के बाद उनकी नीतियों को समझकर उनकी ही काट की। ये पॉइंट भी भारत को आज़ाद कराने में काफी कारगर साबित हुआ।
निष्कर्ष ये है कि, दुर्भाग्यवश किसी देश का नायक, संस्था-प्रमुख, भारतीय समाज के आधार पर चेयरमैन, ग्राम-प्रधान व परिवार का मुखिया अर्थात किसी भी स्तर पर जिम्मेदार व्यक्ति अगर पद के प्रति ईमानदार व गम्भीर न हो, और अन्य जिम्मेदार लोग मूक-दर्शक बने रहें समय रहते वाजिव हस्तक्षेप करके उचित निर्णय न लें अर्थात सम्भालें.. तो हालात दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होते ही चले जाते हैं.. 👍
: मुख्य विचारक
; मुकेश ‘कालिया’ नीमगाँव,राया,मथुरा।
नोट- मुकेश जी ने ये विचार मुझे एक पेज पर लिखकर भेजे थे मुझे ठीक लगे तो ब्लॉग के रूप में publish कर दिए..👍