मेरे ख्याल से करोड़ो-अरबों वर्षों से……अगर मैं गलत नहीं हूँ, तो
जब से ये दुनियाँ अस्तित्व में आयी है तब से, यहाँ ‘कर’ या टैक्स निर्धारण के सदैव से अपने कुछ मानक रहे हैं, जैसे ; देश के महान ग्रंथ ‘रामायण’ में भरत द्वारा वनवास के दौरान ‘कर-व्यवस्था’ के बारे में पूछे जाने पर प्रभु श्रीराम ने कहा था,
कि भइया भरत! अन्य राजाओं की तो मैं नहीं कह सकता, मग़र हम लोग सूर्यवंशी हैं इसलिए हमें अपनी प्रजा से ‘कर’ सदैव सूरज की तरह ही वशूल चाहिए।
सूरज, बड़ी-बड़ी झीलों से, बड़े-बड़े नदी-नालों से और समुद्र आदि से उनकी सामर्थ्य के अनुसार वाष्प के रूप में जल लेता है और फिर ‘बादल’ बनाकर कम दबाव वाले क्षेत्रों में उसे वारिस के रूप में पुनः धरती को ही लौटा देता है जिससे धरती हर्षित होने के साथ-साथ पूरा वातावरण में शीतलता एवं मिट्टी में नमी सन्तुलन बन जाता है। विल्कुल इसी प्रकार किसी देश व रियासत के राजा को भी ‘कर’ ऐसे ही लेना चाहिए।
हिंदी के महाकवि तुलसीदास ने भी कुछ इसी ओर इशारा किया हैं;
“बरसत-हरषत सब लखें। ‘कर’ सत लखे न कोइ।। तुलसी प्रजा सौभाग्य से।भूप भानु सम होई।।”
अर्थात बर्षा हो तो सभी हर्षित हों, ‘कर’ ऐसा हो कि ‘कर’ देते समय कोई भी दुखी न हो।
तुलसीदास कहते हैं कि, प्रजा के सौभाग्य से ‘राजा’ का स्वभाव सूरज जैसा हो। जैसे; कि, टैक्स-निर्धारण का मानक न केवल उचित हो अपितु सामर्थ्य के मुताविक भी हो..
मग़र देश की वर्तमान सरकार की तरह मनमाना न हो..? “टैक्स” तो आटे में नमक की तरह होना चाहिए कि जनता कर’ दे भी दे और उसे पता भी न चले..
परन्तु सरकार उस टैक्स को पूर्ण-पारदर्शिता के साथ समाज के ‘विकास कार्यों’ में ही लगाए, जो सबको दिखें..
जैसे; स्कूल-कॉलेज ,हॉस्पिटल्स,हाई-वे बिजली-पानी की समुचित व्यवस्था आदि सब करे।
यहां मेरा भी वही सुझाव है जो काफ़ी वर्ष पूर्व अपनी रचना के माध्यम से महाकवि तुलसीदास ने कहा था,
जैसे; “मणि, माणिक महँगे किये, सहजे तृण, जल, नाज।। तुलसी सोई जानिए, राम ग़रीब नवाज़।।”
ज़रूरत मंदों का हित जानते हुये एकबार को मणि, माणिक भले ही महँगे हो जायँ मग़र आम इंसान के आवश्यकता की वस्तुएं जैसे; तृण ‘तिनके’ यानी भूसा-चारा, जल एवं अनाज आदि गरीब के लिए अवश्य सहेज कर रख लेने चाहिए।..
काश! हमारी सरकारें भी इसी पध्दति पर चलें, जैसे; शराब, सिगरेट यानी नशीले पदार्थों को महंगा करें, विमानों में ऐयरशिप्स, बी.एम.डबल्यू. जैसी गाड़ियों का महंगा होंना, रेल यात्रा में फर्स्ट क्लास,बिज़नेस क्लास आदि के टिकट महंगे हो जाय, तो आम जनता को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। दूसरे हाई-क्लास लोग तो सक्षम होते ही हैं। तो फिर बजट से क्यों शिकायत होगी..? फिर देशवासी क्यों दुःखी होगे..?
गरीबों के लिए तो सरकार को सामान्य बोगी,गरीबरथ आदि की संख्या बढ़ा देंनी चाहिए। किराया कम कर देना चाहिए।
इस पर किसी कवि की एक रचना बड़ी सटीक बैठ रही है..
“बलि मिस देखें देवता। ‘कर’ मिस मानव देव।। मोई मारिस विचार हत। स्वारथ साधन एव।।”
अर्थात आज के नेता संगी साथियों जैसे अडानी,अंबानी आदि कैपिटलिस्ट के हितों को साधने में लगे हुए हैं इस चक्कर में आम आदमी के पेट काटने की योजनाएं बनाई जाती रहती हैं। और वे अनन-फानन में तानाशाही वाले रौब से भोली-भाली जनता पर लागू भी होती जा रही हैं।
ये कारण है सामान्य लोगों के दुःख का। सिर्फ जुबान से राम राज्य की दुहाई देने से कुछ नहीं होगा। जमीन पर उतर कर करना होगा।
मुझे तो ऐसा लगता है कि ‘नेता- लोग’ सत्ता के नशे में ये तो ये, वे अपना परलोक भी बिगाड़ ले रहे हैं..क्योंकि,
“जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। तो नृप अवश्य नरक अधिकारी।”
धन्यवाद युग,पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा।