यदि इंसान की “मनःस्थिति” सुधरे तो फिर सब सुधर सकता है।
“मन” में विचारों की एक श्रंखला होती है। अर्थात हर पल कुछ न कुछ घटता ही रहता है।
लेकिन समस्या तब आती है, जब विचारों के साथ-साथ कई बार हम ख़ुद भी उठते और गिरते रहते हैं तथा जीवन में पैदा होने वाली तमाम असमानताओं का स्वयं कारण बनते हैं।
मग़र दोष सदैव परिस्थितियों और संबंधियों को या फिर सामाजिक व पारिवारिक हालातों को ही देते हैं।
निगेटिविटी के कारण अपने अंदर तमाम शारीरिक व मानसिक रोगों को पाल लेते हैं।
इससे बचने के लिए हम को “स्टॉप ट्रैवलिंग विद आवर अनवांटेड थॉट्स” अर्थात हमें अपने आप को कर्ता मानना बंद करना होगा। ये आपको थोड़ा सा विरोधाभाषी लगेगा मग़र सत्य है।
अगर आध्यात्मिक नज़रिए से देखें तो दुनियाँ में ‘कर्ता’ सिर्फ ईश्वर है, दूसरा कोई नहीं।
आप कभी भी विचार-प्रवाह के ‘थपेड़ों’ के हवाले मत हो जायेगा..
तो फिर..
क्या करें..?
“स्टार्ट ट्रेवललिंग विद योर ब्रीदिंग”
अर्थात अपनी सांसों के साथ यात्रा कीजिये।
लगातार अभ्यास से आप ऐसा कर सकोगे, “ये मेरा अपना अनुभव है। जब ऐसा होने लगता है, हम “कर्ता से दृष्टा” बन जाते हैं।
तब हम विचार रूपी प्रवाह के थपेड़ों से मुक्त होकर दूर से उनको उमड़ते घुमड़ते देखने लगते हैं..
और मानलो! कभी यदि हम किसी परिस्थिति में होते भी हैं, तो इस नज़रिए से परिस्थिति के उद्गम तक पहुंच जाते हैं और फिर तनाव की जगह सुधार के बाद हम नए रूप में रूपान्तरित हो जाते हैं।
ये भी एक विडम्बना है कि, सभी समस्याओं और तनावों के मूल में इंसान खुद ही होता है मग़र न जाने क्यों..? समाधान बाहर ढूंढता है..?
जो कि कभी भी संभव नहीं है। पहले हम “आत्मिक-स्तर” पर स्वयं से जुड़ें, खुद को जानें, फिर चाहे संसार की भौतिक उपलब्धियां हो, सामाजिक मान प्रतिष्ठा हो या आध्यात्मिक उपलब्धियां, जो भी हो..
ये सभी अभ्यास या कोई भी कार्य.. निरंतर होते रहना चाहिए .. रुकना, तो कतई नहीं चाहिए।
क्योंकि ‘एक कहावत के अनुरूप “जीवन चलने का नाम-चलते रहो सुबह-शाम” वाले सिद्धांत से और प्रकृति के नियमों से हमें जीवन बड़े संयम के साथ अच्छे से जीना चाहिए।
धन्यवाद ,जय हो! वसुधैवकुटुम्बकम!!
युग,पचहरा,नीमगाँव,राया, मथुरा।
Jeevan ka adhar hai ye
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Thanks
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Thanks जी
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