102-“बेवाक-विचार”

मांफ कीजियेगा..”दो-टूक” श्रृंखला में ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ वाले दृष्टिकोण से  “विचार” हमेशा बेवाकी से ही रखे जाते हैं।

इसलिए दोनों पक्षों के लिए थोड़ा असहनीय अवश्य होता है मग़र वही “सच” होता है। 

काश! ऐसा हो सकता.. कि किसान कुछ दिन केवल अपनी आवश्यकता और..थोड़ा बहुत सामाजिक स्तर पर अपने मजदूर साथियो की जरूरतों के लिए ही खेती करता..?, तो मात्र एक वर्ष में देश के ‘सेवक से बने सभी असंवैधानिक हुक्मरानों’ अर्थात तथाकथित नेताओं की अक्ल ठिकाने आ जाती..! 

और यदि मशहूर हिन्दी फ़िल्म “शोले” के ठाकुर वाले अंदाज़ में देश का अन्नदाता सरकार के इन नुमाइंदों से बोल पाता..

कि, “कह दो उस सरकार से जो जनता के टैक्स पर उसी की मालिक बनी बैठी है..उन अहसान-फ़रामोशों को अब ‘फल, सब्जी,दूध एवं रोटी.. डालना किसान ने बंद कर दिया है।” 

तो कम दाम में अच्छी-अच्छी चीजें  खाने वाले देश के सभी गद्दारों की सारी हेकड़ी निकल जाती..!

मत भूलिए, किसान के ही ऊपर सबके जीवन का गणित टिका होता है।

पूरी दुनियाँ में भारत ही वो देश है जिसके पास बेहतर ‘एग्रीकल्चर-लैंड’ के साथ-साथ उपयुक्त प्राकृतिक-जलवायु, सिंचाई आदि के समुचित साधन आदि उपलब्ध हैं। इसलिए उसे अन्य देशों की “कृषि-पॉलिसी” की राह पर ले जाने की भूल विल्कुल मत कीजियेगा।

जो लोग अपने बच्चों को लगभग ढाई लाख की मोटर साइकल, पचासों हजार के मोबाइल-सेट..   महंगे-महंगे सामान खरीद कर देते समय एक बार भी नहीं बोलते कि महँगा है..

  ऐसे लोग आज किसानों की ‘जायज माँग’ पर ये बहस कर रहे है कि ऐसा किया,तो दूध और गेहूँ अब महँगा हो जाएगा..?

अरे ज़रा शर्म करो..!  एमेजोन व माॅल्स से ख़रीददारी में अंधाधुंध पैसा उड़ाने वाले गेंहूँ की कीमत बढ़ जाने से डर रहे हो!!   तीन सौ रुपये किलो के भाव से ‘मल्टीप्लैक्स सिनेमा हॉल के इंटरवल में’ पॉपकॉर्न खरीदने वाले आज मक्का के भाव किसान को तीन रुपये किलो से अधिक न मिलें इस पर बे सिर पैर की बहस कर रहे हैं।

क्यों भई क्यों..?

  कोई एक बार भी कभी नहीं बोलता कि मैगी, पास्ता,पिज्जा,बर्गर व कॉर्नफ़्लैक्स के दाम बहुत ऊंचे हैं।

  1970 के महंगाई आंकड़े पर भी एक नज़र डाल लीजियेगा..तो     किसान के साथ आज़ादी के बाद से एक योजनाबद्ध तरीके से लगातार होता चला आ रहा “अन्याय” सबकी समझ में बड़ी आसानी से आ जाएगा..

    जी हाँ, 1970 में किसान एक तौला सोना अपने तीन कुन्तल गेंहूँ बेचकर खरीद लिया करता था। अगर सरकार महँगाई वृद्धि उसी अनुपात में किसान के गेहूँ के मूल्य में करती रही होती..? तो आज किसान को ‘आंदोलन’  करने की क्या पड़ी थी..?   

जनाव, 1970 में     गेंहू  का मूल्य लगभग 76 रु कुन्तल, था। उस वक़्त सोना लगभग 228 व 230 रु का एक तौला था। यानी..     तीन कुन्तल गेंहूँ = बराबर एक तौला सोना। 

   आज सोना लगभग 60,000/-रु तौला है।     जबकि गेंहूँ  मात्र 1900/- रु प्रति कुन्तल  पर ही आ सका है।     उसी दर से आज 1900×3=5700/-रु का एक तौला सोने का दाम कर दीजिये।     या फिर किसान के गेंहूँ का दाम 20,000/- रु प्रति कुन्तल कर दीजिये! ताकि वो तीन कुन्तल गेहूँ 20,000×3=60,000 की कीमत में एक तौला सोना ख़रीद कर अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर सके..!    

किसान को किसी की खैरात की जरूरत न कभी थी न आज है। उसे तो अपनी मेहनत के अनुसार अपना “हक़” चाहिए।

एक बात और आपको बताकर चलूं जो शायद आपको ध्यान भी नहीं रही होगी…   कि  काँग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री श्री पी.वी.नरसिंमहा राव को जब भारतीय किसान यूनियन के प्रणेता श्री महेंद्र सिंह टिकैत ने दिल्ली में ‘बोट-क्लव’ पर अपनी “किसान-शक्ति” के दम पर न केवल घेरा था। वल्कि अपने साथ ख़ुद पी.एम. को वार्ता करने को मजबूर कर दिया था। उसी दौरान  प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हा राव वार्तालाव के दौरान फ्लो-फ्लो में..उनकी टिकेत साहब के व्यक्तिगत सत्यता वाले “ऊर्जा क्षेत्र” के प्रभाव के आवेश में यकायक ये स्वीकार कर गए थे, कि “हाँ किसानों के साथ ‘अन्याय’ है।”

मग़र जैसे ही श्री महेंद्र सिंह टिकैत साहब ने कहा,कि “इस वक़्त आप देश के एक जिम्मेदार पद पर हो ,तो क्यों न किसानों के साथ होते चले आ रहे इस “अन्याय” को खत्म कर एक साफ- सुथरी व्यवस्था बना दो” परन्तु वो समय-अभाव व फिर कभी..पर टाल कर व कार्य की व्यस्तता आदि जताते हुए वार्ता से चले गए.. और तब से देश में कितने पी.एम.सी.एम. नए-पुराने हो गये लेकिन आज तक स्थिति..

‘जस की तस’ है..    

पिछले कई महीनों से इन ‘कृषि-बिलों’ पर कड़कड़ाती ठण्ड में अपना घर-बार छोड़कर..      “करो या मरो” वाली स्थिति में देश का किसान उसी “अन्याय” के ख़िलाफ़ देश की सरहदों पर पड़ा है..मग़र कुछ डिजाइनर लोग तो इसे ‘किसान-आंदोलन’ ही मानने को राजी नहीं हैं,

कुछ खालिस्तानियों का जमावड़ा, आतंकवादी या विपक्षी नेताओं की वर्गलाहट का हुज्जुम और तो और ‘आंदोलन-जीवी’ तक करार दे रहे हैं..

      कहने को तो ‘सत्ता-मदान्ध’ कुछ भी कहते  रहें..उनकी अपनी धृष्टता है..? मग़र सच क्या है..?  ये देश का बच्चा-बच्चा अच्छी समझ रहा है..      

क्योंकि मेरा ऐसा मानना है कि “अहम और झूठ के बादल सच के सूरज को ज्यादा देर तक छुपा कर नहीं रख सकते।” 

      वो “सत्यार्थ-प्रकाश” न केवल देश अपितु पूरी दुनियाँ के सामने एक दिन आ कर ही रहता है।        

इसलिए “धैर्य एवं संयम” से चलें।

      अच्छा, आप एक बात और बताइये! यदि किसान को खाद,बीज दवाइयाँ उचित रेट पर उपलब्ध हो जाएं और न्यूनतम समर्थन मूल्य की गैरेंटी-कानून के साथ उसकी हर फ़सल का उचित दाम मिल जाया करे, तो फिर किसान “आंदोलन” करेगा..ही क्यों..?

अगर सरकार देश की हर व्यवस्था जो उसका मूल कर्तव्य भी है उन सबके बीच एक सही सन्तुलन बनाये रखना चाहती है, तो कम से कम किसानों पर से अपने “कृषि-क़ानून” में हुई ख़ामियों को न केवल हटाये,वल्कि उनकी जगह कृषि-हित में नई व्यवस्थाएं अनुभवी किसानों को साथ बैठाकर बनाये, और ये बात देश के किसान भाइयों को भी अपनी ज़िद छोड़कर मान्य कर लेनी चाहिए…      

हम सबको किसान की थोड़ी सी “क़र्ज़- माफ़ी” बड़ी जल्दी नज़र आ जाती है। मग़र फ़र्ज़ी घाटा दिखा कर या दोस्ताना अंदाज में करोड़ो के लोन माँफ करा लेने वाले इंडस्ट्रीयलिस्ट किसी को कभी भी नहीं दिखते..? 

बेचारा किसान, किसी आपदा, जो कि सबको दिखती है, के कारण जायज तरीके से क़र्ज़ की माफी की माँग कर भी दे, तो कहने लगते हैं कि किसान बहुत नाजायज़ माँग कर रहा है।     दरअसल आज़ादी के बाद से अबतक.. किसानों के साथ सरकारों की ये ही  वो ‘दोहरी-नीति’ या ‘सौतेला-रवैया’ रहा है। जिससे ‘भारतीय-किसान’ की आर्थिक स्थिति जानबूझ कर एक योजना के तहत कमज़ोर की जाती रही है।

क्योंकि आज गेंहू सरकारी आँकड़ों में 1900 रुपये प्रति क्विंटल जरूर है। मग़र एम.एस.पी. की गारण्टी न होने की बजह से ज़मीनी हकीकत में किसान को बमुश्किल पंद्रह सौ रु प्रति कुंतल ही मिल पाते हैं।

चलो इसे भी छोड़िए..  देश में महँगाई की मार झेलते हुए आज गेंहूँ का दाम सरकारी आंकड़ों में 1900 है, तो =100×19 यानि लगभग 50 साल के में मात्र ‘उन्नीस गुना’ ही बढ़ा है।

जबकि उसकी तुलना में सोना आज लगभग साठ हज़ार रुपये प्रति दस ग्राम है

मतलब सोने की कीमतों में लगभग 226 गुना की दर से वृद्धि हुई है। मग़र किसान के लिए उसे 19 गुना ही रखा गया है.. क्यों ..?

ये कैसी जोर ज़बरदस्ती है ..? इस पर तर्क ये देते हो कि खाद्यान्न महँगे होने से आम आदमी को दिक्कतें आ जाएंगी इसलिए.. कम रखा है।

एक और तथ्य पर गौर फरमाइयेगा.. 1975 में एक सरकारी अधिकारी को 500/- रुपये वेतन मिलता था, जो आज एक राक्षसी वृद्धि से बढ़कर दो सौ पच्चीस गुना (लगभग सवा लाख रु महीने ) हो गया है। मैं ये नही कहता कि उनको इतना वेतन क्यों..? मग़र सबको किसान के खाद्यान्नों की मूल्य वृद्धि से ही क्यों आपत्ति है। क्या वो देश का नागरिक नहीं है..?

ये सब नेताओं की सोची समझी ‘कुटिल-नीति’ नहीं  है, तो क्या है..?

किसान इतना भोला है कि उस बेचारे को तो पता ही नहीं है कि उसे असल में आज़ादी के बाद से एक योजनाबद्ध तरीके से लगातार ठगा जा रहा है..

दरअसल बात ये है कि, सरकार को ‘एग्रीकल्चर-लैंड’ कम करके  किसान को शहरों में “दिहाड़ी-मजदूर” बनने को मजबूर जो करना है..  ?

इसीलिए किसी भी सत्ता-दल की मंशा ‘किसान-हितैसी’ हो, ये उनकी दशा और दिशा को देखते हुए सम्भव नहीं लगता..?

छोटे से लेकर बड़े-बड़े पदों पर आसीन देश के समस्त जिम्मेदार नागरिकों से मेरी अपील है कि, वर्तमान में किसानों के साथ हो रहे अन्यायों की पराकाष्ठा देश के समस्त पीड़ित नागरिकों को एक प्लेट-फॉर्म पर आने को मजबूर न कर दे, फिर कहीं ऐसा न हो कि देश के असंवेदनशील नेताओं की सारी “नेताही” धरी की धरी रह जाय..? क्योंकि वर्तमान-सत्ता का भी जनता को आज वही राक्षसी रूप दिख रहा है। जो 2014 से पूर्व कांग्रेसियों का हो गया था।

  ये बात सर्व विदित है कि “इतिहास लोगों को प्रेरणा देता आया है, और सदैव देता रहेगा भी।

इसलिए जनता आपको भी सिरे से ख़ारिज न कर दे।  ये देश की सरकार व जिम्मेदार पदों पर आसीन पदाधिकारियों को वक़्त रहते समझना होगा..?

किसी को भी आप एक लम्बे समय तक मूर्ख बनाके नहीं रख सकते। एक वक़्त तो आता ही है उसके जगने का। 

ध्यान रहे.. बरसों तक किया जाता रहा शोषण अंततः हिंसा को ही जन्म देता है। जैसे; आदिवासियों पर हुए अत्याचार ने “नक्सल-आंदोलन” को जन्म दिया था और अब देश के दुर्भाग्यवश किसान को भी आपने लगभग पिछले सात महीने से उसी जगह पर ला कर खड़ा कर दिया है..?

आप चाहते क्या हैं..?  कि समर्थन मूल्य के झाँसे में फँसे किसान के खून में सनी रोटियाँ अपने आलीशान डाईनिंग हॉल में सजी इटैलियन मार्बल वाली ‘डाइनिंग-टेबल’ पर ऐसे ही खाते रहेंगे..और अन्नदाता सरहद पर पड़ा रहेगा..?  

आख़िर कब तक..?

और जब आज किसान को सारा खेल समझ में आ गया है, तो वह  अपनी बात भी न रखे..?    वाह ! भई, वाह ! अच्छी तानाशाही है। 

  किसान भाइयों ! क्या आपको पता है कि आपके क्षेत्र का सांसद व विधायक आपका सेवक होने की आड़ में एक साल में चार-चार लाख की बिजली मुफ़्त फूँक देता है। और ये सब आपके गलत रवैये के कारण ही आपके ऊपर ‘अधिकारी’ बने बैठे रहते हैं।  

  जबकि कि “लोकतंत्र” की आड़ में नेताओं द्वारा आम जनता के लिए इन्हें “प्रत्यक्ष-प्रतिनिधि” (जन-सेवक) के रूप में परिभाषित किया जाता रहा है।

क्या वास्तव में वे होते हैं..? 

  ये हम सभी अच्छी तरह जानते हैं।  आपके ये प्रतिनिधि जो आपकी बात संसद और विधान सभा तक न केवल पहुंचाने के लिए होते हैं,वल्कि अपने क्षेत्र की ज्यादा से ज्यादा समस्याओं के निराकरण हेतु ही निर्वाचित किए जाते हैं। जिसके एवज़ में ये अच्छी-खासी तनख्वाह व महंगाई-भत्ते व पेंशन आदि डकारते हैं।  लेकिन चुने जाने के बाद वो आपके ही गलत रवैये से ख़ुद को बहुत उच्च स्तर का मानने लग जाते हैं…और आपको निम्न।

भाइयो, ये देश के समस्त नागरिकों, के सचेत हो जाने का समय है। आप ख़ुद कहिए, कि  साठ से अस्सी रुपये लीटर दूध और कम से कम साठ रुपये किलो गेंहू खरीदने के लिए हम सभी नागरिक तैयार हैं, तो ही बात बनेगी। मग़र कहें कैसे..?  लोगों के स्वार्थ आड़े आ जाता है…? 

  अरे क्या हुआ.. कुछ कटौती अपने ऐश-ओ- आराम में कर लीजिएगा। नहीं तो आने वाले वक़्त में जब अन्नदाता ये चीजें उगाएगा ही नहीं  तो फिर आपको बहुराष्ट्रीय कंपनियों से उस दाम पर भी खरीदनी होंगी जो आपकी सामर्थ्य से भी परे होंगी..?   

सोचो.. विचारों.. वक़्त बहुत कम है।

वर्तमान स्थिति को एक किसान के नजरिये से देखने का प्रयास..कीजियेगा.

कृपया किसानों एवं हिंदुस्तान के हित में इसे न केवल स्वयं पढ़े यदि उचित लगे, तो अपनों को शेयर भी कर दीजियेगा।

👍 जय जवान ,जय किसान।

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