110-“इज्ज़त / बेइज्जत”

यदि मनुष्य स्वयं को ईश्वर प्रदत्त सच्चे एवं सरल स्वभाव..वाले ‘स्वरूप’ में रख पाता है, अर्थात ‘मनुष्यता’ के दायरे में रहता है, तो

मेरा ऐसा मानना है कि,उसके लिए, दुनियाँ में फिर “इज्ज़त-बेइज्जत” नाम की कोई चीज़ नहीं रह जाती। फिर वो एकदम ‘सरल’ हो जाता है।

मग़र बुजुर्ग सदैव कहते आये हैं.. ‘सरल’ होना कठिन है।

दरअसल, दुनियाँ भर के लोग जिसे ‘इनसल्ट’ कहते आये हैं वह असल में इंसान का ख़ुद का ही “ईगो-स्वरूप” (Ego-Form) है।और कुछ नहीं।

विचार कीजियेगा.. ये बात ज़रा नाज़ुक है! ‘ईगो’ शब्द ऐसा है, दुनियाँ में जितने लोग इसकी उतनी ही परिभाषाएं हो जाएंगी..

मग़र ‘ईगो’ को मैंने, जितना जाना या समझा है.. मेरे ख्याल से ये है..”Considering yourself what you are not, and then trying you are hard to protect ‘the thing’ ” that’s ‘Ego.’

जैसे; “अस्सी जट मैं! मैं,हूँ अस्सी जट ! ,अस्सी साड्डा ए..!, बोल कें..कीता..? “

ये वाला जो रुआब है, दरअसल यही ‘ईगो-स्वरूप’ है।

मेरा सभी ब्लॉग-रीडर्स से विनम्र निवेदन है.. कि, कोई भी इसे व्यक्तिगत न ले.. बस एक उदाहरण के तौर पर मेरा ‘फ़िकरा’ (View) समझने का प्रयास कीजियेगा..

जैसे; मैं नौकरीशुदा ! मैं अध्यक्ष ! , मैं संस्था-प्रधान!, मैं सचिव! वग़ैरह वग़ैरह… ये जो “मैं” है, बस यही ‘ईगो’ है।

ऐसी बातें इंसान सदैव ‘ईगो’ के वशीभूत ही बोलता है। वरना, ऐसे अनर्गल-प्रलाप की आवश्यकता ही क्या..है! और फिर उसी के अनुरूप अपना मनगढ़ंत “इज्ज़त / बे-इज्ज़त का एक पैरामीटर सैट कर लेता है। जो एक निम्न ‘सोच’ का द्योतक है।

अन्यथा ‘सरल-स्वभाव’ वाले बन्दे, तो हमेशा ऐसा विचारते हैं कि, योग्यता+कार्यानुभव+पूर्व कर्मों के संस्कारों द्वारा निर्मित प्रारब्ध से जो भी दायित्व हमें मिलें हैं, वो एक निश्चित वक़्त के लिए ही तो हैं। उन्हें बख़ूबी निभाएं.. क्योंकि एक निश्चित समय-सीमा के बाद वही दायित्व किसी और को मिल जाने हैं, आख़िर अमुक-ओह्दे की पहचान तो एक अच्छे या बुरे ‘बन्दे’ के रूप में ही होनी है। जैसा उसका “वर्क ऑफ नेचर” रहेगा। फिर क्यों अपनी पीढ़ियों को ख़राब करते हो….

मुझे तो ये ‘संसार की चक्रीय-क्रम’ व्यवस्था के अंतर्गत एक “कार्य-हस्तांतरण” जैसा खेल लगता है। परन्तु इसे लोगों ने अज्ञानतावश ‘ईगो’ के वशीभूत अपनी इज्ज़त / ‘बेईज्जती’ से जोड़ लिया है जो एकदम निराधार है ग़लत है।

असल ‘सवाल’ तो इस बात का है कि, जिस भी बन्दे को कोई छोटी या बड़ी अमुक जिम्मेदारी मिली.. उसने वह “निभाई कैसी..?” वह “उसके-साथ” न्याय कर सका या नहीं..?

यदि नहीं.., तो लोक-प्रचलित दो ‘सैद्धांतिक-कहावतें’, “सत्ता पाहि काहि मद नाहिं”, एवं “राजेस्वरी सो नरकेस्वरी” ये दूध का दूध और पानी का पानी करने में पूर्ण सक्षम हैं।

इसमें कोई दोराय नहीं है। ये कहावतें किसी भी जिम्मेदारी के सन्दर्भ में बंदों पर यदि चरितार्थ होतीं हैं, तो ये जग ज़ाहिर है।

अपनी सन्तुष्टि के लिए आप इतिहास में भी झांक सकते हैं।

कर्मयोग में स्पष्ट लिखा है, न सिर्फ पद के ‘मदान्ध बंदों’ को वल्कि उनकी आने वाली सन्ततियों को भी इस ईगो लिप्त एक-एक “क्रिया-कलाप” का भुगतान करना होता है। दुनियाँ में कोई भी कर्म खाली नहीं जाता! अच्छे को अच्छा और बुरे की बुरा भोगना ही होता है।..That solve..

धन्यवाद

4 thoughts on “110-“इज्ज़त / बेइज्जत””

  1. अहंकार कभी भी सत्य को नहीं स्वीकार करता

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