आज ‘अपोलो-13’ अधिकतर के लिए मात्र एक ‘हॉलीवुड मूवी’ है..
जबकि वास्तविकता ये है कि यह एक सच्ची घटना है जो बहुत ही प्रेरणादायक है। इसे जन-जन तक पहुंचाने के लिए इस पर मूवी प्लान की गयी.. निर्देशक के साथ-साथ अन्य सभी में ‘टीम-स्प्रिट’ को देखकर आप कह सकते हैं..कि ये फ़िल्म हम सबके लिए आज ‘सही निर्देशन’ की एक बेहतरीन मिसाल है।
ये मंज़र उस दौर का है जब,अमेरिका के फ़ेल्ड.. मून मिशन पर जाने वाले “अपोलो-13” चंद्रमा के बिल्कुल नजदीक पहुँचते-पहुँचते अंतरिक्ष यान के लगभग फेल हो जाने की स्थिति में..
उसकी हालत ये हो गयी थी कि उसमें पॉवर विल्कुल न के बराबर बची थी। ‘न’ के बराबर से मेरा मतलव है कि, प्रेसर इतना कम हो गया था कि, अंतरिक्ष यान तो क्या..उतने कम प्रेसर पर, किसी घर का वैक्यूम क्लीनर भी नहीं चल सकता!!
उन परिस्थितियों में अंतरिक्ष यान चंद्रमा से धरती पर वापस आएगा.. ये कहना तो एकदम असम्भव ही था!
मग़र उन कर्मयोगी ‘फरिश्तों’ ने पूरी दुनियां को एक ‘सकारात्मक-सोच’ के जादू से असम्भव को सम्भव करके दिखाया!!
एकबार को लग रहा था कि कुछ भी सम्भव नहीं है। अधिकतर लोग हताश होने लगे थे, हर कोई मान चुका था कि अंतरिक्ष यात्रियों में से दुर्भाग्यवश वहाँ अब एक भी जीवित नहीं बच पाऐगा..😢
यहाँ तारीफ़ करनी होगी..मिशन के डायरेक्टर ‘जीन क्रेंज’ की। क्योंकि उन हालातों में मिशन के मुखिया ने एक ऐसा डायलॉग बोला, जो ‘मील का पत्थर’ साबित हुआ..।
“Failure is not an option.”
अर्थात ‘असफलता तो विकल्प ही नहीं है।’
उसी वक़्त यह ‘डायलॉग’ इतिहास के पन्नों पर सदैव के लिए दर्ज हो गया। आप, कभी ‘नासा-ह्यूस्टन’ जाइएगा, तो इस डायलॉग को वहाँ की दीवारों पर लिखा पाएंगे।
इस डायलॉग के ज़रिये ‘जीन’ ने अंतरिक्ष-यात्रियों का हौसला बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें ये भी बोला..कि
“America has never lost any person in any moon mission and ‘Most certainly America will not loose anyone in my leadership.”
अर्थात् ग़ौरतलब है अमेरिका ने किसी भी ‘चंद्रमा मिशन’ पर आजतक कोई भी यात्री नहीं खोया, और ..
जीन क्रेंज़ ने तुरन्त कहा! ये तय है कि मैं अपने नेत्रत्व में ऐसा कलंक अपने ऊपर कभी नहीं लगने दुंगा..?
ये ही है वो “हौसला”..! जिसने न केवल इतिहास रचा..अपितु पूरी दुनियां के लिए एक प्रेरणादायक प्रकरण बनकर सामने आया..आगे हम और आप जानते ही हैं उन सबकी हिम्मत और मेहनत से सभी अंतरिक्ष यात्री पुनः धरती पर सकुशल वापस आए।
यह कहानी है उस “हौसले”.. की। जो ये ज़ाहिर करता है, कि ‘नेत्रत्व वही मज़बूत है, जो वक़्त की नज़ाकत समझते हुए विकट परिस्थितियों में भी सही फ़ैसले लेने की सामर्थ्य रखता हो।’👍
यहाँ हमें ये मानना पड़ेगा कि, मनुष्य वाक़ई “शक्तिमान” है। उसकी ‘कल्पना-शक्ति’ में बेजोड़ ताक़त है जिसे शब्दों में कभी अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता।
बशर्ते कि, वह ‘अपनी-पर’ आ.. जाय !
तो आप ख़ुद सोचिए.. वह क्या..? नहीं कर सकता..मेरा मतलव..’वह सबकुछ कर सकता है।’
मनुष्य के समक्ष सदैव दो बाह्य शक्तियाँ जो पूर्ण प्राकृतिक हैं और सात ‘आंतरिक-शक्तियाँ’ जो उसके ख़ुद के अंदर मौजूद रहतीं हैं..सम्पूर्ण जगत में इन ‘नौ’ शक्तियों के अतिरिक्त कोई अन्य शक्ति होती नहीं। यदि कोई इनका आपस में सही संयोजन बना पाय, तो मनुष्य में वाक़ई ‘अकूत’ ताकत है! फिर कभी किसी अन्य लेख में उन सभी नौ शक्तियों की चर्चा अवश्य करेंगे।
आप यदि किसी ‘पूर्वाग्रह’ से ग्रसित न हों, तो मैं एक बात कहूँ..ध्यान कीजियेगा.. लगभग एक वर्ष पूर्व देश में बेहद अनिश्चय का माहौल था।
सवाल “Covid-19 महामारी से कैसे बचा जाए..?”
उस वक़्त ये ‘सवाल’ भी ‘अपोलो-13’ की कहानी से कम जटिल नहीं था। अंतरिक्ष-यात्रियों की ही तरह उस वक़्त कोई कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था..?
लॉकडाउन..के दौरान मैंने हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी को बड़े गौर से पढ़ा.. सच कह रहा हूँ.. मैं शॉक्ड रह गया.. उसमें हमारे देश के प्रति बहुत अच्छे संकेत नहीं थे। मग़र अन्य देशों की तुलना में आज लगभग एक वर्ष बाद देश में जो भी स्थिति है। मैं इतना तो जरूर कहने की हालत में हूँ कि, वह हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट से कहीं बेहतर है।
इसका श्रेय देश के वैज्ञानिकों, मेडिकल स्टाफ़ की दिन रात की कड़ी मेहनत, देश की फोर्स आदि के साथ-साथ देश के नागरिकों की बेहतर प्रतिरोधक क्षमता और समय से वैक्सीन तैयार कराने…और फिर उसके मुफ़्त टीकाकरण की समुचित व्यवस्था कराने आदि सब के पीछे एक व्यक्तित्व ऐसा भी है..
जो ‘अपोलो-13’ के डायरेक्टर मिस्टर ‘जीन क्रेज’ की तरह इस भयंकर महामारी की गिरफ्त से बचाव के अपने ‘अप्रत्याशित-प्रयासों’ से देश को क़रीब-क़रीब निकालकर ही ले आया है। तो इसका बहुत कुछ श्रेय देश की “बुलन्द हौसले & फैसले लेने वाली” वर्तमान लीडरशिप को क्यों नहीं जाना चाहिए..?
मग़र सबकुछ साफ दिखने के बावजूद भी ये सच्चाई बहुतों के गले नहीं उतरेगी.. लेकिन सच तो आख़िर सच ही रहता है..इतिहास गवाह है..झूँठ के बादल सच के सूरज को कभी भी बहुत देर तक ढक के नहीं रख पाए हैं। वह आख़िर निकल कर आ ही जाता हैं। धन्यवाद।
आपका युग