104-“शख़्सियत”

जनाव!

कितना ही अच्छा हो..! कि,

हम अपने समाज में सिर्फ एक ‘शख्स’ बनकर ही नहीं, वल्कि एक सरल-स्वभाव वाली “शख़्सियत” बनकर उभरें..और जीवन के हर-पल को जिएं….

क्योंकि ‘शख्स’ तो क्रिकेट के खेल की तरह ‘सांस’ रूपी अपने निश्चित ‘ओवर्स’ की समाप्ति पर (जो “प्रारब्ध” की ‘पूर्व-निर्धारण’ व्यवस्था है।) उसके अन्तर्गत एक नियत ‘समय’ के बाद दुनियाँ से विदा हो जाना है….

मग़र ये “शख़्सियत” की सरलता हमारे ‘स्थूल-शरीर’ के दुनियाँ छोड़ जाने के बाद भी..

परिवार, समाज, देश व दुनियाँ जिस भी मुक़ाम पर हम होंगे उसी वातावरण में…

आपकी भलाई-बुराई ‘सूक्ष्म-शरीर’ के रूप में काफी वक़्त तक लोगों के जहन में एक यादगार बन कर मौजूद रहती है।

इसीलिए हमें कठिन नहीं एक सरल-स्वभाव वाली “शख़्सियत” अख़्तियार करनी चाहिए।      

धन्यवाद       

आपका दिन शुभ हो            🙏नमस्कार🙏   

विचारक:  युग,पचहरा, नीमगाँव,राया,मथुरा।

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